गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

हिमांशु कुमार चौहान "हरित" की कहानी - खाली कमरा

clip_image002[4]

खाली कमरा
आज भी रोज की तरह ही एक आम दिन है ..आज भी शाम के चार बजे हैं ...आज भी बीनू पहले कि तरह थकी हुई घर लौटी है ....दिन भर कॉलेज की पढ़ाई ने उसके चेहरे को निश्तेज कर दिया है ...फिर आज क्यों कोई उसके सर पर हाथ फेर कर नहीं बोला ,,,बिटिया थक गयी हो ना ...लो पहले पानी पी लो ..।

बीनू के दिमाग में एक चलचित्र उभरा , लेकिन बहुत जल्द उसने खुद को सम्हाला ...तेजी से वाशबेसिन कि तरफ कदम बढ़ाये , मुँह धोने के लिए पानी हाथ में लिया ही था कि , एक लड़खड़ाई हुई आवाज आई ...बिटिया पहले पसीना सुखा लो , बाद में मुँह धोना , नहीं तो सर्दी हो जाएगी ...अचानक बीनू चिल्लाई ,,,क्या नानी अपने काम से काम रखा करो;,,,,बेकार में दिमाग कि दही कर देती हो,,,,,। पर अचानक उसे कुछ अहसास हुआ ,,दिमाग से उठी एक विद्युत् तरंग सीधे ह्रदय से टकराई ,,,और भावनाओं कि नदी कुछ ऐसे उभरी ..कि पलकों का बाँध टूट गया ,आँसू अपनी सीमा लाँघ कर कपोलों पर आ गए ...।

वो अपने कमरे की तरफ दौड़ी, जो घर के एक कोने में सिर्फ इसलिए बनाया गया था ,,ताकि उसे पढ़ते वक़्त कोई परेशान ना करे ...लेकिन बीच में एक कमरा ..जिसके सामने से वो हमेशा भाग के निकलती थी ..कि कहीं नानी अपने पास ना बुला ले ...आज वो उस कमरे के सामने क्यों रुक गई ...यही तो वो कमरा है..इसी बिस्तर पे नानी बैठी रहती थी,,,,यहीं से मुझे आवाज लगाती थी ...। बीनू के कोई मामा नहीं थे ,उसकी नानी हमेशा उनके साथ रही , ,,बीनू को हमेशा लगता था कि नानी हर वक़्त टोका टोकी करती रहती है ,,ये ऐसे मत करो ,,नहीं तो ये हो जायेगा ,,,,हर वक़्त बस बीनू !बीनू ! .., सर्दियो में अँगीठी जलाना ,,बीनू बिटिया थोड़ा ताप लो ,,फिर पढ़ लेना ..कॉपते हाथों से चाय बनाना ...।

एक दिन बीनू बाहर से कुछ खा आई  ,घर पे आकर बोल दिया आज भूख नहीं है,पापा मम्मी सब खाना खा कर सो गए  ,,अचानक रात में जब बीनू पढ़ने के बाद सोने कि तैयारी कर रही थी  ,तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया ,,बीनू ने दरवाजा खोला  ,,देखा .. नानी हाथ में खाने कि थाली लिए खड़ी थी  ..और होठ एक अजीब से भय से कुछ विनती कर रहे थे  ..बिटिया बस जरा सा खा लो ,,इस उम्र में भूखे सोना ठीक नहीं ...बीनू चिल्लाई  ..नानी !.हद हो गई अब तो !,,,मेरी तो जैसे अपनी कोई लाइफ ही नहीं है ,,,चौबीसों घंटे जैसे नजरबंदी में रहना होता है !..., नानी ने सब सुना लेकिन उस पुजारी कि तरह जम के खड़ी रही  ,,जो मंदिर से तब तक न जाने का प्रण लेकर घर से चला हो, कि चाहे कुछ भी हो जाये भगवान को भोग लगाकर ही वापस आऊंगा !

