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आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

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अतुल कुमार मिश्र “राधास्वामी” की कविता : कचोट

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कचोट कचोट एक मन उठी, कसक एक मन उठी | क्यों लुट गया वो देश पर, क्यों लुट गया था वो देश पर, अनाम शहीद, बेफिकर, बेजिकर | जबकि एक ये, क्यों लूटता गया देश को, कैसे लूट सका देश को | नामी, नामचीन, सांप एक आस्तीन, थी सबको खबर, था जिकरों में जिकर, मगर सभी बेपरवाह- बेखबर, मूढ़ बने आँख मूंदकर | सो कचोट एक मन उठी, कसक एक मन उठी | क्यों मूक मैं, क्यों मूक वो, हे! अंतर मन मुझे झिंझोड़ दो | देश मेरा, मैं देश को, मन अंतर अहसास दो | आत्म दो, विश्वास दो, ये मन अंतर साहस दो | पूछ संकू आंखों में आँखे डालकर, जबाब दो, जबाब दो || अतुल कुमार मिश्र “राधास्वामी” atulkumarmishra007@gmail.comhttp://atulkumarmishra-atuldrashti.blogspot.com/

मंजरी शुक्ल की कविता - जब तू याद आया

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जब तू याद आया कही सावन आया मिली नज़रे तुझसे तो गुलाल उड़ आया I सतरंगी इन्द्रधनुष छाया मन को यूँ भरमाया रूई से बादलों में जब तू नज़र आया I  कलाई खनक उठी मेहँदी इतराने लगी बिंदिया जगमक चमकी तब तू मुस्काया I धानी चुनर उड़ चली सांझ आँचल ओढ़ ली चाँद थोड़ा शरमाया मीत था मेरा आया --डॉ. मंजरी शुक्ल
श्री समीर शुक्ल
सेल्स ऑफिसर (एल.पी.जी.)
इंडियन ऑइल कॉरपोरेशन
गोरखपुर ट्रेडिंग कंपनी
गोलघर
गोरखपुर (उ.प्र.)
पिन - २७३००१

शशांक मिश्र ''भारती'' की बालकथा - नानी की कहानी

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बच्चों, परम पुण्य दायिनी गंगा के नाम से तुम अपरिचित न होगे। नाचती- गाती, उछलती-कूदती गंगा के मंदाकिनी , सुरसरि , विश्णुपदी , देवापगा , हरिनदी , भागीरथी आदि अनेक नामों की तरह एक नाम जाह्मवी भी है।         हां नानी, है तो, जरा समझाकर बताओ ना हम भी तो जानें।         तो सुनो , बच्चों- दिलीप के पुत्र भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा जी ने पृथ्वी पर आना स्वीकार कर लिया। जिस ओर भगीरथ   जाते । उसी ओर समस्त पापों का नाश करने वाली नदियों में श्रेष्ठ यशस्वी गंगा भी जाती।         उसी समय मार्ग में अद्भुत पराक्रमी राजा जह्नु यज्ञ कर रहे थे। गंगा जी अपने जल प्रवाह से उनके यज्ञ मण्डप को बहा ले गई। रघुनन्दन राजा जह्नु इसे गंगा जी का गर्व समझकर क्रोधित हो उठे।         फिर क्या हुआ नानी? बच्चों ने बीच में ही प्रन करते हुए पूछा,         आगे ध्यान से सुनो- '' फिर तो उन्होंने गंगाजी के उस समस्त जल को ही पी लिया। यह संसार के लिए बड़े आश्चर्य की बात हुई। तब देवता ,गन्धर्व तथा ऋषि अत्यन्त आश्चर्य चकित होकर पुरुष प्रवर महात्मा जह्नु की स्तुति करने लगे।          उन्होंने गंगाजी को उन नरेश की कन्या ब…

