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March, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रमोद भार्गव का आलेख : विकीलीक्‍स - मुखौटे उतारने का माध्‍यम

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विकीलीक्‍स एक ऐसी मजबूत तकनीक के रुप में उभर रही है, जो बिना कोई अर्जी लगाए ‘सूचना के अधिकार' का दायित्‍व निर्वहन करती नजर आने लगी है। जब किसी देश या संस्‍था में तकनीकी नेतृत्‍व प्रभावी हो जाता है तो वह कठपुतली नेतृत्‍व कहलाता है। उसके संचालन के सूत्र अदृश्‍य हाथों में होते हैं। ऐसा नेतृत्‍व न संवेदनशील होता है और न ही बहुसंख्‍यक आबादी के हितों की दृष्‍टि से जवाबदेह। यह राजनीतिक नेतृत्‍व तब और खतरनाक साबित होने लगता है जब यह विदेशी शक्‍तियों का सूत्रवाहक बन पूंजीवादी मूल्‍यों को देश की अवाम पर थोपने लगता है। इसी कारण भारत के आंतरिक मामलों में न केवल अमेरिकी दखल साफ दिखाई देने लगा है, बल्‍कि वह सरकारी नीतियों को बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के हितार्थ ढालने भी लग गया है। यह स्‍थिति ईस्‍ट इंडिया कंपनी और ब्रितानी हुकूमत की उन दिनों की याद ताजा करती है, जब इन्‍होंने भोग-विलासी भारतीय सामंतों और राजे-रजवाड़ों के जरिये न केवल भारत-भूमि पर पैर जमाए बल्‍कि आम भारतीय को गुलाम बनाने और उसे प्राकृतिक संपदा, भू-अधिकार तथा जंगलों से बेदखल करने के लिए अमानवीय कानूनों की एक पूरी संहिता ही रच दी। इस म…

अंतस सिंग की प्रेम कविताएँ : नारी पथ भटक गई है...

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नारी पथतुम कभी समानता की बात करती हो
तो कभी बदलाव की ...
या कभी मर्दों से कंधे से कन्धा मिलाने की ...
पर जब में कहता हूँ कि आज सब्जी बाज़ार से तुम लाओ तो कह देती हो की तुम लड़के हो ..बस में खड़े खड़े मैं कितना भी थक जाऊं वो कभी सीट नहीं छोड़ती ..
किसी थके हुए मर्द को लेडीज़ सीट में बैठा देख उसके मन में कभी दया की भावना नहीं आती और बड़ी निर्ममता से उठा कर खुद बैठ जाती है..
उसमें उसे अपनी जीत का एहसास होता है मानो कोई सिंहासन हासिल कर लिया हो.
नारी पथ भटक गयी है...----मन है किमन है कि तुम्हें मैं साइकल पर आगे बिठाकर हरे भरे जनपथ पर साथ घुमाऊं ..इंडिया गेट दिखाऊं..
साइकल चलाते चलाते जब में हांफ़ने लगूं तो मेरे गर्म सासों की आवाज़ तुम्हारे कानो में पहुंचे ..
हफ -फ -फ-हफ -फ -फ ( संघर्ष से भरा रोमांतिसिस्म)--तुम्हारे दोमुंहे बाल..तुम्हारे दोमुंहे बाल अच्छे लगते हैं ..मैगी में पड़ जाये तो भी मुझे बुरा नहीं लगता. नूडल समझ कर उसे भी निगल लेता हूँ पर शादी के बाद यह सबमुझे इरिटेट करेंगे..---हर जगह दिखती होराह चलते हर एक कपल में तुम्हें और अपने आप को देखता हूँ ..
तुम कभी भोली तो कभी कमीनी तो कभी खर्चीली द…

