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January, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - सीडी नाम सत्य है

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सीडी है तो एक छोटी सी चीज, मगर काम बड़े-बड़े कर देती है। सीडी में कुछ भी भरा जा सकता है। सीडी कभी भी कहीं भी बांटी जा सकती है। पत्रकार वार्ता में एक सीडी को बांट कर सरकार को गिराया या बचाया जा सकता है। किसी को झूठे बलात्‍कार के मुकदमे में फंसाया जा सकता है। सीडी के कारण एक राष्ट्रीय दल के अध्‍यक्ष को नौकरी से जाना पड़ा। सीडी के कारण कई मंत्रियों, अफसरों, नेताओं के कैरियर कब चौपट हो जाये कोई कह नहीं सकता। ताजा समाचार ये है कि काले धन और विदेशों में छिपे धन की जानकारी की सीडी बाजार में आ गई है, पता नहीं विश्‍व में कितनी सरकारों को जाना पड़ सकता है। बाजार में हर काम की सीडी उपलब्‍ध है। गोपनीयता को सरे राह खोलती ये सीडियां सांप-सीढ़ी से ज्‍यादा खतरनाक साबित हो रही है। सीडी में कुछ भी बदला जा सकता है। राम के शरीर पर श्‍याम का चेहरा लगाकर बलात्‍कार, हत्‍या, रिश्‍वत के सीन दिखाये जा सकते हैं। पूंजीपति, उद्योगपति, नेता सभी को बेनकाब करने का अछूता उपाय है सीडी। तथ्‍य हो या नहीं सीडी का अखबारों या चैनलों के दफ्‌तर में पहुँचने की खबर मात्र से ही देश-दुनिया में सब कुछ कांपने लग जाता है। वास्‍तव …

यशवन्‍त कोठारी का आलेख : सवाल राजनैतिक नियुक्‍तियों का

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इन दिनों राजनैतिक नियुक्‍तियों की बड़ी चर्चा है। केन्‍द्र व प्रदेश की सरकारें सत्‍ता में आने के बाद ही राजनैतिक नियुक्‍तियों की कवायद में लग जाती है। हारे हुए नेता, छुटभैये कार्यकर्ता, सेवानिवृत्त्‍ा नौकरशाह, पत्रकार, कलाकार, साहित्‍यकार, विश्‍वविद्यालयों के अध्‍यापक सब राजनैतिक नियुक्‍तियों के लिये उखाड़ पछाड़ में लग जाते हैं। कांग्रेसी सरकारें ये नियुक्‍तियां जल्‍दी कर देती है। जबकि अन्‍य सरकारों को इन नियुक्‍तियों को करने में ज्‍यादा समय लगता है। एक अनुमान के अनुसार लगभग एम․एल․ए․ की संख्‍या के बराबर राजनैतिक नियुक्‍तियों के पद होते है। इन नियुक्‍तियों से सरकार, संगठन, सत्‍ता में तालमेल बनता है। कार्यकर्ता खुश होते है और अगले चुनावों में पार्टी संगठन को फायदा होने की संभावना बनती है। विचारणीय बिन्‍दु ये है कि जिस सरकार की आयु अब डेढ़ वर्ष से भी कम रह गयी है वो सरकार तीन वर्ष या पांच वर्षों के लिये राजनैतिक नियुक्‍तियां कैसे कर सकती है। डेढ़ वर्ष बाद जब सरकार बदलेगी तब इन राजनैतिक नियुक्‍तियों का हश्र क्‍या होगा। इन पदों पर आने वाले नेता कार्यकर्ताओं का क्‍या होगा। शायद कुछ लोग त्‍या…

संजय दानी की ग़ज़ल - मेरा सफ़र

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मेरा सफ़र
रात उम्मीद से भारी है, सुबह होने नहीं वाली है।
मुश्किलों से भरा है सफ़र, आज ज़ख्मों की दीवाली है।
मैं चरागों का दरबान हूं, वो हवाओं की घरवाली है।
क़ातिलों को ज़मानत मिली, न्याय मक़तूल ने पा ली है।
मै खुदा को कहां ढूढूं अब, मन्दिरों मे भी मक्कारी है।
सुख समन्दर मे पाता हूं मै, दिल किनारों का सरकारी है।
झोपड़ी रास आती मुझे, महलों का दिल अहंकारी है।
गो चढ़ाई पहाड़ों सी है, पैरों की ज़ुल्फ़ें मतवाली हैं।
पड़ चुके पैरों मे छाले गो,  फिर भी मेरा सफ़र ज़ारी है।