एस के पाण्डेय का व्यंग्य - योग्यता की अवहेलना

माथुर जी का कहना है कि देश में योग्यता की अवहेलना हो रही है। योग्य लोग भरे पड़े हैं। उन्हें कोई पूछने वाला नहीं है। वहीं दूसरी ओर लोग अयोग्यों के पीछे पड़े हैं। ये कहते हैं कि पूरे देश तथा समाज की यही कहानी है। इन्हें सबक सिखाने के लिए हाल ही में सरकार ने स्पष्टीकरण माँगा था । इनके स्पष्टीकरण की कुछ बातें नीचे दी जा रहीं है। पाठक स्वतः फैसला करें कि माथुर जी की बातों में कितना दम है। कई नेता जेल जाने के लिए पूरी (न्यूनतम योग्यता से कहीं अधिक) योग्यता हासिल किये हुए मजे में बैठे हैं। पुलिस ही उन्हें गिरफ्तार करने से कतराती है। इसमें उनका क्या दोष है ? जबकि बहुत से मामले में इन नेताओं से कम योग्यता वालों को जेल में ठूंस दिया जाता है। इससे स्पष्ट है कि देश में योग्य लोगों की अवहेलना होती है तथा उनकी कोई पूछ नहीं है। वैसे तो अयोग्यों के भी पूछ नहीं है। फिर भी उनकी बहुत पूछ है। कई नेता चुनाव में सिर्फ चुनाव हारने के ही योग्य नहीं होते बल्कि इस योग्य होते हैं कि उनकी जमानत जब्त हो जाए। फिर भी वो भारी मतों से जिता दिए जाते हैं। जबकि नेता खुद समझता है कि वह जीतने के योग्य नहीं है और इसलिए ही वह…

सत्यवान वर्मा सौरभ के दोहे

दोहे- 1- तू भी पाएगा कभी फूलों की सौगात। धुन अपनी मत छोड़ना सुधरेंगे हालात। 2- बने विजेता वो सदा ऐसा मुझे यकीन। आँखों आकाश हो पांवों तले जमीन।। 3- जब तुमने यूँ प्यार से, देखा मेरे मीत। थिरकन पांवों में सजी, होंठों पे संगीत।। 4- तुम साथी दिल में रहे, जीवन भर आबाद। क्या तुमने भी किया, किसी वक्त हमें याद।। 5- लिख के खत से तुम कभी,भेजो साथी हाल। खत पाए अब आपका, बीते काफी साल।। 6- हिन्दी हो हर बोल में,हिन्दी पे हो नाज। हिन्दी में होने लगे,शासन के सब काज।। 7- हिन्दी भाषा है रही,जन-जन की आवाज। फिर क्यों आंसू रो रही,राष्ट्रभाषा आज।। 8- मन रहता व्याकुल सदा,पाने माँ का प्यार। लिखी मात की पातियां,बांचू बार हजार।। 9- बना दिखावा प्यार अब, लेती हवस उफान। राधा के तन पे लगा, है मोहन का ध्यान।। 10-आपस में जब प्यार हो, फ ले खूब व्यवहार। रिश्तों की दीवार में, पड़ती नहीं दरार।। 11-चिट्ठी लायी गांव से, जब राखी उपहार। आँखें बहकर नम हुई,देख बहना का प्यार।। 12-लोकतंत्र अब रो रहा,देख बुरे हालात। संसद में चलने लगे, थप्पड़-घूंसे-लात।। 13-नहीं रहे मुंडेर पे, तोते-कौवे-मोर। डूब मशीनी शोर में, होती अब तो भोर।। 14-…

विजय वर्मा की रचनाएँ

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कहानीलौट आओ दीदी बात उन दिनों की है जब आम आदमी तक टीवी-कंप्यूटर की पहुँच तो नहीं ही हुई थी,रेडियो-ट्रांजिस्टर भी अपनी पहुँच सर्व-सुलभ नहीं बना सके थें.छपरा शहर के मुख्य-मार्ग पर--जो गुदड़ी -बाज़ार से साहेबगंज तक जाती है--यातायात के मुख्य साधन टमटम और बैल-गाड़ी ही थें.बैल-गाड़ी तो खैर सामान ढोने के लिए ही थे ,लेकिन उसपर लटककर एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने से बच्चों को भला कौन रोक सकता था. तो उन दिनों साहेबगंज में आज की भांति इतने सारे ठेले,मोबाइल की दुकानें ,सड़क पर सजी दुकानें तो नहीं ही थे,इतना भीड़-भाड़ भी नहीं था. जिला मुख्यालय होते हुए भी उसका स्वरुप एक कस्बे से ज्यादा नहीं था.फिर भी लगता है कि जब से सृष्टि बनी है तब से इस शहर का मुख्य-बाज़ार साहेबगंज ही रहा है.हथुआ महाराज का बसाया हुआ हथुआ-मार्केट तब भी शहर का शान था,आज भी है. एक मुख्य बात यह थी कि गेहूं पिसाने की चक्की साहेबगंज में ही थी इसलिए दहियावां -टोला तक के लोगो को भी इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए साहेबगंज ही आना पड़ता था. आज जो कलेक्टर्स -कम्पौंड में स्टेडियम और उसके चारो तरफ इतने सारे घर बने हुए है,तब उस सब का अस्तित्…