प्रमोद भार्गव का आलेख : पुलिस को मानवतावादी बनाने की जरूरत

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हाल ही में दिल्‍ली की एक अदालत ने एक न्‍यायसंगत फैसला सुनाते हुए पुलिस का चेहरा बदलने की कोशिश की है। भ्रष्‍टाचार और निर्ममता से पुलिस ये दो चरित्रजन्‍य विकार हैं। अदालत ने वर्ष 2010 में लूट और नाजायज हथियार रखने के जुर्म में चार गरीब युवकों को आरोपी बनाया था। लेकिन अदालत ने इस मामले को झूठा पाते हुए न केवल आरोपियों को बरी किया बल्‍कि संबंधित पुलिस वालों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही करने की हिदायद भी दी। साथ ही सभी युवकों को 50-50 हजार रूपये मुआवजा दिए जाने का आदेश भी दिया। जिससे इनकी आर्थिक, मानसिक, शारीरिक और सामाजिक हुई हानि की भरपाई की जा सके। पुलिस का यह चरित्र बन गया है कि वह किसी भी व्‍यक्‍ति को हिरासत में लेकर प्रताड़ित तो करती ही है, अधिकारियों और राजनेताओं को खुश करने के लिए भी फर्जी मामलों की कूट रचना कर डालती है। इस तरह के काम पुलिस व्‍यक्‍तिगत उपलब्‍धियों की फेहरिश्‍त लंबी कर पदोन्‍नति हासिल करने के लिए भी करती है। इन षड्‌यंत्रकारी कोशिशों पर सख्‍ती से अंकुश लगाए बिना पुलिस का चेहरा मानवतावादी नहीं हो सकता। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्‍य सरकारों को पुलिस एक्‍ट में बदलाव…

सुमित शर्मा की कविता - बचपन

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बचपन रेत गिट्टी, ईंट मिट्टी, और तपती धूप तले, झुलसता हुआ बचपन कोई मैं देखता हूँ। सावन मनभावन, निर्मल जल पावन, और किसी टूटी टपरिया तले, भीगता हुआ बचपन कोई मैं देखता हूँ। शरद अनवरत, शीतलहर लेती लपट, और किसी फटे चिथड़े तले, सिकुड़ता हुआ बचपन कोई मैं देखता हूँ। बसंत मनपसंद, हरदम ही आनंद, और आधे नग्‍न बदन में, फूल बीनता हुआ बचपन कोई मैं देखता हूँ। मुस्‍कुराता हरदम, बदले चाहे मौसम, और पनपता, और उन्‍नत, खुशहाल बचपन का कोई स्‍वप्‍न वही मैं देखता हूँ। सुमित शर्मा, खिलचीपुर,जिला-राजगढ़ (म.प्र.)

अमिता कौंडल की कविताएँ

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१. लगाने को अपना इक वन सुंदर सा इक मेरा गाँव 
पर्वत के आँचल में 
चारों और से घिरा हुआ था 
हरे भरे वृक्षों से 
मेरे मुन्ने को भाते थे 
वृक्ष और उनपे कूदते बंदर  छोड़ कर उस गाँव को 
प्रकृति की ठंडी छाँव को 
हम विदेश आ गए 
बडी बडी इमारतों के
समुंदर में  समा गए 
कभी कभी बन मुन्ना बंदर 
मुझे बनाता था वो पेड़ 
झूल कर मेरी बाजू पर
करता था उस वन को याद 
लौट के जब हम  आए गाँव 
गायब था वो पूरा वन 
उद्योगीकरण का दानव 
पूरा उसे चुका था निगल 
और वहां  खड़ा था 
एक  बढा  सा कलघर  
उगले  जो जहरीला धुआँ   
और बंदर  मचा  रहे थे हुड़दंग  
उनका जो  उजड़ा था चमन
मुन्ना होकर  बोला उदास 
कहाँ गया माँ मेरा वन ?
सब बंदरों को क्यूँ भगाते हैं ?
वो क्यों  न  मुझे  हंसाते हैं ?
दादाजी ने तब समझाया 
वनों का उसे महत्व बतलाया
बोला बढे ही जोश में 
माँ, मैं वन  लगाऊंगा 
और बंदरों को बसाउंगा 
चला फिर दादाजी के संग 
लगाने को अपना इक वन  २.कटने  से  भी  बचाने  हैं  चला मेरा मुन्ना लगाने को
अपना इक वन
चुने सारे मनपसंद पौधे
और बनाया अपना उपवन
सीखा दादा जी से
उनकी देखभाल करना
सुबह शाम देता था पानी
और करता था ढेरों  बातें
जब कोई …

गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' की रचनाएँ

टूट गया बंजारा मन
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माना रिश्ता जिनसे दिल कादे बैठा मैं तिनका-तिनकादिल के दर्द,कथाएँ सारी
रहा सुनाता बारी-बारी
सुनते थे ज्यों गूँगे-बहरे
कुछ उथले कुछ काफी गहरे
मतलब सधा,चलाया घन.
टूट गया बंजारा मन.
भाषा मधुर शहद में घोली
जिनकी थी अमृतमय बोली
दाएँ में ले तीर-कमान
बाएँ हाथ से खींचे कान
बदल गए आचार-विचार
दुश्मन-सा सारा व्यवहार
उजड़ा देख के मानस-वन.
टूट गया बंजारा मन.
जिस दुनिया से यारी की
उसने ही गद्दारी की
लगा कि गलती भारी की
फिर सोचा खुद्दारी की
धृतराष्ट्र की बाँहों में
शेष बची कुछ आहों में
किसने लूटा अपनापन.
टूट गया बंजारा मन.
कैसे अपना गैर हो गया
क्योंकर इतना बैर हो गया
क्या सचमुच वो अपना था
या फिर कोई सपना था
अपनापन गंगा-जल है
जहाँ न कोई छल-बल है
ईर्ष्या से कलुषित जीवन.
टूट गया बंजारा मन.
वे रिश्तों के कच्चे धागे
आसानी से तोड़ के भागे
मेरे जीवन-पल अनमोल
वे कंचों से रहे हैं तोल
छूट रहे जो पीछे-आगे
जोड़ रहा मैं टूटे धागे
उधड़ न जाए फिर सीवन.
टूट रहा बंजारा मन.
बाहर भरे शिकारी जाने
लाख मनाऊँ पर ना माने
अनुभव हीन, चपल चितवन
उछल रहा है वन-उपवन
'नाद रीझ' दे देगा जीवनय…

सुरेन्द्र अग्निहोत्री की कविता - रोशनी एक वहम...

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रोशनी.......एक वहम! सिर्फ अंधेरा..... कई रंगों, कई रूपों में जी हाँ सिनेमा का यही रूप है। सिनेमाई सरोकार की अनूठी पहल गंदामी रंग के कपड़े पहने कचरे के ढ़ेर बीच बुनते सपने सुबह का उजाला एक ना एक दिन आयेगा मेरे घर - आंगन जब दूसरों की तरह पढ़ने में जाऊंगा थियेटर में फिल्‍म, बाजार में खाना खाऊंगा बच्‍चों की यह अभिलाषा पूरी करने कौन गढ़ेगा परिभाषा। --सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्रीराज सदन, 120/132, बेलदारी लेन लालबाग लखनऊ

नन्‍दलाल भारती की कहानियाँ

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परमार्थ मुरली-क्‍यों मुंशी भईया माथे पर चिन्‍ता और मुट्‌ठी भर आग लिये बैठे हो। कोई नई मुश्‍किल आन पड़ी क्‍या ?मुंशी-मुरली जमाने ने तो मुट्‌ठी में आग भरी है विषमताओं के कलछुले से। इस मुट्‌ठी आग को फेंकना कठिन हो गया। यह आग तो पहचान बन गयी है जबकि कर्म से आदमी की पहचान बनती है परन्‍तु यहां तो आंख खुली नहीं आग मुट्‌ठी में भर दी जाती है। मुट्‌ठी भर आग ठण्‍डी नहीं हो पा रही है। यही चिन्‍ता है और अशान्‍ति का कारण भी। मुरली-माथे पर चिन्‍ता और जमाने की दी हुई मुट्‌ठी भर भर आग ठण्‍डी करते हुए तुम तो कलयुग के कर्ण बन गये हो। मुंशी- क्‍यों मजाक बना रहे हो मेरी दीनता और मुट्‌ठी भर आग मे मर रहे सपनों का। आदमी की मदद कर देना कोई गलत तो नहीं। मुझसे जो हो जाता हे कर देता है। किसी से उम्‍मीद नहीं करता की बदले में मेरा कोई काम करें। अरे नेकी कर दरिया में डाल। इस कहावत में रहस्‍य है मुरली। मुरली-देखो आखिरकार सच्‍चाई जबान पर आ गयी। किसी ने नेकी के बदले बदने की है ना। अरे भईया लोग बहुत जालिम हो गये है। काम निकल जाने पर पहचानते ही नहीं। तुम्‍हारे पड़ोस सुनील खड़ुस की तरह। किस किस का भला करोगे खुद तकलीफ उठा…

