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April 2011
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मुन्ना भैया कितने अच्छे

मुन्ना भैया कितने पक्के

नहीं कहीं से भी दिखते हैं

किसी तरह के चोर उचक्के ।

 

सबसे ह‍ंस हंसकर मिलते हैं

बनते दोस्त सभी के पक्के

करते सदा मदद सबकी हैं

खाना पड़ें भले ही धक्के ।

 

सुबह सुबह ही योगा करते

तभी रखे हैं लाल गुलक्के

बात बात पर खूब हंसी के

रोज लगाते चौके छक्के ।

 

उन जैसे मिलते दुनियाँ में

हैं दुनियाँ में इक्के दुक्के

सदा व्यस्त रखते हैं खुद को

नहीं बैठते कभी दुबकके ।

 

सीखो हरदम चलते रहना

रुकना नहीं हरके थकके

करके अच्छे काम दिखाना

रह जायें सब हक्के बक्के ।।

 

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भारत में स्‍थल यातायात का प्रमुख साधन रेल गाड़ी ही है। रेलें भारतीय जन मानस में रची बसीं हुईं हैं। कई लोक गीतों में रेलों, रेल यात्राओं आदि का वर्णन किया जाता हैं। फिल्‍मों में, दूरदर्शन धारावाहिकों में, उपन्‍यासों और कहानियों में रेलें एक महत्‍वपूर्ण विषय हैं। भारतीय रेलों का विश्व में दूसरा व एशिया में पहला स्‍थान है। भारत में सर्वप्रथम रेल 1853 में मुम्‍बई से थाणे के मध्‍य चली। यह रेलवे मार्ग 34 किलोमीटर लम्‍बा था, लेकिन विश्व में पहली रेल 1830 में लिवर पूल से मानचैस्‍टर तक चली। उस समय लोगों के दिलो-दिमाग में रेलों की संचालन व्‍यवस्‍था को लेकर कई शक थे, मगर धीरे-धीरे रेलें सम्‍पूर्ण यातायात व्‍यवस्‍था में सबसे महत्‍वपूर्ण हो गयीं। भारत में प्रथम रेल लाइन का निमार्ण 1948-49 में हावडा-रानीगंज (पश्चिम-बंगाल)में शुरू हुआ। इस समय भारत में कुल 9 रेलवे क्षेत्र हैं। रेलवे बोर्ड सम्‍पूर्ण व्‍यवस्‍था को देखता है। इसमें 6 सदस्‍य होते हैं। संसद में 1924-25 से ही रेलवे बजट अलग से प्रस्‍तुत किया जाने लगा। 1929 में प्रथम विद्युत रेल मुम्‍बई से पूणे तक चली। देष भर में आजकल एक ही प्रकार की रेल लाईन (प्रोजेक्‍ट यूनीगेज) पर बड़ी तेजी से काम हो रहा है। 1950 में भारत में पहला भाप का इंजन, 1961 में पहला विद्युत इंजन बना था। बड़ी रेलों में शताब्‍दी एक्‍सप्रेस, पैलेस आन व्‍हील्‍स,तथा डबलडेकर ट्रेनें हैं।

रेलों को उनकी गति के आधार पर पैसेंजर, एक्‍सप्रेस, सुपर फास्‍ट, जनता एक्‍सप्रेस आदि में बांटा गया है। दोनों तरफ इंजन हो तो डबलहेडेड हो जाती हैं। केवल माल ले जाने वाली गुड्‌स ट्रेनें कहलाती है। भारत में भूमिगत रेलवे लाइन केवल कलकत्ता में है। अब दिल्‍ली में मेट्रो रेल सेवा शुरू हुई है। 1988 से देष में रेलों में आरक्षण में कम्‍प्‍यूटर लगें। हमारे देश में सबसे बड़ी सुरंग मंकीलह से खंडाला तक (2100 मीटर) है। सबसे बडा रेलवे पुल सोनपुर (बिहार) में हैं। सबसे बड़ा प्‍लेटफार्म खड़कपुर में है।

हमारे यहां लगभग 10,000 रेलवे इंजन है। देष भर में 45 वर्कशाप हैं। 7084 रेलवे स्टेशन हैं। 11 हजार ट्रेनें हैं। 11,300 पुल हैं। और 350 टन माल प्रतिदिन ढुलता है। रेलवे का एक बड़ा म्‍यूजियम दिल्‍ली में हैं। उदयपुर में भी एक रेलवे ट्रेनिंग स्‍कूल है। विकास के साथ साथ रेलों का प्रबन्‍ध बहुत कुशलता से किया जाता हैं। विकास के साथ साथ रेलों की गति में बहुत वृद्धि हुई है। इलेक्‍ट्रोनिक उपकरणों से सुसज्‍जित व्‍यवस्‍था से रेलों की यात्रा बहुत सुखद व आसान हो गयी हैं। रेलवे विभाग सुरक्षा की ओर पूरा ध्‍यान देता है। रेलवे समय का पाबन्‍द रहने में भी अग्रणी है। रेलवे में सुरक्षा, संरक्षा व समय की पाबन्‍दी पर विशेष ध्‍यान दिया जाता है।

भारतीय रेलों से यात्रा करना आज भी रोमांचक है। और शायद आगे भी रहेगा। आज भी तीर्थ यात्री, सुकून से यात्रा करने वाले पर्यटक, मनमौजी यात्री रेलों से ही यात्रा करना पसंद करते है। भारतीय रेलें सही मायने में एक समाजवादी गाड़ी हैं, तृतीय श्रेणी समाप्‍त कर दी गयी है। और प्रथम श्रेणी व वातानुकूलित डिब्‍बे कम हो रहे हैं। अतः सभी यात्री समान हैं और समान अधिकारों के साथ रेलवे में यात्रा करते हैं। रेलों के विकास में अंग्रेजों ने भी योगदान दिया। आजादी के बाद केन्‍द्र सरकार ने रेलों को तेजी से विकसित किया। यह भारत का सबसे बडा विभाग है, जिसमें लाखों लोग काम करते हैं। बर्मा व पाकिस्‍तान के अलग होने से क्रमशः 3200 कि0 मी0 लाईन भारत से अलग हो गयी है। रेलों के पुराने इंजन, कार्य प्रणाली, डिब्‍बे, सिगनल व तार सुविधा आदि को समझने, देखने के लिए रेलवे म्‍यूजियम दिल्‍ली का अवलोकन किया जा सकता है। रेलें भारत की संस्‍कृति, एकता, अखण्‍डता और समरसता का प्रतीक हैं। रेलें हमारी अर्थ व्‍यवस्‍था व सामाजिक जीवन से बहुत गहरे तक जुड़ी हुई है। रेलों के सरोकार भारतीय जन जीवन के सरोकार हैं। रेलों के बिना भारतीय जन जीवन की कल्‍पना नहीं की जा सकती है।

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यशवन्त कोठारी

86,लक्ष्‍मी नगर ब्रह्मपुरी बाहर,जयपुर-302002

ykkothari3@gmail.com

पागलपन

“वह सिर्फ मेरी है। उसके और मेरे बीच में में कोई आया तो उसकी खैर नहीं.....।“ मोहन रामू से यह सब बोले जा रहा था। रामू बोला “ आखिर मैं क्यों आने लगा किसी के बीच में। मुझसे इन बातों से कोई मतलब नहीं है। मैं यहाँ पढ़ने आया हूँ। न कि किसी चक्कर में पड़ने। मेरे समझ में कुछ नहीं आ रहा है कि तुम मुझे क्यों लेक्चर दिए जा रहे हो।“

मोहन बोला “मुझे गोली दे रहे हो। तुम क्यों आने लगे किसी के बीच में। बताओ तो जरा पुस्तक के ऊपर यह क्या और क्यों लिख रखा है ? ”

यह कहकर मोहन ने रामू से पुस्तक छीन लिया। अब तक कई लड़के वहाँ इकट्ठा हो गए थे। सबने देखा पुस्तक के आवरण पर “पीपी” लिखा है। मोहन अब और बिगड़ चुका था बोला “ क्यों बे ‘पीपी’ लिखकर घूम रहा है और कहता है कि मुझे किसी चक्कर में नहीं पड़ना है।“

रामू बोला “ जैसे तुम अपने हाथों में, किताबों और कापियों में पीपी लिखकर घूमते हो उसी तरह सबको समझते हो। तुम्हें हर जगह बस पीपी, पीपी ही दिखाई पड़ती है। लेकिन यह देख यह फिजिक्स प्रैक्टिकल की पुस्तक है। मेरे पीपी का मतलब फिजिक्स प्रैक्टिकल है न कि पुष्पा पाठक।

मोहन ने किसी तरह रामू के गिरेवान से हाथ हटाया। सभी लड़के स्तब्ध रह गए। सिर्फ इतनी सी बात पर इतना हंगामा। लगता है इसे पीपी का भूत सवार है। यह इस बार भी फेल होगा। रामू बोला भूत नहीं यह पागलपन है। यह पागल हो गया है।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.)।

BLOG: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/

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अपराध

कुछ लोग बतिया रहे हैं -

‘तुम्‍हें पता है वहां अपराध कम हो रहे हैं।‘

‘अच्‍छा ! .......हमारे यहां तो दिन पर दिन बढ़ ही रहे हैं।‘

‘वहां का कानून बड़ा कठोर है ना।‘

‘तभी !.......यहां तो कानून का किसी को डर ही नहीं।‘

‘पता है वहां अभी एक उच्‍चाधिकारी को भ्रष्‍टाचार के आरोप में

फांसी दी गई है।‘

‘और यहां............. दुर्दान्‍त आतंकवादी की भी फांसी भी रोक दी गई है।‘

सस्‍ता

आज बाजार में बड़ा हल्‍ला हो रहा था। सुना है मंहगाई में कुछ कमी हुई है। बड़े मैदान पर चल रही सभा में नेताजी जोर-जोर से बता रहे थे-‘‘ये हमने कर दिखाया है.....रसोई गैस में 20 और पेट्रोल-डीजल में 5-5 रूपये की कमी की है........हवाई जहाज का किराया भी हमने 30 प्रतिशत कम कर दिया है............जमीनों की कीमतें और सीमेंट-सरिये की कीमतें भी कम हो रही हैं........हमने जनता की सुविधा का पूरा ध्‍यान रखा है............इससे गरीब जनता को राहत मिलेगी...........।‘‘

किसना दिन भर ठेले पर माल ढ़ोता यह सब सुनकर बहुत खुश था। वह सोच रहा था-‘‘आज मेरी मजूरी में से चार-पांच रूपये तो बच ही जाएंगे।‘‘

शाम को वह जल्‍दी-जल्‍दी राशन की दुकान पहुंचा। वहां भी कुछ लोग मंहगाई में राहत होने की ही चर्चा कर रहे थे। किसना खुश होता हुआ बोला-‘‘सेठजी, मुझे तो आटा-दाल ही चाहिए.........इसमें कितने कम हुए.........।‘‘ उसकी बात सुन सेठजी सहित वहां खड़े सभी लोग ठहाका लगाकर हंस पड़े।

भाषा

भव्‍य शपथग्रहण समारोह चल रहा था। अहिन्‍दी भाषी क्षेत्र के साथ-साथ अधिकांश हिन्‍दी भाषी क्षेत्र के मंत्री भी अंग्रेजी में शपथ ले रहे थे। सभी सहजतापूर्वक सुन रहे थे और औपचारिक तालियां भी बज रही थीं।

एक दक्षिण प्रांतीय महिला ने जब हिन्‍दी भाषा में शपथ लेना शुरू किया तो सभी आश्‍चर्यचकित हो गए। कुछ शब्‍दों का उच्‍चारण ठीक से न बोल पाने पर भी उसने संभल-संभल कर हिन्‍दी में शपथ पूर्ण की। हॉल में बैठे सभी गणमान्‍य व्‍यक्‍ति इससे खुष होकर देर तक तालियां बजाते रहे और उस महिला की प्रशंसा करने लगे। कोई कह रहा था-‘‘वाह! हिन्‍दी में शपथ लेकर आपने तो कमाल कर दिया...।‘‘

टेलीविजन पर यह सब देख रहे मेरे 11 वर्षीय पुत्र ने अनायास पूछा-‘‘पापा, हमारी राष्‍ट्रभाषा तो हिन्‍दी ही है ना.........?

आतंकवाद

क्‍लब हाऊस में चर्चा गर्म थी। आतंकवाद से कैसे निपटा जाए। इस ज्‍वलंत मुद्‌दे पर तार्किक बहस चल रही थी। सबके अपने तर्क, अपने समाधान -

‘‘आतंकवाद से निपटने के लिए पोटा जैसा सख्‍त कानून होना चाहिए।‘‘

‘‘आतंकवादियों को सरे आम फांसी दी जानी चाहिए।‘‘

‘‘देष में एक विशेष कमांडो फोर्स हो, जो आधुनिक हथियारों से लैस हो।‘‘

‘‘मैं तो कहता हूं पड़ौसी देष में चल रहे आतंकी शिविरों पर आक्रमण कर उनका सफाया कर देना चाहिए।‘‘

‘‘राज्‍यों को और अधिकार मिलने चाहिए।‘‘

‘‘अमरीका और संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद्‌ के साथ मिलकर योजना बननी चाहिए।‘‘

‘‘मैं समझता हूं एक संघीय जांच एजेंसी गठित हो।‘‘

तकरार और बहस के बीच आजादी की लड़ाई देख चुके बाबूजी चुपचाप बैठे थे। किसी ने पूछा, ‘‘बाबूजी, आप चुप क्‍यूं हैं, बताइये आतंकवाद से निपटने के लिए क्‍या किया जाए?‘‘

बाबूजी ने एक गहरी श्‍वास ली और बोले, ‘‘सिर्फ राजनीतिक दृढ़ इच्‍छा शक्‍ति चाहिए...........।‘‘

अब सभी चुप थे।

वोट

‘‘सर, आज मुझे एक घण्‍टे की छुट्टी मिलेगी?‘‘

‘‘ छुट्टी! किसलिए?‘‘

‘‘सर, आज पार्लियामेन्‍ट के लिए पोलिंग है ना..........‘‘

‘‘तो.........? यू नो, प्राइवेट कम्‍पनी में छुट्टी नहीं होती।‘‘

‘‘आई नो सर। इसीलिए तो एक घण्‍टे की छुट्टी ही मांग रहा हूं। परिवार वालों को साथ लेकर अपना वोट डालकर आ जाऊंगा।‘‘

‘‘ओ.के., पर जल्‍दी आना।‘‘

‘‘सर, आप नहीं जाएंगे वोट करने।‘‘

‘‘नो, नेवर।‘‘

‘‘लेकिन सर, वोट तो हमारा अधिकार है.......‘‘

‘‘बट आई डोन्‍ट नीड।.........एक वोट के लिए कौन इतनी दूर उस गन्‍दी प्राइमरी स्‍कूल में जाए.......... और इतनी लम्‍बी लाईन में खड़े रहना........ आई कान्‍ट ............. ए.सी. छोड़कर ............ नेवर............‘‘

‘‘बट सर, एक-एक वोट कीमत होता है डेमोक्रेसी में........‘‘

‘‘नेवर माइंड, कोई फर्क नहीं पड़ता.......... ये जीते या वो.........पिसना तो जनता को ही है...............‘‘

साहब के ए.सी. कमरे से बाहर निकलते वह सोच रहा था - ऐ कितने ही पढ़े-लिखे वोट नहीं करते.... इसीलिए तो जनता को पिसना पड़ता है..........।

पहचान

राजनीतिक धुरंधरों ने सामाजिक सोच में नया क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है। समाज को मानव समूहों के स्‍थान पर जाति समूहों में बदल दिया है। कल ही चाय की थड़ी पर मिले कुछ लोक बतिया रहे थे -

‘‘नमस्‍ते, आपका परिचय ?‘‘

‘‘जी, मैं जाट हूं।‘‘

‘‘अच्‍छा और आप?‘‘

‘‘मैं गुर्जर.....‘‘

‘‘मुझे मीणा कहते हैं....‘‘

‘‘मैं ब्राह्मण हूं...‘‘

‘‘ये सज्‍जन मराठी हैं।‘‘

‘‘ये श्रीमान्‌ बिहारी हैं।‘‘

‘‘ये बंगाली हैं....‘‘

‘‘और ये....................‘‘

मैं खड़ा सोचता रहा। मेरी असली पहचान क्‍या है.......... व्‍यक्‍तिगत नाम..........एक भारतीय...... या ........................!

