

| रचना कैसी लगी: |

नारी पथ
तुम कभी समानता की बात करती हो
तो कभी बदलाव की ...
या कभी मर्दों से कंधे से कन्धा मिलाने की ...
पर जब में कहता हूँ कि
आज सब्जी बाज़ार से तुम लाओ
तो कह देती हो की तुम लड़के हो ..
बस में खड़े खड़े मैं
कितना भी थक जाऊं
वो कभी सीट नहीं छोड़ती ..
किसी थके हुए मर्द को
लेडीज़ सीट में बैठा देख
उसके मन में कभी
दया की भावना नहीं आती
और बड़ी निर्ममता से
उठा कर खुद बैठ जाती है..
उसमें उसे अपनी
जीत का एहसास होता है
मानो कोई सिंहासन
हासिल कर लिया हो.
नारी पथ भटक गयी है...
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मन है कि
मन है कि तुम्हें मैं
साइकल पर आगे बिठाकर
हरे भरे जनपथ पर
साथ घुमाऊं ..
इंडिया गेट दिखाऊं..
साइकल चलाते चलाते
जब में हांफ़ने लगूं
तो मेरे गर्म सासों की आवाज़
तुम्हारे कानो में पहुंचे ..
हफ -फ -फ-हफ -फ -फ
( संघर्ष से भरा रोमांतिसिस्म)
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तुम्हारे दोमुंहे बाल..
तुम्हारे दोमुंहे बाल
अच्छे लगते हैं ..
मैगी में पड़ जाये
तो भी मुझे बुरा नहीं लगता.
नूडल समझ कर
उसे भी निगल लेता हूँ
पर शादी के बाद यह सब
मुझे इरिटेट करेंगे..
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हर जगह दिखती हो
राह चलते हर एक कपल में
तुम्हें और अपने आप को देखता हूँ ..
तुम कभी भोली
तो कभी कमीनी
तो कभी खर्चीली दिखती हो.
सुबह सुबह ऑफिस के लिए
जब अपने आप को
बाथरूम में धकेलता हूँ
तो सिंथोल में तुम्हे देखता हूँ..
तुम कभी भरी भरी तो
कभी गली गली दिखती हो..
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अंतस की और भी कविताओं और ग्राफ़िक्स का आनंद लें उनके ब्लॉग द लेज़ी आर्टिस्ट गैलरी http://antaswork.blogspot.com/ पर.
| रचना कैसी लगी: |
हाल ही में दिल्ली की एक अदालत ने एक न्यायसंगत फैसला सुनाते हुए पुलिस का चेहरा बदलने की कोशिश की है। भ्रष्टाचार और निर्ममता से पुलिस ये दो चरित्रजन्य विकार हैं। अदालत ने वर्ष 2010 में लूट और नाजायज हथियार रखने के जुर्म में चार गरीब युवकों को आरोपी बनाया था। लेकिन अदालत ने इस मामले को झूठा पाते हुए न केवल आरोपियों को बरी किया बल्कि संबंधित पुलिस वालों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही करने की हिदायद भी दी। साथ ही सभी युवकों को 50-50 हजार रूपये मुआवजा दिए जाने का आदेश भी दिया। जिससे इनकी आर्थिक, मानसिक, शारीरिक और सामाजिक हुई हानि की भरपाई की जा सके। पुलिस का यह चरित्र बन गया है कि वह किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेकर प्रताड़ित तो करती ही है, अधिकारियों और राजनेताओं को खुश करने के लिए भी फर्जी मामलों की कूट रचना कर डालती है। इस तरह के काम पुलिस व्यक्तिगत उपलब्धियों की फेहरिश्त लंबी कर पदोन्नति हासिल करने के लिए भी करती है। इन षड्यंत्रकारी कोशिशों पर सख्ती से अंकुश लगाए बिना पुलिस का चेहरा मानवतावादी नहीं हो सकता। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्य सरकारों को पुलिस एक्ट में बदलाव के लिए कई बार हिदायतें दी हैं।
पुलिस की कार्यप्रणाली प्रजातांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक अधिकारों के प्रति उदार, खरी व जवाबदेह हो इस नजरिये से सर्वोच्च न्यायालय ने करीब पांच साल पहले राज्य सरकारों को मौजूदा पुलिस व्यवस्था में फेरबदल के लिए कुछ सुझाव दिए थे, इन पर अमल के लिए कुछ राज्य सरकारों ने आयोग और समितियों का गठन भी किया। लेकिन किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले ये कोशिशें आईएएस बनाम आईपीएस के बीच उठे वर्चस्व के सवाल और अह्म के टकराव में उलझकर रह गईं। लिहाजा पांच साल बाद एक बार फिर उच्चतम न्यायालय को पुलिस व्यवस्था में जरूरी सुधार के लिए हिदायत देने को मजबूर होना पड़ा है। किंतु ब्रितानी हुकूमत के दौरान 1861 में वजूद में आए ‘पुलिस एक्ट' में बदलाव लाकर कोई ऐसा कानून अस्तित्व में आए जो पुलिस को कानून के दायरे में काम करने को तो बाध्य करे ही, पुलिस की भूमिका भी जनसेवक के रूप में चिन्हित हो क्या ऐसा नैतिकता और ईमानदारी के बिना संभव है ? पुलिस राजनीतिकों के दखल के साथ पहुंच वाले लोगों के अनावश्यक दबाव से भी मुक्त रहते हुए जनता के प्रति संवेदनशील बनी रहे, ऐसे फलित तब सामने आएंगे जब कानून के निर्माता और नियंता ‘अपनी पुलिस बनाने की बजाय अच्छी पुलिस' बनाने की कवायद करें।
पुलिस को समर्थ व जवाबदेह बनाने के लिए उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह बनाम भारतीय संघ के एक मामले में उच्चतम न्यायालय ने पुलिस व्यवस्था को व्यावहारिक बनाने की दृष्टि से सोराबजी समिति की सिफारिशें लागू करने की हिदायत राज्य सरकारों को दी थी। लेकिन पुलिस की कार्यप्रणाली को जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप बनाने की पहल देश की किसी भी राज्य सरकार ने नहीं की। लिहाजा सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर पांच साल पुराने निर्देशों को दोहरा कर सुप्त पड़ी राज्य सरकारों को चेताया है। चूंकि ‘पुलिस' राजनीतिकों के पास एक ऐसा संवैधानिक औजार है जो विपक्षियों को कानूनन फंसाने अथवा उन्हें जलील व उत्पीड़ित करने के आसान तरीके के रूप में पेश आती है। इसीलिए पुलिस तो पुलिस, सीवीसी और सीबीआई को भी विपक्षी दल सत्ताधारी हाथों का खिलौना कहते नहीं अघाते। लेकिन जब इसे बदलकर जनहितकारी बनाए जाने की हिदायत देश की सर्वोच्च न्यायालय दे रही है तब कांग्रेस और साम्यवादी राज्य सरकारों की बात तो छोड़िए उन तथाकथित राष्ट्रवादी दलों की सरकारें भी इस ब्रिटिश एक्ट को पलटने की उदारता नहीं दिखा रहीं, जो पानी पी-पीकर फिरंगी हुकूमत को कोसती रहती हैं। इससे जाहिर होता है सभी राजनीतिक दलों की फितरत कमोबेश एक जैसी है। नौकरशाही की तो डेढ़ सौ साल पुराने इसी कानून के बने रहने में बल्ले-बल्ले है। सो पूरे देश में यथा राजा, तथा प्रजा की कहावत फलीभूत हो रही है।
इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आजादी के 63 साल बाद भी पुलिस की कानूनी संरचना, संस्थागत ढांचा और काम करने का तरीका औपनिवेशिक नीतियों का पिछलग्गू है। इसलिए इसमें परिवर्तन की मांग न केवल लंबी है बल्कि लाजिमी भी है। लिहाजा इसी क्रम में कई समितियां और आयोग वजूद में आए और उन्होंने सिफारिशें भी कीं। परंतु सर्वोच्च न्यायालय के बार-बार निर्देश देने के बावजूद राज्य सरकारें सिफारिशों को लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देने की बजाय इन्हें टालती रही हैं। बल्कि कुछ सरकारें तो सर्वोच्च न्यायालय की इस कार्यवाही को विधायिका और कार्यपालिका में न्यायपालिका के अनावश्यक दखल के रूप में देखती हैं। इसीलिए सोराबजी समिति ने पुलिस विधेयक का जो आदर्श प्रारूप तैयार किया है, वह ठण्डे बस्ते में है।
पुलिस की स्वच्छ छवि के लिए जरूरी है उसे दबाव मुक्त बनाया जाए। क्योंकि पुलिस काम तो सत्ताधारियों के दबाव में करती है, लेकिन जलील पुलिस को होना पड़ता है। झूठे मामलों में न्यायालय की फटकार का सामना भी पुलिस को ही करना होता है। पुलिस के आला-अधिकारियों की निश्चित अवधि के लिए तैनाती भी जरूरी है। क्योंकि सिर पर तबादले की तलवार लटकी हो तो पुलिस भयमुक्त अथवा भयनिरपेक्ष कानूनी कार्रवाई को अंजाम देने में सकुचाती है। कई राजनेताओं के मामलों में तो जांच कर रहे पुलिस अधिकारी का ऐन उस वक्त तबादला कर दिया जाता है, जब जांच निर्णायक दौर में होती है। जब प्रभावित होने वाला नेता यह भांप लेता है कि जांच में वह प्रथम दृष्टया आरोपी साबित होने वाला है तो वह अपनी ताकत व पहुंच का बेजा इस्तेमाल कर जांच अधिकारी को बेदखल करा देता है। हालांकि जांच और अभियोजना के लिए पृथक एजेंसी की जरूरत भी सिफारिशों में हैं। ऐसा होता है तो पुलिस लंबी जांच प्रक्रिया से मुक्त रहते हुए, कानून-व्यवस्था को चुस्त बनाए रखने में ज्यादा ध्यान दे पाएगी।
पुलिस का एफआईआर दर्ज करने के लिए बाध्यकारी बनाए जाने की कवायद भी सिफारिशों में शामिल है। क्योंकि पुलिस कमजोर व पहुंच विहीन व्यक्ति के खिलाफ तो तुरंत एफआईआर लिख लेती है, लेकिन ताकतवर के खिलाफ ऐसा तत्काल नहीं करती। इसलिए नाइंसाफी का शिकार बने लोग अदालत के लिए मामलों को संज्ञान में ला रहे हैं। ऐसे मामलों की संख्या पूरे देश में लगातार बढ़ रही है। इस वजह से पहली नजर में जो दायित्व पुलिस का है उसका निर्वहन अदालतों को करना पड़ रहा है। अदालतों पर यह अतिरिक्त बोझ है। अदालतों में ऐसे मामले अपवाद के रूप में ही पेश होने चाहिए। न्यायालय ने तो निर्देशित भी किया है कि पुलिस किसी भी फरियादी को एफआईआर दर्ज करने से मना नहीं कर सकती। दिल्ली उच्च न्यायालय ने तो एफआईआर की प्रति भी अनिवार्य रूप से फरियादी को देने और उसे फौरन वेबसाइट पर डालने की हिदायत दी है।
राष्ट्रीय पुलिस आयोग भी पुलिस की मौजूदा कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं है। आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 60 फीसदी ऐसे लोगों को हिरासत में लिया जाता है, जिन पर लगे आरोप सही नहीं होते। कारागारों में बंद 42 फीसदी कैदी इसी श्रेणी के हैं। दिल्ली अदालत का चार युवकों को बरी करने का मामला ऐसे ही मामलों में शामिल हैं। ऐसे ही कैदियों के रखरखाव और भोजन पानी पर सबसे ज्यादा धनराशि खर्च होती है। आरूषि हत्याकाण्ड, असीमानंद की गिरफ्तारी और बांदा में बसपा विधायक द्वारा बलात्कार की शिकार नाबालिग किशोरी की हिरासत कुछ ऐसे ताजा मामले हैं। जिनमें सीबीआई और पुलिस की नाकामी जाहिर तो हुई ही, निर्दोषों को प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी है। इसलिए राज्य सरकारों को पुलिस व्यवस्था में सुधार की जरूरत को नागरिक हितों की सुरक्षा के तईं देखने की जरूरत है, न कि पुलिस को राजनीतिक हित-साध्य के लिए खिलौना बनाने की ?
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प्रमोद भार्गव
शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी (म.प्र.) पिन-473-551
लेखक वरिष्ठ कथाकार एवं पत्रकार हैं।
| रचना कैसी लगी: |
बचपन
रेत गिट्टी,
ईंट मिट्टी,
और तपती धूप तले,
झुलसता हुआ
बचपन कोई मैं देखता हूँ।
सावन मनभावन,
निर्मल जल पावन,
और किसी टूटी टपरिया तले,
भीगता हुआ
बचपन कोई मैं देखता हूँ।
शरद अनवरत,
शीतलहर लेती लपट,
और किसी फटे चिथड़े तले,
सिकुड़ता हुआ
बचपन कोई मैं देखता हूँ।
बसंत मनपसंद,
हरदम ही आनंद,
और आधे नग्न बदन में,
फूल बीनता हुआ
बचपन कोई मैं देखता हूँ।
मुस्कुराता हरदम,
बदले चाहे मौसम,
और पनपता, और उन्नत,
खुशहाल बचपन का कोई
स्वप्न वही मैं देखता हूँ।
सुमित शर्मा, खिलचीपुर,जिला-राजगढ़ (म.प्र.)
| रचना कैसी लगी: |
१. लगाने को अपना इक वन
सुंदर सा इक मेरा गाँव
पर्वत के आँचल में
चारों और से घिरा हुआ था
हरे भरे वृक्षों से
मेरे मुन्ने को भाते थे
वृक्ष और उनपे कूदते बंदर
छोड़ कर उस गाँव को
प्रकृति की ठंडी छाँव को
हम विदेश आ गए
बडी बडी इमारतों के
समुंदर में समा गए
कभी कभी बन मुन्ना बंदर
मुझे बनाता था वो पेड़
झूल कर मेरी बाजू पर
करता था उस वन को याद
लौट के जब हम आए गाँव
गायब था वो पूरा वन
उद्योगीकरण का दानव
पूरा उसे चुका था निगल
और वहां खड़ा था
एक बढा सा कलघर
उगले जो जहरीला धुआँ
और बंदर मचा रहे थे हुड़दंग
उनका जो उजड़ा था चमन
मुन्ना होकर बोला उदास
कहाँ गया माँ मेरा वन ?
सब बंदरों को क्यूँ भगाते हैं ?
वो क्यों न मुझे हंसाते हैं ?
दादाजी ने तब समझाया
वनों का उसे महत्व बतलाया
बोला बढे ही जोश में
माँ, मैं वन लगाऊंगा
और बंदरों को बसाउंगा
चला फिर दादाजी के संग
लगाने को अपना इक वन
२.कटने से भी बचाने हैं
चला मेरा मुन्ना लगाने को
अपना इक वन
चुने सारे मनपसंद पौधे
और बनाया अपना उपवन
सीखा दादा जी से
उनकी देखभाल करना
सुबह शाम देता था पानी
और करता था ढेरों बातें
जब कोई नया पत्ता आता
हर्षित हो घर में चिल्लाता
यूँ ही बीता इक माह
पर वन बढा जरा सा
लौट के हमको आना था
परदेशी बन जाना था
उसका पुलकित मन
ले दादाजी से वादे
पानी देना प्रतिदिन इनको
और करना मीठी मीठी बातें
लौट के मैं जब आउंगा
देखूंगा अपना यह वन
प्रतिदिन करता वन को याद
यूँ ही बीता फिर एक साल
लौट के हम घर आये थे
पौधे बढे थे थोड़े से
पर वृक्ष नहीं बन पाए थे
हो कर बोला बढा उदास
माँ कब बनेगा मेरा वन
समझाया उसे तब प्यार से
वृक्ष होते हैं बच्चों जैसे
धीरे धीरे बढ़ते हैं
दादाजी ने रोपे जो वृक्ष
तो फल आपने खाए हैं
बोला होकर उत्सुक
लगते इतने वर्ष
एक वृक्ष को बढ़ने में
फिर एक ही दिन में
कट जाता वो क्यों
माँ अब मैं समझा हूँ
केवल वृक्ष नहीं लगाने हैं
पर कटने से भी बचाने हैं.
