गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

चंद्रेश कुमार छतलानी की कविता - समय

 

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समय

वट वृक्ष समय का चल भी है अचल भी।

पत्तियों में खँडहर पाओगे जड़ों में महल भी !

जीवन के क्षय होते क्षण मिल जाते हैं,

इसके पतझड़ के मौसम में !

बसंत में छिपे हैं कर्म और भावनाएं,

मोह-माया है समागम में।

 

मौन श्वास की खाद से बढ़ता है बीतता भी

झूलते फलों में है चहल भी पहल भी।।

वट वृक्ष समय का चल भी है अचल भी ....

धरती से जुड़ा है अटूट बंधन से,

नीले और काले आकाश तक फैला है।

 

अपनों को भूल कर कहीं मेला है,

माँ की कोख में हर समय अकेला है।

स्वर्ग में भी पसरा है और नर्क से भी जुड़ा,

समस्या भी यही है, यही है हल भी।।

वट वृक्ष समय का चल भी है अचल भी ....

 

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चंद्रेश कुमार छतलानी

परिचय

जन्म स्थान - उदयपुर (राजस्थान)

शिक्षा - एम. फिल. (कंप्यूटर विज्ञान), तकरीबन १०० प्रमाणपत्र (ब्रेनबेंच, स्वीडन से)

भाषा ज्ञान - हिंदी, अंग्रेजी, सिंधी

लेखन - पद्य, कविता, ग़ज़ल, गीत, कहानियाँ

पता - ३ प ४६, प्रभात नगर, सेक्टर - ५, हिरण मगरी, उदयपुर (राजस्थान)

 

ई-मेल - chandresh.chhatlani@gmail.com

यू आर एल - http://chandreshkumar.wetpaint.com

कार्य - १२ वर्षों से कंप्यूटर सोफ्टवेयर एवं वेबसाईट डवलपमेंट का कार्य

अभी एक विश्वविद्यालय (जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ) में लेक्चरर( कंप्यूटर विज्ञान)

5 blogger-facebook:

  1. मुदिता गोस्वामी9:17 pm

    बहुत ही सुन्दर, ह्रदय को छूने वाली रचना है| बहुत खूब लिखा है |

    उत्तर देंहटाएं
  2. Neera Srivastava3:38 pm

    satya, tathya aur bhavnaon ka mishran hai, chandresh ji bahut acha likha hai..... kripaya aur bhi rachanaye bheje !!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. Mohit Shrimal11:31 pm

    great wordings..touched

    उत्तर देंहटाएं
  4. Mahesh Kumar11:23 pm

    bahut sunder, padh kar acha laga.

    उत्तर देंहटाएं
  5. pragya soni11:13 pm

    what a beautiful words and realism

    उत्तर देंहटाएं

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