मालिनी गौतम की कविता - स्वर्ण मृग

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स्वर्ण मृग
बहुत हुआ ! बस ! अब और नहीं ! नहीं बनना है उसे नींव का पत्थर उसे तो बनना है शिखर पर विराजमान स्वर्णिम कलश ! सदियों से देवी बनकर नींव में डालती रही त्याग, समर्पण प्रेम,आदर्श और तप के पत्थर ! हर बार उसे ही छला जाता रहा कुंती, गांधारी, अनुसूया और सावित्री के नाम पर ! और हर बार स्वर्ण कलश बन शिखर पर जगमगाता रहा कोई और ! हर बार एक सीता अपना सर्वस्व समर्पित कर अनुकरण करती रही अपने ही राम का और हर बार ली गई उसी सीता की अग्नि परीक्षा ! पर कर लिया है उसने अब संकल्प कि नहीं चलेगी वह किसी राम के बताये हुए पथ पर उसे तो चलना है अपने ही बनाये हुए रास्ते पर ! नहीं देगी वह अवसर किसी को लक्ष्मण रेखा खींचने का क्योंकि कर लिया है उसने निश्चित कि वह स्वयं ही मारेगी अपने हिस्से के स्वर्ण मृग को ! डॉ. मालिनी गौतम

महेन्‍द्र भीष्‍म का आलेख : गीतकार इंदीवर

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गीतकार इंदीवर सिनेजगत के उन नामचीन गीतकारों में से एक थे जिनके लिखे सदाबहार गीत आज भी उसी शिद्‌दत व एहसास के साथ सुने व गाए जाते हैं, जैसे वह पहले सुने व गाए जाते थे। इंदीवर जी ने चार दशकों में लगभग एक हजार गीत लिखे जिनमें से कई यादगार गाने फिल्‍मों की सुपर डुपर सफलता के कारण बने। उत्तर प्रदेश के झाँसी जनपद मुख्‍यालय से बीस किलोमीटर पूर्व की ओर स्‍थित बरूवा सागर कस्‍बे में आपका जन्‍म कलार जाति के एक निर्धन परिवार में 15 अगस्‍त, 1924 ई. में हुआ था। आपका मूल नाम श्‍यामलाल बाबू राय है। स्‍वतंत्रता संग्राम आन्‍दोलन में सक्रिय भाग लेते हुए आप ने श्‍यामलाल बाबू ‘आजाद' नाम से कई देश भक्‍ति के गीत भी अपने प्रारम्‍भिक दिनों में लिखे थे। श्‍यामलाल को बचपन से ही गीत लिखने व गाने का शौक था। जल्‍दी ही आपको स्‍थानीय कवि सम्‍मेलनों में शिरकत करने का मौका मिलने लगा। स्‍व. इंदीवर के बाल सखा रहे स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी स्‍वर्गीय श्री रामसेवक रिछारिया एवं स्‍वर्गीय श्री आशाराम यादव से लेखक ने उनके जीवनकाल में इंदीवर जी के बारे में कई जानकारियाँ प्राप्‍त की थीं, जैसे श्री रिछारिया जी ने लेखक को …