 

संवेदना

आज आन्‍दोलन को आठ दिन हो गए हैं। प्रदेशभर में जगह-जगह धरने, प्रदर्शन हो रहे हैं, रास्‍ते जाम हो रहे हैं, रेल की पटरियां उखाड़ी जा रही हैं। राजनीतिज्ञों को अपनी कुर्सी और वोट की चिन्‍ता है तो आन्‍दोलनकारियों को अपनी मांगें मनवाने के स्‍वार्थ की फिक्र।

रोज हाथठेले से माल ठोकर मजदूरी कमाने वाला भोला आठ दिन से बेकाम बैठा है, उसके बच्‍चों को दो वक्‍त की रोटी भी नसीब नहीं हो रही। मजदूरों की कच्‍ची बस्‍ती में मातम-सा छाया है। बन्‍द रास्‍तों के कारण श्रीवास्‍तव जी की दोनों लड़कियां कैरियर के लिए आवष्‍यक परीक्षा नहीं दे पाने के कारण व्‍यथित हैं। समाचार मिला है कि गांव से ट्रेक्‍टर में बैठकर शहर के स्‍कूल जा रहे बच्‍चों को बन्‍द का रौब दिखाकर मारा-पीटा गया और ट्रेक्‍टर में आग लगा दी गई। मंडी में सब्‍जियों के दाम आसमान छूने लगे हैं। हजारों यात्री ट्रेनें रद्‌द होने से स्‍टेशनों पर फंसे हुए हैं। चारों ओर आमजन हैरान-परेशैन है।

आन्‍दोलनकारी रेल की पटरियों और राजमार्ग पर डेरा डाले, अलाव के ताप में छक कर खा-पी रहे हैं और ढ़ोल-नगाड़ों की ताल पर खुशी से नाच-गा रहे हैं। टी.वी. पर यह सब दृश्‍य देखकर लगता है शायद्‌ मानवीय संवेदना कहीं खो गई है।

 

प्रतिमा

चौराहे पर सैंकड़ों लोग अनशन कर रहे थे। एक समाजसेवी भाषण दे रहे थे-‘‘साथियों, आज हम सब सरकार और स्‍थानीय प्रशासन से यही मांग कर रहे हैं कि हमारे श्रद्धेय महापुरूष की प्रतिमा यहां चौराहे पर लगाई जाए। प्रतिमा लगने से लोगों को उनके जीवन से प्रेरणा मिलेगी, बच्‍चों को उनके बारे में जानने-समझने का अवसर मिलेगा। हम सब प्रतिवर्ष यहां महापुरूष की जयंती पर भव्‍य कार्यक्रम आयोजित करेंगे, प्रतिभावान बच्‍चों को पुरस्‍कृत करेंगे..................................।‘‘

उसी शहर में एक प्रमुख मार्ग पर स्‍थित उद्यान में एक अन्‍य महापुरूष की प्रतिमा लगी हुई है। आज उनकी जयंती भी है, किन्‍तु वहां कोई भव्‍य आयोजन तो दूर कोई माला पहनाने भी नहीं आया है।

 

भ्रष्‍टाचार-1

गांधी भवन पर आज सैंकड़ों लोग जमा हुए हैं। भ्रष्‍टाचार के खिलाफ धरना है। लोग हाथों में तख्‍तियां लिए हाथ उठा-उठाकर भ्रष्‍टाचार के विरूद्ध नारे लगा रहे हैं। प्रेस और मीडिया के तमाम लोग आ गए हैं। धरने का नेतृत्‍व कर रहे कार्यकर्ता गांधीजी की मूर्ति पर पुष्‍पहार पहना रहे हैं। फोटो खींची जा रही है, विविध चैनल के मीडियाकर्मी इन्‍टरव्‍यू ले रहे हैं।

लगभग दो घण्‍टे चले इस धरना कार्यक्रम के बाद लोग अब लौट रहे हैं। एक ओर धरने के अग्रणी कुछ लीडर बतिया रहे हैं। एक ने कहा-‘‘देखा भाई साहब, हमारे इतने प्रयासों के बाद भी इतने लोग ही इकट्‌ठा हो पाये हैं।‘‘ दूसरा बोला-‘‘जनता को तो जैसे इस सबसे कोई मतलब ही नहीं है।‘‘ तीसरा लीडर बोला-‘‘अब क्‍या करें, हमें तो यह सब करना ही पड़ता है, राजनीति में जिन्‍दा जो रहना है।‘‘

भ्रष्‍टाचार-2

वे आज बड़ी जल्‍दी में हैं। सामाजिक कार्यकर्ता हैं, अनेक संगठनों से जुड़े हुए हैं। आज भ्रष्‍टाचार के विरूद्ध विशाल रैली का आयोजन है। उसी में सम्‍मिलित होने के लिए जा रहे हैं। रास्‍ते में किसी काम से रूकना है, जल्‍दी में अपनी कार गलत जगह पार्क कर देते हैं। ट्रैफिक वाले क्रेन से कार उठाकर ले जाने लगते हैं। वे दौडकर उन्‍हें रोकते हैं। ट्रैफिक सिपाही बताता है कि चार किलोमीटर दूर स्‍थित थाने से पांच सौ रूपये जुर्माना देकर कार छुड़ानी होगी। वे सिपाही के पास जाते हैं और चुपके से सौ रूपये का नोट उसकी जेब में डाल देते हैं। कार छूट जाती है और वे समय पर रैली में पहुंच गए हैं।

कुछ देर बाद ही वे रैली को संबोधित करते हुए कह रहे हैं-‘‘...... अब प्रत्‍येक जन को जाग जाना है, हमें भ्रष्‍टाचार और भ्रष्‍टाचारियों का साथ कदापि नहीं देना है। ...... भ्रष्‍टाचार को खत्‍म करने के लिए हमें आज यह संकल्‍प लेना है कि हम न तो रिश्‍वत लेंगे और न ही कभी भी किसी को रिश्‍वत देंगे।..................‘‘

-उमेश कुमार चौरसिया

24.4.11

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परिचय विवरण

1. नाम ः- उमेश कुमार चौरसिया

2. पिता का नाम ः- श्री राम दयाल चौरसिया

3. शिक्षा ः- बी.कॉम., एल.एल.बी., एम.ए. (हिन्‍दी)

4. जन्‍म तिथि ः- 03 जनवरी, 1966

5. सम्‍प्रति ः- माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्‍थान, अजमेर में सेवारत

6. विधा ः- प्रमुख विधा- नाटक लेखन - निर्देषन - अभिनय

अन्‍य विधाएं- लघुकथा, कविता, व्‍यंग्‍य व गीत लेखन

7. प्रकाशित ः- दस नाट्‌य कृतियां व चार संपादित पुस्‍तकें प्रकाषित, विविध राष्‍ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं एवं इन्‍टरनेट पत्रिकाओं में लघुकथाएं, व्‍यंग्‍य, लेख व कविताएं निरंतर प्रकाषित, दूरदर्शन व आकाशवाणी के लिए निरन्‍तर लेखन

8. पुरस्‍कार-सम्‍मान ः-1. अखिल भारतीय युवा साहित्‍यकार सम्‍मान-2005 2. गणतत्र दिवस समारोह में जिला स्‍तर

पर रंगमंच के क्षेत्र में कार्य के लिए सम्‍मान-2009 3. अजयमेरू सांस्‍कृतिक समारोह में कला साधक सम्‍मान-2006 4. ‘नन्‍हीं हवानाटक राज्‍य में प्रथम पुरस्‍कार से पुरस्‍कृत व चार अन्‍य नाटक राज्‍य स्‍तर पर पुरस्‍कृत । श्रेष्‍ठ नाटक निर्देशन/अभिनय के लिए अनेक बार पुरस्‍कृत। 10 वर्ष से बाल-रंगमंच के लिए कार्य

9. पता ः- 50 महादेव कॉलोनी, नागफणी, बोराज रोड़, अजमेर-305001(राज.)

ई-मेल ः ukc.3@rediffmail.com

सामाजिक दायित्‍व ः-1.सह नगर संचालक, विवेकानन्‍द केन्‍द्र कन्‍याकुमारी, शाखा-अजमेर

2.सहयोगी संपादक ‘राजस्‍थान बोर्ड शिक्षण पत्रिका‘

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सारे जग के शुभचिन्तक,

ये पेड़ बहुत उपकारी।

 

सदा-सदा से वसुधा इनकी

ऋणी और आभारी।

 

परहित जीने-मरने का 

आदर्श हमें सिखलाएँ।

फल देते, ईंधन देते हैं,

देते औषधि न्यारी।

 

छाया देते, औ‘ देते हैं

सरस हवा सुखकारी।

आक्सीजन का मधुर खजाना

भर-भर हमें लुटाएँ।

 

गरमी, वर्षा, शीत कड़ी

ये अविकल सहते जाते,

लू, आँधी, तूफान भयंकर

देख नहीं घबड़ाते।

 

सहनशीलता, साहस की

ये पूजनीय  प्रतिमाएँ।

पेड़ प्रकृति का गहना हैं,

ये हैं श्रृंगार धरा का।

 

इन्हें काट, क्यूँ डाल रहे

अपने ही घर में डाका।

गलत राह को अभी त्याग कर

सही राह पर आएँ।

 

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डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

निकट रेलवे कालोनी ,  सुभाष नगर  , 

शाहजहाँपुर- 242001.  (उत्तर प्रदेश, भारत) 

परिचय 

डा. नागेश पांडेय 'संजय' , जन्म: ०२ जुलाई १९७४ ; खुटार ,शाहजहांपुर , उत्तर प्रदेश . माता: श्रीमती निर्मला पांडेय , पिता : श्री बाबूराम पांडेय ; 

शिक्षा : एम्. ए. {हिंदी, संस्कृत }, एम्. काम. एम्. एड. , पी. एच. डी. [विषय : बाल साहित्य के समीक्षा सिद्धांत }, स्लेट [ हिंदी, शिक्षा शास्त्र ] ; 

सम्प्रति : प्राध्यापक एवं विभागाद्यक्ष , बी. एड. राजेंद्र प्रसाद पी. जी. कालेज , मीरगंज, बरेली . 

बाल साहित्य के अतिरिक्त बड़ों के लिए भी गीत एवं कविताओं का सृजन . प्रतिष्ठित पत्र- पत्रिकाओं में बच्चों के लिए कहानी , कविता , एकांकी , पहेलियाँ और यात्रावृत्त प्रकाशित . रचनाओं के अंग्रेजी, पंजाबी , गुजराती , सिंधी , मराठी , नेपाली , कन्नड़ , उर्दू , उड़िया आदि अनेक भाषाओं में अनुवाद . अनेक रचनाएँ दूरदर्शन तथा आकाशवाणी के नई दिल्ली , लखनऊ , रामपुर केन्द्रों से प्रसारित .