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| रचना कैसी लगी: |
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| रचना कैसी लगी: |
रोशनी.......एक वहम!
सिर्फ अंधेरा..... कई रंगों, कई रूपों में
जी हाँ सिनेमा का यही रूप है।
सिनेमाई सरोकार की अनूठी पहल
गंदामी रंग के कपड़े पहने
कचरे के ढ़ेर बीच बुनते सपने
सुबह का उजाला एक ना एक दिन
आयेगा मेरे घर - आंगन
जब दूसरों की तरह पढ़ने में जाऊंगा
थियेटर में फिल्म, बाजार में खाना खाऊंगा
बच्चों की यह अभिलाषा
पूरी करने कौन गढ़ेगा परिभाषा।
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सुरेन्द्र अग्निहोत्री
राज सदन, 120/132, बेलदारी लेन लालबाग लखनऊ
| रचना कैसी लगी: |
मुंशी-मुरली जमाने ने तो मुट्ठी में आग भरी है विषमताओं के कलछुले से। इस मुट्ठी आग को फेंकना कठिन हो गया। यह आग तो पहचान बन गयी है जबकि कर्म से आदमी की पहचान बनती है परन्तु यहां तो आंख खुली नहीं आग मुट्ठी में भर दी जाती है। मुट्ठी भर आग ठण्डी नहीं हो पा रही है। यही चिन्ता है और अशान्ति का कारण भी।
मुरली-माथे पर चिन्ता और जमाने की दी हुई मुट्ठी भर भर आग ठण्डी करते हुए तुम तो कलयुग के कर्ण बन गये हो।
मुंशी- क्यों मजाक बना रहे हो मेरी दीनता और मुट्ठी भर आग मे मर रहे सपनों का। आदमी की मदद कर देना कोई गलत तो नहीं। मुझसे जो हो जाता हे कर देता है। किसी से उम्मीद नहीं करता की बदले में मेरा कोई काम करें। अरे नेकी कर दरिया में डाल। इस कहावत में रहस्य है मुरली।
मुरली-देखो आखिरकार सच्चाई जबान पर आ गयी। किसी ने नेकी के बदले बदने की है ना। अरे भईया लोग बहुत जालिम हो गये है। काम निकल जाने पर पहचानते ही नहीं। तुम्हारे पड़ोस सुनील खड़ुस की तरह। किस किस का भला करोगे खुद तकलीफ उठा कर। परमार्थ का राही बनने से बेहत्तर है कि खुद का घर रोशन करो।
मुशी-कुछ लोगों को आदमियत के विरोध की लत पड़ चुकी है तो कुछ लोगों को आदमियत और परमार्थ के राह चलने की। हमे आदमियत और परमार्थ काम में आत्मिक सुख मिलता है ।
मुरली-क्यों न बच्चों के मुंह का निवाला छिन जाये। धूपानन्द का तुमने कितना उपकार किया। आखिरकार उसने तुमको ठेंगा दिखा दिया। यही परमार्थ का प्रतिफल है।
मुंशी-परमार्थ प्रतिफल की चाह में नहीं किया जाता ।परमार्थ के लिये तो बुघ्द ने राजपाट तक छोड़ दिया। यदि आज का आदमी अपने सुखों में तनिक कटौती कर किसी का हित साधे दे तो बड़े पुण्य का काम होगा। आदमी होने के नाते फर्ज बनता है कि हम दीनशोषित वंचित दुखी के काम आये।
मुरली-खूब करो। धूपानन्द को कितने साल अपने घर में रखे खानाखर्चा उठाये नौकरी लगवाये जबकि तुम्हारे उससे कोई खून का रिश्ता भी न था। उसके परिवार तुम अपयश लगाये। धूपानन्द के दिन तुम्हारी वजह से बदले। वही तुमको आंख दिखा रहा है। उसके घर वाले तुमको बेईमान साबित करने में जुटे रहे। नेकी के बदले क्या मिला दुनिया भले ही न कहे पर धूपानन्द के चाचा चाची,भाई भौजाई ने तो कह दिया ना कि भला आज के जमाने में बिना किसी फायदे को कोई किसी को एक वक्त की रोटी नहीं देता मुंशी चार चार साल फोकट में धूपानन्द का खानखर्च कैसे उठा सकता है। मुरली भाई तुम्हारी नेकी तो सांप को दूध पीलाने वाली बात हुई।
मुंशी-हमने अपनी समझ से अच्छा किया है। मै खुश हूं एक लाचार की मदद करके। यदि कोई मेरे निःस्वार्थ भाव को स्वार्थ के तराजू पर तौलता है तो तौलने दो। सच्चाई तो भगवान जानता है। परमार्थ तो निःस्वार्थ भाव से होता है। स्वार्थ आ गया तो परमार्थ कहां रहा। दुर्भाग्यवस किसी की मुट्ठी आग से भर जाये तो आदमी होने के कारण जलन का एहसास कर शीतलता प्रदान करना चाहिये की नहीं।वैसे भी रूढिवादी व्यवस्था ने तो हर मुट्ठी में आग भर दिया है।
मुरली-वाह रे हरिश्चन्द्र वाह करते जा नेकी। खाते जा दिल पर चोट। दर्द पीकर मुस्कराता रह और करता रह परमार्थ। अब तो चेत जा।
मुशी-कोई गुनाह तो नहीं किया हूं कि पश्चाताप करूं। आदमी का नहीं भगवान का सहारा है मुझे। आदमी को परमात्मा का प्रतिरूप मानकर सम्मान करता है। यही मेरी कमजोरी है। यही कारण है कि आग बोने वाले मतलबियों की महफिलों में बेगाना हो जाता हूं। हमारी नइया का खेवनहार तो भगवान है। मुट्ठी ही नहीं तकदीर में आग भरने वाले तो बहुत है।
मुरली-मुंशी भइया ऐरे गैरों के लिये अपनों का पेट काटते रहते हो,खुद को तकलीफ देते हो इसके बदले तुमको क्या मिला।अरे धूपानन्द के परिवार वालो का देखो एक भी आदमी तुम्हारी बीमारी की अवस्था में हालचाल पूछने तक नहीं आया। धूपानन्द ने कौन सा अच्छा सलूक किया तुम्हारे बच्चों को अपशब्द बककर गया। तुम्हारे पड़ोसियों को देखो जिनके दुख मे रात दिन एक कर दिये वही तुम्हें बदनाम कर रहे है। तुम्हारे दुश्मन बन रहे है। ऐसी नेकी किस काम की भइया मुंशी।
मुंशी-यकीन कोई दौलत तो नहीं मिली पर आत्मिक सुख तो बहुत मिला है। यह सुख रूपये से खरीदा भी नहीं जा सकता। परमार्थ के राह में रोड़े तो आते है वह भी हम जैसे गरीब के लिये जिसे रूढिवादी समाज ने मुट्ठी भर आग के सिवाय और कुछ न दिया हो। नेकी की जड़ें पाताल तक जाती हैं ओर गूंजे परमात्मा के कानों को अच्छी लगती है। स्वार्थ की दौड़ में शामिल न होकर मानवकल्याण के लिये दौड़ना चाहिये। इस दौड़ में शामिल होने वाला परमात्मा का सच्चा सेवक होता है।
मुरली-दौड़ो भइया नेकी की राह पर मुट्ठी भर आग लिये। अरे पहने अपनी मुट्ठी की आग को शान्त तो करो। जिस आग ने सामाजिक आर्थिक पतन की ओर ढकेले है।
मुंशी-परहित से बड़ा कोई धर्म नहीं है। यह बात ज्ञानियों ने कही है। मुट्टी में आग भरने वालो ने नहीं। आज का आदमी इस महामन्त्र को आत्मसात् कर ले तो धरती पर बुध्द का सपना फलीभूत हो जाये।
मुरली-मुंशी भइया अपने परिवार के हक को मारकर परमार्थ करना कहां तक उचित है। चलो तुम परमार्थ की राह। यह राह तुमको मुबारक हो पर भइया अपने घर के दीये में तेल पहले डालो।
मुंशी-परमात्मा की कृपा से मेरे दीये का तेल खत्म नहीं होने वाला है। मेरी राह में मेरा परिवार भी सहभागी है। उन्हे भी हमारे उद्देश्य पर गुमान है। हां तंगी में भी मेरा परिवार आत्मिक सुख का खूब रसास्वादन कर रहा है। सच कहूं मेरा परिवार ही मेरा प्रेरणास्रोत है।
मुरली-अपने दिल से पूछो कितना दर्द पी रहे हो। घर परिवार पर ध्यान दो।
मुंशी- पारिवारिक जिम्मेदारी अच्छी तरह निभा रहा हूं। इसके साथ परमार्थ का आत्मिक सुख उठा लेता हूं कोई बुराई तो नहीं।
मुरली-खूब करो। बने रहे परमार्थ के राही। मुझे अब इजाजत दो। तुम्हारे परमार्थ के जनून को सलाम․․․․․․․․․
मुंशी-याद रखना परमार्थ प्रभु की पूजा है।
दहशत
अरे कुमार बाबू क्यो रोनी सुरत बना कर बैठो हो क्या बात है ! ऐसे लगता है कि कोई आपकी भैंस हांक ले गया हो ! क्यों इतने उदास हो ! सिर के बाल अस्तव्यस्त हैं ! भौहे बिलकुल तनी हुई हैं ! गाल पर हाथ रखे बैठे हो ! क्यों इतने उदास हो भइया !क्यों․․․․․․․․ चिन्ता का कोई खास कारण है कहते हुए अंकुर बाबू कुमार बाबू की बगल में बैठ गये !
कुमार बाबूः भाई कमजोर आदमी की खुशी तो बीमार की हंसी के माफिक होती है !
अंकुरबाबूः बड़े मरम की बात कर रहे हो ! मेरी समझ से परे की बात है !सीधी साधी भापा में कुछ कहते तो समझ भी पाता !
कुमार बाबूःअंकुर बाबू कमजोर आदमी दहशत में जीता है ! यह तो मानोगे कि नहीं !
अंकुरबाबूः दहशत मतलब जैसे सीमा पर आंतकवादी बम फोडकर दहशत फैला रहे हैं !
कुमार बाबूःइसी तरह की दहशत कमजोर आदमी न पनप सके बडे बडे उदयोगपति,ओहदेदार इतना ही नहीं तथाकथित धर्म समाज के लोग भी पीछे नहीं है ! मौका पाते ही सभी कमजोर पर टूट पडते हैं बांझ की भांति तभी तो कमजोर कमजोर ही बना हुआ हैं ! न तो उसकी सामाजिक उन्नति हुई हैं uk ही आर्थिक बेचारा रिसते घाव का मवाद ही साफ करते करते मर खप जा रहा है !
अंकुर बाबूः सच कह रहे है ! कुछ भ्रमित स्वार्थी ऊची बिरादरी, ऊंचे ओहदा और सम्पन्न लोग कमजोर लोगो के विकास में बबूल की छांव ही साबित होते हैं ! यह कटु सत्य हैं ! लोग इसे आसानी से नहीं मानेग पर सच्चाई तो यही है !तभी तो देखो उदयोगपतियों का मुनाफा दिन दुना रात चौगुना बढ रहा हैं कमजोर नमक रोटी की जुआड में भटक रहा है ! कमजोर तबके को जातिवाद का जहर पीना पड रहा हैं ऐसी ही हाल बडे ओहदेदारो के मातहत निम्नश्रेणी वाले कर्मचारियों की हैं यदि निम्न श्रेणी का कर्मचारी छोटी जाति का हैं तो उसे पग पग पर शोंपण उत्पीडन प्रताडना के साथ ही आर्थिक नुकसान भी भरपूर पहुंचाया जा रहा है ! कितनी विषमता व्याप्त हैं आज का सुशिक्षित आदमी एंव उच्च असान पर विराजमान आदमी भी जहर की खेती करने से बाज नहीं जा रहा है !नतीजन हर ओर विषमाद के काले बादल छाये हुए है !इन्ही करतूतों की वजह से कमजोर आदमी दहशत में दम भर रहा है !
कुमारबाबूः अंकुरबाबू इतने गूढ रहस्य की बात कर रहे हो ! आपकी बात में चिन्तन के भाव दर्शित हो रहे हैं ! आप सामान्य वर्ग के होकर भी कमजोर व्यक्ति के लिये इतना सोच रहे हैं काश आप जैसे सभी हो जाते तो कब के इस धरती से विषमाद का विष पी गये होते !
अंकुरबाबूः सच कहा है किसी ने बडी मछली छोटी मछलियों को खाकर ही बडी बनी रहने का स्वांग करती रहती है ! दहशत फैेलाना ही उसका स्वभाव होता हैं ! छोटी मछलिया भी एकजुटता का परिचय नहीं देती हैं जिस की वजह से बडी मछली अपने बडे होने के अभिमान में रौदती रहती हैं छोटी मछलियों को !शिकरियों के जाल में भी यही छोटी मछलियां ही जल्दी फंसती हैं !
कुमारबाबूः बिल्कुल सही फरमा रहे हैं! यही तो चिन्ता का विपय है ! आदमी सोच समझ सकता हैं फिर भी अपने रूतबे को कायम रखने के लिये आदमी होकर आदमी का लहू पीकर पलता हैं ! निठारी काण्ड देखो बालक बालिकाओें का यौवन शोपण कर उनकी अंग तक बेच दिये उस ककुर्मी मानिन्दर और उसके साथियों ने ! इसमें ज्यादातर कमजोर लोगों के ही बच्चे थे ! इससे दहशत की दीवार और मजबूत हो गयी हैं ! स्वार्थ के वशीभूत होकर आदमी क्या क्या कर बैठ रहा हैं ! हर ओर दहशत फेली हुई है चाहे जाति समाज की चहरदीवारी हो श्रम की मण्डी हो साहूकार सेठ लोगो की दुकान हो या ऊचे ओहदे का मामला हो हर कमजोर की छाती पर ही बैठकर जुगाली कर रहा हैं खुद के हित की ! परहित की भावना का तो लोप ही हो गया हैं ! यदि इस स्वार्थ की दौड में कोई सामाजिक उत्थान अथवा आर्थिक उत्थान में लगा हुआ हैं तो तहकीकात कर उसको इस विपमतावादी समाज में उच्च आसन प्रदान कर देवत्व का दर्जा दिया जाना चाहिये !
अंकुरबाबूःठीक कह रहे है पर ज्यादातर अमानुष लोग कमजोर मानुषों के आंसू अथवा लहू पीकर ही अपनी तरक्की की नींव मजबूत करते हैं ! आज देवात्माओं का तो मिलना मुश्किल हो गया हैं हजारों बरस में एकाध बार ही कोई बुघ्द पैदा होता हैं कमजोर वर्ग के उद्धार के लिये !काश मानव में समानता का भाव विकसित हो जाता जातिभेद का भ्रम नष्ट हो जाता ! दहशत का घनघोर विषैलापन छंट जाता ! काश मानव अभिमान की दीवार तोडकर मानव कल्याण में निकल पड़ते !सच मानो दहशत का कुहरा छंटते ही वह पूज्य हो जाता बुद्ध भावे गांधी अम्बेडकर की तरह हैं !
कुमारबाबूः ठीक कह रहे हो अंकुर बाबू काश ऐसा हो जाता ! विषमता के बादल छंट जाते ! जातिवाद की जहरीली दरियां में डूबता हुआ इंसान कमजोर केा रौदने के ही फिराक में रहता हैं चाहे वह समाज हो श्रम की मण्डी या धर्म का अडडा या दफतर !किसी ने कहा है देखा देखी पाप देखी देखी पुण्य पर कमजोर केा सताने का पाप ज्यादा हो रहा हैं तभी तो गरीबी भूखमरी जातिवाद का विपधर कमजोर को डंस रहा हैं !