आर.वी.सिंह का व्यंग्य - शहर में भैंस

व्यंग्य शहर में भैंसडॉ.आर.वी.सिंह भैंस और शहर का रिश्ता बहुत पुराना है। इधर पश्चिमी तर्ज़ के पब्लिक स्कूलों में पढ़े-लिखे नौकरशाहों को यह ऐतिहासिक तथ्य कभी-कभी विस्मृत हो जाता है, तो वे अपनी झख में आदेश जारी कर देते हैं कि इन भैंसों को शहर से निकाल बाहर करो। लेकिन शुक्र है कि अपने नेताओं को भैंस से बड़ा प्यार है। उनमें से अधिकतर का डील-डौल भी भैंसों जैसा ही होता है और वे जानते हैं कि शहर और भैंस का नाता बहुत गहरा है। इसलिए शहर में अब भी भैंसें कायम हैं, पूरी शान-ओ-शौकत के साथ। हिन्दी में कहावत मशहूर है, जिसकी लाठी उसकी भैंस। अब आप सोचिए कि यदि शहर में भैंस न हो तो दबंग लोग अपनी लाठी का इस्तेमाल कहाँ और किस पर करेंगे? जिसके पास लाठी हो, उसके आस-पास हाँकने के लिए भैंस तो होनी ही चाहिए। यदि मौके पर भैंस नहीं मिली और लाठी वाले के मन में हाँकने का विचार आ गया तो भले आदमियों की तो शामत ही समझिए। इसलिए बेहतर है कि जब तक लाठी कायम है तब तक भैंस को भी कायम रहने दें। इधर सुनने में आता है कि अमुक-अमुक जगह पर पुलिस वालों ने लोगों की भीड़ पर लाठियाँ बरसाईं। यही तो परेशानी है कि शहर में सही मौके प…

गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' की कविताएँ व ग़ज़लें

महाप्राण निराला की जयन्ती पर  विशेषजहाँ किसी को पीड़ित देखा हाथो-हाथ लिया दीन,दुखी,बुढ़िया, भिखमंगा सबका साथ किया 'प्रभापूर्य, शीतलच्छाय, सांस्कृतिक सूर्य' बन अंधकार का कठिन प्रश्न ही पहले सरल रुद्र रूप था भले, किन्तु वह शांत मनस्वी- महावीर-सा अपना सब कुछ जग के लिए दिया जो कुछ बोला, लिखा सभी कुछ जग पीड़ा थी जग के खातिर मरा और वह जग के लिए जिया रहे न कोई दुखी जगत में इसीलिए,बस- बचा हुआ था शिव से जो,वह सारा गरल पिया सुख अपना औरों को बाँटा बिन माँगे ही जहाँ मिला दुख का सौदागर अपने लिए लिया 'नव नभ के नव विहग वृंद' सब मौन हो गए असमय पतझर ने वसन्त का सौरभ छीन लिया --- डकैत है दिल्ली खिलन्दड़ी टिकैतों का खेत है दिल्ली प्यासे मृग भटक रहे, रेत है दिल्ली आग, धुँआ, गोले, कट्टे छुरी और बम हाथो में थामे हुए डकैत है दिल्ली राजनय, राजधानी, संसद की बोली में हर दम सिपहसालार-सी मुस्तैद है दिल्ली आयकर, बिक्री कर, और भी अनेक कर करों की कारा में हुई कैद है दिल्ली जाति, धर्म, क्षेत्रवाद कोई भी असाध्य रोग किसिम-किसिम रोगों की बैद है दिल्ली                             ------ --- …

त्रिवेणी तुरकर की कविता : गुरूदेव को नमन

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गुरुदेव को नमन हे श्रद्धेय गुरुदेव ए स्‍वीकारो हम सब का शत शत नमन। हे भारत गौरव देशाभिमानी रचा आपने भारत का राष्ट्रगान। हर भारतवासी को है जिस पर अति अभिमान। भारत भू के इस यशोगान का करते सब सम्‍मान। हुई दूर तिमिर छाया पसरा उज्‍जवल आलोकित ज्ञान। देश देशांतर तक हुआ विस्‍तारित आपका गान। मिला आपसे ही विश्‍व को गीतांजली सा दिव्‍य उपहार। मां भारती हुई अति पुलकित सपूत आप सा पाकर। जननी को देखा आपने माता में जन्‍म भूमि में ए उससे भी व्‍यापक बनकर देखा समग्र विश्‍व में। दे गये आप हमें जो साहित्‍य संपदा अनमोल। कभी न होंगे विस्‍मृत वे शब्‍दरत्‍न अनमोल। किया बंधन-मुक्‍त शिक्षा को आपने विद्यालय की चारदीवारी से। शांतिनिकेतन से पाई हमने नई परिभाषा विद्यालय की आपसे। मन पर अंकित है छवि अब भी ए चुलबुली मिनी व बातूनी काबुलीवाले की। दिल को छू लेने वाली छाप उन नन्‍हीं अंगुलियों की। जिसे देखकर करता काबुली याद अपनी बिटिया की। मिनी में काबुली देखता छवि अपनी प्‍यारी सी बेटी की। शांतिनिकेतन की रचना कर किया अपना स्‍वपन साकार। हुई अनेक प्रतिभायें विकसित प्रेरणा आपसे पाकर। मिले देश को जिससे विव…