प्रकाशित पुस्तकें

आलोचना ग्रन्थ : बाल साहित्य के प्रतिमान ;

कविता संग्रह : तुम्हारे लिए ;

बाल कहानी संग्रह : १. नेहा ने माफ़ी मांगी २. आधुनिक बाल कहानियां ३. अमरुद खट्टे हैं ४. मोती झरे टप- टप ५. अपमान का बदला ६. भाग गए चूहे ७. दीदी का निर्णय ८. मुझे कुछ नहीं चहिये ९. यस सर नो सर ;

बाल कविता संग्रह : १. चल मेरे घोड़े २. अपलम चपलम ;

बाल एकांकी संग्रह : छोटे मास्टर जी

सम्पादित संकलन : १. न्यारे गीत हमारे २. किशोरों की श्रेष्ठ कहानियां ३. बालिकाओं की श्रेष्ठ कहानियां

        प्यारा घोड़ा

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         घोड़ा है भाई घोड़ा है
         कितना प्यार घोड़ा है
         मुंबई से दिल्ली तक का
         उसने रस्ता जोड़ा है|

         टिक टिक टिक टिक चलता है
         जोर जोर से हिलता है
         जैसे ही मारो हंटर
         कूदे और उछलता है
         उछलकूद करने में ही
         घर का मटका फोड़ा है|

         पल में चेन्नई पहुंचाता
         उड़कर कोलकाता जाता
         आसमान में उड़ते ही
         फर फर फर फर फर्राता
         मेरे विश्वासों को भी
         कभी न उसने तोड़ा है|

         जहां हुई मेरी इच्छा
         पल भर में पहुंचा देता
         गुल्ली टुल्ली अम्मू से
         तुरत फुर‌त‌ मिलवा देता
         दादा दादी चाचा से
         मीठा रिश्ता जोड़ा है|

          दूध मलाई खाता है
          हँसता है मुस्काता है
          जैसे देखे रसगुल्ला
          खाने को ललचाता है
          खड़े खड़े ही बेचारा
          सो लेता वह थोड़ा है|

       कहीं कहीं पर अड़ जाता
      सब पर भारी पड़ जाता
      नहीं मानता कहना फिर‌
      कसकर जिद्द पकड़ जाता
      कभी कभी तो गुस्से में
      खाना पीना छोड़ा है|

      मैं उसको नहलाती हूं
      प्रतिदिन तेल लगाती हूं
      सुबह शाम ताजे जल से
      उसका मुंह धुलवाती हूं
      उसकी साफ सफाई में
      लगता साबुन सोड़ा है|


    घोड़ा बहुत भला है ये
    मुझको अभी मिला है ये
    जैसे खिलते राज कमल‌
    वैसा खिला खिला है ये
    दुनियां के सब घोड़ों से
    सबसे न्यारा घोड़ा है|

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दिल मेरा सम्हाले नहीँ सम्हले, 
ऐसा हुआ ना सनम कभी पहले ।
  दिल मेरा ये मेरा नहीँ लगता, 
इसपे जोर भी मेरा नहीँ चलता, 
क्या जतन करुँ कैसे ये सम्हले । 
ऐसा हुआ ना सनम कभी पहले ॥ 
 
अब ख्वाबोँ मेँ आने लगे हो,  
आग दिल मेँ लगाने  लगे हो,  
तेरी बातोँ से अब नहीँ बहले । 
ऐसा हुआ ना सनम कभी पहले ॥ 
 
बोलो कैसे फरेब दूँ मैँ इसको, 
कभी दे ना सका जो मैँ किसी को, 
क्या करुँ कैसे पगला ये सम्हले ।
ऐसा हुआ ना सनम कभी पहले ॥ 
 
नादाँ है हकीकत ना समझे, 
चाँद मांगे ये कीमत ना समझे, 
शायद ठोकर लगे तो ही सम्हले । 
ऐसा हुआ ना सनम कभी पहले ॥             
 
(मिलन चौरसियाः मऊःउत्तर प्रदेश )

ग़ज़ल

अब शाहों का सिंहासन, जल्‍दी थर्राने वाला है,

मिजाजे आम हैं बिगड़ा, बवंडर आने वाला है।

 

बड़ी ही देर से सही, मगर आवाज तो आई,

यहाँ उजले लिबासों में छिपा हर हाथ काला है।

 

हया बेच कर खाई, अमीरों और वजीरों ने,

तमाशे हैं यहाँ सस्‍ते, मगर महगाँ निवाला है।

 

हमें ठंडा समझने की, तुमने कैसे की गुस्‍ताखी,

जवां हैं मुल्‍क हिन्‍दोस्‍तां, अभी तनमन में ज्‍वाला है।

 

जाओगे अब कहाँ बचकर, यहीं पर टेक लो माथा,

यहाँ आवाम मस्‍जिद हैं, यहाँ जनता शिवाला है।

 

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कवि परिचय-

नाम - सुमित शर्मा

जन्मतिथि - 31 जनवरी 1992

पता - तहसील चौराहा,गायत्री कालोनी,

खिलचीपुर, जिला- राजगढ़(म.प्र.)

शिक्षा - बी.ई.-तृतीय वर्ष (कम्‍प्‍यूटर साइंस) अध्‍ययनरत

साहित्‍यिक रचनाएँ - चलती रहेगी मधुशाला(काव्‍य) , रिश्ते(उपन्‍यास), 35 कविताएँ/गजलें, लघु कहानियाँ । (सभी अप्रकाशित)

‘‘ दोस्‍तों , हमारा देश महान है, जहां अनेक महापुरुषों ने जन्‍म लिया है। वहीं पक्षियों की बात करने वाल सलीम अली की जन्‍मभूमि भी यह भारत है; जिन्‍होंने पक्षी विज्ञान पर अनेक पुस्‍तकें लिखी हैं। संसार में ऐसे देश भी हैं। जिनमें पशु-पक्षियों पर मुकदमा चलाया गया है।'' चेतना ने सभा का प्रारम्‍भ करते हुए कहा ।

‘‘ बिल्‍कुल सही कहा चेतना ने , हमारे देश के हरियाणा और राजस्‍थान में रहने वाले विश्‍नोई सम्‍प्रदाय के अनेक लोग वनों तथा पशुओं की रक्षा के लिए अपने प्राणों तक को तिनके के समान मानते थे। जब जोधपुर नरेश ने अपने महल के निर्माण के लिए लकड़ी प्राप्‍ति हेतु वृक्षों को काटने की आज्ञा दी तो उनकी आज्ञा के विरुद्ध विश्‍नोई सम्‍प्रदाय के करीब 300 स्‍त्री-पुरुषों ने ‘‘ पहले हमारे शरीर को काटो,, फिर पेड़ काटना'' कहते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। धन्‍य थे वे लोग।'' उपदेश ने बताया ,

-उपदेश भैया की बात सुनकर अगर आज के मानव को देखते हैं; तो उस समय की और आज की स्‍थिति में जमीन- आसमान का अंतर पाते हैं।'' प्रेरणा ने कहा।

-‘‘ प्रेरणा , अंतर तो है। आज का मानव पेड़ों की अंधाधुंध कटाई किए जा रहा है। एक के बाद, दस के बाद सौ, सौ के बाद हजार काटता जा रहा है। उसे चिन्‍ता नहीं हमारे पर्यावरण की; कि वह कितना असंतुलित हो गया है। पृथ्‍वी का आवरण घटता जा रहा है। हमारी पृथ्‍वी का तापमान भी बढ़ गया है।'' शिखर ने कहा।

बच्‍चों की सभा चल ही रही थी; कि तभी वहां घूमते हुए दादा जी आ गए। दादा जी को देखकर सभी बच्‍चे उठ खड़े हुए।

‘‘अरे ,बैठो-बैठो बच्‍चों, जरा मैं भी तो जानूं। किस बात पर विचार-विमर्श चल रहा है?''

‘‘ दादा जी , कितने आश्‍चर्य की बात है; कि प्‍शु और मानव दोनों की ही रचना भगवान ने एक साथ की है। लेकिन मनुष्‍य बहुत बदल गया है।'' चेतना ने कहा।

‘‘ बिल्‍कुल ठीक कहा तुमने चेतना। बच्‍चों, इस मनुष्‍य ने अपने स्‍वार्थ के लिए सभी मर्यादाओं को तोड़ दिया है। विश्‍व कल्‍याण की बात भुलाकर मानव अब सिर्फ अपने कल्‍याण की बात करने लगा है। वर्षों आगे तक की सुविधायें अभी से जुटाने लगा है।'' दादा जी ने बतलाया।

‘‘मनुष्‍य को ऐसा करते देखकर जंगली प‍शु-पक्षी और पेड़ क्‍या सोचते होंगे? उनकी दृष्‍टि में आज का मानव कितना गिर गया होगा दादा जी?'' मिलन ने पूछा ,

‘‘ बेटी, यह तो सच है कल ही स्‍वप्‍न में पीपल दादा मुझसे कह रहै थे; कि पशु जहां आज तक नहीं बदले , जंगल में शेर भी शिकार के बाद दूसरे पशुओं से भाईचारा रखता है। वहीं मनुष्‍य ने स्‍वार्थ में आकर सभी मर्यादायें भुला दी हैं। पता नहीं क्‍या करेगा आज का मानव? उसे ओजोन परत में हो गए इतने विशाल छिद्र की भी चिन्‍ता नहीं। सोचो क्‍या होगा मानव जाति और प्रकृति के संतुलन का?''

''बच्‍चों, इसके बाद कि पीपल दादा कुछ और कहते, तुम्‍हारी दादी मां ने मुझे जगा दिया। तब से मैं यही सोच रहा हूं, कि इस मानव का भविष्‍य क्‍या होगा?'' दादाजीने कहा।

-अच्‍छा दादा जी! अब हम सबको चलना चाहिए। देर हो रही है।, चेतना ने सभी से कहा।

इसके बाद सभी अपन-अपने घर चले गए।

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सम्‍पर्कः-दुबौला-रामेश्‍वर पिथौरागढ़

हिंदुस्तान में बहुत पहले हर घर में गाय रखी जाती थी। और आज किसी-किसी घर में गाय मुश्किल से मिल पाती है। गाय भले ही मुश्किल से मिलती हो लेकिन हर घर में अब चाय रखी जाती है। कोई बिरला ही घर होगा जहाँ चाय न हो। मिले न मिले वह दूसरी बात है। पहले गाय थी और अब चाय है। इसका मतलब यह नहीं है कि जहाँ गाय होगी वहाँ चाय नहीं होगी। फिर भी जब हर घर में गाय थी तब हिंदुस्तान में चाय नहीं थी। और आज चाय है तो हर घर में गाय नहीं है। कुछ विद्वान इसमें कुछ रहस्य होने की बात करते हैं। इनका मानना है कि कहीं न कहीं कोई लिंक जरूर है। यह गुत्थी विद्वानों के लिए छोड़कर हम आगे बढ़ते हैं और अपने समझ की बात बताते हैं।

गाय से जितने फायदे थे। उतने चाय से नहीं है। गाय से कोई नुकसान नहीं था। लेकिन चाय से नुकसान भी है। फिर भी समय की बात है। आज चाय का समय है। पहले गाय का था। आज जिस घर में दूध नहीं भी होता है वहाँ भी चाय मिल जाती है। हिंदुस्तान में गाय-भैंस नहीं भी रहेंगी तो भी चाय मिलेगी। केवल काली नहीं दूध वाली भी। यहाँ जुगाड़ से दूध जो बन जाता है। खड़िया घोलकर।

गाँव से लेकर शहर तक चाय की पहुँच है। बहुत से गांवों में तो चाय, चाय न रहकर चाह हो गई है। चाह न मिलने पर बहुतों की आह निकल जाती है। छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़े भी इसके दीवाने हैं। बच्चे क्या करें उन्हें तो आज माँ का भी दूध मुश्किल से नसीब होता है। इसलिए ही दूध से ज्यादा चाय पसंद करते हैं।

कई तरह की चाय यानी टी प्रचलन में है। जैसे डे टी, नाइट टी, मोर्निंग टी, नून टी, आफ्टर नून टी, इवनिंग टी। इसके अलावा बीएम टी (बिफोर मील टी), एएम टी (आफ्टर मील टी), बेड टी, टोइलेट टी, बाथरूम टी आदि। पीने वाले पीते हैं।

कहाँ तक बताएं कुछ लोग एक बार पीते हैं। कुछ लोग दो बार और कुछ लोग बार-बार पीते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें चाय नुकसान करती है। नुकसान भले करती हो लेकिन पीते जरूर हैं। भले ही बिना दूध के या बिना चीनी के अथवा नमक मिलाकर पिएँ। कुछ लोग साधारण तो कुछ लोग असाधारण यानी स्पेशल पीते है। कुछ लोग देखकर, कुछ लोग दिखाकर और कुछ लोग छुपकर तो कुछ लोग छुपाकर भी पीते हैं।

कुछ लोग नहीं भी पीते हैं। कुछ लोग अपने घर पर नहीं पीते हैं। बाहर पीते हैं। शर्मा जी का कहना है कि चाय नुकसानदायक तथा लाभदायक दोनों हो सकती है। इनका मानना है कि चाय पीना पड़े तो लाभदायक और पिलाना पड़े तो हानिकारक होती हैं। कहते हैं कि मैं चाय नहीं पीता हूँ। लेकिन कोई पिलाना चाहे तो पी भी लेता हूँ। किसी का आग्रह ठुकराना किस भलमानुष का काम है ?

शुक्लाजी चाय चौकन्ने होकर पीते हैं। पीते समय ही कोई आ न टपके। यह चिंता लगातार बनी रहती है। जैसे आहट मिलते ही कुत्ते भौंकने लगते हैं। वैसे ही ये किसी की आहट पाते ही चाय पीना बंद कर देते हैं। छुपाकर रख देंगे। बाद में ठंडी ही सही पर खुश होकर पी जाते हैं। पत्नी कभी कह दे कि गर्म कर देती हूँ तो कहते हैं कि गर्म चाय नुकसान करती है। गैस खर्च होगी तो जाहिर सी बात है नुकसान तो होगा ही। चाय में मक्खी गिर जाय तो न ही चाय छोड़ते हैं और न ही मक्खी को। मक्खी फेंकने से पहले उसे चूस लेते हैं।

तिवारीजी सुबह के समय टहलने निकलते हैं। टहलते-टहलते एक दो चाय किसी न किसी के घर से रोज पी जाते हैं। एक बार किसी ने कहा कि चीनी थोड़ी कम हो गई है तो बोले कि चीनी का क्या करना है। बस गर्म होना चहिये। दरअसल आदत बस बोल गए कि चीनी का क्या करना है ? जब भी पत्नी चीनी लाने को कहती है तो यही कहते हैं। गर्म से ही मतलब हो तो खौलाकर पानी ही पी लिया जाय तो सेहत भी ठीक रहे ।

गाँव-शहर, कस्बों, बाजारों, गलियों, चौराहों आदि पर चाय आसानी से मिल जाती है।

दो रुपए से लेकर चालीस-पचास और सैकड़ों रूपये कप वाली चाय पी और पिलाई जाती है।

चौराहों-नुक्कडों के चाय की दुकानों पर भीड़ देखते ही बनती है। यहीं पर देश और समाज का भविष्य तय किया जाता है। सरकारें बनायी और बिगाड़ी जाती हैं। राजनीतिक पार्टियों व राजनेताओं के भविष्य की घोषणाएं की जाती हैं। कभी-कभी गाली-गलौज और मार-पीट तक की नौबत भी आ जाती है। जहाँ इतने अहम फैसले और मुद्दे होंगे। वहाँ यह सब तो आम बात है। संसद और विधानसभाएं इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि अरे उनकी बात न करो। दरवाजे पर चले जाओ तो एक कप चाय भी नहीं पिला सकते। लेकिन मेरे यहाँ से कोई बिना चाय पिए वापस नहीं जा सकता। बड़े भाई प्रधान हुए हैं। चीनी मुफ्त में उठा लेते हैं। कोटे की आधी चीनी इसी ओर आती है।

कई लोग किसी-किसी को बड़ी उम्मीद से चाय पिलाते हैं। उम्मीद पर पानी फिर जाने पर पछताते हैं और कहते हैं कि हमारे पास फालतू पैसा थोड़े था। लेकिन सोच रहा था कि काम करा देंगे। सैकड़ों चाय गटक गए। और आज साफ मुकर गए कि यह हम से नहीं हो पायेगा। कई लोग इसी गलतफ़हमी का शिकार होते हैं। और दूसरे मजे में चाय गटकते जाते हैं।

कई लोग इसी इंतजार में रहते हैं कि कोई चाय पिलाने वाला मिल जाता तो चाय पी लेते। कोई न मिले तो बहुत मायूस होकर लौट आते हैं और सोचते हैं कि आज का दिन खाली चला गया। कई लोग तो चाय पीते समय उठना भी भूल जाते हैं। चाहे जितनी देर हो रही हो, लेकिन टस से मस नहीं होते। कोई न कोई मसला छेड़ते रहेंगे। कभी–कभी तो ऐसा लगता है कि कुल्हड़ भी चट कर जायेंगे। उसमें कुछ बचा हो अथवा नहीं, उसे चूसते रहेंगे। लेकिन जब तक किसीके सब्र का बाँध टूट नहीं जायेगा, कदापि नहीं उठेंगे। इस स्थिति में कई बार मेरे सब्र का बाँध टूटा है। आखिर कुछ रूपये बचाने के चक्कर में कब तक बैठा रहा जाय ?

