शनिवार, 17 दिसंबर 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की हास्य कविता - ईमान की परिभाषा

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

हास्य कविता :

हमें लगता है कि ईमान की बदली है परिभाषा

बिना दहशत बिना डर के सभी से खुलकर खाते हैं
हमारे बास तो प्रतिदिन हज़ारों में कमाते हैं।

कभी होती शिकायत है तो उनका कुछ नहीं होता
नियम से रोज ऊपर का उन्हें हिस्सा दे आते हैं।

कभी ईमान की सच्चाई की चर्चा हुआ करती
सभी हँसकर हमारे बास के किस्से सुनाते हैं\

उन्हें कोई बास कहता है कभी कोई बाप कहता है
सदा हमदर्द बनकर फर्ज़ का रिश्ता निभाते हैं।

हमें लगता है कि ईमान की बदली है परिभाषा
वही सच्चे कहाते हैं जो खाते और खिलाते हैं।

--

कविता :

सूरज की किरणों में बैठी

सुबह-सुबह जब धूप गुनगुनी
छत पर आती है
सूरज कि किरणों में
मां मुस्कराती है।

आसमान भी देख देख कर‌
गदगद हो जाता
जब छत रूपी बिटिया को
हँसकर दुलराती है।

ठंडी शीतल हवा झूमती
नदियों के ऊपर‌
लहरें जैसे हँसकर कत्थक‌
नाच दिखाती हैं।

बिजली के तारों पर बैठी
चिड़ियों की पंक्ति
चें चें चूं चूं चीं चीं का
मृदु गान सुनाती हैं।

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