प्रमोद भार्गव का आलेख : अंग्रेजी वर्चस्‍व के चलते संकट में आईं भाषाएं

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यह एक दुखद समाचार है कि अंग्रेजी वर्चस्‍व के चलते भारत समेत दुनिया की अनेक मातृभाषाएं अस्‍तित्‍व के संकट से जूझ रही हैं। भारत की स्‍थिति बेहद चिंताजनक है क्‍योंकि यहां कि 196 भाषाएं विलुप्ति के कगार पर हैं। भारत के बाद अमेरिका की स्‍थिति चिंताजनक है, जहां की 192 भाषाएं दम तोड़ रही हैं। दुनियां में कुल 6900 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें से 2500 भाषाएं विलुप्‍ति के कगार पर हैं अंतरराष्‍ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर भाषाओं की विश्‍व इकाई द्वारा दी गई जानकारी में बताया गया है कि बेलगाम अंग्रेजी इसी तरह से पैर पसारती रही तो एक दशक के भीतर करीब ढाई हजार भाषाएं पूरी तरह समाप्‍त हो जाएंगी। भारत और अमेरिका के बाद इंडोनेशिया की 147 भाषाओं को जानने वाले खत्‍म हो जाएंगे। दुनिया भर में 199 भाषाएं ऐसी हैं जिनके बोलने वालों की संख्‍या एक दर्जन लोगों से भी कम है। ऐसी भाषाओं में कैरेम भी एक ऐसी भाषा है जिसे उक्रेन में मात्र छह लोग बोलते हैं। इसी तरह ओकलाहामा में विचिता भी एक ऐसी भाषा है जिसे देश में मात्र दस लोग बोल पाते हैं। इंडोनेशिया की लेंगिलू बोलने वाले केवल चार लोग बचे हैं। 178 भाषाएं ऐसी हैं जि…

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : बाजारवाद का घोड़ा

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हे विकासशील देश के पिछड़े नागरिकों ! सामान खरीदो और खाओ। खाओ पिओ और ऐश करो बाजारवाद का घोड़ा अश्‍वमेघ यज्ञ की तरह दौड़ रहा है। घोड़े की सवारी करना आसान काम नहीं है। अच्‍छे अच्‍छे सूरमा भोपाली धूल चाटते नजर आते है। सर्वत्र बाजारवाद हावी है। बाजार ने सब कुछ बिकाउ माल कर दिया है। आप खरीदे या नहीं बाजार आप के घर में घुस गया है। बाजारवाद रेडियो, टी․वी․ अखबार, इन्‍टरनेट सभी के सहारे आपके जीवन में जहर घोल रहा है। आप माचिस खरीदने जाते है तो सिगरेट या बीयर आपके गले पड़ जाती है। बाजार पर हावी है बाजार के माफिया, बिक्री माफिया, परचेज माफिया, भूमाफिया, शराब माफिया चमचे माफिया, दवा-माफिया, सरकारी माफिया, गैर सरकारी माफिया, यहाँ तक कि देह -व्‍यापार के माफिया लोगों ने पूरे बाजार को कब्‍जे में कर लिया है। वे सारे साधनों से आप पर हमला कर रहे हैं, आपको क्रेडिट कार्ड, डेबिटकार्ड, लोन, इएमआई के सपने दिखा रहे हैं। खरीदो आप पूरे बाजार को खरीदो। घर को गोदाम बना लो। शोप एलकोहोलिक बन जाओ। कुछ नहीं चाहिये मगर खरीदना पड़ेगा, बाजारवाद सबको खरीदने के लिए मजबूर कर देता है। बाजार ने हमारे मन छोटे कर दिये हैं। और ब…

