शनिवार, 24 दिसंबर 2011

पुष्‍पेंद्र दुबे का आलेख - चाणक्य और चन्द्रगुप्त

चाणक्य और चन्‍द्रगुप्‍त

डॉ.पुष्‍पेंद्र दुबे

ब भी कभी राजनीति, अर्थशास्‍त्र, शिक्षा शास्‍त्र की बात होती है, वहां चाणक्य की चर्चा स्‍वतः ही होने लगती है। अनेक लोग तो बिना जाने-समझे ही चर्चा में कूद पड़ते हैं। देश की समस्‍याओं का वे एकमात्र हल चाणक्य नीति में बताने लगते हैं। चन्‍द्र्गुप्‍त को बनाने वाले चाणक्य ही थे। आज भी शिक्षक दिवस पर जब तक चाणक्य का उल्‍लेख न किया जाए, आयोजन अधूरा लगता है। राजनीतिक क्षेत्र में जो कभी पराजित नहीं होता उसे राजनीति का चाणक्य की उपाधि से विभूषित किया जाता है। चाणक्य ने चंद्रगुप्‍त के माध्‍यम से नंदवंश का नाश करवाया था और बाद में शासन की बागडोर मगध सम्राट चंद्रगुप्‍त ने संभाली। जिनके काल को भारतीय शासन व्‍यवस्‍था में स्‍वर्णिम काल कहा जाता है।

प्रश्‍न यह उठता है कि क्‍या चाणक्य ने चंद्रगुप्‍त को नंद के शासन काल में चलने वाली शिक्षा से शिक्षित किया था अथवा चाणक्य ने चंद्रगुप्‍त को अपनी शिक्षा प्रदान की थी ? इसका उत्‍तर यही मिलता है कि चाणक्य ने चंद्रगुप्‍त को नंद की नहीं बल्‍कि अपनी स्‍वयं की शिक्षा नीति से शिक्षित किया था। चाणक्य ने कुछ नया नहीं किया था। उन्‍होंने भारतीय संस्‍कृति के अनुसार ही आचरण करते हुए शिक्षा जैसे महत्‍वपूर्ण विषय को अपने हाथ में रखा। हमारे देश में प्राचीन काल से शिक्षा राज्‍य सत्‍ता से स्‍वतंत्र रही है। रामायण काल में महर्षि वशिष्‍ठ, विश्‍वामित्र आदि गुरु के रूप में प्रतिष्‍ठित थे। राजा दशरथ, राज जनक पर इन गुरुओं की सत्‍ता चलती थी। इसी प्रकार योगेश्‍वर कृष्‍ण शिक्षा हासिल करने के लिए ब्रज से चलकर उज्‍जैन आए और महर्षि सांदिपनी के आश्रम में रहकर ज्ञान प्राप्‍त किया। पंचतंत्र की वह कथा तो प्रसिद्ध ही है जिसमें राजा के चारों राजकुमार महामूर्ख थे। जिन्‍हें पंडित विष्‍णुशर्मा ने कथाओं के माध्‍यम से विद्याप्रवीण बनाया। ऐसे एक नहीं हजारों उदाहरण हैं, जिनसे यह सिद्ध किया जा सकता है कि भारत देश में शिक्षा कभी राज्‍यों का विषय नहीं रही। वही चाणक्य ने किया। चाणक्य अपनी शिक्षा से चंद्रगुप्‍त को इसलिए तैयार कर सके, क्‍योंकि उन्‍होंने नंदवंश की शिक्षा का त्‍याग किया।