वीनस 'जोया' की कविता - कुछ रिश्ते - नातों की यादें

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कुछ रिश्ते - नातों की यादें
कुछ रिश्ते - नातों की यादें
मिट्टी की खुशबू की तरह होती हैं
वक़्त की धूप और जिंदगी की हवा
मिट्टी को सुखा - रुखा कर जाती हैं
यूँ लगता है मानो....सब ख़तम हुआ
............और अब मिट्टी पक चुकी हैपर इक हलकी सी बौछार के साथवही महक.....वही खुशबू .....औरवही गीलापन सब लौट आता है
और तब मालूम होता है .......
.............माजी के रिश्तों की यादें
अभी भी रची बसी पड़ी हैं.........
...............इस मिट्टी के कणों में
.................और मिट्टी अभी भी कच्ची है !----वीनस की अन्य रचनाएँ पढ़ें उनके ब्लॉग - http://venusjun25.blogspot.com/ पर.---

गोविन्द शर्मा की बाल कहानी - गजराज सरजू

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सुरगढ़ के राजा गजानंदसिंह के राज्‍य में घोड़ों से भी ज्‍यादा हाथी थे। वह वर्ष में एक बार हाथी मेला भी आयोजित करते थे। इस मेले में हाथियों की कई तरह की प्रतियोगिताएं होती थी। सर्वश्रेष्‍ठ रहने वाले हाथी को ‘गजराज' की उपाधि मिलती थी। गजराज बनने का मतलब होता था, हाथी के लिये वर्षभर के खाने का इंतजाम राजा की ओर से होता। हाथी के महावत को भी इनाम में नकद राशि मिलती थी। इस बार के मेले में ‘सरजू' नाम के हाथी की धूम थी। यह पहली बार ही इस मेले में आया था। इसके महावत बिरजू ने हाथी को हृष्‍टपुष्‍ट बनाने और प्रशिक्षित करने में पूरे वर्ष मेहनत की थी। इसी का परिणाम था कि सरजू आखिरी परीक्षा के लिये चुने गये इन हाथियों में शामिल हो गया था। सभी को उम्‍मीद थी कि इस बार बिरजू का सरजू ही गजराज बनेगा। आखिरी परीक्षा- दौड़ के लिये सभी हाथी एक कतार में खड़े थे। सभी को तोप के गोले की आवाज का इंतजार था। क्‍योंकि तोप चलने की आवाज के साथ ही हाथियों को दौड़ना शुरू करना था। इस परीक्षा के समय स्‍वयं राजा गजानंद सिंह उपस्‍थित थे। राजा, रानी और राजकुमार एक ऊंचे मंच पर बैठे थे। उनसे थोड़ा नीचे एक और मंच बना था।…

गोविन्‍द शर्मा का व्यंग्य - मेरा गुस्सा मेरा है

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मेरा पहला गुस्‍सा उस कवि पर है, जिसने सिर्फ अपनी पत्‍नी के बोलने पर कुछ कविताएं लिख दी और प्रसिद्ध हो गये। मैंने दूसरों की पत्‍नियों के संदर्भ में कितनी कविताएं लिख मारी, न यश मिला न धन। उलाहनों-शिकायतों का ढेर जरूर लग गया। मनोज कुमार की फिल्‍म उपकार ने रहस्‍योद्‌घाटन किया था- मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती...... मैंने धरती को कई जगह से खोद कर देखा है। सांप बिच्‍छू के अलावा कुछ नहीं निकला। पर धरती न सही, बैंक के लॉकर तो सोना, हीरे मोती, नकदी उगलते ही है। अखबार रोज बताते हैं कि आज फलां के तो आज फलां के बैंक लाकर की तलाशी ली गई। उसमें करोड़ों की धनराशि मिली। जमीन खरीद कर, खोद कर तो देख लिया अब एक आध लॉकर ही खरीद लेता हूं। नकदी कौन-सी हीरे मोती से कम होती है। अब मेरा गुस्‍सा बैंक मैनेजरों की तरफ। मैं एक बैंक में गया। कहा, ‘मुझे एक लॉकर चाहिए।' ‘मिल जायेगा। किस साइज का चाहिए? छोटा या बड़ा?' ‘सभी दिखा दीजिए। कलर, क्‍वालिटी, रूपये, सोने चांदी की क्‍वांटिटी देखकर फैसला करूंगा। ताजा और भरे हुए भी होने चाहिए। नकली एक भी नहीं होना चाहिए।' ‘देखिए, हम तो लॉकर किराये पर देत…