...बीनू ने न चाहते हुए भी थोड़ा खा लिया ,,,नानी बिना कुछ बोले चली गई  ,,,थोड़ी देर बाद बीनू जब घर से बाहर निकली देखा नानी के कमरे कि लाइट जल रही थी ,बीनू नानी के कमरे में गई ,,,देखा नानी सो रही है ...और ये क्या टेबल पर खाने कि थाली ऐसे ही रखी है ...नानी ने कुछ खाया नहीं ,,,बीनू को अपने आप पे बहुत गुस्सा आया ,,सोचा वो कितनी गलत है ,जो प्यार को बंधन समझ बैठी ,,,कोई कैसे किसी के लिए भूखा रह सकता है, अरे लोग तो पूरी उम्र इंतज़ार करते हैं ,,किसी ऐसे अपने का जो सिर्फ आपको देख के जीता हो,,,और ऐसा अपना उसके सामने ही तो है ,,उसकी अपनी नानी ..उसकी आँखों में प्रेम के आसूँ आ गए ..पहले दिल में आया नानी को उठा कर गले से लगा के कहे ..नानी तुम दुनिया कि सबसे अच्छी नानी हो ..फिर सोचा अब सुबह आउंगी ,,नानी की गोद में सर रखकर उनसे माफ़ी मांगूगी ..फिर कभी नानी पे गुस्सा नहीं करुँगी ।

आज पूरी रात बीनू को नींद नहीं आई ,,रात भर नानी का ममतामयी चेहरा उसके सामने घूमता रहा ...,उसकी पलकें इसी ममता के स्पर्श से झुक गई । सुबह हुई मगर कुछ अलग तरह से ..रोज बीनू उठती थी चिड़ियों के चहचहाने से ,,आज उसकी आँखें खुली एक शोरगुल सुन कर ..इस शोरगुल का पीछा करते हुए वो बिस्तर से उठ कर दोड़ी , ये शोरगुल चीखों में बदल गया ,नानी के कमरे से रोने , चीखने कि आवाजें आ रही थी ,,,खबराहट में बीनू ने जैसे ही नानी के कमरे में देखा ..देखती है नानी ठीक वैसे ही बिस्तर पर लेटी है ,जैसे रात में लेटी थी ,,एक अजीब से भय ने एक चीख पैदा की ..पर होठ सिर्फ इतना ही बुदबुदा पाए ..नानी ! तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकती...;...नानी ! मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ....; नानी ! प्लीज एक बार उठो ना ,,आप दुनिया कि सबसे अच्छी नानी हो ,,,,; आज दिमाग रुपी पहरेदार ने अपने हथियार ह्रदय के आगे डाल दिए ..और बीनू वो सब बोल गई, जिसे बोलना शायद उसके लिए सबसे मुश्किल था ...लेकिन क्या नानी ने उसकी बात सुनी  .

आज बीनू समझ नहीं पाई कि उसको नानी के बंधन से आजादी मिली या नानी को उसके प्यार के बंधन से ?
अचानक एक आवाज बीनू के कानों से टकराई ,,बीनू ! अगर मुहं हाथ धो लिए हों तो खाना खा लो बेटा ..ये मम्मी की आवाज थी । बीनू ने घड़ी देखी , शाम के पांच बज गए थे .....उसे एक आश्चर्य हुआ .,जिस कमरे के सामने वो एक मिनट भी नहीं रूकती थी जब उस कमरे में नानी होती थी ...उस कमरे के सामने उसने पूरा एक घंटा बिता दिया ,जबकि अब वो था सिर्फ एक खाली कमरा ................////////


हिमांशु कुमार चौहान "हरित"
haritchauhan@gmail.com 

2 blogger-facebook:

  1. अक्सर किसी कि अह्मियत उसके साथ न होने पे पता लगती है...दिल को छू गयी आपकी कहानी

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी8:55 pm

    achchi hai....apna anubhav yaad aa gaya.....

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------