अंकुर बाबूः सच पाप ज्यादा पुण्य कम हो गया हैं इस युग में सब एक दूसरे को ठगने में लगे हुए है कमजोर की पीडा से बेखबर !दुकानदार मिलावट करने में जुटा हैं! उत्पादक श्रमिक के दोहन शोषण में लगा हुआ हैं अधिकारी कर्मचारी के दोहन शोषण उत्पीडन में लगा रहता हैं ! बांस अपना वर्चस्व कायम रखने के लिये मातहतों को आतंकित किये रहता हैं ! सच अब तो एक सर्वे से यह सिद्ध हो चुका है कि इकहत्तर प्रतिशत बांस मातहतों को आतंकित किये रहते हैं यानि सभ्य समाज के आंतकवादी ! ऊची बिरादरी वाला नीचीं बिरादरी वाले को वहिष्कृत करने की जुगाड़ में बेचैन रहता हैं यानि हर ओर दहशत के बादल !
कुमारबाबूःठीक कह रहे हैं तभी तो न गरीबी का उन्मूलन हुआ इस देश से न ही जातिवाद का ! गरीबी और जातिवाद खूब फलफूल रहे हैं ! समृद्ध कमजोर का लहू चूसने को बेकरार लगता है ! वह अपनी तरक्की कमजोर के शोषण उत्पीडन में ही देखता हैं चाहे वह आर्थिक तरक्की हो या सामाजिक ! सच खुद को खास कहने वाले लोग कमजोर की पहचान लीलने पर उतावलने हैं !
अंकुर बाबूःठीक कह रहे है भइया !यदि ईमानदारी से सामजिक एवं आर्थिक सम्बृद्ध लोग अपने फर्ज पर खरे उतरे होते तो ना आज गरीबी नंगे नाचती और ना ही इसांनियत के माथे का कलंक जातिवाद ही होता ! हमारी धरती स्वर्ग से सुन्दर होती ! जातिवाद की विपपान करने वाला खुद को पाता हैं आज भी सहमा हुआ ! जैसे वह आधुनिक प्रगतिशील समाज में नहीं श्मशान में रह रहा हो जहां उसके अधिकारो का दाह संस्कार किया जा रहा है ! सच इसीलिये तो आज शोषित वंचित तरक्की से दूर पडा हुआ हैं ! अस्सी प्रतिशत आबादी को उन्नचास प्रतिशत आरक्षण का विरोध हो रहा हैं जो समाज के अतिशोपित पीडित पिछडे समाज का दिया जा रहा हैं जबकि देश की मात्र बीस प्रतिशत सामान्य आबादी के लिये इक्वावन प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है इस पर कोई श्शोर शराबा ही नहीं हो रहा हैं ! कमजोर को और कमजोर करने की साजिश हो रही हैं ! क्या इसे न्याय कहा जा सकता हैं !अरे वंचितों को आरक्षण की नहीं संरक्षण की जरूरत हैं !ए तो समानता के भूखे रहते हैं पेट की भूख तो हाड फोड कर बुझा लेते हैं !इनके के सर्वांगीण विकास के लिये आरक्षण से ज्यादा संरक्षण की जरूरत हैं !सामाजिक आर्थिक समानता की जरूरत हैं ! वंचित समाज को तरक्क्ी का मौका मिलना चाहिये !
कुमार बाबूः आपकी उदारता की तो मैं कद्र करता हूं ! आपके विचार से मैं बिल्कुल सहमत हूं ! आप सामान्य वर्ग के होकर कमजोर कि पीडा से कितना ताल्लुक रखते हैं ! सच मानिये आप जैसे ही लोगो के नेक इरादे की वजह से ही तो कमजोर सांसें भर पा रहा हैं वरना कब कदम तोड़ चुका होता ! सच मानिये अंकुर बाबू मुझे भी रोज रोज आसुंओं से रोटी गिली कर खानी पडती हैं ! मजबूरी हैं वरना ऐसी चाकरी से तौबा कर लेता ! सवाल हैं छोडकर जाउंगा कहां हर ओर तो यही हाल हैं ! अरमानों का दहन कर चाकरी में लगा हुआ हूं ! हर क्षण मेरे अरमान रौंद दिये जाते है ! किसी क्षण बूढ़ी व्यवस्था के बहते मवाद का चखना पड जाता हैं तो दूसरे क्षण आर्थिक विषमता का तो किसी क्षण तथाकथित बड़प्पन के अभिमान का कुल मिलाकर मुझ जैसे कमजोर आदमी का हर क्षण दहशत में ही गुजरता है अंकुर बाबू !
अंकुरबाबूः क्या कह रहे हो कुमार बाबू !
कुमारबाबूः ठीक कह रहा हूं!यकीन करो मेरी बात पर ! दिल का हर कोना छिल चुका हैं! आशा में ही तो जा रहा हूं वरना विषमता के पोषक जीने कहा दे रहे हैं !
अंकुर बाबूः आपकी बात में तो बहुत दम लगती है !सच आज आदमी अपनी उन्नति के अभिमान में आदमी को ही उत्पीड़ित कर रहा हैं आदमियत से नाता तोड़कर ! हर तरह से प्रयास करने लगा है कि कमजोर आदमी को गुलाम कैसे बनाकर रखे ! अभिमानी व्यक्ति हमेशा प्रयासरत रहता है कि वह कमजोर व्यक्ति उसके सामने श्वान की भांति जीभ लपलपाता दुम हिलाता रहे और स्वार्थी की हर उम्मीदों पर खरा उतरता रहे !सच आज तो समाज हो या दफतर नंगी आंखों से देखा जा सकता हैं !
कुमारबाबूः यही तो हो रहा है ! कल की ही तो बात है हमारे बांस जो किस्मत के कमाल-वश अफसर बन बैठे हैं ! उनमें भले ही बाकी काबिलियते हो पर शैक्षणिक काबिलियतों को पूरा नहीं करते परन्तु बडे साहेब हैं ! मुझ गरीब के आंसू से अपनी वाहवाही संवारने के फिराक में सदा ही रहते हैं !
अंकुरबाबूः कहना क्या चाह रहे हो कुमार बाबू क्या मतलब है आपके कहने का ! आप भी उत्पीडित हैं !
कुमारबाबूः बिल्कुल सही समझे ! कल छुटटी थी पर मुझे परेशान करने के लिये बांस ने दोपहर में फोन किया दफतर बुलाने के लिये खैर मैं घर पर था नहीं ! रात्रि में देर से आया तो पता चला ! बच्चे ने फोन उठाया था !वह बांस से बोल दिया था कि पापा किसी संस्था के जलसे में गये हैं देर से आयेगे जब भी आयेगे तो बता दूंगा !
अंकुर बाबूः यह तो परेशान होने वाली बात नहीं हुई !
कुमार बाबूः बात पूरी तो होने दो ! दुसरे दिन जब दफतर गया !
अंकुरबाबूः तब क्या हुआ बांस ने फटकारा !
कुमारबाबूः ठीक समझे ! अपने पद के घमण्ड में चूर रहने वाले बांस बडी बदतमीजी से बुलाये ! मैं पेश हुआ अंकुर बाबूःतब क्या हुआ !
कुमार बाबूः इतना बदमिजाज अधिकारी नहीं देखा थी इतने बरस की नौकरी में ! बहुत लोगो ने सताया तो है पर बदसलूकी की हदे पार तो वर्तमान के बांस करने लगे हैं !
अंकुरबाबूः अरे ए तो बताओ आपके बांस ने बुलाकर कहा क्या !
कुमार बाबूः सभ्यता का पोस्ट मार्टम और इंसानियत को गाली और क्या !बदतमीजी के साथ बुलाया और बोले क्यो रे कुमार तू कल दफतर क्यो नहीं आया !एक कागज का पुलिन्दा फेंकते हुए बोला ए काम ले जाकर कर अगर तू कल आ जाता तो यह काम कल हो जाता ना ! तेरे के काम कि अहमियत पता नहीं हैं ! जिस दिन मैं अपनी औकात तेरे को दिखा दूंगा ना तू ही समझ तेरा क्या होगा और भी ढेर सारे बुरे शब्द बोले मुझे तो कहने में भी शर्म आ रही है ! मैं इतना बोलकर चला आया साहेब रात में देर से आया था ! इतने में आग बबूला हो गया और बोला जा जल्दी काम कर ! मैं आसूं बहाता काम में जुट गया बांस अपशब्द बकने में पागल की भांति !
अंकुर बाबूः यह तो श्रम कानून का उलंघन हैं और आदमियत को गाली भी ! कैसा अभिमानी आदमी हैं ! अरे घमण्ड तो टूट गया हिरण्यकश्यप का कंस का रावण का ! यह कहां लगता हैं ! क्या उंची पहुंच या उंची जाति ही हर जगह काम आती हैं !
कुमारबाबूः मजबूरी में नौकरी कर रहा हूं ! परिवार और बच्चों के भविष्य का सवाल हैं ! बांस का व्यवहार तो मेरे साथ बहुत ही बुरा हैं ! वह तो संस्था का कर्मचारी नहीं खुद का गुलाम समझता है ! मुझे तो जैसे आदमी ही नहीं समझते ! दफतर में सबसे छोटा कर्मचारी हूं और छोटी बिरादरी का भी ! मालूम है छुटटी के दिन अफसरों के दफतर आने के लिये कान्वेन्स के पैसे मिलते हैं और मुझे नहीं ! मुझे खुद का पैसा खर्च कर छुटटी के दिन काम पर आना पड़ता है ! काम के दिनों में भी बांस छुटटी के समय चिटठी लिखवाने लगते हैं ! हर तरह से मुझे प्रताडित करने का पणयन्त्र रचते रहते हैं और मैं आंसू बहाता काम में जुटा रहता हूं ! क्या करूं ! गरीबो की कौन सुनता हैं मालूूम हैं बांस के पास तो चौबीस घण्टे बढिया दफतर की कार उपलब्ध रहती है !यही नहीं खुद की जरूरत के लिये किराये की भी खडी हो जाती हैं और भी ढेर सारी सुविधायें भी ! छुटटी के दिन मुझ गरीब को दफतर आने के लिये खुद का पैसा खर्च कर काम पर आना पड़ता है ! इसके बाद भी दर्द के सिवाय मुझे आज तक कुछ नहीं मिला !
अंकुर बाबूःकुमार बाबू बांस की इतनी बडी बदतमीजी को बर्दाश्त कर गये ! सच आप तो महान हो कुमारबाबूः क्या करता प्रतिप्रश्न किये बिना काम करता रहता हूं ! मुझे मालूम हैं मेरी कोई ऊंची पहुंच नहीं हैं ! छोटा कर्मचारी और छोटी बिरादरी का कौन मेरी मदद करेगा ! अंकुरबाबू यहां बहुत सारी बातेां का फर्क पड़ता है इण्डिया है मेरी जान इण्डिया ! अंकुर बाबू प्रतिप्रश्न करने पर नौकरी जाने का खतरा भी तो हैं ! मेरा कोई सर्पोटर भी तो नहीं हैं शायद छोटी जाति का होने के नाते अंकुरबाबूः यहां तो मारे रोवै न देय वाली कहावत चरितार्थ हो रही हैं !
कुमारबाबूः आंसू पीकर नौकरी करना मेरी किस्मत बन चुकी हैं !
अंकुर बाबूः यह तो सरासर अन्याय हो रहा है आपके साथ !
कुमार बाबूः इस अन्याय के पीछे बूढी सामाजिक व्यवस्था की बदबू आपको नहीं लगती !
अंकुर बाबूः आती है uk ! सच कुमारबाबू आप ऊंची बिरादरी के होते तो जरूर आपको अच्छा प्रतिफल मिलता भले ही आपकी पहुंच उपर तक न होती ! परन्तु यहां तो आपके साथ जुल्म हो रहा हैं
कुमारबाबूः जुल्म सह तो रहा हूं मुझे मालूम हैं जुल्म सहना भी अपराध है पर इसके पीछे मेरा मन्तव्यहै! मेरे परिवार बच्चों के सुखद भविप्य का सपना हैं !
अंकुरबाबूः यह आप तप कर रहे हैं !
कुमारबाबूःबडे कप्ट उठाकर यहां तक पहुंच पाया हूं इसे गंवाना नहीं चाहता !अफसोस के साथ कहना पड रहा है कि घाव बहुत पाया हूं ! रोज रोज घाव सहकर परिवार के सपने पूरे करने में लगा हूं ! यदि मैंने पीडा की वजह से चाकरी त्याग दिया तो मेरे परिवार के सपने उजड सकते हैं
अंकुरबाबूःआपके मन्तव्य नेक हैं !सहनशक्ति भी आपको भगवान ही दे रहा हैं वरना सब्र का बांध कब का टूट गया होता ! सच कहा है किसी ने नेक उदेश्य से सहा गया कष्ट भी तप बन जाता हैं ! कुमार बाबू आपकी तपस्या के परिणाम उत्तम आयेगे ! भगवान पर भरोसा रखिये !
कुमार बाबूः अच्छे कल की उम्मीद में ही तो दहशत भरा जीवन जी रहा हूं !
अंकुर बाबूः दहशत भरा आपका यह जीवन त्याग हैं ! जो लोग आपके छोटे पद छोटी बिरादरी से घृणा कर जुल्म कर रहे हैं वे ही एक दिन आपके सामने नतमस्तक होगे ! आदमी के साथ भेदभाव का व्यवहार अपराध हो चुका है !
कुमारबाबूः सभी जानते हैं पर अमल कौन करता हैं ! सब कहने में अच्छा लगता हैं ! कथनी करनी में आज का आदमी अन्तर रखता हैं ! हाथी के दांत की भाति दिखाने को और खाने को और !
अंकुर बाबूःठीक फरमा रहे हैं ! दम्भियों की जडों में तो विषमता की ही उर्वरा शक्ति है uk ! यही अभिमान और दहशत पैदा करने का कारण भी !
कुमारबाबूः सत्य तो यही है !
अंकुरबाबूःजनप्रतिनिधि भी विषमता के उन्मूलन के लिये कुछ नहीं कर रहे हैं ! जाति समाज और पार्टी में ही जी रहे हैं ! सिर्फ समानता की बात तो भाषणों में ही करते हैं चरित्र में कहा उतारते हैं ! इतना ही नहीं जाति समाज और अपने ओहदे की वजह से दहशत फैलाने में भी पीछे नहीं रहते हैं ! यही हाल धर्म समाज के ठेकेदारों का भी है ! यदि ए लोग ईमानदारी से समानता के लिये काम किये होते तो विषमता के काले बादल नहीं मंडराते नहीं दंगे फंसाद होते ! नहीं वंचितों के साथ बलात्कार अत्याचार ही होते ! विषमता ने ही तो आदमी के बीच दहशत की दीवार खडी कर रखी हैं चाहे समाज हो या दफतर हर जगह !
कुमारबाबूः ठीक कह रहे हैं अंकुर बाबूः
अंकुर बाबूः सामाजिक और राजनैतिक नेताओं से तो अभिनेता कुछ मामले में अच्छे हें ! सामाजिक उत्थान का काम करते हैं ! अर्न्तजातीय ब्याह करते हैं !अनाथ बच्चों का पालन पोषण कर रहे हैं ! यही नहीं कुंवारी अभिनेत्रियां भी अनाथ बच्चों का गोद लेकर ममता उडेल रही हैं ! लालन पालन कर रही हैं ! कोई सामाजिक अथवा राजनैतिक नेता ऐसा किया हैं नहीं ना और न ही अपनी से छोटी जाति के साथ रिश्ता किया हैं ! हां देश और समाज को कंगला बनाने के लिये घूसखोरी रिश्तखोरी जरूरी कर रहे हैं ! विषमता की खेती कर रहे है !वंचितों को बस मुट्ठी भर भर आग मिल रही है अपने ही जहां में।
अंकुरबाबूः आपके बांस भी कम नहीं ! वे भी अपने पद के अभिमान में आपको खून के आंसू बहाने पर मजबूर किये रहते हैं !