यशवन्त कोठारी का आलेख - देह व्‍यापार-विवेचन

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इनसाइक्‍लोपेडिया ब्रिटानिका के अनुसार देह व्‍यापार का अर्थ है मुद्रा या धन या महंगी वस्‍तु और शारीरिक सम्‍बन्‍धों का विनिमय। इस परिभाषा में एक शर्त ये भी है कि वह विनिमय मित्रों या पति पत्‍नी के अतिरिक्‍त हो। गणिका के बारे में वात्‌स्‍यायन ने लिखा है-गणिकाएं, चतुर, पुरुषों के समाज में, विद्वानों की मंडली में राजाओं के दरबार में तथा सर्व-साधारण में मान पाती है। प्राचीन भारत में वेश्‍याएं थी, उसी प्रकार हीटीरा यूनान में तथा जापान में गौशाएं थी। वेश्‍या के पर्यायों में वारस्‍त्री, गणिका, रुपाजीवा, शालभंजिका, शूला, वारविलासिनी, वारवनिता, भण्‍डहासिनी, सज्‍जिका, बन्‍धुरा, कुम्‍भा, कामरेखा, पण्‍यांगना, वारवधू, भोग्‍या, स्‍मरवीथिका, वारवाणि आदि शब्‍दों का प्रयोग हुआ है। रोमन युल्‍पियन के अनुसार वेश्‍या उसे कहते हैं जो धन के लिए अपना ‍शरीर कई पुरुषों को बिना चुनाव किए अर्पण करें। फ्रान्‍सीसी विद्वान गेटे के अनुसार वेश्‍या वह है जो स्‍त्री-पुरुष सम्‍बन्‍धों को आर्थिक लाभ के रुप में देखे। वार्टन, वांगर तथा रिचर्ड आदि विद्वानों ने भी इसी प्रकार से वेश्‍याओं को परिभाषित किया है। दामोदर गुप्‍त…

पुरुषोत्तम विश्वकर्मा लिखित नया भारतीय अराष्ट्रगान

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यहां डाल डाल पर रिश्‍वत और दलाली करे बसेरा। अहा! कैसा मुल्‍क है मेरा ॥ रहे विपक्ष में तब तक है सब सीधे और सयाने। हाथ लगी कुर्सी जिसके भी लगता माल कमाने॥ यहां हर फाईल में ही मिलता हैं घोटालों का फेरा। अहा! कैसा मुल्‍क है मेरा ॥ किसने किसने कितना खाया सबको जोड़ा जाय। कर्जा सारा ही भारत का उतने में चुक जाय ॥ जिसको परखा वो ही निकला हड़फू चोर लुटेरा । अहा! कैसा मुल्‍क है मेरा ॥ किसको देश की सेवा करनी केवल बातें करते। पांच साल में ठूंस ठूंस कर जेबें अपनी भरते॥ मैने तो अपनी कह दी हैं अब सब काम हैं तेरा। अहा! कैसा मुल्‍क है मेरा ॥ --- पुरुषोत्‍तम विश्‍वकर्मा

लक्ष्मीकांत की ग़ज़ल - झुलस रहा है जिगर सर्द चांदनी में

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ग़ज़ल000 हज़ार ज़हमतें हैं यार ज़िन्‍दगी में तमाम ग़म भी छुपे रहते हैं खुशी में लुका-छुपी का खेल खेलते रहे हरदम कभी तो आ के मिलो मुझसे रोशनी में निजाम बेलगाम होने लगा है जब से उबाल आने लगा आम आदमी में खुदा मुझे भी ज़रा दाँव-पेंच सिखला दे वरना जी न सकूंगा मैं इस सदी में तुम्‍हारे गाँव का मौसम अजीब है हमदम! झुलस रहा है जिगर सर्द चांदनी में 000 लक्ष्‍मीकांत 14/260, इंदिरा नगर,लखनऊ।

