गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - ठण्ड में ठग

तेज ठण्ड है। हाथ-पैर-सिर सब ठण्ड के मारे कांप रहे हैं। इधर अखबारों में ठण्ड की नहीं ठगों की चर्चा है। रोज नए नए ठग पैदा हो रहे हैं। ठगों ने अपने पेशे को वैधानिक चौला पहना दिया है। वे अब ठगी के लिए कम्पनियां बनाकर ठगी कर रहे हैं। ठगी के नए-नए तरीके ईजाद कर रहे हैं। अठारहवीं सदी में देश पर ठगों का साम्राज्य हो गया था। पिण्डारी के ठग बहुत प्रसिद्धि पा गये थे। वे आज भी भारत के इतिहास में विख्यात है कुख्यात नहीं।

ठग कहां नहीं है, अर्थात सर्वत्र है। साहित्य, संस्कृति, कला, राजनीति, अफसर शाही, सचिवालय, राजधानी तथा सत्ता के गलियारों में सब जगह ठगों का साम्राज्य है। हर नेता, बड़ा अफसर और व्यापारी मुझे ठग नजर आता है। वे बेचारी भोली भाली जनता को ठगने का काम करते हैं। जनता हार कर ठगी जाती है। ठग राजधानियों में ज्यादा पाये जाते हैं। केन्द्र की राजधानी दिल्ली में तो हर तरफ ठग ही ठग है। जैसा ठग चाहे बस मिल ले। एक बार मिल लेने से कुछ नहीं बिगड़ता, काम बन सकता है ठण्ड में ठगी करने का मजा ही कुछ और है।

हर नेता दूसरे नेता को ठग समझता है विपक्षी नेता तो सरे आम सरकारी नेता को ठग कहता है और सरकारी नेता अपना समय आने पर विपक्षी को ठग साबित कर देता है। बाबा रामदेव को भी ठग की उपाधि एक नेता ने अपने श्रीमुख से दे दी है। अन्य भगवानों को भी शीघ्र ही ठग की उपाधि मिल जायगी। ठगने, और ठगा जाने में बड़ा अन्तर है। ज्यादा सीधे सादे सरल लोग चालू, चालाक, तेज, तर्रार, धूर्त लोगों के द्वारा ठगे जाते हैं। साहित्य,-संस्कृति और कला में भी ठगों का बड़ा जोर है। कविसम्मेलन के आयोजक तो ठगों का ही दूसरा अवतार माने जाते हैं। आप एक अच्छी फिल्म के लिए जाते हैं और वोर फिल्म देखकर स्वयं को ठगा महसूस करते हे। बाजवक्त ठग आलोचक का मुखौटा लगा लेता है ऐसे मुखौटे वाले आलोचक ठग साहित्य में काफी पाये जाते हैं।

राजनीति में ठग वास्तव में उच्च स्तर के दलाल होते हैं जो सत्ता के गलियारों में चहल-कदमी करते रहते हैं। ये ठग किसी की भी फाइल को पास कराने की ठगी वसूलते रहते हैं यदि आपके सम्बन्ध सत्ता से अच्छे है तो आप ठगी की कला को पाठ्यक्रम में भी जुड़वा सकते हैं। ऐसी नामी गिरामी कम्पनियां अपने पे रोल पर ठग और पाठ्यक्रम समितियों के सदस्यों को ठगी का भुगतान भी करती है।

वास्तव में ठगी सुविधा सम्पन्न होने का सरल रास्ता है। गरीब को मध्यमवर्ग और मध्यम वर्ग को अमीर और अमीर को शक्ति सम्पन्न ठगता रहता है। भोली भाली ग्रामीण बाला को शहरी बाबू ठग कर चला जाता है। ये शहरी बाबू बाद में पकड़े भी जाते हैं।

गरीब और आम आदमी को ठग कर कितने ही लोग धनवान, सत्तवान, बन गये है। लेकिन ये ठग बाद में किसी को भी नहीं पहचानते हैं। राजनीति, साहित्य, कला, संस्कृति, सत्ता के सारे रास्ते ठगे जाने वाले व्यक्ति के पिचके हुए पेट से ही गुजरते हैं। ठगो के सारे कर्म आम आदमी को गरीब बनाये रखने का एक पडयन्त्र ही होते हैं। सारे ठग आदमी को भीड़ समझ कर स्वयं स्वयंम्भू मठाधीश हो जाते हैं। भूखे पेट वाले को ठगना आसान हैं क्यो कि भूखा पिचका पेट नये साम्राज्य को जन्म देता है, मगर हर क्रान्ति करने वाला बलि हो जाता है क्रान्ति की सफलता ही क्रान्ति-कर्ता की असफलता है। उसे तो मरना पड़ता है। लेकिन ठग तो क्रान्ति के झंझट में नहीं पड़ता है। वो तो ठगी करके अपना काम निकाल लेता है। ठग हमेशा व्यावहारिक होता है वो सिद्धान्तों के चक्कर में नहीं पड़ता है सफलता ही ठग का मूल मन्त्र होता है।

व्यवस्था में परिवर्तन ठगी से नहीं, हो सकता उसके लिए प्रतिबद्ध मानवीय सहयोग होना चाहिये।

ठगों को अपना काम करने दीजिये क्योंकि वे नहीं तो कोई ओर अपने को ठगेगा। पुलिस वाले की बीबी नहीं तो किसी मंत्री की बीबी ठगेगी। अपनी तो नियति ही ठगा जाना है सो है पाठकों स्वयं को ठगा जाने के लिए तैयार रखिये और जब भी चुनाव आयोग का आदेश आये इन ठगों को निकाल बाहर कीजिये।

0 0 0

यशवन्त कोठारी

86, लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर 302002

फोन 2670596

2 blogger-facebook:

  1. काश यह हो पाता कि हर चुनाव में हम इन ठगों को अपनी ज़िंदगी से बाहर निकाल पाते तो देश का कितना भला होता. मेरी बधाई स्वीकार करें.

    उत्तर देंहटाएं
  2. Aapki Rachna ne to Mughe he Thag Liya.....Ravi

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------