कुमार बाबूः सत्तासम्पन्न लोगों के जाति बिरादरी से उपर उठकर देश जन के कल्याणार्थ काम करना चाहिये ! समानता का व्यवहार करना चाहिये ! चाहे मेरे बांस हो या कोई सामाजिक या राजनैतिक सत्ताधारी या कम्पनी संस्था का पदाधिकारी !
अंकुर बाबूःतभी तो कमजोर आदमी दहशत भरे जीवन से उबर कर समानता का जीवन जी सकेगा और तरक्की का अवसर भी पा सकेगा !
कुमारबाबूः काश सामाजिक आर्थिक समरसता की बयार चल पडती ! घमण्डियों की जडे उखउ जाती !
अंकुरबाबूः जरूर वह दिन आयेगा जब हर दहशत से कमजोर निजात पा जायेगा ! दहशत में रखने वाले अपने कुकर्मो की वजह से खुद दहशत में बसर करेगे !बस जरूरत हैं कुमार बाबू शान्ति और अहिंसक मन से आप और आप जैसे कलमकारों को सामाजिक एवं आर्थिक समरसता के शोले उगलते रहने की ! सामाजिक बुराईयों की भभक रही मुट्ठी भर भर आग को सद्भावना से शीतलता प्रदान करने की।
लहू के कतरे
अरे बाप रे अहिल्या माता के शहर के लोग एक दूसरे के लहू के रंग से शहर बदरंग कर रहे हैं !मारने काटने को दौड़ रहे हैं कहते हुए सचेतन जल्दी जल्दी मोटर साइकिल खड़ी किये और झटपट घर में भागे ! घर में घुसते ही बेहोश से गिर पडे ! सचेतन की हालत देखकर बीटिया दौड़ी हुई आयी और जोर जोर से मम्मी मम्मी बुलाने लगी !बीटिया जूही के पुकारने की आवाज सुनकर कल्पना दौड़ती भागती आयी ! सचेतन को झकझोरते हुए बोली अरे जूही के पापा आंख तो खोलो क्या हो गया तुमको !
सचेतन अरे मुझे तो अभी कुछ नहीं हुआ है अगर ऐसे ही चलता रहा तो शहर की आग को यहां तक पहुंचने में देर नहीं लगेगी !
कल्पनाः क्या कह रहे हो हम अपने ही घर में सुरक्षित नहीं है ! क्या हुआ है शहर को ! कैसी आग लगी है ंशहर में साफ साफ कहो तो सही ! मेरा तो दिल बैठा जा रहा है ! अरे क्या हुआ है शहर कोें !
सचेतनःअरे शहर सुलग रहा है !
कल्पनाः क्या कह रहे हो ! सोलह साल से इस शहर में रह रहे है ! कभी तो नहीं सुलगा था यह शहर कुछ दिनों से इस शहर की अमन शान्ति को ना जाने किसकी नजर लग गयी है !आज फिर कौन सी ऐसी बात हो गयी है कि शहर सुलग रहा है ! बात मेरी समझ में नहीं आ रही है !
सचेतनःभागवान शहर में दंगा फैल गया है !लोग एक दूसरे को मारने काटने पर तूले है ! कही दुकान जल रही है तो कही किसी का घर ! कही इज्जत पर हमला हो रहा है तो कही लहू से सडक नहा रही है !
कल्पनाःबाप रे फिर दंगा ! 21 जनवरी मुकेरीपुरा में दंगा भडका था दस दिन बाद कर्बला मैदान पर आज फिर 12 फरवरी 2007 को दंगा भडक गया !एक सम्प्रदाय दूसरे के जान लेने पर तूली है ! इस शहर की अमन शान्ति को धार्मिक उन्माद खा जायेगा क्या भगवान ! हे भगवान उन्मादियों को सदबुद्धि दो जो लोग धर्म की अफीम खाकर दंगा फैला रहे हैं ! बेचारे गरीब मारे जा रहे हैं !अच्छा बताओ आज किस बात को लेकर दंगा भडका है !
सचेतनः जितने मुंह उतनी बातें ! कोई कह रहा है कि नरसिंह बाजार में एक लड़की के साथ छेड़छाड़ को लेकर दंगा भडका है ! कोई कह रहा हैं दो पहिया वाहनों का भिडन्त को लेकर ! इन्ही अफवाहों को लेकर परसिंह बाजार में भगदड मच गयी ! आग में घी डालने का काम कुछ भागती हुई महिलाओं ने भी किया यह कहकर कि उनके घरों में आग लगा दी गयी हैं ! शायद यही अफवाहे साम्प्रदायिक दंगे का रूप धारण कर ली हो ! खैर खुरापाती लोग तो बहाना ही ढूढते रहते हैं जबकि जानते है कि दंगा करने वाले और दंगे का शिकार हुये लोग यानि दोनो मुश्किल में आते हैं पर सिरफिरे अपनी औकात तो दिखा ही देते हैं ! घरो मं आग लगने की अफवाह फैलते ही उपद्रवी लोग सड़क पर आ गये ! पत्थरबाजी बम पेट्रोल बम तक एक दूसरे के उपर पर फेंकने में जरा भी हिचकिचाये नहीं ! जबकि दोनो पक्ष इसी शहर में रह रहे है एक दूसरे को बचपन से देख रहे हैं फिर भी दंगा भड़का रहे हैं ! जिस गली कूचे में पले बढ़े उसी गली को एक दूसरे के खून से बदरंग कर रहे हैं ! क्या लोग हो गये हैं !एक दूसरे पर इतने पत्थर फेंके गये कि सड़क ही पूरी पट गयी ! नगर निगम ट्रकों में भर कर पत्थर ले गया ! लहू के कतरे बिना किसी अलगाव के शहर के फिजा को बदरंग कर रहे है !उपद्रवी है कि अपनी करतूतों पर मदमस्त होकर जहर घोल रहे हैं ! क्या लोग हो गये है , आदमी के लहू के कतरे कतरे से अपनी धर्मानधता एवं जिद को संवारने पर तुले हुए हैं ! यही साम्प्रदायिक दंगे तो धरती पर इंसानियत के दुश्मन बन हुए हैं ! वाह रे धर्म सम्प्रदाय की अफीम खाकर शहर अमन शान्ति को चौपट कर जंगल राज स्थापित करने पर जुटा है सच 12 फरवरी 2007 का दिन शहर के इतिहास का काला दिवस साबित हो गया है !
कल्पनाः सुरक्षा की जिम्मेदार पुलिस नहीं पहुंची क्या !
सचेतनः पुराने ढर्रे पर ! उपद्रवियों को खदेड़ने के लिये गोलियां चलायी ! गोली चलाने के बाद भी उपद्रवी गलियों में छिप छिप करे पत्थरबाजी करते रहे !पढरीनाथ, मल्हारगंज छत्रीपुरा थाना क्षेत्रों में धारा 144 लग गयी है जैसा अखबार में छपा है !
कल्पनाः क्या हो गया है इस शहर के लोगो को शान्ति सदभाव को कुचलने पर उतर रहे है ! यह शहर तो बहुत सुरक्षित था पर अब इस शहर पर ना जाने किसकी नजर लग गयी।
सचेतनः सच सभ्य समाज के विद्रोहियों की नजर लग गयी है। पुलिस प्रशासन समझा बुझाकर शान्ति बहाल करने मे जुटा है।
कल्पनाःसमझाने के अलावा पुलिस तो और भी कदम उठा सकती थी !
सचेतनःआसू गैस बल प्रयोग तक सीमित रहा! उपद्रव की आग जब अपने चरम पहुंची तब जाकर धारा 144 और कहीं कहीं कफ्र्यू लगाया !
कल्पनाः काश यह सब उपद्रव के शुरूआती दौर में लग जाता तब शायद न तो जान की और नहीं माल की हानि होती !
सचेतनः ठीक कह रही हो ! अब तो उपद्रवियों ने आमजन के लिये मुश्किल खडी ही कर दिये है ! सब बाजार हाट बन्द हो सकता है !
कल्पनाः बन्द तो होना ही चाहिये !कब उपद्रवियों की छाती में उबल रहा उन्माद सुलग उठे और शहर को शर्मसार कर दे ! पूरे क्षेत्र में कफ्र्यू लगा देना चाहिये ! बीच बीच में छूट मिलती रहे ताकि लोग अपने जरूरी काम कर सके !उपद्रवियों की शिनाख्त कर काले पानी की सजा दे देनी चाहिये ताकि फिर उन्माद का भूत न सवार हो सके ! कफ्र्यू में ढिल के वक्त पुलिस को उपद्रवियों पर चौकस निगाहें भी रखनी होगी !सडक पर बिखरे लहू के कतरों के सफाई की भांति लोगों को भी अपने दिलों पर जमी मैल की परतों को धो देना होगा तभी पूर्णरूपेण सर्वधर्म सदभाव कायम हो सकेगा !
सचेतन ः जिस दिन शहर में सदभाव स्थापित हो गया ! सचमुच मैं जश्न मनाउंगा ! कल्पनाः काश तुम्हारी दिली ख्वाहिश पूरी हो जाती ! शासन प्रशासन उपद्रवियों के साथ सख्ती से पेश आता हर राजनीति से उपर उठकर ! उपद्रवियों की हर गतिविधियों पर नजर रखता !
सचेतनः भागवान ठीक तो कह रही हो ! होना तो ऐसा ही चाहिये पर लोग अपने कर्तवयों पर खरे उतरे तब ना! पुलिस प्रशासन को तो आग दृष्टि अब तो रखना ही होगा ! खैर जो लोग अमन पसन्द शहर के लहूलुहान हुए है उनका क्या !
कल्पनाः अमन पसन्द लोग अपनी अपनी घाव को भूलकर शहर की शान्ति के लिए त्याग तो करेगे ही परन्तु उपद्रवी लोग अपनी करतूतों पर लगाम तो लगाये शहर को बदनाम ना करें !
सचेतनः ठीक कह रही हो उपद्रव से शहर की अमन सदभावना को धक्का तो लगता ही है ! वह समुदाय धर्म भी दुनिया की नजरों में बदनाम हो जाता हैं जो दंगा फसाद के लिये जिम्मेदार होता है ! खैर अब से भी अमन हो जाता ! शहर तो झुलस ही गया है ! उपद्रवी अब से भी सदभावना विरोधी गतिविधियों पर लगाम लगा लेते तो बडा सकून मिलता !
कल्पनाः देखो जी चिन्ता को दिल से ना लगाओ तुम्हारी तबियत भी ठीक नहीं हैं ! चिन्ता तुम्हारे स्वास्थ की दुश्मन हैं ! रात भी ज्यादा हो गयी हैं ! अब सो जाओ !
सचेतन बडी मुश्किल से सोया पर नींद में भी कई बार बड़बडाता रहा बचाओ बचाओ ! अरे किसी के आशियाने में आग ना लगाओ ! सुबह हुई ही नहीं कि बच्चों से बार बार अखबार लाने को कहने लगे !
पिता के बार बार अखबार मांगने पर बिटिया जूही बोली अरे पापा अभी अखबार ही नहीं आया तो दे कहां से ! रेडियो सुनो समाचार आ रहा है शहर में शान्ति स्थापित हो रही है धीरे धीरे ! उठो ब्रश करो दवाई लो ! आंख खोले ही नहीं अखबार अखबार मांगने लगे सचेतनः अखबार आज इतना देर से क्यो आ रहा है !
कल्पनाःअरे अखबार और हाकरों पर भी तो दंगे का असर होगा की नहीं !
इतने में कुछ गिरने की आवाज आयी !सचेतन जोर से बोले देखो पेपर आ गया क्या ! लगता है हाकर अखबार फेंका है !
कल्पनाःजल्दी जल्दी गयी और अखबार सचेतन को थमाते हुए बोली लो अखबार आ गया सचेतनःअरे बाप रे !
कल्पनाः क्या हुआ !
सचेतनः शहर में कर्फ्यू जारी ,स्कूल कोल बन्द बसों का आनाजाना बन्द ! शान्ति मार्च ! मंगलवार को शाम होते होते स्थिति बिगडी ! दंगे के दूसरे दिन भी अमन नहीं शहर में !
कल्पनाः दंगे का कारण लगता हैं अफवाहें ही रही है वरना छोटी सी बात को लेकर इतना बडा दंगा ! कभी नहीं होता ! छोटी मोटी बातों में धर्म सम्प्रदाय घुस रहा हैं और यही दंगे का कारण बन जाता हैं ! दंगाईयों की सोची समझी साजिश के तहत सब हो रहा है !
सचेतनः मानवता सदभावना के विरोधी चाहते क्या हैं ! जूना रिसाला के एक सामुदायिक भवन पर बम फेंक दिया है दंगाईयों ने !
कल्पनाः बम फेंका है तो कोई ना कोई हताहत भी हुआ होगा !
सचेतनः खैर भगवान ने बचा लिया हैं जान की हानि तो नहीं हुई हैं ! पुलिस ने मोर्चा खोल दिया है !
कल्पनाः उपदवियों की शिनाख्त कर उनके तलाशी के साथ उनके घरों एवं संदिग्ध स्थानों की भी तलाशी लेनी चाहिये ! दंगाई बम गोले कहां से लाते हैं ! इनके तार हो ना हो किसी उग्रवादी ग्रुप से तो नहीं जुडे हुए है !
सचेतनः हो भी सकता है! पुलिस गहन छानबीन कर रही हैं ! रैपिड एक्शन फोर्स भी शहर में आ चुकी है
कल्पनाः शहर का दंगा साम्प्रदायिक रंग के साथ राजनीतिक रंग में भी रंगा लगता है ! शहर की आर्थिक राजधानी जहां हमेशा ठसाठस भीड रहती थी वहां सन्नाटा पसरा हुआ है !
सचेतनः एक तरफ तो शहर का आवाम बेहाल हैं दूसरी ओर राजनीतिक गरमी भी बढने लगी हैं ! अमन की उम्मीद के बीच आरोप प्रत्यारोप भी लग रहे हैं !
कल्पनाः दंगा भले ही साम्प्रदायिक हो पर राजनीति की उर्वरा शक्ति भी इसमें शामिल तो हैं ! ऐसी खबर गली मोहल्ले में फैल चुकी है !
सचेतनःशहर के लोग संवेदनशील एवं वेदना को समझते हैं ! अमन पसन्द लोग हैं ! सामाजिक एकता में विश्वास रखने वाले लोग हैं ! उपद्रवियों के इरादों को विफल तो कर ही देगे !सच यह है कि कोई तो है जो शहर की फिजा बिगाड़ने पर तुला हुआ है !
कल्पनाःठीक कह रहे हो ! उपद्रवियों को बेरोजगारी अशिक्षा, महंगाई, गरीबी छुआछूत जातिवाद के मुददे दिखाई ही नहीं पड रहे हैं ! देश समाज के दुश्मन साम्प्रदायिक भावना के सहारे शहर का अमन चैन छिन रहे हैं !
सचेतनः समाज में बैर फैलाने वाले लोग देश समाज के कल्याण की बात नहीं कर सकते ना !
कल्पनाः यही तो दुर्भाग्य हैं ! देश में पढे लिखे बेरोजगारों की फौज खड़ी हो रही हैं ! भूख गरीबी पसरी पडी हैं ! अशिक्षा नारी शिक्षा के लिये जंग छेडना चाहिये था पर समाज देश के विरोधी अमन शान्ति के खिलाफ मोर्चा खोल रहे है ! शहर को कफ्र्यू धारा 144 में जीने को विवश कर रहे है
सचेतनः ठीक समझ रही हो भागवान काश उपद्रवी लोग भी सोचते देश समाज के हितार्थ !
कल्पनाः दंगे के पीछे कोई ताकत तो हैं !