कुछ लोग काम के समय में बार-बार चाय पीकर आराम फरमाते हैं। और धन्यवाद देते हैं चाय शुरू करने वाले को। इनका कहना है कि चाय न होती तो काम करना मुश्किल हो जाता।

चाय-पीते बतलाते, समय पास हो जाता है। कोई पूछे भी कि कहाँ हैं ? तो लोग यह जानकर कि चाय पीने गए हैं, कोई खास बुरा नहीं मानते। सोचते हैं कि देर-सबेर आ ही जायेंगे।

एक बार एक लड़की को चाय के कारण लेने के देने पड़ गए। ससुराल में नई-नई आई थी। पति ने चाय बनाने को कहा। लड़की ने चाय बनाया और जैसे ही आकर बोली कि ‘टू कप टी--------’। एक सजिल्द किताब आकर उसके कनपटी से टकराई। और जब तक शोर सुनकर पड़ोस के दो-चार लोग इकट्ठा हुए लड़की धराशायी हो चुकी थी। पति महोदय जो लिखते थे। भले ही लेखक नहीं थे। बोले जा रहे थे तू कपटी, तेरा बाप कपटी, तेरे मामा-नाना, माँ-बहन, भाई सब कपटी। तेरा पूरा खानदान कपटी। हम काहे को कपटी। अभी दो दिन भी आये नहीं हुए और तेरी ये मजाल !

काफी का प्रचलन बढ़ने से चाय की अहमियत थोड़ी कम हुई है। फिर भी हिदुस्तान में चाय, पानी के साथ जुड़ गई है। पहले लोग किसी के आने पर कहते थे कि पानी-वानी पिलाओ। अथवा पानी-वानी पिए कि नहीं। और अब वानी के जगह पर चाय आ गई है और पानी से पहले बोल-चाल में अपना स्थान बना ले गई है। अब लोग चाय-पानी पीने-पिलाने की बात करते हैं। पानी-वानी का मतलब होता था ठंढा पानी पीकर ठंढे मन से वानी का प्रयोग यानी मधुर वानी से स्वागत-सत्कार, हाल-चाल पूछना आदि। लेकिन चाय ने वानी को पानी से सिर्फ जुदा ही नहीं किया बल्कि वानी यानी जिह्वा को जलाया भी। ऐसे में मधुर-वानी का अभाव लाजिमी है। वैज्ञानिक भाषा में इसे कहा जाता है कि चाय में उत्तेजना लाने वाला पदार्थ कैफीन होता है और चाय से लोगों में उत्तेजना आती है। भला बताइये उत्तेजना में कहीं मधुर-वानी निकल सकती है क्या ? बात एक ही है कहने के तरीके अलग हैं। आप खुद सोचिए कि जली जीभ से जली बात नहीं निकलेगी तो क्या अमृत में सनी बात निकलेगी ? यही कारण है कि मधुरी वानी ग्रंथों और संतों के प्रवचनों व नसीहतों तक ही सीमित होकर रह गई है। और घर-बाहर सभी जगह सबको जली-कटी बातें ही सुनने को मिलती है।

कई लड़के किसी लड़की को अपनी ओर हँसते देख, चाहे लड़की उसी पर हँस रही हो, चाय के लिए विनम्र निवेदन कर देते हैं। लड़की चाय के लिए तैयार हो जाय तो इसे अपना सौभाग्य समझते हैं और कापी-किताब खरीदने के लिए अथवा फीस के लिए जो पैसा होता है। उसे भी गवाँ बैठते हैं। और बाद में लड़की को भी।

चाय का बहुत महात्म है। एक ओर जहाँ कितने ही लोग चाय पीकर और पिलाकर बर्बाद हो गए हैं। वहीं दूसरी ओर कई लोग ऐसे भी हैं जो चाय पीकर और पिलाकर बन गए हैं।

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डॉ एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/

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बूढ़ा के लिए खेत था। सोलह आना सच यह था कि वह दो सौ वर्ग गज का प्‍लाट था, उसके 25-25 वर्ग गज के आठ क्‍यार बनाये हुये थे। क्‍यार-क्‍यार न्‍यारी फसल उगी थी। चना, जौ, गेहूं, गजरा, पालक, धनिया मैथी। आठवें क्‍यार में बूढ़ा की झोपड़ी थी।

प्‍लाट के तीनों ओर बिल्‍ड़िंगें बनी हुई थीं। सामने तीस फीट की सड़क थी। हवा पानी दोनों इसी राह आते थे, बूढ़ा के लिए। गेट के नाम पर बबूल की छाजन का फाटक था। आड़, चाहे बाड़ हो।

प्‍लाट के आये दिन खरीददार आते। बढ़-चढ़कर मोल भाव करते। बूढ़ा से जिदयाते-‘‘बाबा, अकेले जीव हो। बावली बात छोड़ो। दाम बोलो। दाम पकड़ो।‘‘

बूढ़ा खुद्‌दार। बूढ़ा जज्‍बाती। बूढ़ा खानदानी। बेलाग कहता-‘‘शरीर का सौदा साई, होवै छै कांई।''

बूढ़ा 74 वर्ष की अपनी अवस्‍था को गिनता गामता तक न था। वह अपने क्‍यारों में निलाई करता। खोदी करता। पानी बलाता। खुद अपनी रोटी पानी करता। रात हुई। झोंपड़ी में बिछी खाट पर लेट जाता। रात गहराने लगती। बूढ़ा अतीत की स्‍मृतियों में गुम होने लगता। अतीत और आज, दो धु्रवों की तरह थे, आज। आकाश, चांद-सितारों को नापता बूढ़ा अपनी झोल खाट पर गोल हुआ सो जाता, आसमान में परवाज भरने वाला पंछी अपने घोंसले में पंख समेट कर बैठता है।

एक दिन बूढ़ा उठा। शरीर अकड़ा था। बूढ़ा बुखार जकड़ा था। लाइन के दूसरी ओर बूढ़ा की दादालाई थी। वहाँ खबर कराई गई। बूढ़ा के कुटुम्‍ब के लोग आये। बूढ़ा की सेवा सुश्रूषा की। दवा दारु हुई।

बूढ़ा को सीख दी गई-''बाबा, बीमारी बुढ़ापा की बैरन होती है। सांस रोकती है। सांस ही शरीर की गाड़ी है। सांस थमी, देह माटी हुई। तुम्‍हारे बेटे को फोन कर देते हैं, साथ चले जाना उसके।''

बूढ़ा कुहनी तक हाथ जोड़, मुआफी सी मांगते ‘‘ना'' कह देता-‘‘बूढ़ा और बालक की चाम नाजुक हौवे छै। हवा, पानी जल्‍दी लाग जावै। कभी साज, कभीं नासाज। किसट तो माकी काया भोगेली।''

एक हवा उड़ी। हवा गली-गली दस्‍तक देती गई कि बूढ़ा का जी उठ खड़ा हुआ है। वह प्‍लाट बेचकर अपने बेटे के पास जाएगा। देखें किसके जोग हैं।

हवा में रंगत आ गई। बीमार बूढ़ा के पास आने वालों का तांता लगा रहता; मरणासन्‍न कीट को कीरियां घेर लेती हैं। जिनका कोसों खोज नहीं था, वे तन के लत्त्ो से बूढ़ा के करीबी हो गये थे। खैरियत जानना जरिया रहा, साध बूढ़ा का खेत थी। बगुला इधर उधर गर्दन घुमाए, टकटकी मछली पर होती है।

दवा का असर होता गया। बूढ़ा बीमारी से उबरता गया।

बूढ़ा ने बड़ों का सुना गुणा। खाट पर अच्‍छा भला बीमार हो जाता है। डोलते फिरते से पांव मोकले होते हैं। देह खुलती है।

उसने चादर की बुक्‍कल मारी। साफा बांधा। जूतियां पहनीं। बूढ़ा ने लाठी नहीं पकड़ी थी, अभी। लाठी निकाल ली थी, झोंपड़ी से। शरीर कांपता-हांफता है। सरसरी है। माथा घूमता है। लाठी सहारा देगी।

बूढ़ा ने फाटक भिड़ाया और सड़क पर उतर गया था। भरकम सा एक हाथ बूढ़ा के कंधे पर गिरा। बूढ़ा चौंका। बूढ़ा ठिठका। छोहभरा बूढ़ा पीछे मुड़ा। चौथी गली में रहने वाला पंजाबी था।

उसकी वय पचपन से टपी न होगी। सिर, भौंहे और हाथ पैर सफेदी उतर आई थी। बूढ़ा के मूंछों ढके होंठ बुदबुदायें कि वह खुद बोल पड़ा था-‘‘बुढ्‌ढे़ बाबा पवनदास पंजाबी हाँ असी। चौथी गली विच रहंदे हाँ, उत्‍थो ही दुकान हन, साढी।‘‘

चप्‍पा-चप्‍पा बूढ़ा के पांव चस्‍पा था। किशोर केरसिंह, आज जग की जुबान बूढ़ा' है। वह और उसके जोड़ीदार कबड्‌डी खेला करते थे, वहां।

‘'बोल कांई छै?'' बूढ़ा के कंठ तुर्शी थी।

‘‘पलाट दा कि मांगदे हाँ, तुसी?''

‘‘घर का गूदड़ा।''

‘‘हुं। दसो-दसो।''

बीमारी में क्रोध, बारूद में तीली। बूढ़ा ने संयम बरता- ‘‘कह दी ना ना' बेंचू।'' बूढ़ा की ना' में दुत्‍कार भी थी, फटकार भी थी।

बूढ़ा का जी आगे तक टहल कर लौटने का था। कॉलोनी में कहाँ क्‍या नया हुआ है, देखने की उसकी जिज्ञासा थी। वह अपनी खाट पर आ लेटा था।

मुट्‌ठी में दबी रेत का कण-कण निकालता है। खूड़-खूड़ हाथ से निकल जाने की व्‍यथा बूढ़े को मथने लगी। बूढ़ा की खतौनी आठ खेत थे। सौ बीघा जमीन थी, पक्‍की। तीन बरस अकाल पड़ा। बीस बीघा जमीन बेच दी, चारे के मोल। खुद खाया। पशुओं को खिलाया।

बेटे की कोचिंग। बेटे का लगातार बाहर जाकर पढ़ना, बेटे का यादगार ब्‍याह। पत्‍नी का झेरे में गिर कर मरना। पुलिस का बाज बन जाना। पत्‍नी का मौसर। अड़ी हुई, जमीन निकाल दी, मानो जमीन नहीं, गुल्‍लक के पैसे हो।

अन्‍तर्वेदना लहरों की हिलौरों सी उठती। बूढ़ा खुद को सांत्‍वना देता। अपने पूर्वजों को मानो ढांढस बंधाता-‘‘सब कुछ बेच कर भी कुछ गंवाया नहीं है मैंने। अपने पास जो टुकड़ा है, उसका रोकड़ा, उस सगली जमीन से घना है, आज। बूढ़ा आकाश में खिले तारों की तरह खिलखिलाता उसके खेतों पर शहर बस रहा है।

एक घटना ने उसे उद्‌वेलित किया।

एक खेत बंजड़ पड़ा था। झाड़ झंखाड़ उगा था। कीकर, बबूल खड़ी थी। लोमड़, सियार, भेड़िया जैसे डरावने जानवर खोंखियाया हुंकियाया करते थे। आज एक बड़ा स्‍कूल खड़ा हो गया है वहाँ। सेठ, साहूकार रइसों, शहजादों के बालक मोटर में बैठ कर पढ़ने आते हैं, दूर-दूर से।

स्‍कूल टकटकाता बूढ़ा अवचेतन में चला गया था। वह भीतर जाकर उस खोह को देखना चाहता था, जहां भेड़िये के मुंह पर लाठी मारकर उसने लहूलुहान बकरी को छुड़ाया था।

जुनूनी बूढ़ा आगे बढ़ा। गेट पर बैठी चपड़ासन ने डण्‍डा ठठकार दिया था-‘‘ताऊ किस जागा? छोरा छोरी पढै़ सै के थारा इस सकूल में?''