प्रमोद भार्गव का आलेख : अच्छी पुलिस या अपनी पुलिस

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पुलिस की कार्यप्रणाली प्रजातांत्रिक मूल्‍यों और संवैधानिक अधिकारों के प्रति उदार, खरी व जवाबदेह हो इस नजरिये से सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने करीब पांच साल पहले राज्‍य सरकारों को मौजूदा पुलिस व्‍यवस्‍था में फेरबदल के लिए कुछ सुझाव दिए थे, इन पर अमल के लिए कुछ राज्‍य सरकारों ने आयोग और समितियों का गठन भी किया। लेकिन किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले ये कोशिशें आईएएस बनाम आईपीएस के बीच उठे वर्चस्‍व के सवाल और अह्‌म के टकराव में उलझकर रह गई। लिहाजा पांच साल बाद एक बार फिर उच्‍चतम न्‍यायालय को पुलिस व्‍यवस्‍था में जरूरी सुधार के लिए हिदायत देने को मजबूर होना पड़ा है। किंतु ब्रितानी हुकूमत के दौरान 1861 में वजूद में आए ‘पुलिस एक्‍ट' में बदलाव लाकर कोई ऐसा कानून अस्‍तित्‍व में आए जो पुलिस को कानून के दायरे में काम करने को तो बाध्‍य करे ही, पुलिस की भूमिका भी जनसेवक के रूप में चिन्‍हित हो क्‍या ऐसा नैतिकता और ईमानदारी के बिना संभव है ? पुलिस राजनीतिकों के दखल के साथ पहुंच वाले लोगों के अनावश्‍यक दबाव से भी मुक्‍त रहते हुए जनता के प्रति संवेदनशील बनी रहे, ऐसे फलित तब सामने आएंगे जब कानून के निर्माता…

प्रमोद भार्गव का आलेख : कर चोरी के सुरक्षा कवच में कालाधन

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हमारे देश में जितने भी गैर कानूनी काम हैं, उन्‍हें कानूनी जटिलताएं संरक्षण का काम करती हैं। कालेधन की वापिसी की प्रक्रिया भी केंद्र सरकार के स्‍तर पर ऐसे ही हश्र का शिकार है। सरकार इस धन को कर चोरियों का मामला मानते हुए संधियों की ओट में काले धन को गुप्‍त बने रहने देना चाहती है। जबकि विदेशी बैंकों में जमा काला धन केवल करचोरी का धन नहीं है, भ्रष्‍टाचार से अर्जित काली-कमाई भी उसमें शामिल है। जिसमें बड़ा हिस्‍सा राजनेताओं और नौकरशाहों का है। बोफोर्स दलाली, 2 जी स्‍पेक्‍ट्रम और राष्‍ट्रमण्‍डल खेलों के माध्‍यम से विदेशी बैंकों में जमा हुए कालेधन का भला कर चोरी से क्‍या वास्‍ता ? इसलिए प्रधानमंत्री और उनके रहनुमा दरअसल कर चोरी के बहाने कालेधन की वापिसी की कोशिशों को इसलिए अंजाम तक नहीं पहुंचा रहे क्‍योंकि नकाब हटने पर सबसे ज्‍यादा फजीहत कांग्रेसी कुनबे और उनके वरद्‌हस्‍त नौकरशाहों की ही होने वाली है। वरना स्‍विट्‌जरलैंड सरकार तो न केवल सहयोग के लिए तैयार है, अलबत्ता वहां की एक संसदीय समिति ने तो इस मामले में दोनों देशों के बीच हुए समझौते को मंजूरी भी दे दी है। यही नहीं काला धन जमा करने वाले…

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य संग्रह : सच का सामना

सच का सामना (व्यंग्य-संकलन) डॉ. आर.वी. सिंह(रामवृक्ष सिंह)
आर.वी.सिंह/R.V. Singh
ईमेल/email- rvsingh@sidbi.in
1. बिहारी और सवाई राजा जयसिंह यदि अब होते 2, शराब और किताब3. डेंगू-प्रसारी मादा मच्छर से मुलाकात4. कसम का टोटका 5. सच का सामना 6. हाथी का शौक 7. बापू लोगों की बपौती 8. अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो 9. स्वाइन फ्लू का डर 10. क से कछुआ ख से खरगोश 11. ईमानदारी से कहूँ तो.. 12. चलो थोड़ा भ्रष्ट हो जाएँ13. अपना घर 14. कार्यालय में कर्मयोग 15. कबाड़ हमारे मन में है 16. मैंनू की (मुझे क्या) 17. हिन्दी बोले तो...
बिहारी और सवाई राजा जयसिंह यदि अब होतेकुछ लोगों की कमी हमेशा खलती है। सतसइया के दोहरे रचने वाले कविवर बिहारी ऐसे ही लोगों में से एक हैं। बिहारी ने अपने युग में विभिन्न प्रकार की नायिकाओं, उनके सौन्दर्य और श्रृंगार-लीलाओं का बड़ा ही मार्मिक, माँसल और हृदय-ग्राही वर्णन किया है। यदि अपने वातावरण से उन्हें काव्य-रचना की कुछ भी प्रेरणा मिली तो मेरा विनम्र मत है कि वे मध्यकाल के जिस परिवेश में पैदा हुए, जिए और दिवंगत हुए, उसकी अपेक्षा आज का परिवेश उनके लिए बड़ा ही अनुकूल है। यही बात उन…

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रचनाकार

रवि रतलामी

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