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : रेल-चिन्तन

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रेल बजट आने वाला है अतः आज मैं भारतीय रेलों पर चिन्‍तन करुंगा। जैसा कि आप जानते हैं, चिन्‍तन हमारी राष्ट्रीय बीमारी है। जो कुछ नहीं कर सकता, वह बैठे-ठाले चिन्‍तन करता है। मैं भी आज अरबों रुपयों की लागत के इस विशाल धन्‍धे याने कि भारतीय रेलों पर चिन्‍तन करुंगा। रेल भवन में इन्‍जिन नहीं है, वह पटरी से उतर चुका है, लेकिन भारतीय रेलें हैं कि धकाधक चल रही हैं। इधर हमारे रेल-विभाग ने कई बड़ी रेलगाड़ियाँ चलाई हैं, और इन गाडि़यों से भी तेज गति से भ्रष्टाचार की रेल चलाई है। रिजर्वेशन के नाम पर खुली लूट, भारतीय रेल-विभाग का एक अत्‍यन्‍त गौरवशाली कीर्तिमान है। जापान में यदि कोई रेल गाड़ी कुछ क्षण भी देर से पहुंचती है तो मुसाफिरों को पूरा पैसा वापस दिया जाता है, लेकिन हमारा रेल-विभाग इतना चुस्‍त-दुरुस्‍त है कि यहां आज तक कोई गाड़ी समय पर नहीं पहुंची। इधर भारतीय रेलों का एक नया सुखद पक्ष उजागर हुआ है। यदि आप गरीब हैं तो रेलयात्रा करिए, आपको आत्‍महत्‍या की जरुरत नहीं रहेगी किसी न किसी दुर्घटना में आप तो शहीद हो जायेंगे और आपके घर वालों को दो-लाख रुपयों की आमदनी हो जायेगी। इसे कहते हैं रिन्‍द के र…

नन्दलाल भारती की कविताएँ व लघुकथाएँ

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॥ नर के भेष में नारायण ॥ बात पर यकीन नही होता आज आदमी कीनींव डगमगाने लगती है घात को देखकर आदमी के ।बातों में भले मिश्री घुली लगे तासीर विष लगती हैआदमी मतलब साधने के लिये सम्‍मोहन बोता है।हार नही मानता मोहपाश छोड़ता रहता है,तब-तक जब-तक मकसद जीत नही लेता है।आदमी से कैसे बचे आदमी बो रहा स्‍वार्थ जोसम्‍मोहित कर लहू तक पी लेता है वो ।यकीन की नींव नही टिकती विश्‍वास तनिक जम गयामानो कुछ गया या दिल पर बोझ रख निकाला गया ।भ्रष्‍टाचार के तूफान में मुस्‍कान मीठे जहर सादर्द चुभता हरदम वेश्‍या के मुस्‍कान के दंश सा ।मतलबी आदमी की तासीर चैन छीन लेती हैआदमी को आदमी से बेगाना बना देती है ।कई बार दर्द पीये है पर आदमियत से नाता हैयही विश्‍वास अंध्‍ोरे में उजाला बोता है ।धोखा देने वाला आदमी हो नही सकता हैदगाबाज आदमी के भेष में दैत्‍य बन जाता है ।पहचान नहीं कर पाते ठगा जाते हैं,ये दरिन्‍दे उजाले में अंधेरा बो जाते हैं ।नेकी की राह चलने वाले अंधेरे में उजाला बोते हैंसच लोग ऐसे नर के भेष में नारायण होते हैं ।कविताएँ॥ आशीश की थाती ॥मां ने कहा था,बेटा मेहनत की कमाई खाना काम को पूजा, फर्ज को धर्म, श्रम को लाठी…

संजय दानी की ग़ज़ल - समन्दर से मुझको मुहब्बत है दानी, किनारों का तुम रास्ता पूछ लेना।

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सितारों से मेरी ख़ता पूछ लेना,
अंधेरों  से मेरा पता पूछ लेना।
तेरे हुस्न को देखकर, मेरे हमदम,
ख़ुदाओं का सर क्यूं  झुका पूछ लेना।
मैं तेरे लिये जान दे सकता भी हूं ,
मगर दिल में, मेरी जगह पूछ लेना।
ज़मीं जाह ज़र की इनायत है लेकिन ,
सुकूं मुझसे क्यूं है खफ़ा पूछ लेना।
अदावत,बग़ावत, खयानत,सियासत ,
से इंसानों को क्या मिला पूछ लेना।
चराग़ों की तहज़ीब भाती है मुझको ,
हवाओं का तुम फ़ैसला पूछ लेना।
अभी न्याय की बस्ती मे मेरा घर है ,
ग़ुनाहों का दिल क्यूं दुखा पूछ लेना।
फ़लक को झुकाने की कोशिश थी मेरी
फ़लक खुद ही क्यूं झुक गया पूछ लेना।
समन्दर से मुझको मुहब्बत है दानी,
किनारों का तुम रास्ता पूछ लेना।---
फ़लक=गगन, जाह=सम्मान, ज़र=धन,अदावत=दुशमनी,।