सचेतनः पर्दाफाश हो जायेगा ! किसी के तन पर तो किसी के मन पर घाव लगी हैं ! सभ्य समाज के दुश्मनो ने कितनों की रोटी रोजी में आग लगा दिये हैं ! !
कल्पनाः दंगा कोई चैन दे सकता है क्या !नहीं ना !
सचेतनः सब जानकर भी उन्मादी लोग एक दूसरे के खून के प्यासे बन जाते हैं ! जबकि मानवता से बडा धर्म और दर्द से बडा रिश्ता कोई नहीं होता पर उपद्रवी सब रौंदने पर तुले हैं !
कल्पनाः खैर जिन्दगी पटरी पर आने लगी है !
सचेतनः शहर में जल्दी अमन शान्ति स्थापित हो ! उपद्रवी लोग तो आग उगलते ही रहे हैं!
कल्पनाः जूही के पापा कुछ औरतें कल आपस में बात कर रही थी कि हुकूमत असली मुजरिमों पर हाथ नहीं डालती ! तमाम दंगे इस बात के गवाह हैं ! ऐसा करने मे हुकूमत को खतरों से खेलना पड सकता हैं क्योकि दंगे के जिम्मेदार दोनो पक्षों में कट्टरपंथियों की भरमार होती हैं ! यही दंगों का राज तो नहीं हैं !हुकूमत में एक किस्म का कट्टरपंथी तबका वोट बैंक का इंतजाम करता हैं तो दूसरा राजनीतिक बैसाखियों का !
सचेतनःठीक कह रही हो ! राजनीतिक आकाओं ने वोटों की जिस तरह जाति धर्म अथवा सम्प्रदाय के आधार पर विभाजित कर दिया हैं ! उससे से यह कयास लगने लगा हैं अमन पसन्द देश समाज के नागरिक को कि शहर अब बारूद के ढेर पर खुद को पाने लगे है ! समय आ गया है अब उपद्रवियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो ! शासन प्रशासन इसके लिये कमर कस ले ! उपद्रवी चाहे जिन प्रभावशाली क्यों न हो उसे देश समाज का खतरा समझकर उसके खिलाफ कार्रवाई हो ! धार्मिक साम्प्रदायिक उग्रवादी संगठनों पर पूर्ण प्रतिबन्ध लागू हो जो अमन शान्ति के विरूध्द उठ खड़े होते हैं ! देश में समान संहिता लागू हो !तभी दंगों से निपटा जा सकेगा !
कल्पनाः काश ऐसा ही होता !
सचेतनःऐसा होगा देखना एक ना एक दिन !हत्या दुर्घटना,दंगा उपद्रव महगाई आदि से लम्बे अर्से से दिल दुख रहा है पर अब सकून की खबरें आने लगी हैं ! महाशिवरात्रि एंव जुम्मे की नमाज के प्रभाव से शान्ति एवं सदभावना की बदरी छाने लगी है !
कल्पनाःसच धीरे धीरे अब शहर मुस्कराने लगा है !ऐसी खबर आने लगी है !अमन शान्ति पसन्द शहर के लोग सब कुछ भूलने लगे हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो !अच्छा संकेत हैं सामाजिक सदभावना का !
सचेतनः अरे जूही की मां ए देखो ! कई दिनों के बाद बडा सुकून लग रहा है !
कल्पनाः सकून महसूस कर रहे हो यह तो मैं समझ गयी पर दिखा क्या रहे हो !
सचेतनः अखबार ․․․․․․․शहर में अमन चैन हो गया हैं ना इसीलिये पापा अखबार में छपी खबर दिखा रहे हैं क्यो पापा यही ना !
सचेतन ःठीक समझ रही हो !
कल्पनाः शहर में शान्ति हो गयी हैं ! उपद्रवी अपनी अपनी मांदों में छिप गये हैं ! अब फिर कभी सिर ना उठाये ! शहर और शहर की अमन शान्ति को उपद्रवियों ने साम्प्रदायिकता की आग में धूं धूं कर जला ही दिया था पर अब पुनः सदभाव की लहर दौड़ पउुंडी है !
सचेतनः अमन शान्ति में ही तो सभ्य समाज की आत्मा बसती है !
कल्पनाः देखो सब ओर सदभाव पूर्ण माहौल हो गया हैं तुम अपने वादे पर खरे उतरो !
सचेतनः क्या !
कल्पनाः अरे नाचों गाओं जश्न मनाओ भूल गये क्या ?अब तो उपद्रवियों की बोयी मुट्ठी भर आग ठण्डी हो गयी है।
सचेतन ः नहीं भागवान !आज तो वाकई नाचने गाने जश्न मनाने का दिन हैं शहर में अमन शान्ति हैं और घर में बेटे का जन्म दिन 17 फरवरी आज तो दुगुनी खुशी है! उपद्रवियों द्वारा सुलगायी मुट्ठी भर आग ठण्डी हो गयी है।
कल्पना ः अब देर किस बात की !कुछ गीत तो सुनाओ अब ! इस खुशी के माहौल में चार चांद लगाओ !
सचेतनः लो सुनो सुनाता हूं !
मैं एक गीत गाता हूं !
सदभाव का भूखा,
अमन शान्ति का गीत गाता हूं
ना बहे लहू के कतरे कतरे यारो
शहर जहां शान्ति सदभाव की है यारी !
मैं एक गीत गाता हूं ․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․
कटरपंथियों उन्माद नहीं अच्छा
डर में जीने वाले क्या करोगे सुरक्षा
न उगलना कभी आग,
मानवता से कर लो यारी․
मैं एक गीत गाता हूं -----------------------
नन्दलाल भारती
समाप्त
आजाद दीप, 15-एम-वीणा नगर ,इंदौर।म․प्र।-452010,
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जनप्रवाह।साप्ताहिक।ग्वालियर द्वारा उपन्यास-चांदी की हंसुली का धारावाहिक प्रकाशन
उपन्यास-चांदी की हंसुली सुलभ साहित्य इन्टरनेशनल,दिल्ली द्वारा अनुदान प्राप्त
जीवन परिचय /BIODATA
नन्दलाल भारती
कवि,कहानीकार,उपन्यासकार
शिक्षा - एम․ए․। समाजशास्त्र। एल․एल․बी․। आनर्स।
पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन ह्यूमन रिर्सोस डेवलपमेण्ट (PGDHRD)
जन्म स्थान- ग्राम-चौकी।खैरा।पो․नरसिंहपुर जिला-आजमगढ।उ․प्र।
| प्रकाशित पुस्तकें
ई पुस्तकें․․․․․․․․․․․․ | उपन्यास-अमानत,निमाड की माटी मालवा की छाव।प्रतिनिधि काव्य संग्रह। प्रतिनिधि लघुकथा संग्रह- काली मांटी एवं कविता कहानी लघुकथा संग्रह। उपन्यास-दमन,चांदी की हंसुली एवं अभिशाप कहानी संग्रह -मुट्ठी भर आग,हंसते जख्म, सपनो की बारात लघुकथा संग्रह-उखड़े पांव / कतरा-कतरा आंसू काव्यसंग्रह -कवितावलि / काव्यबोध, मीनाक्षी, उद्गार आलेख संग्रह- विमर्श एवं अन्य |
| सम्मान | स्वर्ग विभा तारा राष्ट्रीय सम्मान-2009,मुम्बई, साहित्य सम्राट,मथुरा।उ․प्र․। विश्व भारती प्रज्ञा सम्मान,भोपल,म․प्र․, विश्व हिन्दी साहित्य अलंकरण,इलाहाबाद।उ․प्र․। लेखक मित्र।मानद उपाधि।देहरादून।उत्तराखण्ड। भारती पुष्प। मानद उपाधि।इलाहाबाद, भाषा रत्न, पानीपत। डां․अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान,दिल्ली, काव्य साधना,भुसावल, महाराष्ट्र, ज्योतिबा फुले शिक्षाविद्,इंदौर।म․प्र․। डां․बाबा साहेब अम्बेडकर विशेष समाज सेवा,इंदौर , विद्यावाचस्पति,परियावां।उ․प्र․। कलम कलाधर मानद उपाधि ,उदयपुर।राज․। साहित्यकला रत्न।मानद उपाधि। कुशीनगर।उ․प्र․। साहित्य प्रतिभा,इंदौर।म․प्र․। सूफी सन्त महाकवि जायसी,रायबरेली।उ․प्र․।एवं अन्य |
| | आकाशवाणी से काव्यपाठ का प्रसारण। रचनाओं का दैनिक जागरण,दैनिक भास्कर,पत्रिका,पंजाब केसरी एवं देश के अन्य समाचार irzks@ifrzdvksa में प्रकाशन , वेब पत्र पत्रिकाओं एवं अन्य ई-पत्र पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशन। |
| सदस्य | इण्डियन सोसायटी आफ आथर्स।इंसा। नई दिल्ली |
| | साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी,परियांवा।प्रतापगढ।उ․प्र․। |
| | हिन्दी परिवार,इंदौर।मध्य प्रदेश। |
| | आशा मेमोरियल मित्रलोक पब्लिक पुस्तकालय,देहरादून।उत्तराखण्ड। |
| | साहित्य जनमंच,गाजियाबाद।उ․प्र․।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद् न्यास,नई दिल्ली
म․प्र․․लेखक संघ,म․्रप्र․भोपाल,
म․प्र․तुलसी साहित्य अकादमी,भोपाल एवं अन्य |
| सम्पर्क सूत्र | आजाद दीप, 15-एम-वीणा नगर ,इंदौर।म․प्र․! दूरभाष-0731-4057553 चलितवार्ता-09753081066 Email- nlbharatiauthor@gmail़com Visit:- http://www़nandlalbharati़mywebdunia़com http;//www़nandlalbharati़blog़co़in/ http://nandlalbharati़blogspot़com http:// www़hindisahityasarovar़blogspot़com/ httpp://nlbharatilaghukatha़blogspot़com www़facebook़com/nandlal़bharati |
जनप्रवाह।साप्ताहिक।ग्वालियर द्वारा उपन्यास-चांदी की हंसुली का धारावाहिक प्रकाशन
| रचना कैसी लगी: |
इनसाइक्लोपेडिया ब्रिटानिका के अनुसार देह व्यापार का अर्थ है मुद्रा या धन या महंगी वस्तु और शारीरिक सम्बन्धों का विनिमय। इस परिभाषा में एक शर्त ये भी है कि वह विनिमय मित्रों या पति पत्नी के अतिरिक्त हो। गणिका के बारे में वात्स्यायन ने लिखा है-गणिकाएं, चतुर, पुरुषों के समाज में, विद्वानों की मंडली में राजाओं के दरबार में तथा सर्व-साधारण में मान पाती है।
प्राचीन भारत में वेश्याएं थी, उसी प्रकार हीटीरा यूनान में तथा जापान में गौशाएं थी। वेश्या के पर्यायों में वारस्त्री, गणिका, रुपाजीवा, शालभंजिका, शूला, वारविलासिनी, वारवनिता, भण्डहासिनी, सज्जिका, बन्धुरा, कुम्भा, कामरेखा, पण्यांगना, वारवधू, भोग्या, स्मरवीथिका, वारवाणि आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है।
रोमन युल्पियन के अनुसार वेश्या उसे कहते हैं जो धन के लिए अपना शरीर कई पुरुषों को बिना चुनाव किए अर्पण करें।
फ्रान्सीसी विद्वान गेटे के अनुसार वेश्या वह है जो स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को आर्थिक लाभ के रुप में देखे।
वार्टन, वांगर तथा रिचर्ड आदि विद्वानों ने भी इसी प्रकार से वेश्याओं को परिभाषित किया है।
दामोदर गुप्ता के ग्रन्थ कुट्टनीमतम् के अनुसार सज्जनों का आचरण, दुष्टों का व्यवहार, मनुष्यों की रुचि, चतुर पुरुषों का परिहास, कुलटाओं के व्यंग्य, गुरु गंभीर विषय, कामशास्त्र की ज्ञाता, धूर्तों को ठगने की कला में माहिर होना वेश्याओं के लिए आवश्यक है।
अमरकोश के अनुसार अप्सराएं स्वर्ग की वेश्याएं हैं। ऋग्वेद में उर्वशी का वर्णन है। यजुर्वेद में स्वर्ग की वेश्याओं का वर्णन है तथा रामायण व महाभारत में भी वेश्याओं का वर्णन है। तन्त्रों के ग्रन्थों में भी देह व्यापार का वर्णन है। बौद्ध काल में भी वेश्याएं थी, जैन ग्रन्थों में भी वेश्याओं का वर्णन है। संस्कृत के ग्रन्थों में भी वेश्याओं का विशद वर्णन आया है। मृच्छ कटिकम् नाटक, दरिद्र चारुदत्त, मुद्राराक्षस, आदि नाटकों में वेश्या-चरित्रों का वर्णन है। कालिदास ने मेघदूत में देवदासियों का जिक्र किया है। शिशुपाल वध में भी वेश्या वर्णन है।
समर्थ दिपिका नामक ग्रन्थ में वेश्याओं को शुभ शकुन के रुप में स्वीकार किया है।
स्कन्द पुराण के अनुसार स्वर्ग की अप्सराओं तथा पृथ्वी के मनुष्यों के समागम से वेश्याओं की उत्पत्ति हुई। पंचचूर्णा नामक अप्सरा की कोख से पहली वेश्या पैदा हुई। बौद्ध काल में आम्रपाली तथा शलावती जैसी प्रसिद्ध वैश्याएं थी। गुप्त काल में भी वेश्यावृत्ति थी। कौटिल्य ने अपनी पुस्तक में वेश्यावृत्ति का विशद वर्णन किया है।
परसियों की धार्मिक पुस्तक जिंदा अवेस्ता में भी इनका वर्णन है। ईसा मसीह वेश्याओं को भी उपदेश देते थे।
वात्स्यायन के काम सूत्र के अनुसार वेश्याएं तीन प्रकार की हैं 1․गणिका 2․रुपाजीवा और 3․ कुम्भदासी। इनमें से प्रत्येक उत्तम, मध्यम तथा अधम हो सकती है।
वेश्याओं के अन्य प्रकारों में पहाड़ी पातर, डोमिनी, पेरवी, गोयगिरनी देवदासी, गंधारी, नटनी, विषकन्या, आदि होती है। देवदासी दक्षिण के मन्दिरों में यल्लमा देवी की सेवा करने वाली वेश्याएँ हैं।
संयुक्त राष्ट्रसंघ की एक रिपोर्ट के अनुसार 1970 तक 25 लाख वेश्याएं थी, जबकि एक अन्य सर्वेक्षण के अनुसार इनकी संख्या 2से तीन करोड़ है। यूरोपीय देशों के अलावा बेरुत और हांगकांग में औरतों की खरीद और बिक्री का काम चलता है। महिलाओं की अन्तर्राष्ट्रीय परिषद के अनुसार 1950-1975 तक 75 लाख औरतें बेची गई थीं। स्पेन में 29,000 चकला घर पंजीकृत है। राजस्थान में धोलपुर में वेश्याओं की हाट लगती है।
भारत में वेश्याएं प्रमुख शहरों में देह व्यापार करती है। दिल्ली का श्रद्धानन्द बाजार बम्बई का फारसी रोड़, कोलाबा, कलकत्ता, कानपुर, आगरा आदि देह व्यापार के बडे बाजार है।
अनेकों कारणों के बावजूद वेश्या-वृत्ति निरन्तर बढ़ रही है और आदिकाल से अनादिकाल तक चलती रहेगी। भारत में पतिता उद्धार सभा तथा अन्य संगठनों ने लाइसेंस प्रणाली द्वारा इस व्यापार को जायज करार देने की मांग की है। उनकी मान्यता है कि वेश्याएं दलालों, ग्राहकों, पुलिस द्वारा सताई जाती है। पश्चिम जर्मनी में वेश्याओं को लाइसेंस जारी कर दिए गये हैं। वेश्यावृत्ति को लाइसेंस के बजाए पुनर्वास कार्यक्रमों की आवश्यकता है जो हमारी सामाजिक जरुरत है। वास्तव में वेश्यावृत्ति एक जटिल मानसिक घटना है। कोई नहीं कह सकता कि कोई लड़की वेश्या क्यों बन जाती है और क्यों बनी रहती है। हमारे देश में ऐसे सैंकड़ों अंचल हैं जहां पर सामाजिक रुढि़यों, परम्पराओं और आर्थिक कारणों से यौन-शोषण से तंग आकर लड़कियां वेश्याएं बन जाती है।
अधिकांश वेश्याएं यह स्वीकार करती है कि इस व्यापार में आने का कारण आर्थिक था, बूढ़े मां-बाप, या भाई बहनों की जिम्मेदारी, नौकरी नहीं मिलना, भूख, बीमारी और बेरोजगारी से तंग आकर लड़कियां इस व्यापार में आती है।
पैसे के आकर्षण के साथ ही प्राकृतिक कारण भी हो सकते हैं। एक कालगर्ल के अनुसार वह तो समाज की सेवा कर रही है वे नहीं होती तो बहू-बेटियों का रहना मुश्किल हो जाता।
समाज विज्ञानियों के अनुसार कुछ सामाजिक कारण भी होते हैं, जो लड़कियों को इस व्यापार की ओर धकेलते है। वास्तव में वेश्यावृत्ति एक अनोखी या अजूबी घटना नहीं होकर सामाजिक आर्थिक कारणों का परिणाम है।
सच पूछा जाय तो विज्ञान के अनुसार मानव याने होमोसेपाइन्स क्लास मेमेलिया का सदस्य है और इस क्लास के प्रमुख लक्षणों में एक लक्षण पोलीगेमी है। अर्थात् मनुष्य। नर या मादा प्रकृति के अनुसार बहु सहवासी है, अब सामाजिक मर्यादाएं, नियम कानून उसे कहां तक बांध पाते हैं- यह एक अलग प्रश्न है। पोलीगेमी वेश्यावृत्ति का आधार माना गया है।
