गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

शंकर लाल कुमावत की हास्य-व्यंग्य कविता : लोकसभा का टिकट और मैं

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लोकसभा का टिकट और मैं

कल तो मजा आ गया

घर में उस वक्त उत्सव छा गया

जब एक पार्टी का बड़ा नेता

लोकसभा का टिकट देने

खुद मेरे घर आ गया।

 

खुशी का ये आलम दिल में नहीं समाया

दिल से निकल कर इतना बाहर आया

की श्रीमती जी ने गणेश जी की जगह

नेताजी को मोदक का भोग लगाया।

 

मैं ! मैं तो मन ही मन फूले नहीं समाया

लेकिन अगले ही क्षण मुझे होश आया

मैंने नेताजी के सामने सवाल उठाया।

 

मैं एक आम आदमी हूँ

राजनीति में कैसे चलूंगा ?

हर छोटे –बड़े मुद्दे पर

विरोधी सवाल उठाएंगे

पत्रकार राय जानना चाहेंगे

तो मैं क्या टिप्पणी दूँगा?

 

नेताजी बोले,

बस इतनी सी बात

अरे ये तो है बहुत ही आसान

देखो मैं अभी देता हूँ इसका ज्ञान

यदि कोई अपनी पार्टी के नेता पर आरोप लगाये

या अपनी पार्टी का नेता संगीन जुर्म में

रंगे हाथ पकड़ा भी जाये

तो जितना जल्दी हो सके बयान देना

सारे आरोप मनगढ़ंत और निराधार है कहना

और इसे विरोधी पार्टी और विदेशी ताकतों की साजिश बता देना।

 

यदि नेता विरोधी पार्टी का हो

उस पर वास्तव में ही मनगढ़ंत आरोप लगा हो

तो भी आरोप को गंभीर कहना

और नैतिकता के नाम पर, तुरन्त इस्तीफा मांग लेना|

यदि अपनी पार्टी शासित राज्य में

गोली चल जाये, या दंगे भड़क जाये

लाखों जाने जाये या हजारों आशियाने उजड़ जाये

इस पर विपक्ष जब आरोप लगाये

मीडिया सवाल उठाये

तो बयान देना

ऐसी छोटी-मोटी घटनायें तो होती ही रहती है

फिर भी राज्य सरकार ने अच्छा काम किया है

कम से कम 90 % दंगों को

होने से पहले ही रोक दिया है।

 

और यदि विरोधी पार्टी के राज्य में

किसी की जेब भी कट जाये

तो लाँ एंड ऑर्डर का मुद्दा उठाना

सरकार पर राज्य को लीबिया बनाने का आरोप लगाना

बिना देरी किये मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांग लेना

और राष्ट्रपति शासन का संज्ञान देना।

 

मैंने नेताजी को नमन किया

राजनीति का राज बताने के लिये धन्यवाद दिया।

लेकिन तभी एक और सवाल ने

दिल में संशय पैदा किया

इसलिए मैंने वो भी लगे हाथ

नेताजी से पूछ ही लिया

अपनी और विरोधी पार्टी को तो मैं सम्भाल लूँगा

लेकिन सिविल सोसायटी कोई सवाल उठाएगी

तो क्या जवाब दूँगा ?

 

नेताजी बोले

इसमें थोड़ी अक्ल लगाना

पहले तो बंदे को समझाना

फिर प्रेस कान्फ्रेंस में उसी पर

उल्टा आरोप लगाना

फिर भी नहीं माने, तो

पुलिस और सीबीआई को पीछे लगा देना

किसी सच्चे-झूठे आरोप में फंसा देना|

 

मैंने कहा

ये तो अनैतिक और गलत होगा

इस पर नेताजी पहले तो भड़के

फिर बोले

तुम जनता की तरह सवाल बहुत करते हो

अन्दर से सत्यवादी और नैतिक दिखते हो

तुम राजनीति में नहीं चलोगे

ख्वाबों में हो, ख्वाबों में ही रहो

अच्छे लगोगे

कह कर टिकट फाड़ा और चले दिये।

 

मैं कुछ सोचता, इससे पहले ही

श्रीमती जी चिल्लायी,

क्यों कब तक यो ही पड़े रहोगे ?

निद्रा से जागो और ऑफिस को भागो

वरना लेट हो गये तो हमें ही दोष दोगे।

 

मैं दौड़ते हुए ऑफिस गया

सांसें जब फूलकर वापस बैठी

तो थोड़ा श्वास लिया

अपने आप से परिचय किया

राजनीति तो दूर

अब राजनीति का सपना भी

नहीं लूँगा ये प्रण किया।

--

शंकर लाल, इंदौर मध्यप्रदेश

Email: Shankar_kumawat@rediffmail.com 02/09/2011

2 blogger-facebook:

  1. bahunt khub, janata ko hansate huve apane desh ki raj tantra paristhitiyon ke baare me bata kar desh vashiyon ko sachet kar rahe hai, aisi hasya kavy vastav bhrasta chari ke virodh me atee avashyak hai.
    isliye kavivar shankar ji ko bahunt bahunt dhanyavad.

    उत्तर देंहटाएं

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