बूढ़ा का अंतस तनतनाया-‘‘कह दूं। मुंह को लगाम दे बाई। किसका खेत है, बैठी चाकरी करती है तू।''

बूढ़ा का मन कभी उन खेतों में, तो कभी उन पर उगे कंकरीट के जंगल में विचरण कर रहा था कि प्‍लास्‍टिक के पाइप से पानी कूदने लगा था, गल्‌ल गल्‌ल। फुर्र फुर्र। गल्‌ल गल्‌ल। हवा और पानी भरा पाइप कुचले सांप की तरह छटपटा रहा था।

तबियत बहाल होते ही बालक का मन खेल खिलौनों में लग जाता है, बूढ़ा अपने क्‍यार में जा खड़ा हुआ था। कुरते की बांह संगवाये था, कुहनी तक। धोती के खूंट अडूंसे थे, घुटनों तक। रूमाल उतार कर एक ओर रखा था। हाथ में खुरपी थी। नंगे पैर थे, सिंचते खेत जूती चप्‍पलें नहीं चलतीं।

‘‘बाबा। बूढ़ा बाबा। बाबा साहब। ओ बाबा।''

बूढ़ा के उम्र पके कान ऊँचा सुनते थे। बीमारी के बाद और क्षीण हो गये थे।

बूढ़ा के भोथरा कानों से शब्‍द टकराये। उसने खुरपी वाले हाथ को जमीन में रोप सा दिया था, जैसे। दूसरा हाथ गोड़े पर रखा और उठ खड़ा हुआ, बूढ़ा बैल थान से उठा हो, थूथन जमीन पर टिका कर। देखा। चश्‍मा के भीतर आंखें छपछपाईं। सधाईं। बूढ़ा को गुस्‍सा आया। उसकी खाट पर आ बैठा कौन बेशऊर है।

उसने चश्‍मा की दोनों डण्‍डी कानों पर ठीक की। निगाह बांधी। खाट पर बैठे शक्‍स को पहचान लिया था। वही वकील जी थे, जो बूढ़ा की बीमारी के टेम आये थे बूढ़ा की खाट पर बैठकर उसका बुखार देखा था। आत्‍मीयता से बतियाते थे। बाप का नाम जाना था। खेत की नाप पूछी थी।

वकील ने बूढ़ा की ओर देखा। उसके गीले पैर जमीन छपते आये थे। खुरपी वाले हाथ से रेत मिट्‌टी टपक रहे थे। उन्‍होंने बूढ़ा को नमस्‍कार कर पूछा-‘‘बाबा अब तबियत कैसी है, आपकी? हिदायत दी-‘‘पानी में मत रहो, आराम करो।''

झबरीली मूंछों के भीतर बूढ़ा मुस्‍कराया-‘‘जीते जी आराम कांई वकील जी।'' बूढ़ा के नेत्रों में विभोर उतर आया था।

बूढ़ा यानि केरसिंह मोटियार था। भौंरे के रंग जैसी स्‍याह मूंछों के ताव चढ़े छोर बैलों के सीगों की तरह आसमान देखा करते, उमरदराज भैंसे के माथे पर लुढ़के सींगों की भांति उसकी धोली मूंछें ठोड़ी पर पड़ी थीं। बूढ़ा का गीली मिट्‌टी और पानी भरा हाथ मूंछों पर आ बैठी मक्‍खी को उड़ाने लगा था। गंदलाई एक बूंद मूंछों के बालों से रिपसती छोर पर थिर गई थी। वकील हंसे।

उन्‍होनें ने बूढ़ा को विश्‍वास में लिया -‘‘बाबा साहब, साठ फीट के रोड़ पर जो ट्रांसफार्मर है ना, उसके दो प्‍लाट आगे इमली का पेड़़ है एक, उसी से दूसरा प्‍लाट है, मेरा।''

दूसरो या तीसरो?''

‘‘तीसरा नहीं दूसरा बाबा।''

‘‘जको आगो अबार बनो छै, अर बुच लाग्‍योड़ी छै?''

‘‘तांत्रिक हो बाबा।''

बूढ़ा बोला-‘‘वकील जी वैण्‍डे हमने अपनो बैल दबायो छो, बीस बोरी नमक मेल।‘‘ बूढ़ा के कंपकंपाते होंठों के साथ मूंछें भी कांप गई थीं।

वकील का जी सा निकल गया था। मुंह खुला का खुला रह गया था, बया सा। अण्‍डर ग्राउण्‍ड खोदते पशु कंकाल निकला था, वहां।

बूढ़ा ने बानगी भर बताया था। इमली के पेड़ की बात अंदर रख ली थी। कहता, वह पेड़ उसने अपने हाथों लगाया था, ऐन आजादी के दिन। वहां झाड़ियां थीं। बोर थे। बुरट थे। निकलो, कपड़ों पर चिपक जाते थे, बुरी तरह। खेत की डोल डोल निकलते थे।

बूढ़ा को गुमदाया देख, वकील ने यकीन दिलाया-''बाबा साहब, वह आदमी आला काला नहीं है। मैं बीच में हूं ही। चिंता मत करो।''

अर्द्ध बधिर बूढ़ा हुं हाँकर अपने क्‍यारों की ओर बढ़ गया था, नल चला जाएगा।

वकील का स्‍कूटर फाटक के बाहर बस्‍ता बांधे खड़ा था। एक गाय मुंह उठाती फाइलों की ओर बढ़ गई थी। उधर दौड़ते वकील ने बूढ़ा की ओर हाथ हिलाया। जवाब में बूढ़ा ने भी हाथ हिला दिया था। वकील गदगद हुए-‘‘बाखड़ भैंस देर से पोसाती है, बूढ़ी अकल विलम्‍ब से बावड़ी।''

बूढ़ा बीमार हुआ, उस दिन से साग सब्‍जी बेचने नहीं गया था। पालक, मैथी, चना का साग बड़ा हो रहा था, क्‍यारों में। बूढ़ा ने तोड़ चूंट सागपात का मिला' कर लिया था, पोटली भर।

बूढ़ा सौ फीट सड़क के जिस नुक्‍कड़ पर सब्‍जी लेकर बैठा करता, वह बरकत की ठोर थी, जैसे। यहां सब्‍जी की पोटली उतारते ही उसके जेहन में पानी भरे बादलों की भांति कुछ घुमड़ता। कभी दो कुआं की सब्‍जी, भेली (इकट्‌ठा) होती थी, यहाँ। बैलगाड़ी सब्‍जी मण्‍डी नहीं जाती थी। चिल्‍लपोह, भीड़-भड़ाका, बैल चमकते चौंकते थे। तांगा ले जाया करते थे।

एक जना बूढ़ा के सामने आ खड़ा हुआ था। बूढ़ा ने पोटली खोलकर साग में हाथ मारा-‘‘आओ बाबू साब ताजा साग छै, अपना खेत को। चार रुपये पाव देऊंलो।''

लंबे तगड़े बदन पर ढ़ीला ढंकल सा कुरता पाजामा पहने 35 के उस आदमी की पुतलियों में कुछ और ही दिपदिपा रहा था। हल्‍की सी खंखारी ली - ''बूढ़ा बाबा, अपना प्‍लाट का भाव बताओ थै, तो।''

बोनी बट्‌टा हुआ नहीं कि...। बूढ़ा धधका। बूढ़ा चमका। बूढ़ा ने होंठ से जीभ काटी-‘‘साग की बात कर बाबू, पिलाट विलाट ना बेचूं, मैं।''

बूढ़ा एक ग्राहक को साग तोल रहा था। उचंती सा एक दलाल आया। बैठा। उसने आव देखा न ताव बैग की चैन खींची। सौ-सौ के नोटों की तीन गडि्‌डयां बूढ़ा के साग पर बिछा दी थीं। पूरे तीस हजार थे। उसकी सूझ थी, प्‍लाट या मकान बेचने वाले के सामने रकम बिछा दो। नोटों की गरमी जमे घी की तरह पिघल जाएगा वह। गरुर से कहने लगा-‘‘बूढ़ा बाबा, पाव-पाव कांई बेचो। पिलाट का दाम बोलो। रोकड़ा लो।''

बूढ़ा की नस नस में ज्‍वाला उतरी थी। रौआं रौआं उठ खड़ा हुआ था। मूंछों के बाल हुंचकने लगे थे। बूढ़ा को लगा जैसे किसी ने उसके भीतरले (हृदय) को खूनमखून कर दिया है, सरेराह।

चीते में भी इतनी चपलता ना हो। कट्‌टे में पड़ा चाकू निकाल कर बूढ़ा झट खड़ा हो गया था। उसने दलाल के सीने पर चाकू रख दिया था-‘‘बोल, थारा कालजा को कांई लाग्‍यो?''

सिंह शावक सा कुलांचे भरता दलाल का उत्‍साह, चूहे जैसे भय में परिणित हो गया था। उसकी आंखें बाहर निकल आई थीं। गिरीं, अब गिरीं। चेहरा फक्‍क पड़ गया था। दलाल अपने पैसे समेट कर भीगी बिल्‍ली सा चला गया था। झुंझल बूढ़ा की झुर्रियों में झूलती रही थी। तमाशबीन दांतों तने उंगली दबाये थे, बूढा कि शोला।

बूढा का मन उचट गया था। हृदय चोट खाई गेंद की नाई उछल-बैठ रहा था। काला रंग का एक सांड खड़ा हुआ था। बुढ़ऊ पर,, जिजीविषा लिए। बूढ़ा उठा और उसके सामने साग की धोती झड़का दी थी।

सड़क के दोनों किनारे मंजिल पर मंजिल बनती जाती थी। दुकानें व शापिंग सेंटर खुले थे। बूढ़ा अपना धोती कट्‌टा लिए उन्‍हें अपलक निहारता चला जाता था। आह भरता, उसी के खेत हैं।

मोड़ था। एक महिला बूढ़ा के सामने घिर गई थी।

नाराजगी भरे अंदाज में वह बूढ़ा से बोली-‘‘बाबा, म्‍हारा पिसां कांकरा था कांईं।‘‘ दूसरां ने पलाट बेच दियो।''

बूढ़ा छोह से बिगड़ा-‘‘कै ससुरा ने बेच दियो पिलाट? कै साला ने खरीद लियो‘‘ बता तो।

‘‘मरद मरण नै मर जाएगो, मन की थाह ना देगो।''

वह साड़ी का पल्‍लू सिर पर लेती फुच्‍च फुच्‍च थूक फुचकती आगे बढ़ गई थी।

बूढ़ा अपने खेत से बाहर निकलता। ‘‘खेत बिकाऊ नहीं हैं।'' अपनी अनगढ़ लिखावट में कागज या गत्त्ो पर लिख उसे बंद फाटक पर टांक देता। लौटता, कागज या गत्ता नदारद मिलता। हवा ले जाती। गाय मुंह भर जाती। कचरा बीनने वाले झटक ले जाते।

बुढ़भस को एक नई सूझी। उसने गेट पर तीन चार तसला रेत डाल दिया था। बूढ़ा रेत को अपनी हथेली से एकसार करता। उंगली से गहरी लकीर खींचता और ‘‘खेत बिकाऊ नहीं है।'' मांड देता, टेढ़ा मेढ़ा।

बूढ़ा वापस आता। उसका तन-बदन जल उठता। वह इबारत भांति-भांति के खोजों से रौंदी मिलती।

बूढ़ा अपने खेत के सामने ठिठक गया था। कलेजा धक्‌ रह गया था। सांसें कपाल जा लगी थीं। फाटक खुला था। पुलिस की गाड़ी बाहर खड़ी थी। बड़े-बड़े खोज अंदर की ओर थे। खेत की नाप जोख हो रही थी। डी.वाई.एस.पी. खुद फीता पकड़े थे।

खातेदार बूढ़ा हो या बालक, उसमें मालिकाना अहम्‌ होता है। बूढ़ा ने बाट-तराजू का कट्‌टा नीचे पटका। धोती खाट पर फेंकी। बूढ़ा बंदर की फुर्ती लिए लपका और पुलिस अफसर के हाथ से फीता झटक लिया था-‘‘मरां को माल छै कांई, फीतो डल रहो छै?''

पुलिस अफसर खड़ा रह गया था, सट्‌ट। तैशभरी आंखें बताईं-‘‘एडवांस नहीं लिया, तुमने?''

‘‘कै ससुरा ने लियो एडवांस? कै साला ने करो कागज पे गूंठो?'' बूढ़ा ने उसांस छोड़ी।

उन्‍होंने स्‍टाम्‍प पेपर की फोटो कापी निकाल कर पूछा-‘‘तुम्‍हारा नाम केरसिंह सैनी है?''

‘‘हुं।''

वल्‍द भगवानाराम?'

‘‘हुं।''

उम्र 74 वर्ष?''

‘‘हुं।''

प्‍लाट नं. 53?''

‘‘हुं।''

''साइज दो सौ वर्ग गज?''

‘‘हुं।''

‘‘हुं-हुं-हुं। बाबा साहब, बूढ़ों पर यकीन करना धर्म मानते हैं। आप हैं कि पांच हजार एडवांस लेकर गिरगिट हो गये।''

‘‘कांईं ससुरा ने पाई भी ली, खट्‌टाराम की सों। ‘‘सच्‍चाई बूढ़े की आंखों में नमी के रूप में उतरी थी।

गेंद पानी में डुबाओ, उछल कर ऊपर आती है। पुलिस अफसर का क्षोभ दबाये नहीं दबता था। उनका मन हुआ था। टोकरे की खपच्‍चियों जैसी पसलियों के ढांचे इस डोकरे को गाड़ी में पटक कर ले जाए और भांग उगाने का केस बनाकर इसकी बुढ़ौती बिगाड़ दे। चवन्‍नी की चमक में चाकर का चेहरा या उसके हुक्‍काम था। बूढ़ा के अफसर बेटे का ख्‍याल कर उन्‍होंने अपना फीता समेट लिया था।

बूढ़ा ने अपनी नम आंखें पोंछी। फाटक को बंद करते हुए अपने बेटे को दाद दी-‘‘मेरो बेटो खट्‌टाराम बड़ो अफसर छै। फोन माले धरती धूजे। ना तो दो पैरां का जानवर मुनै मोस मीस कदी का खेत डकार जाता।

पुलिस अफसर अपनी गाड़ी के पास आकर खड़े हो गये थे। वे वकील को बुलाकर बूढ़ा से रू-ब-रू होना चाहते थे, बयाना के बाद भी मूकर क्‍यों? दफ्‍तर से उनका मोबाइल आ गया था। चलो, बाद में बात करते हैं, कसाई का माल पाड़ा खाने से रहा।

जग जवर कर रहा है बूढ़ा का सिर घूम रहा था। धोंकनी बढ़ गई थी। मोटियार केरसिंह कभी बीस फीट फौरा कूद जाता था, बूढऊ डग-डग, झोंपड़ी तक पहुंचा। बल्‍ली पकड़ ली थी। शरीर में रीढ़ की हड्‌डी की तरह छान को रोके खड़ी शीशम की यह बल्‍ली बूढ़ा की हमउम्र थी। किसान अपने खेत खानाबदोश हो जाया करता है। जहां फसल उगाई, झोंपडी डाल ली। झोंपड़ी किसानी की निशानी। झोपड़ी बूढ़ा का आशियाना। बल्‍ली हमसफर। बल्‍ली पर रखी झानें, शरीर से पुराने कपड़ों की तरह उतरती रहीं। बल्‍ली वही रही।