इस व्यापार में दलालों की एक अलग संस्कृति है। वे एक समानान्तर सरकार के स्वामी हैं जो वेश्याओं के लिए ग्राहक लाते हैं। और अपना कमीशन लेते हैं। कालगर्ल, सोसाइटी गर्ल, सामान्य वेश्याएं सभी इन पर निर्भर करती हैं। अतः इनकी दुनिया में ये ही सब कुछ हैं।
उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक परिवर्तनों, औद्योगीकरण तथा मशीनीकरण ने मानव जीवन को बदल दिया। घर से दूर नौकरी की तलाश में भटकते मानव ने महा- नगर में बड़े पैमाने पर इस धन्धे को पनपने में मदद की।
वेश्यावृत्ति के साथ ही मेल प्रोष्टीट्यूशन तथा समलैंगिक सम्बन्ध भी अनैतिक है और इस व्यापार से जुड़े हुए हैं। अब कुछ देशों में सम लैंगिक सम्बन्धों को कानूनन मान्यता हैं इसी प्रकार वेश्याओं का भी वर्णन मिलता है। कुछ वर्षों पूर्व गुजरात में फ्रेंडशिप एक्ट के अन्तर्गत समूह में महिलाओं को आमोद-प्रमोद हेतु रजिस्टर किया जाता था।
देह व्यापार के बाजार में सांकेतिक शब्दों का प्रचलन होता हैं।
वेश्याओं के डेरों की अलग-अलग सांकेतिक बोली होती थी और व्यापार के समय इन शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
वेश्याओं से स्वास्थ्य सम्बन्धी खतरे भी बहुत हैं। यौन रोगों तथा रति-जन्य रोगों तथा एड्स का खतरा वेश्याओं से बहुत ज्यादा है। इसके अलावा गर्भधारण करना या एमटीपी या डी․एन․सी․ भी इनके स्वास्थ्य के लिए एक खतरा है। कुष्ट रोग भी वेश्याओं में मिलता है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले फ्रांस में रतिरोगों के कारण ही वेश्यावृत्ति पर रोक लगा दी गई। वेश्याओं का नियमित मेडिकल चेकअप ही इसका एक मात्र समाधान है।
यौन व्यापार दुनिया का प्राचीनतम व्यवसाय है। एक आवश्यक बुराई, जो समाज के शरीर पर एक भद्दा नासूर है, कैंसर है, मगर आवश्यक है।
ये बदनाम बस्तियों के वासी, ये गन्दी, आवारा गलियों के राही है। सभ्यता के प्रारम्भ से लगा कर आज तक इनका स्वरुप कब-कब बिगड़ा, बना और फिर बिगड़ा।
एक प्रसिद्ध चिन्तक के अनुसार सभ्यता का इतिहास वेश्यावृत्ति का इतिहास है। वास्तव में यह एक कटु सत्य है। इस दूसरी औरत को क्या इतिहास से अलग रखा जा सकता है। क्या यह व्यापार हमारे एहसासों, नजरियों का व्यापार नहीं है, जो हम एक सेक्स के लोग दूसरे सेक्स के प्रति रखते हैं।
यह आश्चर्य मिश्रित खेद का विषय है कि समाज का इस व्यापार के प्रति रुख हमेशा एक जैसा रहा है। निन्दनीय, अनैतिक और दुर्गन्धयुक्त। फ्रांस में वेश्याओं को आनन्द की पुत्रियां कहा गया है। शायद यही सब से ठीक विशेषण है।
1- गायन 2․ नृत्य 3․ वाद्य 4․ चित्रकला 5․ विशेषच्छेय 6․चावलादिसो चौक पूरना 7․ पुष्प रचना 8․ रंजन कला 9․ गच तैयारी 10․ सेज सजाना 11․ जल तरंग 12․ जल- क्रीडाएं 13․ मित्र योग 14․ माला गूंथना 15․ फूल गूंथना 16․ नेपथ्य प्रयोग 17․ दांत,शंख आदि से वेश रचना 18․ गंध-युक्ति 19․ भूषण योजन 20․ जादू के खेल 21․ कौचमार 22․ हाथ की सफाई 23․ पाकशस्त्र 24․ सिलाई कला 25․ डोरों कारवेज 26․ वीणा वादन 27․ पहेलियां बुझाना 28 अंताक्षरी 29․पद्य रचना 30․ पुस्तक वाचन 31․ नाटक कला 32․ काव्य कला 33․ बेंत की बुनाई 34․ तक्षकर्म 35․ बढ़ई का काम 36․ वास्तु कला 37․रत्न परीक्षा 38․ धातु कला 39․ मणिरागाकर ज्ञान 40․ वृक्षायुर्वेद योग 41․ युद्ध विधि 42․ मालिश कला 43․ सांकेतिक भाषा 44․ गूढ़ बातचीत 45․ देश-भाषा ज्ञान 46․ पुष्प शकटिका 47 साथ पढ़ाना 48․ मानसी 49․ काव्य क्रिया 50․ स्माण रखना 51․ छेद का ज्ञान 52․ रचना परीक्षा 53․ ठग विद्या 54․ द्यूत विद्या 55․ पांसे खेलना 56․ बाल क्रीड़ा 57․ वस्त्रगोपन 58․ पशु साधना 59․ विजय दिलाना 60․ व्यायाम-शिकार कला।
वेश्याओं के बारे में जो प्रसिद्ध ग्रन्थ है उनमें वात्स्यायन के कामसूत्र के बाद कवि दामोदर गुप्ता का कुट्टनीमतम् है। इस ग्रन्थ में कवि ने वेश्या-समाज का बड़ा विशद चित्रण किया है। इसे पढ़कर वेश्या के जीवन, समाज, परम्पराओं के बारे में काफी जानकारी मिलती है। इस पुस्तक में मालती नामक वेश्या के माध्यम से कुट्टनी चरित्र को विस्तार से समझाया गया है। कवि ने वेश्याओं की तुलना चुम्बक से की है जो लोहे की तरह पुरुष को अपनी ओर खींचकर उसका सब धन हरण कर लेती है। इनके ग्रन्थों के अलावा कला विलास, दशकुमार चरित भी वेश्याओं से सम्बन्धित है।
विश्व की सभी भाषाओं के साहित्यकारों ने वेश्याओं पर लिखा है और लिपिबद्ध साहित्य के साथ ही वेश्याएं एक शाश्वत विषय बन गई। ऐतिहासिक आलेखों से लगाकर वेदों, उपनिषदों आदि में वेश्या वर्णन मिलता है। कालान्तर में कथा साहित्य का शाश्वत विषय देह व्यापार बन गया। ब्रह्म वैवर्त पुराण, गरुड़ पुराण में भी वेश्यावृत्ति का उल्लेख है।
कथा सरित सागर में क्षेमेन्द्र ने वेश्यावृत्ति का वर्णन किया है। मध्य युग में गणिकाएं श्रृंगार और रीतिकालीन नायिकाएं बन गई। फ्रांसीसी लेखक ब्रोतोल, अंग्रेजी लेखक जॉन क्लोलैंड ने भी अपनी कलम इस व्यापार पर चलाई है। एमोलजोला का उपन्यास नाना, कुप्रिन का यामा, चेखवका पाशा, बालजक का डाल स्टोरीज, मोंपासा, गोर्की की रचनाएं भी प्रसिद्ध हुई। मेंगी लिखकर स्टीफेन क्रेन प्रसिद्ध हुए।
बीसवीं सदी में सआदत हसन मंटो, इस्मत आपा, हेनरी मिलन, अल्बटों मोरादिया, विलियम सरोयां, आर्थर कोस्लर, कमलेश्वर, पर्लबक, गुलाम अब्बास, जैनेन्द्र कुमार, आबिदसुरती, अमृत लाल नागर, हेनरी मिलर, यशपाल आदि ने भी इस वृत्ति को आधार बनाकर रचनाएं लिखी हैं जो काफी प्रसिद्ध हुई। नागर जी की ये कोठे वालियां एक प्रामाणिक ग्रन्थ है।
धन्धा कॉल गर्ल्स का
आधुनिक समाज में वेश्याओं को तीन समूहों में बांटा गया है। पहली वे हैं जो गली, चौराहों, बस स्टेण्डों, रेलवे स्टेशनों पर अपने ग्राहक ढूंढती हैं। दूसरी चकले वाली और तीसरी कॉलगर्ल्स या सोसाइटी गर्ल्स। जो बड़े समाज में शान से घूमती हैं। पहली प्रकार की वेश्याओं की कीमत बहुत कम, जबकि कॉलगर्ल्स एक सिटिंग के हजारों वसूल करती हैं। सुरा सुन्दरी की मदद से सत्ता और सरकार के काम निकालते हैं और वे सत्ता के भेद तक निकाल लाती हैं। कीलर और प्रोफ्यूमों कांड के बारे में कौन नहीं जानता। राजधानी दिल्ली, महानगर बम्बई और प्रान्तीय राजधानियों में कॉलगर्ल्स का धन्धा खूब पनप रहा है।
पिछले कुछ दशकों में यह व्यापार एक बहुत ही अहम् व्यापार बन गया है। सत्ता, राजनीति, धन और पश्चिम से आई मुक्त यौन सम्बन्धों की हवा ने इस व्यापार को हवा दी है। कॉलगर्ल्स के ग्राहक बहुत सम्पन्न व्यापारी, नेता या अफसर होते हैं। इनके पास कार, टेलीफोन, बंगला होता है और बड़े होटलों से आर्डर पर माल भेजा जाता है।
दूसरी बड़ी लड़ाई के बाद समाज में एक नवधनाढ्य वर्ग पनपा, जिसके लिए सफलता ही सब कुछ थी। इस वर्ग में निचले तबके से आए लोगों ने अपनी संस्कृति छोड़ कर पश्चिम की संस्कृति अपनायी। सत्ता, सरकार में काम निकालने के लिए इस पीढ़ी ने कॉल गर्ल्स, सुरा सुन्दरी तथा खाओ-पीओ और मौज करो की संस्कृति ने क्लब , बार, होटल, रेस्ट्रां, फ्लेटों की एक नई दुनिया का विकास किया। इनकी देखा देखी अन्य लोगों ने भी नकल की। पैसा कहां से आए। आसान तरीका महीने में एक या दो व्यापार की सिटिंग। और पांच सौ से पांच हजार रुपयों तक की प्राप्ति। मम्मीज, आन्टीज का एक ऐसा जाल चारों तरफ बिछा कि मत पूछिए और परिणाम कॉलगर्ल्स का विकास।
एक सर्वेक्षण के अनुसार अकेली दिल्ली में 20,000 कॉनगर्ल्स हैं जिनमें से आधी उच्च वर्ग और संभ्रान्त परिवारों से आती हैं। कम वेतन पर काम करने वाली अध्यापिकाएं, सेल्स गर्ल्स, नर्स, क्लर्क सभी हैं इस व्यापार में।
करोल बाग, दक्षिण दिल्ली, पहाड़गंज, कनाट प्लेस, कर्जन रोड़, मंडीहाउस आदि स्थानों पर कॉलगर्ल्स हैं।
अक्सर बड़े होटलों में कमरे बुक होते हैं, कभी कभार पकड़े भी जाते हैं तो कुछ नहीं होता।
बम्बई में भी हालात ऐसे ही है। यहां पर कॉलगर्ल्स की संख्या पचास हजार से ज्यादा है। प्रति 10 कार्यशील महिलाओं में से कम से कम एक अवश्य अस व्यापार में है। गेस्ट हाउसों, वातानुकूलित शहरों में यह धन्धा खूब चल रहा है।
दूरदर्शन, मॉडल, विज्ञापन, फिल्म, कला, रंगमंच तथा अन्य व्यवसायों से जुड़ी लड़कियां उच्च स्तर की कॉल गर्ल्स हैं। संभ्रान्त परिवारों के ग्राहक होते हैं। सम्पन्न परिवारों की विवाहित महिलाएं शारीरिक सुख के लिए कॉल गर्ल्स बनती हैं। कोलाबा, कफ-परेड, बांद्रा तथा वर्किंग वूमेन होस्टलों में ये आसानी से उपलब्ध है।
फिल्मों में असफल लड़कियां या अपना कैरियर बनाने को बेताब लड़कियां आगे जाकर कॉल गर्ल्स फिर चकलावासी बन जाती हैं। दलाल उन्हें चकले पर चढ़ाकर ही दम लेते हैं।
कलकत्ता में भी यही स्थिति है। लखनउ, पटना, भोपाल, जयपुर भी इस धन्धे में पीछे नहीं है।
देवदासी प्रकरण
कर्नाटक में येल्लम्मा देवी को प्रति वर्ष सैंकड़ों कन्याओं को समर्पित करके देवदासी बना दिया जाता है। प्रारम्भ ये पूज्य थी मगर आजकल इनकी हालत धार्मिक मान्यता प्राप्त वेश्याओं की है। समाज के दौलतमंद लोग इसके यौवन को लूटकर बुढ़ापा आते ही भीख का कटोरा थमा देते हैं।
भारत में इस प्रथा का जन्म आर्यों के प्रवेश से पूर्व हुआ था। तीसरी शताब्दी में प्रारम्भ इस प्रथा का मूल उद्देश्य धार्मिक था। चोल तथा पल्लव राजाओं के समय देवदासियां संगीत, नृत्य तथा धर्म की रक्षा करती थी। 11 वीं शताब्दी में तंजोर में राजेश्वर मंदिर में 400 देवदासियां थीं। सोमनाथ मंदिर में 500 देवदासियां थी। 1930 तक तिरुपति, नाजागुड में देवदासी प्रथा थी।
देवदासियों की 2 श्रेणियां थीं-
1- रंग भोग 2․ अंग भोग। दूसरी श्रेणी की देवदासियां मंदिर से बाहर नहीं जाती थीं।
वेलमा देवी को समर्पित करने की रस्म शादी की तरह ही थी। कन्या की उम्र 5-10 वर्ष की होती है। कन्या का नग्न जुलूस मन्दिर तक लाया जाता है। उसको फिर देवदासी के रुप में दीक्षित किया जाता है।
समर्पण के बाद ये देवदासियां मंदिर और पुजारियों की सम्पत्ति हो जाती है। जब तक जवान है तब तक भोग्या और जवानी के उतरते ही उसी मंदिर के बाहर भिखारी का रुप।
धर्म और वेश्या
ऐसे कई स्थान है जहां वेश्याओं ने मंदिर बनाएं हैं, धर्म के प्रति आस्था प्रकट की है। वे अपने धर्म के प्रति पक्की होती है। मंगलवार को हनुमानजी के प्रति आस्था व्यक्त करती है। व्रत रखती है, धन्धा नहीं करती है। मुसलमान वेश्याएं नमाज, रोजा की पाबन्द होती है। पूनम का व्रत भी हिन्दू वेश्याएं रखती हैं। वेश्याओं का एक धर्म यह भी है कि वे एक की होकर दूसरे के पास नहीं जाती। वसन्त सेना का उदाहरण ऐसा ही है वह राजा के साले के पास नहीं जाकर चारुदत्त के पास गई।
वेश्याएं और समाज
समाज में वेश्याओं को उचित सम्मान हर काल में रहा है। वे राज सभा और शाही जुलूसों का एक आवश्यक अंग समझी जाती थी।
प्राचीनकाल में इनका सामाजिक महत्व तो था ही, वे राजनीतिक कार्यों में भी मदद करती थी। कौटिल्य ने अपने ग्रन्थ के प्रथम अधिकरण के चौवालीसवें प्रकरण में गणिकाध्यक्ष का वर्णन किया है और लिखा है कि गणिकाध्यक्षको एक प्रधान गणिका और 2 सहायिकाएं रखनी चाहिए। वेश्याएं संधि-विग्रह में प्रयुक्त होती थी। विष कन्याओं के रुप में वे शत्रु का नाश करती थी। बाद के काल में राजा, महाराजा, नवाब तथा श्रेष्ठिवर्ग के लोग अपने बच्चों को तहजीब, संस्कार तथा दुनियादारी सिखाने के लिए वेश्याओं के पास भेजते थे। अच्छी गणिकाएं इन बच्चों को अपने पुत्रों की तरह शिक्षा-दीक्षा देती थीं और समाज में समादृत होती थीं।
स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी कई वेश्याओं ने अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान किया था। असहयोग आंदोलन के दिनों में हुसना बाई की अध्यक्षता में एक सभा हुई। जिसमें हुस्नाबाई ने भारत को गुलामी से मुक्ति के लिए प्रयास करने का आह्वाहन किया।
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यशवन्त कोठारी, 86, लक्ष्मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596
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यहां डाल डाल पर रिश्वत और दलाली करे बसेरा।
अहा! कैसा मुल्क है मेरा ॥
रहे विपक्ष में तब तक है सब सीधे और सयाने।
हाथ लगी कुर्सी जिसके भी लगता माल कमाने॥
यहां हर फाईल में ही मिलता हैं घोटालों का फेरा।
अहा! कैसा मुल्क है मेरा ॥
किसने किसने कितना खाया सबको जोड़ा जाय।
कर्जा सारा ही भारत का उतने में चुक जाय ॥
जिसको परखा वो ही निकला हड़फू चोर लुटेरा ।
अहा! कैसा मुल्क है मेरा ॥
किसको देश की सेवा करनी केवल बातें करते।
पांच साल में ठूंस ठूंस कर जेबें अपनी भरते॥
मैने तो अपनी कह दी हैं अब सब काम हैं तेरा।
अहा! कैसा मुल्क है मेरा ॥
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पुरुषोत्तम विश्वकर्मा
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ग़ज़ल
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हज़ार ज़हमतें हैं यार ज़िन्दगी में
तमाम ग़म भी छुपे रहते हैं खुशी में
लुका-छुपी का खेल खेलते रहे हरदम
कभी तो आ के मिलो मुझसे रोशनी में
निजाम बेलगाम होने लगा है जब से
उबाल आने लगा आम आदमी में
खुदा मुझे भी ज़रा दाँव-पेंच सिखला दे
वरना जी न सकूंगा मैं इस सदी में
तुम्हारे गाँव का मौसम अजीब है हमदम!