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

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ग़ज़ल 1खरपतवारें पाली बाबा। अज़ब अनाड़ी माली बाबा॥ टिड्डे बैठे पात पात पर , उल्‍लू डाली डाली बाबा। कुटिल बिल्‍लियां यहां दूध की, करती हैं रखवाली बाबा। दूनिया बड़ी निराली बाबा , अपनी देखी भाली बाबा। भरी रहे र्निनाद हमेशा, बजती हैं बस खाली बाबा। कहां रखी रहन किसी ने , हर घर की खुशहाली बाबा। पाचन तंत्र सुदृढ़ इतना कि , वो लेते नहीं जुगाली बाबा। छलनी जैसी कर बैठेगा , वो अपनी ही थाली बाबा। धवल वेश में छिपा रखी थी, कुत्‍सित काया काली बाबा। --- ग़ज़ल 2क्‍यों आस्‍थाएं दे रही आख्‍यान लड़की । कि आज भी दुनिया में हैं भगवान लड़की ॥ ये चूड़ियां हैं बेड़ियां नादान लड़की , मत बिन्‍धाओ नाक और ये कान लड़की । नहीं हैं मूंछ ढ़ाढ़ी मर्द की पहचान लड़की , वही हैं मर्द तो जो दे तुम्‍हें सम्‍मान लड़की । सिन हो कमसिन तो कहां इरफान लड़की , उत्‍फाल तो हैं नासमझ नादान लड़की । तू दुख्‍तरे हौवा हैं नातुअरन लड़की , हैं वाग्‍देवी तुझपे मेहरबान लड़की । क्‍यों लोग हैं तुझको पराया धन बताते, तू बाप की दहलीज की हैं आन लड़की। ----

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल गीत - यादों की नौका में बचपन

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हा हा ही ही से स्वागत यादों की नौका में बचपन जब भी कभी सवार हुआ , भूली बिसरी सब यादों ने आँखों में आकार लिया | नदी नहाने जाते थे सब मित्रों को संग में लेकर , यही देखते भरी नदी को किन मित्रों ने पार किया | नदी किनारे रखकर कपड़े जी भर के स्नान किया , पता नहीं किस सेंध मार ने पर्स रुपयों का मार दिया | जिस पाकिट में पर्स रखा था वह पाकिट ही गायब था , पकिट था जिस जींस मे पेंट किसी ने मार दिया | अब तो हम थे बिना पेंट के चड्डी में ही घर आये , हा हा ही ही से सबने मेरा स्वागत सत्कार किया |

प्रमोद भार्गव की पुस्तक समीक्षा : रामचरितमानस में पत्रकारिता

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समीक्षा रामचरितमानस में पत्रकारिता प्रमोद भार्गव समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा है, तुलसी के रामचरितमानस में जितने गोते लगाओ उतनी ही बार सीप और मोतियों की उपलब्‍धियां होती रहती हैं। कुछ इसी तर्ज पर लेखक आरएमपी सिंह ने रामचरितमानस में डूबकियां लगाईं और मानस से पत्रकारिता के वे सूत्र खोज लाए जो सार्थक और समर्थ पत्रकारिता के लिए जरूरी हैं। वैसे भी कई दार्शनिक और मानस के गूढ़ मर्मज्ञ रामचरितमानस को मानव जीवन का संविधान बताते हैं। लिहाजा इसके मंथन से व्‍याख्‍याकार विधायिका, न्‍यायपालिका और कार्यपालिका जैसे तीन स्‍तंभों का अनुसंधान तो पहले ही कर चुके हैं, अब आरएमपी सिंह ने लोकतंत्र के चौथे स्‍तंभ ‘पत्रकारिता' की खोज भी कर डाली। वैसे भी राम संवैधानिक व्‍यवस्‍था में अयोध्‍या के साम्राज्‍यवादी एकतंत्री राजा जरूर थे, लेकिन उनकी कार्यशैली लोकहितैषी प्रजातांत्रिक मूल्‍यों की जीवन पर्यंत संरक्षक व समर्थक रही है। जन इच्‍छा राम के लिए कितनी महत्‍वपूर्ण थी, यह एक साधारण से धोबी के कथन को अमल में लाने से ही पता चल जाता है कि राम लोक मूल्‍यों की रक्षा के लिए पत्‍नी सीता का आनन-फानन में ह…