सांस जुड़ी कि बूढ़ा खाट पर बैठ गया था। बिस्‍तर तले कागज जैसा कुरकुराया। बूढ़ा ने बिस्‍तर तहा कर देखा। हाथ लिखा दस रुपये का स्‍टाम्‍प था। नीचे दो दस्‍तखत थे। मजमून नोटरी पब्‍लिक से सत्‍यापित था। बूढ़ा को डंक सा लगा।

कॉलोनी बूढा को जिंदादिल कहती। बूढ़ा खुद को बड़ा हेकड़ मानता था। उसकी डरी सहमी बूढ़ी आंखें कागज नहीं पढ़ पा रही थीं। बिंब बनता कि शब्‍द फिसल जाते, मानो शब्‍द नहीं पारा हो, न चुटकी में, न मुट्‌ठी में।

विपदा की घड़ी, साहस संबल। चश्‍मा की डण्‍डी पकड़े बूढ़ा कागज पर लिखा पढ़ गया था, शब्‍द-शब्‍द।

राजफाश।

उसका हाथ खाट पर रखी प्‍लास्‍टिक की थैली पर गया। कागज पर पांच हजार मंडे थे, वही थे। बूढ़ा को पसीना छूटा।

आक्रोश, भर्त्‍सना और धिक्‍कार से बूढ़ा की गर्दन हिलती रही।

डोकरा हूं, न। अकेला हूं, न। दफन कर दो, बिन कफन।'

वकील का लंबोतर चेहरा बाघ के मुंह सा भयानक और खाऊं लगा, बूढ़ा को। बीमारी के टेम, वकील ने उसके पेट में घुसकर बातें पूछी थी। खेत में खडे़ पुलिस अफसर ने तस्‍दीक कर दी थी। बूढ़ा की आंखों में धरती आसमान घूमने लगे थे।

बूढ़ा झटके से उठा। उसने रुपये और कागज धोती-बंध में बांधे। साफा पहना। लाठी ली। लाठी पर बूढ़ा की मुटि्‌ठयां कसती गई थीं।

सांझ उतर रही थी। दीया बाती का वक्‍त होने को था। आग का भभूका सा बूढ़ा खेत ना बेचूं, खेत ना बेंचू' बर्राता वकील के घर के सामने जाकर रूका। उसने घंटी के बटन पर उंगली दबाई, घंटी नहीं, टेटुंआ हो।

घंटी कुकडूं कू,कुकडूं-कू,कुकडूं-कूं बोली। झबर वालों वाला एक कुत्ता लपक कर आया। वह बूूढ़ा को भूंकता गेट नोंचने लगा था। बूढ़ा ने ठोरा मारा। कुत्ता डर कर दीवार के साथ जा लगा था।

लुंगी बांधे। कुरता गर्दन में डालते हुए वकील बाहर निकले। बूढा को देख बाग-बाग हुए। वकील की अकल। अक्‍खड़ बूढ़ा खुद गेट पर है।

वकील ने एक सुखद आह ली-‘‘वकालत तो यूं ही टुच्‍च-टुच्‍च है। धंधा प्‍लाटों की दलाली। दो थोक पचास हजार आएंगे।‘‘

गेट खोलते हुए वकील बूढ़ा से मुखातिब हुए-‘‘बाबा साहब, स्‍टाम्‍प पर निशान लगाया था, वहां दस्‍तखत कर दिये न, आपने?''

बूढ़ा ने अडूंस खोली। स्‍टांप की चिंदी-चिंदी कर वकील पर फेंकी दीं। रूपये की थैली सामने पटकी।

उसने गेट पर लाठी ठकठकाई- ‘‘वकील छौं ना। केरसिंह पागल कोनी, कालजो बेच दे अपणों।‘‘

बूढ़ा लाठी उठाये, वकील ने गेट बन्‍द कर लिया था।

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रचनाकार परिचय:

रत्‍नकुमार सांभरिया

जन्‍म - 06.01.1956 (छः जनवरी, सन्‌ उन्‍नीस सौ छप्‍पन)

गाँव - भाड़ावास, जिला - रेवाड़ी (हरियाणा) पिछले 30 वर्षों से राजस्‍थान में।

शिक्षा - एम.ए.बी.एड., बी.जे.एम.सी. (पत्रकारिता में डिप्‍लोमा)

कृतियां - समाज की नाक - एकांकी संग्रह

बांग और अन्‍य लघुकथाएँ - लघुकथा संग्रह

हुकम की दुग्‍गी - कहानी संग्रह

काल तथा अन्‍य कहानियाँ - कहानी संग्रह

खेत तथा अन्‍य कहानियाँ- कहानी संग्रह

दलित समाज की कहानियाँ - कहानी संग्रह

प्रतिनिधि लघुकथा शतक - लघुकथा संग्रह

मुंशी प्रेमचन्‍द और दलित समाज - आलोचना

डॉ. अम्‍बेडकर ः एक प्रेरक जीवन - संपादन

सृजन - लगभग 250 कहानियाँ, लघुकथाएँ,

पुस्‍तक समीक्षाएँ और लेख प्रकाशित।

‘‘मै जीती'' कहानी पर टेलीफिल्‍म ।

कहानियों एवं लघुकथाओं का

रेडियो नाट्‌य रूपान्‍तर प्रसारित।

शोधकार्य- कहानियों एवं लघुकथाओं पर विभिन्‍न

विश्‍वविद्यालयों से 12 शोधार्थी शोधरत

सम्‍मान - नवज्‍योति कथा सम्‍मान, ‘‘आखेट'' कहानी पर।

- सहारा समय कथा चयन प्रतियोगिता-

2006 में पुरस्‍कृत, ‘‘चपड़ासन'' कहानी

के लिए उपराष्‍ट्रपति द्वारा सम्‍मानित।

- कथादेश अखिल भारतीय हिन्‍दी कहानी

प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्‍कार-

‘‘बिपर सूदर एक कीने'' कहानी पर

- राजस्‍थान पत्रिका सृजनात्‍मक

पुरस्‍कार-2007 ‘‘खेत'' कहानी पर

संप्रति - राजस्‍थान सूचना एवं जनसम्‍पर्क सेवा के

वरिष्‍ठ अधिकारी, सहायक निदेशक (प्रचार)

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संपर्क - भाड़ावास हाउस, सी-137, महेश नगर,

जयपुर-302015,

जीवन क्रम

 

बचपन गुजारा

खेले में, मेले में,

मां की झोली में

बाप की बाहों में

यौवन गुजारा

प्‍यार की मस्‍ती में

वंश की वृद्धि में

आर्थिक समृद्धि में

अधेड़ अवस्‍था गुजारी

बच्‍चों के विवाह में

उनके परिवार में

घर के संसार में

वृद्धावस्‍था गुजारी

अवहेलना में, उपेक्षा में

दर्द में इलाज में

गुजरे हुए इतिहास में

भूल गये हम

नश्‍वर संसार को

प्रभु के नाम को

मृत्‍यु के सत्‍य को

जीवन के अंत को

मोक्ष की राह को

प्‍यार

प्‍यार का कोई भी मजहब नहीं होता

प्‍यार की कोई भी भाषा नहीं होती

प्‍यार में कुछ भी असंभव नहीं होता

प्‍यार में कोई भी बंधन नहीं होता

प्‍यार मौत से कभी डरता नहीं

प्‍यार मौत से कभी मरता नहीं

प्‍यार में लुट जाती है सल्‍तनतें

प्‍यार में बन जाते है ताजमहल

प्‍यार जीवन का सुरीला गीत है

प्‍यार सांसों का मधुर संगीत है

प्‍यार यौवन का मधुमास है

प्‍यार ईश्‍वर का एक वरदान है

मैंने देखा है

धर्म के नाम पर मैंने

धर्म को ही मिटते देखा है

जातिवाद के विषधर को मैंने

देश की अखंडता को डसते देखा है

एक संतान की चाहत में मैंने

रात भर, बांझ को, सिसकते देखा है

आतंक की दहशत में मैंने

बंद तालों में खौफ देखा है

ताजमहल के कब्रखाने में

हथकटे मजदूरों की रूहों को देखा है

सात फेरो की पवित्र कसमों को

व्‍यापार में बदलते देखा है

देश के रहनुमाओं के हाथों मैंने

देश को ही बिकते देखा है

गुनाह की दुनिया के दरिंदों को

ऊंची कुर्सियों पर बैठे देखा है

मेहनतकश फौलादी हाथों में मैंने

मेरा भारत महान देखा है

हम तुम न बन सके

हम तुम न बन सके

तुम हम न बन सके

फासलों की दूरियां कभी न कम हुई

ना तुम बदल सके, ना हम बदल सके

वफा तेरी पे हम

गिला न कर सके

वफा मेरी पे तुम यकीं न कर सके

ना हम तुम्‍हें समझ सके, ना तुम हमें समझ सके

यूं जिंदगी भर हम

साथ साथ चले

विश्‍वास के आधार को शक ने निगल लिया

ना तुम संभल सके, ना हम संभल सके

समझौतों का प्‍यार

कभी न टिक सका

प्‍यार की दूरियां कभी ना कम हुई

ना तुम निभा सके, ना हम निभा सके

काश बहु बेटी बन पाती

घर में दीवारें ना खिंचती

महाभारत दोहरायी ना जाती

रामायण में विभीषण ना होता

सोने की लंका ना जलती

काश बहु बेटी बन पाती

मात-पिता की ममता

चौराहे पर खड़ी ना होती

खून के रिश्‍ते पानी ना होते

प्‍यार की रीत निभाई होती

काश बहु बेटी बन पाती

अग्‍नि के फेरों की कसमें

काश तुम्‍हें याद आई होती

भूल के सारे कर्म धर्म को

विष की बेल लहराई ना होती

काश बहु बेटी बन पाती

शकुनी की चौसर ना बिछती

घर में नये षडयंत्र ना होते

बेटी की कभी कमी ना खलती

काश बहु बेटी बन पाती

पक्षी

चल पंछी कहीं दूर चलें

आदमी जिस बस्‍ती में रहता हो

चैन से तुम कहां रह पाओगे

जड़ से ही जब काट देंगे पेड़ को

घोंसले तेरे कहां बच पायेंगे

हर पल कोलाहल हो जहां

प्‍यार के फिर गीत कहां गा पाओगे

बंधनों में आ गये एक बार तुम

फिर कहां आजाद तुम रह पाओगे

सीख लोगे शैतानियत इंसान से

मासूमियत वसीयत में नहीं दे पाओगे

मजहबी सरहदों में बंट गया जंगल तेरा

चैन से तुम मर भी नहीं पाओगे

--

कविता

नीड़

नीड़ उजड़ जाने से पंछी,

शोक नहीं मनाते हैं।

पंख जिनकी ताकत है,

वो फिर से नीड़ बनाते हैं,

नीड़ उजड़ जाने से पंछी......

कटा अँगूठा एकलव्‍य का,

गुरु मंत्र सिखलाता है।

हिम्‍मत जिनकी पूंजी है,

वो मंजिल को पा जाते हैं।

नीड़ उजड़ जाने से पंछी......

धीरज के तट से टकराकर,

सब तूफान मिट जाते हैं।

मेहनतकश इंसान के आगे,

देव भी शीश झुकाते हैं।

नीड़ उजड़ जाने से पंछी......

भाग्‍य भरोसे रहने वाले,

मिट्‌टी में मिल जाते हैं।

तूफानों से जूझने वाले,

स्‍वंय इतिहास बनाते हैं।

नीड़ उजड़ जाने से पंछी......

कविता

तपती धरती (ग्‍लोबल वार्मिंग)

आने वाली संतानों को,

हम क्‍या विरासत में देंगे

तपते मौसम की लपटें देंगे,

पानी को प्‍यासी नदियां देंगे,

जंगल को तरसती धरती देंगे,

ओजोन की सिमटती परतें देंगे।

आने वाली संतानों को......

सीमेंट के कंक्रीट शहर देंगे,

शहरों का कोलाहल देंगे,

हाइड्रोजन बम के गोले देंगे,

आंतकी मानव बम देंगे।

आने वाली संतानों को......

परिवारों में सिमटते रिश्‍ते देंगे,

रिश्‍तों में मिटता प्‍यार देंगे,

शांति को भटकते दिल देंगे।

आने वाली संतानों को......

कविता

तलाक

प्रश्‍नचिन्‍ह जब सम्‍बंधों पर लग जाते हैं,

सात जन्‍म के जीवन साथी पल में दूर चले जाते है

शंका के अकुंश से उपजे,

बीज कहां फल पाते हैं।

सदियों के संस्‍कार हमारे,

पल में रूप बदल जाते हैं।

सात जन्‍म के जीवन साथी...

मन पर हावी इच्‍छाऐं,

जब हो जाती हैं।

सही गलत की सब सीमाऐं,

जाने कहां खो जाती हैं।

सात जन्‍म के जीवन साथी...

विश्‍वासों की आधारशिला,

जब हिल जाती है।

एक नीड़ के दो पंछी,

अलग दिशा को उड़ जाते हैं।

सात जन्‍म के जीवन साथी...

कविता

आशादीप

दुःख अक्‍सर सिरहाने आकर,

चुपके से कह जाता है।

जिस पत्‍थर ने ठोकर मारी,

गले उसे लगाकर देख।

दुःख के बादल जब घिर आये,

साथ अपनों ने छोड़ दिया।

जीवन की आपाधापी में,

गैरों को तू अपनाकर देख।

उम्‍मीदों के अंधियारे में,

आशादीप जलाकर देख।

मंजिल कितनी दूर हो तेरी,

पंखों को फैलाकर देख।

सागर तट से टकराकर,

लहरें, हरदम ये समझाती हैं।

पीछे हटने वाले मुसाफिर,

आगे कदम बढ़कर देख।

कविता

बचपन

ऐ लौट के आ बचपन मेरे,

जब तारों को गिनते गिनते,

बेसुध होकर सो जाते थे।

छोटी छोटी बातों पर हम,

कभी हंसते थे कभी रोते थे।

ऐ लौट के आ बचपन मेरे...

जब दर्द दवा का पता ना था,

मां की झोली बस दुनिया थी।

चंदा को मामा कहते थे,

तारों में हम खो जाते थे।

ऐ लौट के आ बचपन मेरे...

जुगनू का पीछा करते करते,

घंटो हम भागा करते थे।

गुड्डे गुड़िया की शादी में,

दिन रात जश्‍न मनाते थे,

ऐ लौट के आ बचपन मेरे...

