रविवार, 11 दिसंबर 2011

रामवृक्ष सिंह की दो बाल कविताएँ

(1)    पाखी पाहुन आए


मील हजारों दूर कहीं से, उड़कर पाखी पाहुन आए।
हाय मेरे भारत की धरती उनके मन को कितना भाए।।

प्रकृति खोले हरित हृदय-पट। मुदित भाव करती है स्वागत।
मंद मधुर झिर रहा समीरन। पाहुन जन-सेवा में शाश्वत।
चहक उठी बँसवार अचानक, सोहर कास-वनों ने गाए।
मील हजारों दूर कहीं से, उड़कर पाखी पाहुन आए।।

झीलों, जंगल, तालाबों पर। दलदल कास-वनी के भीतर।
खग-कुल का कलरव है मनहर। कूजित-अनुगूँजित नभ-प्रांतर।
झूम रही निर्द्वन्द्व जिन्दगी। तरह-तरह के नीड़ सजाए।
मील हजारों दूर कहीं से, उड़कर पाखी पाहुन आए।।

ओ रे पाखी पाहुन प्यारे। धन्य भाग तुम यहाँ पधारे।
कितनी दूर चले आए तुम। महज प्रेम की प्यास सहारे।
हम भी काश कभी उड़ पाते। इसी भाँति डैने फैलाए।  
मील हजारों दूर कहीं से, उड़कर पाखी पाहुन आए।।
 

(2)    अबकी बरस है सरदी ज्यादा


अबकी बरस है सरदी ज्यादा।
बार-बार कहते हैं दादा।
जब देखो ठिठुरा करते हैं
कनटोपे पर लाद लबादा।।
अबकी बरस है सरदी ज्यादा।।
    मन करता है लिए रज़ाई
    खेलें-कूदें, करें पढ़ाई।
बाहर इतनी धुन्ध घिरी है
    कुछ भी देता नहीं दिखाई।।
ऐसे में हमको नहलाने पर
मम्मी हैं क्यों आमादा।।
अबकी बरस है सरदी ज्यादा।
    कोहरे ने कोहराम मचाया
    अग-जग बस छाया ही छाया।
    दबे पाँव जो धूप थी आई
    उसे धुन्ध ने मार भगाया।।
खा-पीकर सो रहें चैन से
सबसे सुन्दर नेक इरादा।।
अबकी बरस है सरदी ज्यादा।

--

(डॉ. रामवृक्ष सिंह)
लखनऊ
ईमेल/email-rvsingh@sidbi.in

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