झुलस रहा है जिगर सर्द चांदनी में
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लक्ष्मीकांत
14/260, इंदिरा नगर,लखनऊ।
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बीती बातें
बीते बरस सैकड़ा भर
अभी तक नहीं भूला पर |
बना रेत का घर घूला ,
जो थोपा था पंजों पर |
आया शाला से पैदल ,
झड़ी लगी थी झर झर झर |
लथपथ पूरा पानी से ,
काँप रहा था थर थर थर |
छींक छींक बेहाल हुआ ,
नाक बोलती घर घर घर |
विक्स मला था मम्मी ने ,
पीठ नाक और सीने पर |
याद हमें आती रहती ,
बीती बातें ये अक्सर |
खुशियों से मन भर जाता ,
हो जाते ताजा दम तर |
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विकास
जिस बस्ती में मैने अपना झोंपड़ा बनाया है वह अभी विकास की भ्रूण अवस्था में है, न बिजली-पानी, न नाली न सड़कें, न फोन, न सीवर लाइन, लेकिन मुझे विश्वास था कि यह बस्ती जल्द ही न केवल विकास की यौवनावस्था को प्राप्त होगी बल्कि वृद्धा अवस्था को भी प्राप्त होगी, फिर एक दिन मेरी बस्ती में सड़कें बननी शुरू हो गयी, पहले कच्ची, फिर रोडियॉ पड़नी शुरू हुई, उसके बाद डामर की पक्की सड़क बन कर तैयार हो गई, एक सप्ताह के बाद नाली बनाने वाले आ गये, उन्होंने नाली बनाई, पक्की बनाई, बढ़िया बनाई, बेतरतीब बनाई, नाली की मिट्टी ने सड़क को अपने गले लगा लिया, उसके बाद आए पानी के पाइप बिछाने वाले, बिजली वाले, उन्होंने जगह जगह से सड़क को काटकर अपना काम किया, बडे बडे गड्ढों में सीमेन्ट के पाइप डाल कर खड़े किये, एक साल के बाद छोटे छोटे बल्ब जलने लगे। इसके बाद ट्रकों में लदकर बड़े बड़े पाइप आये और उन्हें सड़कों के किनारे किनारे डाल दिया गया अब सीवर लाइन खुदने की बारी थी, कुछ दिन बाद सीवर लाइन वालों ने सड़क की मांग को बीच से उजाड़ना शुरू कर दिया, जब कि बस्ती अपनी नवयौवना अवस्था में थी, सीवर लाइन वाले अपना काम करके चले गये। अब सीवर लाइन बनी हुई दीख रही थी, सड़कें नाली तो पहले ही बन चुकी थी।
अब मेरी बस्ती का पूरा विकास हो चुका है।
.....................
पूजा घर
मॉ बाप, चार बेटे, चार कमरों का मकान, मॉ बडी खुश थी, उसने एक कमरे में पूजा घर बना लिया। एक बच्चों को दे दिया, एक कमरे में पति पत्नी और एक बैठक। मॉ का सब कामों में सबसे प्रिय काम था उसका पूजा करना, रोज अपने हाथों से उसे सजाती, संवारती, ठाकुर जी को नहलाती, फूल-धूप बत्ती से पूजा करती, लेकिन करती तब, जब घर के सारे काम सिमट जाते, कभी गीता का पाठ करती, कभी रामायण, कभी शिव पुराण, कभी भागवत, उसे इस काम में एक निर्मल शान्ति प्राप्त होती। किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं थी। समय गुजरता गया,पहले बडे बेटे की शादी हुई उसे बैठक वाला कमरा दे दिया गया, फिर उससे छोटे की शादी हुई उसे भी एक कमरा दे दिया गया, फिर तीसरे बेटे की शादी पर एक कमरा उसे दे दिया गया । पूजा और बाकी सदस्य एक कमरे में सिमट गये, चौथे बेटे की शादी पर वह कमरा उसे दे दिया गया और पति-पत्नी ने बरामदे में अपनी अपनी चारपाई डाल ली। आजकल मां स्नान घर के एक कोने में अपने भगवान को जगह दे पाई, उसकी पूजा अभी भी जारी है। मां को किसी से अब भी शिकायत नहीं है।
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RK Bhardwaj
151/1 Teachers Colony, Govind Garh]
Dehradun (Uttarakhand)
email: rkantbhardwaj@gmail.com
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ये मौसम
बातों-बातों में छलने का मौसम है,
सर्द-आहों से पिघलने का मौसम है.
झूठ है,फरेब है ,दगा है ,बेईमानी है.
आप अब तक बचे है,ये क्या कम है!
नज़रों से दूर तो नज़रअंदाज़ कर दिए,
सामने है तो बस हम ही हम है.
वक़्त का क्या है, गुजरता जाता है,
सुना है ज़माने में और भी ग़म है.
वह दौर भी गुजरा है कि हाथों में फूल थे,
आज तो नौनिहालों के भी हाथों में बम है.
हम तो हर बार सच बोल के हारे है ,
अपनी तो ऐसी है 'मेरे नादाँ सनम है.
आज भी है तेरी ईजाओं का इंतज़ार ,
बचा के रखना तेरे जितने सितम है
उलाहने दो, ताने दो पर कुछ तो बोलो ,
देखो चुप ना रहना तुम्हे मेरी कसम है..
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v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS
BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com
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तारकोल, कीचड़ सने, चेहरे रूप-कुरूप.
होली में सब एक-से, रंक, भिखारी, भूप..
धो सकती है होलिका, सबके मन का मैल.
पर धुलने की क्या कहें, और रहा है फैल..
मन के प्यारे खेल को, रहे देह से खेल.
सारी कुंठा, वासना, ऐसे रहे उंडेल...
चाहे कपड़े नए हों, या अनगिन पकवान.
सब के सब फीके लगें, बिना प्यार, सम्मान..
होली में ऐसे हुए, तन-मन चंग-मृदंग.
बजते-बजते, ताल, लय, सारे हो गए भंग..
छलिया, रसिया राग के, झोली भर-भर रंग.
होली मिलने चल पड़े, कलिकाओं से भृंग..
वासन्ती परिधान में, खिला अंग-प्रत्यंग.
सरसों ने फेरे लिए, फिर गेहूं के संग..
लाने को नव सभ्यता, और नए संस्कार.
बड़ों -बड़ों की होलिका, कपड़े रही उतार..
-डॉक्टर गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'
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क्रिसमस ट्री
जन्मदिन पर मिले
बहुत से तोहफों में
एक तोहफा था-‘छोटा सा क्रिसमस ट्री’
बड़े चाव से एक छोटे से गमले में
मैनें उस पौधे को लगाया।
उसे रोज़ पानी देना,
मिट्टी गोड़ना,
उससे बातें करना,
उसकी फैली हुई छोटी-छोटी बाहों को सहलाना
मेरा नित्यक्रम था ।
मेरे प्यार-दुलार
खाद,मिट्टी और पानी नें
अपना रंग दिखाया
देखते ही देखते पौधा बढ़्ने लगा
और उसकी जड़ों ने गमले में तिराड़ डाल दी ।
मैनें उसे एक बड़े गमले में
उतार दिया.......
धीरे-धीरे क्रिसमस ट्री शान बन गया
कभी मेरे बगीचे की,
कभी बरामदे की,
तो कभी ड़्रॉईंग रूम की
हर आने-जाने वाले की
नज़र उस पर टिक जाती,
अरे वाह.....!
दो फुट के गमले में सात फुट का पौधा !
मैं मन ही मन खुश होती
वैसे ही, जैसे एक माँ
अपने बच्चे की तारीफ सुनकर
खुश होती है।
पर जल्द ही यह गमला भी
छोटा पड़ने लगा।
पर्याप्त पोषण के अभाव में
मेरा पेड़ मुरझानें लगा।
मैं समझ रही थी इस बात को
कि खुली जमीन और खुले आकाश के वृक्ष को
मैनें कैद कर रखा है
एक गमले और घर में!
उसे दूर करने के ख्याल से
मैं काँप उठती.......
मेरे बगीचे की शान.........
मेरी बरसों की मेहनत, जतन....
पर आखिरकार स्वार्थ को तो
हारना ही था ममता के सामने
और मैनें मेरे कॉलेज़ के बगीचे में
उस पेड़ को लगाकर
उसे लौटा दी उसकी- खुली जमीन,खुला आसमान!
अब हर सुबह
जैसे ही कॉलेज में कदम रखती हूँ
आसमान से बातें करता,
मुस्कराता,
अपनी बाहों को हवा में झुलाता ‘क्रिसमस ट्री’
मेरा आलिंगन करने को तत्पर दिखाई देता है.....
मैं मन ही मन न्यौछावर हो जाती हूँ
मेरी ममता के इस नये रूप पर.....
---
एक होलियाना गजल
--
आज होली के संग वो बहकने लगे
लाज में डूब कर हम सिमटने लगे
लाल रंगों की ऐसी फुहारें पड़ी
भीगी कोरी चुनर हम दहकने लगे
हँस उठे फूल टेसू के आगोश में
मन हुआ बावरा हम चहकने लगे
गीत फागुन के कोकिल सुनाने लगी
महुआ खिल-खिल उठा हम महकने लगे
आँखों ही आँखों में कुछ इशारे हुऐ
साथ उनका मिला हम सँवरने लगे
--
डॉ.मालिनी गौतम
| रचना कैसी लगी: |
यों ही सोचा जैसे अकसर सोचा करता हूं कि वे आए हैं तो मेरे संकट हरने ही आए होंगे।
सच कहूं जबसे होश संभाला है तबसे संकटों से ही दो चार होता रहा हूं। कभी घर में आटे का संकट तो कभी दाल का संकट। कभी बेटे को अच्छे स्कूल में दाखिल करवाने का संकट तो कभी उसकी हर हफ्ते ट्यूशन फीस का संकट। मैं तो बस औरों के ही संकटों को आजतक झेलता रहा। अपने संकटों को गंभीरता से लेने का कम्बख्त मौका ही नहीं मिला। अब देखो न! बीस बरसों से दिमाग चाटती बीवी के संकट को लगातार झेल रहा हूं। कई बार इस संकट से खुद को उबारने की कोषिष भी की! पर जितने को कुछ करने की सोचने लगा कि दूसरा ही संकट मुंह के पास मुंह लटकाए खड़ा हो गया। कुल मिलाकर ,कभी ये संकट तो कभी वो संकट। ऐसे में मेरी जगह आप होते तो सपने में पूर्व प्रेमिकाओं के बदले संकट मोचकों के ही दर्शन किया करते मेरी तरह।
मैंने उन्हें प्रणाम किया,‘ हे संकट मोचक प्रणाम! आप हो तो संकट मोचक ही पर किसके संकट मोचक हो? यूपीए के ,एनडीए के या फिर चारों ओर से संकटों में घिरी जनता के! जिसके आगे यूपीए है तो पीछे एनडीए। दाएं कम्युनिस्ट हैं तो बाएं समाजवादी! न वह आगे ही जा सकती है न ही पीछे। न दाएं न बाएं! चारों ओर खाइयां ही खाइयां ,' तो वे मेरी ओर से बेरूखे हो बोले,‘ मैं यहां जनता के संकटों को हरने नहीं आया हूं,' तो मैंने पुनः हाथ जोड़े पूछा,‘ तो प्रभु! किसका संकट हरने आए हो? यूपीए पर आया संकट तो खत्म हो गया ! करूणानिधि ने समर्थन वापस लेने की धमकी के बाद दुम दबाए अपनी धमकी वापस ले ली। बेचारे मुलायम अपना उस्तरा पैना करते ही रह गए,' तो वे दोनों हाथों में अपन सिर थाम अपनी गदा मेरे हाथ में थमा बोले,‘ क्या बताऊं यार! मैं तो खुद ही संकट में फंसा हूं!'