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल कविता - याद आई बीती बातें

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   बीती बातेंबीते बरस सैकड़ा भर अभी तक नहीं भूला पर | बना रेत का घर घूला , जो थोपा था पंजों पर | आया शाला से पैदल , झड़ी लगी थी झर झर झर | लथपथ पूरा पानी से , काँप रहा था थर थर थर | छींक छींक बेहाल हुआ , नाक बोलती घर घर घर | विक्स मला था मम्मी ने , पीठ नाक और सीने पर | याद हमें आती रहती , बीती बातें ये अक्सर | खुशियों से मन भर जाता , हो जाते ताजा दम तर | --

आर. के. भारद्वाज की लघुकथाएँ

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विकासजिस बस्‍ती में मैने अपना झोंपड़ा बनाया है वह अभी विकास की भ्रूण अवस्‍था में है, न बिजली-पानी, न नाली न सड़कें, न फोन, न सीवर लाइन, लेकिन मुझे विश्‍वास था कि यह बस्‍ती जल्‍द ही न केवल विकास की यौवनावस्‍था को प्राप्‍त होगी बल्‍कि वृद्धा अवस्‍था को भी प्राप्‍त होगी, फिर एक दिन मेरी बस्‍ती में सड़कें बननी शुरू हो गयी, पहले कच्‍ची, फिर रोडियॉ पड़नी शुरू हुई, उसके बाद डामर की पक्‍की सड़क बन कर तैयार हो गई, एक सप्‍ताह के बाद नाली बनाने वाले आ गये, उन्‍होंने नाली बनाई, पक्‍की बनाई, बढ़िया बनाई, बेतरतीब बनाई, नाली की मिट्‌टी ने सड़क को अपने गले लगा लिया, उसके बाद आए पानी के पाइप बिछाने वाले, बिजली वाले, उन्‍होंने जगह जगह से सड़क को काटकर अपना काम किया, बडे बडे गड्ढों में सीमेन्‍ट के पाइप डाल कर खड़े किये, एक साल के बाद छोटे छोटे बल्‍ब जलने लगे। इसके बाद ट्रकों में लदकर बड़े बड़े पाइप आये और उन्‍हें सड़कों के किनारे किनारे डाल दिया गया अब सीवर लाइन खुदने की बारी थी, कुछ दिन बाद सीवर लाइन वालों ने सड़क की मांग को बीच से उजाड़ना शुरू कर दिया, जब कि बस्‍ती अपनी नवयौवना अवस्‍था में थी, सीवर ला…

विजय वर्मा की ग़ज़ल - बातों बातों में छलने का मौसम है...

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ये मौसम 
बातों-बातों में छलने का मौसम है, सर्द-आहों से पिघलने का मौसम है. झूठ है,फरेब है ,दगा है ,बेईमानी है. आप अब तक बचे है,ये क्या कम है! नज़रों से  दूर तो नज़रअंदाज़ कर दिए, सामने है तो बस हम ही हम है. वक़्त का क्या है, गुजरता जाता है, सुना है ज़माने में और भी ग़म है. वह दौर भी गुजरा है कि हाथों में फूल थे, आज तो नौनिहालों के भी हाथों में बम है. हम तो हर बार सच बोल के हारे है , अपनी तो ऐसी है 'मेरे नादाँ सनम है. आज भी है तेरी ईजाओं का इंतज़ार , बचा के रखना तेरे जितने सितम है  उलाहने दो, ताने दो पर कुछ तो बोलो , देखो चुप ना रहना तुम्हे मेरी कसम है..
--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' के दोहे : बड़े-बड़ों की होलिका, कपड़े रही उतार..

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तारकोल, कीचड़ सने, चेहरे रूप-कुरूप.
होली में सब एक-से, रंक, भिखारी, भूप..धो सकती है होलिका, सबके मन का मैल.
पर धुलने की क्या कहें, और रहा है फैल..
मन के प्यारे खेल को, रहे देह से खेल.सारी कुंठा, वासना, ऐसे रहे उंडेल...
चाहे कपड़े नए हों, या अनगिन पकवान.
सब के सब फीके लगें, बिना प्यार, सम्मान..
होली में ऐसे हुए, तन-मन चंग-मृदंग.बजते-बजते, ताल, लय, सारे हो गए भंग.. छलिया, रसिया राग के, झोली भर-भर रंग.
होली मिलने चल पड़े, कलिकाओं से भृंग..
वासन्ती परिधान में, खिला अंग-प्रत्यंग.
सरसों ने फेरे लिए, फिर गेहूं के संग..
लाने को नव सभ्यता, और नए संस्कार.
बड़ों -बड़ों की होलिका, कपड़े रही उतार..           -डॉक्टर गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'

