रविवार, 4 दिसंबर 2011

सत्यवान वर्मा सौरभ की कविता


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उषा उतरी पूरब से , कर सोलह श्रृंगार !
मानो दुल्हन लिए खड़ी, कोई हीरक हार !!

नदियाँ तट पे जब हवा, गए फाल्गुन राग !
भोरें आतुर हो उठे , पाने मस्त पराग !!


बस आडम्बर रूप है , पूजा-जप-तप ध्यान !
मन की आँखें देखती , कण -कण में भगवान!!

रोम -रोम में आप हो , आप रमें हर पोर !
आप मिले सब कुछ मिला , बाकी है क्या और !!

मानव को कैसे मिले , जीने का अधिकार !
बना रहे हर रोज हम , खतरनाक हथियार !!

नयी सुबह का आगमन, लगे तीज -त्यौहार !
मिलजुल के गाये सभी, कोई गीत मल्हार !!
 
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डॉ सत्यवान वर्मा सौरभ बडवा / सिवानी मण्डी : भिवानी / हरियाणा : भारत 
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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  फतुहा, पटना  की कलाकृति)

3 blogger-facebook:

  1. बहुत प्रेरक और सुंदर अभिव्यक्ति..

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत खूब सुंदर रचना.बधाई...
    मेरे पोस्ट में आपका स्वागत है

    उत्तर देंहटाएं

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