बुधवार, 7 दिसंबर 2011

अनन्‍त आलोक की लघुकथा नपुंसक

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एक मित्रनुमा प्राणी ने मेरी फेसबुक वाल पर एक फोटो शेयर किया जिसमें एक सोई हुई अर्धनग्‍न लड़की का एक वक्ष अग्रभाग तक प्रदर्शित हो रहा था । मेरे लॉगइन करने से पहले उस पर असंख्‍य भद्र, अभद्र कमेंट्‌स आ चुके थे। मैंने भी अपना स्‍वभाविक कमेंट छोड़ा '' इस में क्‍या नई बात है ? इट्‌स नेचर ।'' तुरंत प्रतिक्रिया हुई और एक कमेंट मेरे ही कमेंट पर आ गया '' नपुंसक''

मैंने उस पर जवाब पोस्‍ट किया ''नपुंसक तो ये सारा समाज है और मैं भी इसका हिस्‍सा हूँ लेकिन उस समय ये मर्द कहाँ होते हैं जब इन लड़कियों के साथ छेड़खानी होती है ? सरेआम अत्‍याचार होते हैं ,बलात्‍कार होते हैं''

इस टिप्पणी का प्रकाशित होना था कि सौन्‍दर्यपान करने वाले इन सभी प्राणियों के कमेंट्‌स धीरे धीरे रिमूव होने लगे और मुझे लघुकथा के लिए एक नया हॉट विषय मिल गया।

अनन्‍त अलोक

आलोक भवन ददाहू त0 नाहन जि0 सिरमौर हि0 प्र0 173022

email: anantalok1@gmail.com Blog: sahityaalok.blogspot.com

3 blogger-facebook:

  1. रवि जी आपका हार्दिक आभार |

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  2. इस लघुकथा में... आलोक के ‘आलोकित चिंतन’ की जो दिशा दिख रही है, वह प्रशंसनीय है।

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  3. श्रधेय जौहर साहब का हार्दिक आभार | आपका स्नेह आशीष इसी प्रकार बना रहे यही कामना है |

    उत्तर देंहटाएं

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