हरि भटनागर का कहानी संग्रह : सेवड़ी रोटियाँ और जले आलू

वरिष्ठ और चर्चित कथाकार हरि भटनागर का कहानी संग्रह - सेवड़ी रोटियाँ और जले आलू यहीं पर पढ़िए ई-बुक रूप में या पीडीएफ़ ई-बुक के रूप में डाउनलोड कर पढ़ें-पढ़ाएँ अपने अथवा अपने मित्रों के कंप्यूटर, लैपटॉप अथवा आई-पैड, मोबाइल फ़ोनों में. डाउनलोड के लिए नीचे दिए गए डाउनलोड लिंक पर क्लिक करेंWe're sorry, your browser doesn't support IFrames. You can still visit this item., however.
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प्रमोद भार्गव का आलेख : विश्‍वग्राम में बढ़ता नस्‍लभेद

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पूरी दुनिया में मानवाधिकारों की वकालत करने वाले व उसकी शर्तें विकासशील देशों पर थोपने की तानाशाही बरतने वाले अमेरिका की सरजमीं पर नस्‍लवाद कितना वीभत्‍स है, यह हाल ही में अमेरिका के ट्राई वैली नामक फर्जी विश्‍व विद्यालय में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों के टखनों में ‘वितंतु पट्‌टा' (रेडियो कॉलर) पहनाकर उन पर नजर रखने के पशुवत व्‍यवहार के रूप में सामने आया है। इस दंभी आचरण की कार्यशैली को क्‍या कहा जाए, अमेरिकी मानव प्रजाति को सर्वश्रेष्‍ठ जताने की हठी कोशिश अथवा इस अमानवीय बद्‌तमीजी को नस्‍लभेदी मानसिकता का पर्याय माना जाए ? क्‍योंकि पश्‍चिमी देशों में अब ये घटनाएं रोजमर्रा का हिस्‍सा बनती जा रही हैं। दरअसल भारतीयों की श्रमसाध्‍य कर्त्तव्‍यनिष्‍ठा का लोहा वैश्‍विक परिप्रेक्ष्‍य में दुनिया मान रही है। परंतु भारतीयों का नियोक्‍ता राष्‍ट्र के प्रति यही समर्पण और शालीन सज्‍जनता कुछ स्‍थानीय चरमपंथी समूहों के लिए विपरीत मनस्‍थितियां पैदा करती है। जिसके तईं स्‍थानीय नागरिक भारतीयों की अपने देशों में प्रभावशाली उपस्‍थिति को मौलिक अधिकारों के हनन के रूप में देखते हैं और जाने अनजाने ऐसा बर्ता…

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य : मैंने भी खरीदा वाहन

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§ आम शहरी नागरिक की तरह मेरे पास भी एक अदद द्विचक्रवाहिनी नामक वाहन था, जिसे मैं अपने विद्यार्थी काल से ही काम में ले रहा था। इस ऐतिहासिक वाहन पर चढ़ कर ही मैंने एम․एस․सी․ किया। नौकरी शुरू की। शादी की तैयारियां कीं और वे सभी सांसारिक कर्म किये जो इस साईकिल नामक वाहन से संभव था। मगर इधर तेजी से बदलती, बदलती दुनिया और समय की कमी, आपा-धापी से परेशान होकर मैंने भी एक दुपहिया वाहन लेने की सोची। बस मुसीबतों का पहाड़ उसी दिन से गिरना शुरू हुआ पत्‍नी से बात की तो बोली, साईकिल में क्‍या खराबी है इस पर तुम आटा भी पिसवाकर ले आते हो, सब्‍जी भी आ जाती है। स्‍कूटर पर आटा नहीं पिसवा सकोगे और फिर पेट्रोल का खर्चा। इस महंगाई के युग में यह फालतू का खर्चा। कम से कम तीन सौ रुपये माहवार फुंक जायेंगे। मैंने बात को संभालने की कोशिश की। - अरे भागवान ! तुम कुछ समझने की कोशिश करो। अगर एक अदद दुपहिया वाहन खरीद लें तो मैं दफ्‍तर से शाम को जल्‍दी घर आ जाऊंगा। बच्‍चों को स्‍कूल छोड़ सकूंगा। और कभी कभार तुम्‍हें भी घुमाने ले जाऊंगा। सच में जब कन्‍धे पर हाथ रखे पीछे महिला को बिठाकर कोई वाहन सर से मेरे पास से गुजरता…

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