गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल गीत - बांदकपुर का मेला

बांदकपुर का मेला

दादाजी के संग गये थे
बांदकपुर के मेले में
भीड़ अधिक होने के कारण
हम फँस गये झमेले में।

कई दिनॊं से सोचा था
कि मैं मेले में जाऊंगा
मुन्नु चुन्नु और दादा को
अपने संग ले जाऊंगा।

दादाजी को बहुत मनाया
मुश्किल से तैयार हुए
मुन्नू चुन्नू मैं और दादा
मिलकर पूरे चार हुए।

बस स्टेंड गये तो देखा
बहुत भीड़ थी मेले की
धक्का मुक्की लोग कर रहे
अक्कल नहीं अधेले की।

जगह बसों में नहीं है बिल्कुल
लोग ठसाठस भरे हुए
खड़े हुये थे बच्चे बूढ़े
सहमे सहमे डरे हुए।

दादाजी बोले तब हमसे
नहीं कोई अब घर जायेंगे
भोले बाबा के इस मेले में
जैसे भी हो हम जायेंगे।
इस कारण से हम सबके सब
बैठ गये एक ठेले में
दादाजी के संग गये थे
बांदकपुर के मेले में।

मेला क्या था यूं लगता था
जैसे मच्छर भिनक रहे
जहां देखिये वहां आदमी
एक दूजे से चिपक रहे।

मंदिर के बाहर देखा तो
कई झुंड के झुंड खड़े थे
बम बम भोले बोल बोल कर
दरवाजे पर अड़े पड़े थे।

मंदिर के भीतर जाना तो
हमको बहुत कठिन लगा
शायद ही हम जा पायेंगे
हम सबको बस यही लगा।

दादाजी अब हमें पकड़कर
एक तरफ को ले आये
बुरी तरह से थके हुए थे
हम सब थोड़ा सुस्ताये।

इधर उधर हम रहे घूमते
कुछ भी समझ नहीं आया
भीतर जाने का उपाय
कोई भी सुझा नहीं पाया।

किंतु अचानक दादाजी के
मन मंदिर में बल्ब जला
मंदिर के भीतर जाने का
चटपट एक उपाय मिला।

एक पुजारी से दादा ने
की कुछ बात अकेले में
दादाजी के संग गये थे
हम बांदकपुर के मेले में।

पीछे के दरवाजे से हम
मंदिर के भीतर आये
और पुजारी ने सबको
शिवजी के दर्शन करवाये।
तुरत बाद मां पार्वती का
मंदिर हम सबने देखा
चेहरा जिनका दमक रहा था
माथे पर सुंदर टीका।

यहीं बगल के मंदिर थे
बैठे राम लखन भाई
और बीच में शोभित थीं
मां पतिव्र‌ता सीता माई।

राधा कृष्ण,विष्णु लक्ष्मी के
मंदिर में भी हम आये
बड़ी भीड़ थी सभी जगह
मुश्किल से दर्शन कर पाये।

नदी नर्मदा मां की भी
हमने सुंदर मूरत देखी
चारों तरफ जहां देवता थे
हमने दृष्टि अपनी फेंकी।

और अंत में भैरवजी के
दर्शन करने हम आये
जहां देखिये वहां वहां पर
ढेरों झुंड खड़े पाये।

शंकरजी के गीत गा रही थीं
महिलायें मस्ती में
बम भोला की धूम मची थी
इस बांदकपुर बस्ती में।

हर हर महादेव के नारे
भक्त लगाते जाते थे
अपने परिजन मित्रों के संग
आगे बढ़ते जाते थे।

मंदिर से बाहर आकर हम
सब मेले की ओर गये
एक जगह जादू के करतब
सबने देखे नये नये।

एक जगह बंदूकें लेकर
हमने साधे कई निशान
और निशाने साध साध कर
ले ली कई फुग्गों की जान।

कुंआ मौत का हमने देखा
कारें चलतीं दीवारों पर
कई लोग ऐसे भी देखे
जो चलते थे अंगारों पर।

एक बड़े होटल में हमको
दादाजी लेकर आये
बड़े मजे से हम चारों ने
छककर रसगुल्ले खाये।

झूलों के मेले में देखीं
झूलों की की नई नई किस्में
बोला मैंने दादाजी से
हम झूलेंगे सब इसमें।

ऐसा कहते कहते हम सब
बैठ गये एक झूले में
दादाजी के संग गये थे
बांदकपुर के मेले में।

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