बुधवार, 7 दिसंबर 2011

मालिनी गौतम की कविता - नकाब

नकाब

वो तीन-चार लड़कियाँ

हमेशा बैठतीं हैं मेरी क्लास में

सबसे पीछे की बेंच पर

तैरती रहती है उनके होठों पर

शरारत भरी मुस्कुराहट

धीरे-धीरे खुसपुस-खुसपुस करती

एक दूसरे पर झुकी हुई

दबी-दबी आवाज में हँसतीं हुई

आँखों ही आँखों में इशारे करती हुई

हरदम डालती रहती खलल

क्लास के शांत वातावरण में

जैसे ही मैं देखती उन्हें आँखें तरेर कर

उनके चेहरे पर छा जाती

एक नासमझ सी चुप्पी

उनकी आँखों में उठते वलय

कुछ ऐसे वर्तुलाकार होते कि

पल भर को मैं भी डूब जाती उनमें

मेरे क्लास से निकलते ही

बिन्दास, चप्पल फटकारते हुए

वे भी गलियारों में निकल पड़तीं

उनकी खी..खी की आवाजें

स्टाफ-रूम तक मेरा पीछा करतीं

पर कभी-कभी अचानक

अपनें कुछ शुभचिंतकों को सामनें देख

वे ठिठक जातीं

उनके होंठ सिल जाते

और आँखें नीची झुकाए

उनके हाथ सहसा व्यस्त हो जाते

हवा में उड़ते दुपट्टों कों

सिर पर ओढ़नें में

कॉलेज से घर जाते समय

मेरी नज़र

अन्य विद्यार्थियों के बीच

उन्हें ही ढूँढती रहती

पर मुझे रास्ते पर दिखाई देते

कोलतार की काली सड़कों में

घुल-मिल जाते

तीन-चार काले लबादे

जिनमें से झाँक रही होतीं

काली, भूरी, मंजरी आँखें

अपरिचित..अनजान आँखें....

जीवन रहित, पीली, निस्तेज, बेजान आँखें...

और उन आँखों को देख

मैं कभी नहीं पहचान पाती

कि उनमें से कौन है....मेहजबीन....फरहीन

......हिना के ......सुल्ताना....

--

डॉ मालिनी गौतम

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