मालिनी गौतम की रचनाएँ

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क्रिसमस ट्रीजन्मदिन पर मिले बहुत से तोहफों में एक तोहफा था-‘छोटा सा क्रिसमस ट्री’ बड़े चाव से एक छोटे से गमले में मैनें उस पौधे को लगाया। उसे रोज़ पानी देना, मिट्टी गोड़ना, उससे बातें करना, उसकी फैली हुई छोटी-छोटी बाहों को सहलाना मेरा नित्यक्रम था । मेरे प्यार-दुलार खाद,मिट्टी और पानी नें अपना रंग दिखाया देखते ही देखते पौधा बढ़्ने लगा और उसकी जड़ों ने गमले में तिराड़ डाल दी । मैनें उसे एक बड़े गमले में उतार दिया....... धीरे-धीरे क्रिसमस ट्री शान बन गया कभी मेरे बगीचे की, कभी बरामदे की, तो कभी ड़्रॉईंग रूम की हर आने-जाने वाले की नज़र उस पर टिक जाती, अरे वाह.....! दो फुट के गमले में सात फुट का पौधा ! मैं मन ही मन खुश होती वैसे ही, जैसे एक माँ अपने बच्चे की तारीफ सुनकर खुश होती है। पर जल्द ही यह गमला भी छोटा पड़ने लगा। पर्याप्त पोषण के अभाव में मेरा पेड़ मुरझानें लगा। मैं समझ रही थी इस बात को कि खुली जमीन और खुले आकाश के वृक्ष को मैनें कैद कर रखा है एक गमले और घर में! उसे दूर करने के ख्याल से मैं काँप उठती....... मेरे बगीचे की शान......... मेरी बरसों की मेहनत, जतन.... पर आखिरकार स्वार्थ को तो हार…

अशोक गौतम का व्यंग्य : संकटमोचक भी अब हारो!

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यों ही सोचा जैसे अकसर सोचा करता हूं कि वे आए हैं तो मेरे संकट हरने ही आए होंगे। सच कहूं जबसे होश संभाला है तबसे संकटों से ही दो चार होता रहा हूं। कभी घर में आटे का संकट तो कभी दाल का संकट। कभी बेटे को अच्‍छे स्‍कूल में दाखिल करवाने का संकट तो कभी उसकी हर हफ्‌ते ट्‌यूशन फीस का संकट। मैं तो बस औरों के ही संकटों को आजतक झेलता रहा। अपने संकटों को गंभीरता से लेने का कम्‍बख्‍त मौका ही नहीं मिला। अब देखो न! बीस बरसों से दिमाग चाटती बीवी के संकट को लगातार झेल रहा हूं। कई बार इस संकट से खुद को उबारने की कोषिष भी की! पर जितने को कुछ करने की सोचने लगा कि दूसरा ही संकट मुंह के पास मुंह लटकाए खड़ा हो गया। कुल मिलाकर ,कभी ये संकट तो कभी वो संकट। ऐसे में मेरी जगह आप होते तो सपने में पूर्व प्रेमिकाओं के बदले संकट मोचकों के ही दर्शन किया करते मेरी तरह। मैंने उन्‍हें प्रणाम किया,‘ हे संकट मोचक प्रणाम! आप हो तो संकट मोचक ही पर किसके संकट मोचक हो? यूपीए के ,एनडीए के या फिर चारों ओर से संकटों में घिरी जनता के! जिसके आगे यूपीए है तो पीछे एनडीए। दाएं कम्‍युनिस्‍ट हैं तो बाएं समाजवादी! न वह आगे ही जा सकती …