आज जब कहते हैं कि देश को चाणक्य नीति का अनुसरण करना चाहिए। देश को चाणक्य के बताये रास्‍ते से स्‍वर्णिम बनाया जा सकता है, तो प्रश्‍न यह उठता है कि क्‍या चाणक्य बनना इतना आसान है ? आज जब सारी शिक्षा नीति सरकारें तय कर रही हैं। विद्यार्थियों को क्‍या पढ़ाया जाए और क्‍या न पढ़ाया जाए, यह तय करने की जिम्‍मेदारी समाज की नहीं बल्‍कि सरकारों ने ओढ़ रखी है। सरकार बदलने के साथ पूरी शिक्षा नीति बदल जाती है, पाठ्‌यक्रम बदल जाता है, इतिहास परिवर्तित हो जाता है। आज के चाणक्य अर्थात्‌ अध्‍यापक अपना सब कुछ खोकर सरकारों की चरण वंदना कर रहा हो। कुछ चाणक्य सरकार की जय-जयकार में लग जाएं, ‘चंद्रगुप्‍त' भेड़-बकरियों के समान हर आज्ञा का पालन करने के लिए मजबूर हो जाएं। चंद्रगुप्‍त का स्‍वार्थ केवल डिग्री हासिल करने तक सीमित रह गया है। आज के चाणक्‍यों को अपने दिए जाने वाले ज्ञान पर ही भरोसा नहीं है। तभी तो सभी ‘चाणक्य' वेतन तो ‘नंद' से लेते हैं, परंतु अपने नौनिहालों को ‘पब्‍लिक स्‍कूल' अथवा ‘प्रोफशनल कॉलेज' में भर्ती कराते हैं। तब आखिर क्‍या किया जाए ? यह यक्ष प्रश्‍न समाज के सामने है। हम यह तो चाहते हैं कि हम स्‍वर्णिम भारत की पुनर्रचना करें। देश में व्‍याप्‍त अनेकानेक समस्‍याएं हल हो जाएं। आज की शिक्षा के माध्‍यम से समाज में क्रांति हो जाए। लेकिन ऐसा हो कैसे ? क्‍योंकि शिक्षा समाज के हाथ में नहीं, बल्‍कि सरकार के हाथ में है। गुलामी के दिनों में अंग्रेजों ने उतने ही लोगों को वैसी शिक्षा दी, जितनी उन्‍हें राज्‍य चलाने के लिए जरूरी लगी। उनमें से यदि कुछ चेतना संपन्‍न स्‍वतंत्रता के आकांक्षी महापुरुष निकले तो यह इस देश का सौभाग्‍य था। महात्‍मा गांधी ने अंग्रेजों की शिक्षा पद्धति की आलोचना की है। उनसे पूछा गया कि आपने स्‍वयं वह शिक्षा हासलि की है। तब वे हिंंद स्‍वराज में इस प्रश्‍न का उत्‍तर देते हैं कि ‘मैंने स्‍वयं को इस शिक्षा से मुक्‍त किया, तब असली रूप को पहचान पाया।' यदि ‘चाणक्य' बनना है और देश में ‘चंद्रगुप्‍त' तैयार करना है तो ‘नंदवंश' की शिक्षा नीति को अस्‍वीकार करना ही होगा। तब ही ‘चंद्रगुप्‍त' निकलेंगे, जो ‘नंदवंश' अर्थात्‌ आज के सरकारवाद को समाप्‍त करेंगे। शिक्षा को सरकार से मुक्‍त कराने पर ही शासनमुक्‍त समाज की स्‍थापना होगी।

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4 blogger-facebook:

  1. शिक्षा ही तो नहीं मिली इस देश के निवासियों को. और शिक्षा भी कैसी जिसमें पुरानी परम्पराएँ से विहीन. पुराने इतिहास से कोई वास्ता नहीं.

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  2. निश्च्य ही महत्वपूर्ण तथ्य है ...परन्तु क्या हम, हमारा आज का नवीन वैग्यानिक- तथाकथित प्रगतिशील समाज... जो खाने -कमाने में आयातित-भौतिकता में लिप्त जीवन जीने में अनुरक्त है... तैयार है चाणक्य शिक्षा-नीति के लिये....क्या समाज स्वयं तैयार या सक्षम है शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय की बागडोर अपने हाथ में लेने के लिये ?

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  3. बेनामी9:00 pm

    "व्यवस्था" "चाणक्य" है। "चाणक्य" अपना काम बखूबी कर रहे हैं। "नंदवंश" की शिक्षा का फलना-फूलना इस "चाणक्यीय व्यवस्था" में इतना आसान नहीं है।
    लेखक का आशय समझना चाहिए। यह लेख भी उसी "चाणक्यीय व्यवस्था" के अनेकमुखी हथियारों का एक मुख है।

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