रिश्‍तों की दुनिया छोटी थी,

हर रिश्‍तें से प्‍यार निभाते थे।

तेरे मेरे का भेद ना था,

मिल बांट के सब कुछ खाते थे।

ऐ लौट के आ बचपन मेरे...

कविता

आदमी और जानवर

चिड़िया अपने नवजात को,

शेरनी अपने शावक को,

जलचर, थलचर, नभचर सभी,

सिखाते हैं, अपनी संतानों को,

शिकार के गुर, बचाव के उपाय,

जीवित रहने के लिए,

वंश और परम्‍परा को जीवित सौंपते हैं,

एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को,

बिना किसी विद्यालय के,

शिक्षण या प्रशिक्षण के,

एक मनुष्‍य को छोड़कर।

मनुष्‍य संतानों कें लालन पालन में,

भूल जाता है उनको सिखाना,

समाज के नियमों को,

कर्तव्य को, दायित्‍व को,

प्रेम को, बलिदान को,

और उसकी भूल जन्‍म देती है।

स्‍वार्थी को, भ्रष्‍टाचारी को,

अपराधी को, आतंकी को,

मानवता रहित मानव को।

--

कविता

प्‍याला

जब तक उम्र मिली खुदा से,

जश्‍न मना लें प्‍याले में,

आने वाले कल की चिंता,

घोल के पी जा प्‍याले में।

होली की जलती हो ज्‍वाला,

या दीपों की हो माला,

अपना बस त्‍यौहार एक है,

सुबह शाम पी प्‍याले में।

पीने वाले पी जाते है,

सब दुःख दर्द प्‍याले में,

मृत्‍यु के आने से पहले,

खुशी मना ले प्‍याले में।

मन में छुपी सारी बातें,

खुल जाती है प्‍याले में,

चले गये जो इस दुनिया से,

याद उन्‍हें कर प्‍याले में।

धर्म, जाति, भाषा के बंधन,

सिमट जाते है प्‍याले में,

पाप पुण्‍य की सब रेखायें,

मिट जाती है प्‍याले में।

प्राण प्रिये मरने पे मेरे,

पंडित को ना बुलवाना,

पीने वालो को बुलवाकर,

जमके पिलाना प्‍याले में।

काया की माटी का प्‍याला,

भक्‍ति की हो माला,

रामनाम सुमिरन के रस को,

सुबह शाम पी प्‍याले में।

मेरा गांव

भुला दिया उस गांव को हमने,

रचते थे इतिहास जहां,

प्‍यार जिसे करते थे इतना,

ब्‍याहता के मायके की तरह।

भुला दिया..........

तपते सूरज में पनपे हम,

आवारा बादल की तरह,

बैलों की घंटी सुनते थे,

मां की लोरी की तरह।

भुला दिया..........

सांझ ढले नदी किनारे,

प्‍यार के गीत गाते थे,

खुशी ओ गम के अफसाने,

लहरों पर लिख आते थे।

भुला दिया..........

सूरज की आहट से पहले,

पनघट पर गोरी जाती,

आसमान सतरंगी होता,

भवरों की गुंजन होती।

भुला दिया..........

कविता

 

भरी महफिल में,

बहुत देर तक,

सिर्फ सुनते रहना,

और कुछ न कहना,

नामुमकिन तो नहीं,

मगर बहुत मुश्‍किल है।

बिखरे घर को,

बचाने की खातिर,

जोश में आकर,

होश ना खोना,

नामुमकिन तो नहीं,

मगर बहुत मुश्‍किल है।

बेलगाम शब्‍दों के घोड़ों का,

बहुत तेज रफ्‍तार से,

बिना दुर्घटना के,

सही मार्ग पर चलना,

नामुमकिन तो नहीं,

मगर बहुत मुश्‍किल है।

झूठ जब सत्‍य पर,

हावी हो जाये, तब,

सत्‍य के अस्‍तित्‍व को,

मिटाने से बचाना,

नामुमकिन तो नहीं,

मगर बहुत मुश्‍किल है।

कविता

अंकुर से पुष्‍प को,

यौवन से तरूणाई को,

लहरों से ध्‍वनियों को,

सूर्य से रोशनी को,

रोक सकता है, भला इंसान क्‍या?

बचपन से मासूमियत को,

नदियों से उफान को,

मां से ममता को,

पुष्‍प से गंध को,

रोक सकता है, भला इंसान क्‍या?

पेड़ से छाया को,

मेघों से वर्षा को,

वाणी से शब्‍दों को,

नयनों से ज्‍योति को,

रोक सकता है, भला इंसान क्‍या?

नारी से प्‍यार को,

प्रसव से जन्‍म को,

विरह से मिलन को,

जन्‍म से मृत्‍यु को,

रोक सकता है, भला इंसान क्‍या?

कविता

महंगाई

बढ़ती महंगाई,

छीनती है निवाला,

भूखे बच्‍चे के मुंह से,

डूब जाता है कर्ज के बोझ में,

मेहनतकश इंसान,

और आत्‍महत्‍या करता है,

स्‍वाभिमानी अन्‍नदाता किसान।

बढ़ती महंगाई,

जलते चूल्‍हे की आग,

बुझा देती है,

बेबस बाप नहीं बनवा पाता,

टूटे चश्‍मे का फ्रेम,

बच जाते है बस कुछ चिथड़े,

तन ढकने को यौवन गरीब का।

सत्‍ता पक्ष संसद में,

देता है कोरे आश्‍वासन,

विपक्ष सेंकता है राजनीतिक रोटियां,

देश बंद के आह्वाहन से,

करता है शक्‍ति परीक्षण,

कोई नहीं सोचता,

बढ़ती महंगाई।

कविता

वृक्षारोपण

आज कुछ तेज धार,

आरे की मशीनें उतरी,

आज कुछ जीपों से,

शैतान परिंदे उतरे हैं,

आज फिर जख्‍मी होंगें,

जंगल में पेड़ों के सीने,

आज फिर शर्मसार होगी मानवता।

जिंदगी भर,

फल-फूल का तोहफा देने वाले,

तपती धूप में बादल बन,

मां के आंचल का साया देने वाले,

आज फिर जड़ से उखड़ कर,

टुकड़ों में कट जायेगें,

आज फिर धरती की आंखों में आंसू होगें।

अब यहां किसी पंछी का,

न बसेरा होगा,

अब न कभी पेड़ों पर,

आदमी के पूर्वज होंगें,

अब हवाओं में,

न होगी खुशबू फूलों की,

चारों ओर उजड़े हुए गुलशन होगें।

कविता

आधुनिक युग की शवयात्रा

गम की रेखायें,

चेहरे पे नहीं किसी के।

हर कोई अपने अपने,

बस गीत गा रहा है।

पहलू में जिनके हमने,

जिंदगी गुजार दी थी।

जल्‍दी उठाओ अर्थी,

वहीं गुन गुना रहा है।

घर की बगिया का माली,

जो बागवां था कल तक।

अंतिम सफर में देखो,

अकेला ही जा रहा है।

दुनिया के सारे मेले,

रूकते नहीं कभी भी।

मरने वाले बस तू ही,

दुनिया से जा रहा है।

उम्र भर तूने तिनके,

चुन चुन के घर बनाया।

खाली हाथ लेकर,

दुनिया से जा रहा है।

कर्मों की तेरी पूंजी,

बस तेरे संग चलेगी।

दुनिया की सारी दौलतें,

तू छोड़े जा रहा है।

दोहे

‘1'

दुःख के पदचिह्नों की राहें,

छोटी बहुत हुआ करती हैं

अक्‍सर दुःख के चौराहों पर,

सुख ने भी विश्राम किया है।

‘2'

ख्‍वाबों में कोई रंग नहीं है,

जीवन में उमंग नहीं है।

लहरों का सरगम कहता है,

जीवन पतझड़ (है) बसंत नहीं है।

‘3'

गंध फूल की भेद न करती,

मंदिर, मसजिद, गुरूद्वारे में।

आसमान को बांट लिया है,

धर्म के ठेकेदारों ने।

‘4'

मेरी दीवानगी का आलम,

कोई आ के तो देखे।

अपना आशियाना हमने,

काफिर के दिल में बनाया है।

‘5'

जिन्‍हें झुकना नहीं आता,

वो अक्‍सर टूट जाते हैं।

हवाओं के बवंडर में,

तिनके बच जाते है।

‘6'

वो जो सच कहने की जिद करते हैं,

उम्र भर अंधेरों में सिसकते हैं।

दोहे

‘1'

कितने सावन पतझड़ बीते,

कितने आंधी तूफां आये।

मेरे विश्‍वासों को तुम,

खंडित कभी न होने देना।

‘2'

वतन की आजादी में,

दरारें दिख रही हैं अब।

हमारी राजनीति नें,

आस्‍तीन के सांपों को पाला है।

‘3'

तरक्‍की के चिरागों को,

अपनों ने बुझाया है।

दिलों की दूरियों ने अब,

इस घर को जलाया है।

'4‘

धन दौलत ही जब,

पहचान हो इंसान की।

सभ्‍यता के उस दौर में,

सादगी अभिशाप है।

‘5'

मुस्‍कानों का अभिनय,

वो बस करते रहे।

छलक के आंसू पलक से,

राज़ सारा कह गये।

‘6'

वक्‍त रोके से गर रूका होता,

आदमी भगवान बन गया होता।

कविता

जापान में सुनामी

एक जलजला आया,

धरती थरथरायी,

लहरों का कहर बरसा,

पैगामें मौत बनकर।

फौलादी ट्रक तैरते,

खिलौनों से नजर आये,

तांडव वो मौत का था,

जिंदगी की हार बनकर।

कुछ में थी सांसें बाकी,

कुछ लाशों में पड़े थे,

कुछ जिंदा दफन हुऐ,

जल में समाधि बनकर।

फौलादी परमाणु रिएक्‍टर,

लहरों में टिक ना पाये,

सुरक्षा कवच सब टूटे,

मिट्टी के खिलौने बनकर।

घुलने लगी जहर अब,

हवा के कण कण में,

मीलों तक सन्‍नाटा,

मरघट में मौत बनकर।

मेहनत और हिम्‍मत से,

अब वक्‍त फिर बदलेगा,

जापान फिर चमकेगा,

उगता सूरज बनकर।

कविता

मेरी पत्‍नी

आजकल मेरी पत्‍नी,

चन्‍द्रमुखी कम, ज्‍वालामुखी ज्‍यादा है,

आजकल उसकी आंखों में,

प्‍यार कम, नफरत ज्‍यादा है।

आजकल बाहों के घेरों में,

मिलन कम, चुभन ज्‍यादा है,

आजकल मन में उनके,

समर्पण कम, अधिकार ज्‍यादा है।

आजकल एकांत लम्‍हों में,

अपनापन कम, बेरूखी ज्‍यादा है,

आजकल जिंदगी के हर मोड़ पर,

नजदीकियां कम, दूरियां ज्‍यादा है।

आजकल उनकी वाणी में,

फूल कम, अंगारे ज्‍यादा है,

आजकल पति-पत्‍नी के रिश्‍ते में,

मिठास कम, खटास ज्‍यादा है।

आजकल विश्‍वास की नींव में,

पत्‍थर कम, दरारें ज्‍यादा है,

आजकल गृहस्‍थी की गाड़ी में,

स्‍पीड (गति) कम, ब्रेक ज्‍यादा है।

कविता

नींद जब आती नहीं है रातों में,

वो हसीन ख्‍वाबों की बात करते हैं,

पतझड़ में डाल से टूटे, बिखरे पत्‍ते,

वो सावन की बरसात की बात करते हैं।

दिल के उजड़े चमन में जब अंगारें बरसें,

वो पहले प्‍यार की बात करते हैं,

प्‍यार बिकता है जब बाजारों में,

वो शीरी फरहाद की बात करते हैं।

इश्‍क ने कर दिया निकम्‍मा हमको,

वो हमसे कारोबार की बात करते हैं,

दौलत की भूखी इस दुनिया में,

वो सच्‍चे प्‍यार की बात करते हैं।

कविता

बापू लौट के तुम आ जाते

हिंसा अपराधों की नगरी,

पूरा भारतवर्ष बना है,

राजनीति से अपराधी का,

एक नया गठबंधन हुआ है,

बापू लौट के तुम आ जाते।

न्‍याय की तेरी उस लाठी का,

अब तो कोई मोल नहीं है,

जनता के दुःख दर्द को समझे,

ऐसा कोई बापू नहीं है,

बापू लौट के तुम आ जाते।

राजनीति के गलियारों में,

सत्‍य अंहिसा सिसक रहें है,

भ्रष्‍टाचार चरम सीमा पर,

राजनीति में नीति नहीं है,

बापू लौट के तुम आ जाते।

दलित दुःखी की दीन दशा का,

अब कोई हमदर्द नहीं है,

हरिजन के दुःख दर्द को समझे,

ऐसा कोई गांधी नहीं है,

बापू लौट के तुम आ जाते।

कविता

भटकन

मैं जलता ही रहा,

कभी विरह की आग में,

कभी मिलन की चाह में।

मैं छलावे में रहा,

कभी अपनों के,

कभी बेगानों के।

मैं सुनता ही रहा,

कभी पास आते कदमों की आहट,

कभी गुजरते हुए कारवां की आवाज।

मैं सोचता ही रहा,

कभी गुजरे हुए कल को,

कभी आने वाले कल को।

मैं जीता ही रहा,

कभी घुट घुट के मरने के लिए,

कभी मर मर के जीने के लिए।

मैं भटकता ही रहा,

कभी मोह के जाल में,

कभी सत्‍य की तलाश में।

कविता

आजादी के दीवाने

नहीं मिलते नहीं मिलते,

आजादी के दीवाने नहीं मिलते।

जिस आजादी को लक्ष्‍मीबाई ने,

अपने खून से सींचा,

तात्‍या टोपे, मंगल पांडे ने,

अपने प्राणों से सींचा,

वो आजादी के रणबांकुरे,

नहीं मिलते नहीं मिलते।

बिखरे हुए राज्‍यों को,

मिला कर एक कर देना,

इरादों के लौह पुरूष,

सरदार पटेल नहीं मिलते,

नहीं मिलते नहीं मिलते।

मुझे तुम खून दो,

आजादी मैं तुम्‍हें दूंगा,

सुभाष बोस जैसे,

आजाद फौज के सेनानी,

नहीं मिलते नहीं मिलते।

अहिंसा सत्‍य के हथियार से,

जंग जीतने वाले,

महात्‍मा गांधी जैसे अब,

रहनुमा नहीं मिलते।

खुशी से फांसी के फंदे में,

हंस के झूलने वाले,

शहीद भगत सिंह जैसे,

आजादी के परवाने,

नहीं मिलते नहीं मिलते।

कविता

दहेज की बलि

(नव विवाहिता की मौत पर माता पिता की पाती)