पुरुषोत्तम व्यास की कविता - सुना सुना

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सुना सुनामन ही मन में बुना बुना मन ही मन में खोये खोये विचार चल रहे अपने आप में अथाह धधकती आग भड़की नस नस में अभाव का घरोंदा विचलित सा मस्तिष्क भी जकडा जकडा सोच के भी सोच नहीं खोच के भी खोच नहीं मन की वेदना तन मे समाई घडी के कांटे मन अटका अतप्त सा भटक भटक रहा सूखे – झरने का पथ सूखा सूखा चारों ओर भूखा- भूखा चारों ओर सच्च मृत्यु होना जीवन इस पर भावना का झमेला उलटा पुलटा सीधा सरल सुख दुख जीवन तो जीवन......। -- पुरुषोत्तम व्यास पत्ता झामनानी निवास डा फजल दवाखाना के पास क्वेटा कालोनी नागपुर(महाराष्ट) ई-मेल pur_vyas007@yahoo.com

शेर सिंह की लघुकथा - पुण्‍य लाभ

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तीर्थ स्‍थली पुरी में भगवान जगन्‍नाथ के उस बहुत बड़े मंदिर में जा कर, उस ने जहां कहीं भी मूर्तियां, तस्‍वीरें और फल- फूल चढ़ाए हुए स्‍थान देखे, वह श्रद्धा और आदर से उन के सामने नतमस्‍तक हो कर अपना शीश झुकाता रहा । दरअसल, वह अपने एक प्रिय जन की अकाल मृत्‍यु के पश्‍चात मंदिर में दिवंगत आत्‍मा की शान्ति और अपने मन को संतोष और पुण्‍य कमाने के इरादे से आया था । बहुत देर तक भगवान की मूर्तियों पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने के पश्‍चात एवं मंदिर की प्रदक्षिणा कर वाहर निकला तो मंदिर के पास बैठे - खड़े कुछ भिखारियों को अपने प्रिय बन्‍धु को याद करते हुए पच्‍चीस- पचास पैसे के सिक्‍के फैंकते आगे बढ़ता रहा । जेब में पड़ी थोड़ी सी रेजगारी जब खत्‍म हो गई, तो उस ने भिखारियों को आगे ब़ने से रोक दिया । लेकिन एक भिखारी जिसे शायद कुछ नहीं मिला था, उस के पीछे ही पड़ गया । "मोते भी दियो बाबू …मोते भी दियो बाबू " की रट लगा कर । भिखमंगा जब उस के साथ ही हाथ फैलाए चलने लगा तो वह असहज होने लगा । और फिर उस को गुस्‍सा ही आ गया । उस ने एक नजर इधर- उधर डाली और एक झन्‍नाटेदार चांटा भिखमंगे के गाल पर जड़ दिया । …

सी.पी. राजू का आलेख : भैरवप्रसाद गुप्त के कथा-साहित्य में बेरोज़गारी का चित्रण

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इक्कीसवीं सदी की ओर अग्रसर विज्ञानी मानव अनेक अभिशापों से ग्रसित है। बेरोज़गारी उनमें से एक भयंकर अभिशाप है। वर्तमान आर्थिक युग में जीविकोपार्जन ही मनुष्य के जीवन का लक्ष्य रह गया है। किसी देश में कम से कम बेरोज़गारों का होना वहाँ की आर्थिक प्रगति और विकास का परिचायक होता है। जब जनसंख्या की वृद्धि आर्थिक विकास वृद्धि से अधिक हो जाती है, तब बेरोज़गारी का उदय होता है। बेरोज़गारी का अर्थ काम के अवसरों की कमी है। भारत में बेरोज़गारी का रूप भयंकर बन गया है। साधारण या उच्च शिक्षा प्राप्त अनेक युवक-युवतियाँ रोज़गार कार्यालयों में लाईन लगाकर कई दिनों तक दस बजे से पाँच बजे तक खड़े रहने पर भी, केवल बेरोज़गारी में नाम ही लिखा पाता है। फलस्वरूप उसके मन में इस देश और समाज के प्रति विरक्ति की भावना उत्पन्न होती है। इसी भावना का फल है कि भारत जैसे आध्यात्मिक देश में भी आत्महत्याओं की अधिकता होती है। बेरोज़गार युवक देश के लिए विनाशकारी, अनुशासन हीन, विद्रोही और क्रांतिकारी बन जाते हैं। इसलिए देश का सर्वप्रथम कर्तव्य बेरोज़गारी दूर करना है और जन-सामान्य को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर प्रदत्त करना होता है। गु…

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रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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