बुधवार, 7 दिसंबर 2011

पुरूषोत्तम व्यास की कविता - मुस्कान

 

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मुस्कान

अधरों के छोटे-से घरोंदे मे जो रहती,

अति-सुंदर सी मन को हर्षित करती,

बहुत शर्मिली-सी होती-मुस्कान ।

 

मुस्कानों-से जीवन चलता,

पथिक को अपना-पथ प्यारा लगता

संग छुटा-सबका

तुम्हारा मधु-सा संग न छूटा

पतझड़ से इस जीवन मैं

सुखद-सा एहसास करा जाती

लगती जैसे तितली-

बगिया-बगिया खुशियाँ बिखेरी थी ।

 

हर मोड़ पर जीवन के

तुमकों –ही अपना-सा पाया

प्यार जिसके ह्दय में

ढूढ़ लेगा वह-तुमकों

प्रकृति के हर-पुष्प पर,

तुम्हारी ही महक आयेगी ।

 

चंचल-चपल नयनों में,

काजल-संग तुम रहती हो,

संन्यासी के गांव में,

प्रणय-समीर बन बहती-हो

        ...... मुस्कान ।

--

ई-मेल pur_vyas007@yahoo.com

 

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