‘ आप और संकट! सरकार तो हमसे चौबीसों घंटे मजाक करती ही रहती है अब आप भी क्यों हमसे मजाक करने लगे? जनता मांइड नहीं करेगी क्योंकि उसके पास माइंड है ही कहां! हमारे संकट नहीं हरने तो सीधे से इंकार कर दो । वैसे भी आजतक संकटमोचक सत्ता के ही हुए हैं, जनता के भाग में तो बस संकट ही संकट बदा है, ' मेरे कहते ही उन्होंने मेरा सहारा ले कहा,‘ बस यार! बहुत कह दिया तूने। पर सच ये है कि मैं राम रावण वार के समय से ही उन बाबुओं के चक्कर में फंसा हूं जिनकी सुर नर मुनि आरती उतारे, जय जय जय बाबू उचारे! भूत पिसाच सब मौज मनाए, बाबू को जब डटके खिलाए!!'
‘बाबुओं के चक्कर में और आप!' मुझे लगा मैं पागल न हो जाऊं तो वे दीन हीन हो बोले,' हां यार! राम रावण का युद्ध हुआ था तो उसमें लक्ष्मण मूर्छित हुए थे कि नहीं?'
‘हां तो!!' मैंने अपने से लंबी सांस भरी तो वे मुझसे भी लंबी सांस भर बोले,‘तब सरकार के आदेश से मैं संजीवनी लाने हिमालय चला गया। वे बोले आधिकारिक अनुमति बाद में ले लेना। अभी लक्ष्मण का सवाल है। प्रजा का होता तो सोचने को वक्त मिल जाता। और मैं कार्यालय आदेशों की परवाह किए बिना संजीवनी लेने जा निकला। रास्ते का सारा खर्चा अपनी जेब से किया। सरकार को खतरा जो था,‘ कह उनकी आंखों में आंसू से आए तो मैंने पूछा,‘ बाद में तो सब मिल गया होगा?'
‘कहां यार! आज तक मेरा बिल नहीं निकल पाया। वो विद्या सिंह बाबू है कि बिल में कभी ये आब्जेक्शन लगा देता है तो कभी वो। कभी कहता है कि उड़नखटोले से यात्रा की तुम्हारी पात्रता नहीं थी, तो कभी कह टाल देता है कि टूअर डायरी अपने बास से प्रापरली हस्ताक्षरित करवा कर लाओ। बिल में कभी ये कमी तो कभी वो कमी! बस , उसी बिल के चक्कर में जब मौका मिलता है बाबू के पास आ लेता हूं। साला अपने आप सारा दफ्तर डकार गया। पर उसे पूछने वाला कौन,' मुझे काटो तो खून नहीं,‘सरकारी काम से ही तो गए थे न!आज के अफसरों की तरह तो नहीं कि बनाते हैं सरकारी काम से टूअर और गए होते हैं प्रेमिका के साथ मस्ती करने। घरवाली घर में सड़ती रहे तो सड़ती रहे। जनाब से बात नहीं की इस बारे में?' तो वे लंका तक उदास होते बोले,‘ उनसे क्या बात करूं! वे तो बेचारे खुद ही अपनी भूमि पर उपजे विवाद को लेकर परेशान हैं। तुम्हारे उस बाबू से लिंक हो तो मेरा काम निकलवा दो प्लीज!'
--
अशोक गौतम
गौतम निवास, अपर सेरी रेाड,
सोलन-713212
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सुना सुना
मन ही मन में
बुना बुना
मन ही मन में
खोये खोये
विचार चल रहे
अपने आप में
अथाह धधकती आग
भड़की
नस नस में
अभाव का घरोंदा
विचलित सा
मस्तिष्क भी जकडा जकडा
सोच के भी सोच नहीं
खोच के भी
खोच नहीं
मन की वेदना
तन मे समाई
घडी के कांटे
मन अटका
अतप्त सा
भटक भटक रहा
सूखे – झरने का
पथ
सूखा सूखा चारों ओर
भूखा- भूखा चारों ओर
सच्च
मृत्यु होना
जीवन
इस पर भावना का झमेला
उलटा पुलटा
सीधा सरल
सुख दुख
जीवन तो जीवन......।
--
पुरुषोत्तम व्यास
पत्ता झामनानी निवास
डा फजल दवाखाना के पास
क्वेटा कालोनी
नागपुर(महाराष्ट)
ई-मेल pur_vyas007@yahoo.com
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तीर्थ स्थली पुरी में भगवान जगन्नाथ के उस बहुत बड़े मंदिर में जा कर, उस ने जहां कहीं भी मूर्तियां, तस्वीरें और फल- फूल चढ़ाए हुए स्थान देखे, वह श्रद्धा और आदर से उन के सामने नतमस्तक हो कर अपना शीश झुकाता रहा । दरअसल, वह अपने एक प्रिय जन की अकाल मृत्यु के पश्चात मंदिर में दिवंगत आत्मा की शान्ति और अपने मन को संतोष और पुण्य कमाने के इरादे से आया था ।
बहुत देर तक भगवान की मूर्तियों पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने के पश्चात एवं मंदिर की प्रदक्षिणा कर वाहर निकला तो मंदिर के पास बैठे - खड़े कुछ भिखारियों को अपने प्रिय बन्धु को याद करते हुए पच्चीस- पचास पैसे के सिक्के फैंकते आगे बढ़ता रहा । जेब में पड़ी थोड़ी सी रेजगारी जब खत्म हो गई, तो उस ने भिखारियों को आगे ब़ने से रोक दिया । लेकिन एक भिखारी जिसे शायद कुछ नहीं मिला था, उस के पीछे ही पड़ गया । "मोते भी दियो बाबू …मोते भी दियो बाबू " की रट लगा कर । भिखमंगा जब उस के साथ ही हाथ फैलाए चलने लगा तो वह असहज होने लगा । और फिर उस को गुस्सा ही आ गया । उस ने एक नजर इधर- उधर डाली और एक झन्नाटेदार चांटा भिखमंगे के गाल पर जड़ दिया । भिखमंगा अविश्वास से वही खड़ा रह गया । पलभर में ही भिखमंगे की आंखें घृणा से भर गई थी । लेकिन वह संतोष से आगे बढ़ गया जैसे कुछ हुआ ही न हो ।
O शेर सिंह
अनिकेत अपार्टमेंट, प्लाट नं. 22
गिट्टीखदान लेआउट, प्रतापनगर
नागपुर - 440 022
| रचना कैसी लगी: |
इक्कीसवीं सदी की ओर अग्रसर विज्ञानी मानव अनेक अभिशापों से ग्रसित है। बेरोज़गारी उनमें से एक भयंकर अभिशाप है। वर्तमान आर्थिक युग में जीविकोपार्जन ही मनुष्य के जीवन का लक्ष्य रह गया है। किसी देश में कम से कम बेरोज़गारों का होना वहाँ की आर्थिक प्रगति और विकास का परिचायक होता है। जब जनसंख्या की वृद्धि आर्थिक विकास वृद्धि से अधिक हो जाती है, तब बेरोज़गारी का उदय होता है। बेरोज़गारी का अर्थ काम के अवसरों की कमी है।
भारत में बेरोज़गारी का रूप भयंकर बन गया है। साधारण या उच्च शिक्षा प्राप्त अनेक युवक-युवतियाँ रोज़गार कार्यालयों में लाईन लगाकर कई दिनों तक दस बजे से पाँच बजे तक खड़े रहने पर भी, केवल बेरोज़गारी में नाम ही लिखा पाता है। फलस्वरूप उसके मन में इस देश और समाज के प्रति विरक्ति की भावना उत्पन्न होती है। इसी भावना का फल है कि भारत जैसे आध्यात्मिक देश में भी आत्महत्याओं की अधिकता होती है। बेरोज़गार युवक देश के लिए विनाशकारी, अनुशासन हीन, विद्रोही और क्रांतिकारी बन जाते हैं। इसलिए देश का सर्वप्रथम कर्तव्य बेरोज़गारी दूर करना है और जन-सामान्य को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर प्रदत्त करना होता है। गुप्तजी ने अपने कथा-साहित्य के माध्यम से समाज में प्रचलित बेरोज़गारी का चित्रण किया है।
भारतीय गाँवों में युवक पढ़-लिखकर बड़े हो जाते हैं, तब उनके सामने नौकरी की समस्या खड़ी हो जाती है। वे नौकरी के लिए कोशिश करते हैं, किन्तु नौकरी न मिलने से वे बेकार रहते हैं। गुप्तजी के सती मैया का चौरा उपन्यास में मुन्नी ने बेरोज़गारी के प्रति अपना विचार व्यक्त किया है। मुन्नी सोचता है- ओह! बेकारी कितना बड़ा अभिशाप है! यह इन्सान को मुर्दा बना देता है‘ 1। अन्त में गाँव में काम न मिलने पर माँ-बाप को बिना बताए गाँव छोड़कर मुन्नी नौकरी की तलाश में मद्रास जाने की तैयारी करता है।
समाज में आज पढ़े-लिखे युवकों के सामने बेरोज़गारी एक प्रश्न चिह्न है। पढ़ाई के समय युवक यही महत्वाकांक्षा रखते हैं कि अध्ययन के बाद उन्हें कहीं न कहीं नौकरी मिलेगी। पर पढ़ाई के बाद नौकरी न मिलने पर वे दुःखी बन जाते हैं। उनकी आशाएँ टूट जाती हैं।
-तुम ने अपनी महत्वाकांक्षा के संबन्ध में क्या बताया-आफ़ताब ने पूछा।
-मैं ने बताया कि मेरी कोई भी महत्वाकांक्षा नहीं है-सरल ने बताया-मुझे एक नौकरी चाहिए, कोई भी 2‘।
हमारे समाज में शिक्षित और अशिक्षित सभी प्रकार के बेरोज़गार देखे जा सकते हैं। पर उनमें शिक्षितों की संख्या अधिक रहती है। इसका उल्लेख करते हुए छोटी सी शुरुआत उपन्यास में सरल कहता है- मैं नौकरी के लिए एक जमाने से भूखा हूँ। लेकिन आज तक किसी ने एक नेवाला भी मेरी थाल में नहीं डाला! मैं नौकरी तलाशते हुए पढ़ाई आगे बढ़ाता रहा। नौकरी नहीं मिली और मैं परीक्षा पर परीक्षा पास करता गया‘ 3।
ज्योतिष कहानी में गुप्तजी ने समाज में व्याप्त बेरोज़गारी का गंभीर रूप चित्रण किया है। कहानी में सदानन्द के पिता ने उन्हें इसलिए पढ़ाया कि पढ़-लिखकर सदानन्द को नौकरी मिलेगा, तब परिवार से गरीबी हट जाएगी। लेकिन वैसा नहीं हुआ तो घर की हालत से आजिज आकर पिताजी ने सदानन्द से कहा- तू पढ़ा-लिखा होकर हमारे साथ यहाँ क्यों भूखों मर रहा है? जाकर कहीं कोई नौकरी-चाकरी क्यों नहीं ढूँढ़ता? आँख से ओझल कहीं तू भूखों मर भी जायेगा तो हमें उतना दुःख नहीं होगा जितना यहाँ तुझे भूखे देखकर होता है‘ । यह सुनकर सदानन्द कहता है- मैं क्या करता, कहाँ जाता?‘ 4
अपरिचय का घेरा कहानी में बेकारी की समस्या मुख्य रूप से दिखाई पड़ती है। कहानी में कई युवक बेकारी के कारण जीवन से जैसे हारे हुए लगते हैं। इसी तरह गाँव का लछमन भी बेकार है। घर में माँ-बाप, भैया-भाभी लछमन को डाँटा करते हैं कि वह किसी काम पर जाए। खाना खाते समय, उठते-बैठते समय यहाँ तक कि हर समय उसे डाँट खानी पड़ती थी। असह्य लछमन काम की तलाश में गाँव छोड़कर मद्रास चला जाता है। वहाँ पर जाकर घरेलु बच्चों को पढ़ाने के काम में लग जाता है, जिससे कमाई भी अच्छी होने लगती है। लछमन को बार-बार गाँव की याद आती थी। शहर में हर तरह की सुख-सुविधाएँ होते हुए भी लछमन अपने आप को अकेला महसूस कर रहा था। गाँव जाने की सोचता, लेकिन फिर उसे लगता कि अगर वह गाँव लौटेगा तो घरवालों से फिर बेकारी के कारण ताने-बाने सुनने होंगे, यह सोचकर मज़बूरन उसे मद्रास में ही रहना पड़ता है।
समाज में आज नौकरी मिलना है तो सिर्फ शिक्षित होना ही नहीं बल्कि घूस भी देना पड़ता है। छोटी सी शुरुआत उपन्यास में गुप्तजी ने सरल के भाई द्वारा इसका उल्लेख किया है। सरल का भाई कहता है- नौकरी की तलाश में तो वह मिडिल पास करने के बाद से ही लगा है। उसे नौकरी कहाँ मिलेगी? दो बार तो यहाँ की पुलिस ही उसके खिलाफ रिपोर्ट कर चुकी है। डाक खाने में और फिर रेलवे में वह चुन लिया गया था। पुलिस रिपोर्ट भेजने के लिए पाँच हज़ार और दस हज़ार रुपये माँगे थे। इतने रुपये बड़े भैया कहाँ से देते, वे एक हज़ार और पाँच सौ तक देने को तैयार थे। लेकिन नायब ने इनकार करते हुए कहा, मैं ने आपकी औकात को ध्यान में रखकर ही कम से कम माँगा है। रेलवे में टी.टी की जगह है, लड़के की नियुक्ति हो गयी, तो वह एक-दो महीने में ही दस हज़ार पीट लेगा। डाक खाने की नौकरी प्रतिष्ठा की और उन्नति की दृष्टि से बहुत अच्छी है। यों तो उसे नैकरी मिलेगी नहीं‘5।
संक्षेप में, मनुष्य की आवश्यकताओं को यदि संतुष्ट किया जाना है तो उन्हें रोज़गार मिलना चाहिए। बेरोज़गारी केवल दरिद्रता एवं दुःखों को ही जन्म नहीं देती, अपितु सामाजिक संगठन पर प्रतिकूल प्रभाव भी डालती है।
यद्यपि बेरोज़गारी सर्वत्र व्याप्त है, तथापि भारत में यह अत्यधिक है। इसके अतिरिक्त, बेरोज़गारी का दुखदायी स्वरूप यह है कि पंचवर्षीय योजनाओं के उपरान्त भी बेरोज़गारों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। शिक्षित वर्ग में बेरोज़गारी गंभीर रूप धारण किए हुए हैं।
संदर्भ
1 . सती मैया का चौरा पृष्ठ सं 85
2. छोटी सी शुरुआत पृष्ठ सं 62
3. वही, पृष्ठ सं 24
4. ज्योतिष (मंगली की टिकुली कहानी संग्रह) पृष्ठ सं 85
5. छोटी सी शुरुआत पृष्ठ सं 72
---
Dr. Raju. C.P,
Asst.Professor in Hindi,
St.Thomas’ College Thrissur, Kerala
| रचना कैसी लगी: |
प्रकाशनार्थ रचनाएं आमंत्रित हैं
रचनाकार में प्रकाशनार्थ हर विधा की रचनाओं का स्वागत है. अपनी या अपने रचनाकार मित्रों की रचनाएँ हिन्दी के किसी भी फ़ॉन्ट यथा - कृतिदेव, डेवलिस, श्रीलिपि, शुषा, वेबदुनिया, जिस्ट-आईएसएम, लीप या किसी भी अन्य फ़ॉन्ट में पेजमेकर या एमएस वर्ड फ़ाइल के रूप में अपनी रचना ई-मेल के जरिए rachanakar@gmail.com .के पते पर भेजें. विस्तृत जानकारी बाजू पट्टी में देखें. आप अपनी रचनाओं के सस्वर ऑडियो/वीडियो पाठ की सीडी भी प्रकाशनार्थ भेज सकते हैं जिन्हें कुछ इस तरह [ देखने के लिए इस कड़ी/लिंक पर क्लिक करें] प्रकाशित किया जा सकेगा. ......................