गुजारी कितनी रातें हमने,

रो-रो के तुम्‍हारी यादों में,

ना रूके आंसू ना तुम आये,

ना हम खुद को समझा पाये।

खुदा के वास्‍ते इक बार,

तुम आ के देख तो जाते,

हम जिंदा दिखते तो हैं,

मगर लाशों में गिने जाते हैं।

तेरे आने की चाहत में,

हमारी पथरा गयी आंखें,

ओ दुनिया छोड़ने वाले,

कभी वापस तो आ जाते।

मिटा देने से खुद को भी,

अगर तुम लौट के आते,

कभी के मिट गये होते हम,

तुम आ के देख तो जाते।

खुदा तू अपने उसूलों में,

कुछ तबदीलियां तो कर,

जो बचपन में चले जाते,

उन्‍हें वापिस तो भेजा कर।

दोहे

बुढ़ापे में मां बाप को,

बनबास दे देना,

ये कलयुग की रामायण,

समझा गयी हमको।

 

कभी भी झूठ से,

सत्‍य हारा नहीं है,

दिये की टिमटिमाती लौ,

ये बतला गयी हमको।

 

गरीब जनता की आवाज,

जब नेता नहीं सुनते,

क्रांति लीबिया और मिस्र की,

समझा गयी हमको।

 

अपने दिल पे,

मेरा नाम लिख दीजिए,

इस खता की,

फिर कुछ भी सजा दीजिए।

 

तुझे अपना कहने की चाह में,

किसी और के ना हम हो सके,

मुझे चाह बस तेरी रही,

तुझ चाह है किसी और की,

मेरे दिल में है बस तू ही तू,

तेरे दिल में कोई और है,

मेरी जिंदगी की मंजिल है तू,

तेरी मंजिलें कोई और है,

तुझे अपना कहने की चाह में,

जिंदगी गुजारी तुम बिन,

कुछ इस तरह से हमने,

कांटों के गुलदस्‍ते में,

फूलों ने रात गुजारी।

 

-सम्‍पर्क सूत्र

5/3 तेग बहादुर रोड, देहरादून

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यह मात्र संयोग नहीं है कि भारत के विरूद्ध सुपर बग तथा अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा की अमेरिकियों के सस्‍ते इलाज के लिए भारत या मैक्‍सिकों जाने की चिन्‍ता हो, दोनो ही मामलों में भारत के विरूद्ध कुप्रकार की गन्‍ध तो मिलती ही है और साथ ही भारत की धीरे-धीरे बढ़ती ताकत का एहसास भी पूरी दुनिया महसूस कर रही है। ज्ञान के युग में जिस सर्वाधिक संसाधन की आवश्‍यकता होती है वह मानव संसाधन है, जिसकी पूंजी भारत की झोली में नैसर्गिक तौर पर है। उदारीकरण के बाद आई टी की धूम ने भारतीय मेधा की पहचान अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पहली बार कराई। आई टी के साथ-साथ दवा उद्योग, वाहन उद्योग सहित कई उद्योगों ने अन्‍तर्राष्‍ट्रीय पहचान इन बीते 20 वर्षों में देश की मेधा ने बनाई। इन सारे उद्योगों या इनके इतर अन्‍य मामलों में भारत की वैश्‍विक बढ़त का मुख्‍य कारण भारतीय मेधा ही थी। अमेरिका सहित सारे विकसित देश इस उभरती भारतीय क्षमता को हतोत्‍साहित करने का प्रयास नये-नये तरीकों से करते रहते है। अमेरिका द्वारा आऊट सोर्सिंग पर प्रतिबन्‍ध या आऊट सोर्स कराने वाली कम्‍पनियों पर कर वृद्धि का मामला, एच1बी बीजा को आठ गुना महंगा करने का विषय, सुपर बग का कुप्रचार या अमेरिकी नागरिकों का भारत में इलाज के लिए आने का मसला हो, हर तरह से अपनी श्रेष्‍ठता से पीड़ित अमेरिका और अमेरिकी राष्‍ट्रपति भारत को घेरने की हर संभव कोशिश करते दिखते है और भारत को बदनाम कर उसकी व्‍यवसायिक क्षमता की धार को कुन्‍द करने का प्रयास करते है।

अभी आल ही में अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने बर्जीनिया के एक कार्यक्रम में कहा कि मेरी प्राथमिकता होगी कि अमेरिकी जनता सस्‍ते इलाज के लिए मैक्‍सिकों या भारत न जायें। भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य जगत में जबरदस्त प्रतिक्रिया स्‍वाभाविक तौर पर हुई जिसकी अपेक्षा इस खुली और तथाकथित बराबर के मौकों वाली वैश्‍विक अर्थव्‍यवस्‍था में होनी चाहिए थी। प्रतिस्‍पर्धा के लिए समतल मैदान की बातें तथा मुक्‍त अर्थव्‍यस्‍था का पैरोकार अमेरिका लगातार अपने देश की कृषि तथा उद्योगों को अतिरिक्‍त संरक्षण दे रहा है तथा दूसरे अन्‍य संभावना वाले देशों की राह में रूकावट पैदा कर रहा है। यह सच है कि अमेरिका की स्‍वास्‍थ्‍य सेवायें भारत की स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के मुकाबले कई गुना मंहगी है। अमेरिकी राष्‍ट्रपति अपने यहॉ ‘हेल्‍थ केयर रिफार्म पैकेज' से काफी उम्‍मीदें लगाये बैठे है जिसके अनुसार अमेरिका में इलाज आम आदमी की पहुॅच के अन्‍दर आ जायेगा। अमेरिका के स्‍वास्‍थ्‍य सेवायें निजी हाथों में है तथा यह काफी महंगी है। जो आम जनता की पहुंच से काफी बाहर है। अमेरिका में भारत के सापेक्ष इलाज 10 से 15 गुना तक महंगा है। अमेरिकन मेडिकल एशोसियेशन के एक अनुमान के मुताबिक अमेरिका में भारत के मुकाबले हार्ट बाईपास 13 गुना, हार्ट वाल्‍व बदलना 16 गुना, एन्‍जियोप्‍लास्‍टी 5 गुना, कूल्‍हा प्रत्‍यारोपण 5 गुना, घुटना प्रत्‍यारोपण 5 गुना तथा स्‍पाइनल फ्‍यूजन लगभग 11 गुना महंगा है। अमेरिका में स्‍वास्‍थ्‍य बीमा महंगे होने के कारण लगभग 4 करेाड़ लोग बिना बीमा के जीवन यापन कर रहे है। पूरे देश में महंगी स्‍वास्‍थ सेवाओं के कारण अमेरिकी राष्‍ट्रपति सवालों के घेरे में है। अत खर्चों में कटौती की बात कर स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं को सस्‍ता करने का प्रयास भारत की किफायती और उच्‍चस्‍तरीय स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं को लांक्षित करके नहीं किया जा सकता है।

भारत में स्‍वास्‍थ्‍य सेवायें निजी क्षेत्र में आधुनिक और उच्‍च स्‍तरीय होती जा रही है तथा भारत की छवि ‘मेडिकल टूरिज्‍म' के क्षेत्र में उत्‍तरोत्‍तर सुधरती जा रही है। पिछले वर्ष भारत में लगभग 6 लाख विदेशी अपने इलाज के लिए भारत आये थे तथा इस वर्ष इस आकड़े में और वृद्धि की संभावना है। अपने देश में एक तरफ इलाज स्‍तरहीन तथा अनुपलब्‍ध है। वहीं दूसरी ओर निजी क्षेत्र के अस्‍तपताल ‘मेडिकल टूरिज्‍म' की संभावना केा ध्‍यान में रखकर अपना स्‍तर तथा उपलब्‍धता बढ़ाते ही जा रहें है। पिछले वर्ष अपोलों अस्‍तपताल में अकेले 60,000 के आसपास विदेशी मरीज अपने इलाज के लिए आये थे जिनमें अमेरिका और यूरोप के लगभग 20 प्रतिशत मरीज थे। मैक्‍स अस्‍पताल तथा फोटिंर्स अस्‍पताल में भी क्रमशः 20,000 तथा 6,000 विदेशी मरीज अपने-अपने इलाज के लिए यहॉ आये थे जिसमें लगभग 20 प्रतिशत मरीज अमेरिका और यूरोप से आये थे। देश में विदेशी मरीजों के कारण लगभग 4,500 करोड रूपये की आय हुई थी। देश के सभी निजी अस्‍पताल इन विदेशी मरीजों की संभावनाओं के कारण अपना वैश्‍विक विस्‍तार कर रहे है, उच्‍च स्‍तरीय सुविधायें मुहैया करा रहे है, दूसरे देशों के प्रमुख अस्‍तपतालों के सहयोग का अनुबन्‍ध कर रहे है, सूचना/सुविधा केन्‍द्र खोल रहे है तथा इन्‍टरनेट का भरपूर इस्‍तेमाल कर रहें हैं। इस तरह भारत में किफायती और अच्‍छा इलाज उपलब्‍ध होने की संभावनाये वैश्‍विक स्‍तर पर धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। अतः स्‍वाभविक ही है कि अच्‍छा और किफायती इलाज दुनियॉ में जहॉ भी उपलब्‍ध होगा ‘ग्‍लोबल विलेज' का नागरिक उस ओर ही रूख करेगा। ‘मेडिकल टूरिज्‍म' की बढने के साथ ही देश के लोगों की नौकरियॉ और व्‍यवसाय की संभावनाये भी बढ़ती जायेगी। इस समय सूचना केन्‍द्र/सुविधा केन्‍द्र का व्‍यवसाय, टेलिमेडिसन का व्‍यवसाय, विदेश मरीजों के लिए गेस्‍ट हाउस, दुभाषियों के सुनहरे मौके, अस्‍पताओं का विस्‍तार और दवा उद्योग का विस्‍तार, दवा के दुकानदारों की वृद्धि, हर देश के नागरिक की रूचि के अनुसार भोजन का व्‍यवसाय तथा मेडिकल इन्‍श्‍योरेन्‍स के व्‍यवसाय की वृद्धि लाजिमी है। भारत का निजी क्षेत्र इस संभावना का दोहन वैश्‍विक स्‍तर पर कर लेना चाहता है। इस समय मेडिकल टूरिज्‍म के मालमे में अकेले भारत ही नहीं बल्‍कि थाईलैण्‍ड, मलेशिया, ब्राजील और सिंगापुर भी बड़ी संख्‍या में अपने यहॉ विदेशी मरीजों को आकर्षित कर रहे है, अतः इस क्षेत्र में भी जबर्दस्‍त प्रतिस्‍पर्धा चल रही है।

इस समय एक ओर तो मेडिकल टूरिज्‍म की वृद्धि हो रही है वही दूसरी ओर निजी स्‍वास्‍थ्‍य सेवायें देश के गरीबों की पहुंच से बाहर होती जा रही है। अमेरिका के अन्‍दर भी बुरे हालात परिणाम तक पहुंच चुके है। भारत के समक्ष भी खतरा हो सकता है। क्‍योंकि देश की सरकारी स्‍वास्‍थ्‍य सेवायें नाकाफी और नकारा साबित होती जा रही है। एक अरब इक्‍कीस करोड़ की आबादी के हिसाब से स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की उपलब्‍धता तथा स्‍तरहीनता चिन्‍ता का विषय है। सरकार और निजी क्षेत्र को आपस में सहयोग कर एक ऐसा मॉडल तैयार करना चाहिए जिसमें देश की स्‍वास्‍थ्‍य सेवायें आम आदमी की पहुंच के अन्‍दर रहे तथा दूसरी तरफ विदेशी मरीजों को उच्‍चस्‍तरीय सुविधायें उचित दामों पर उपलब्‍ध हों। भारत की आबादी का यह विरोधाभास चुनौती भी है और ताकत भी है। हमें युवा आबादी के इस चुनौती को देश की ताकत के रूप में परिवर्तित करना है।

इस मेडिकल टूरिज्‍म के कारण भारत की निजी स्‍वास्‍थ्‍य सेवायें की भी उच्‍चस्‍तरीय एवं वैश्‍विक स्‍तर की होने की आवश्‍यकता बढ़ रही है। इस क्षेत्र में जबर्दस्त प्रतिस्‍पर्धा में बढ़त के लिए भारत सरकार केा भी आगे आना होगा। अभी तक की सारी सफलतायें निजी क्षेत्र के प्रयासो के कारण है जिसमें सरकार की भूमिका नगण्‍य है। सरकार को मेडिकल टूरिज्‍म के मार्ग में आने वाली बाधाओं को जल्‍द से जल्‍द समाप्‍त करने के प्रयास करने होगें। पूरी दुनियॉ में महॅगी होती स्‍वास्‍थ्‍य सेवाये जहॉ उन देशों की चिन्‍ता का कारण है वहीं हमारे लिए संभावनाओं का मैदान भी है। अतः हमें इन संभावनाओं का हर संभव दोहन कर भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को मजबूती प्रदान करनी चाहिए। अमेरिका सहित लगभग सभी विकसित देश महॅगी स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं को आसानी से सस्‍ता नहीं कर पायेगें। अतः अमेरिकी राष्‍ट्रपति की चिन्‍ता उनके लिए समस्‍या है भारत के लिए तो संभावना है। भारत में भी एक चिन्‍ता हो रही है कि बीमा आधारित स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं का माडल अमेरिका में असफल होता जा रहा है। अतः इस तरह की स्‍वास्‍थ्‍य सेवा भारत में तो निश्‍चित तौर पर असफल हो जायेगी क्‍योंकि यहां की आबादी अमेरिका की आबादी का लगभग 4 गुना है। अतः स्‍वास्‍थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में किसी विदेशी मॉडल की बजाय अपने देश के हिसाब से मॉडल बनाकर हर वर्ग को समाहित करने का प्रयास करना चाहिए।

 

डॉ0 मनोज मिश्र

एशोसिएट प्रोफेसर

भौतिक विज्ञान विभाग,

डी0ए-वी0 कालेज,

कानपुर।

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संपर्क:

डॉ0 मनोज मिश्र

‘सृष्‍टि शिखर'

40 लखनपुर हाउसिंग सो0,

कानपुर - 24

dr.manojmishra63@yahoo.com

प्रसाद और रूबी वापस आ चुके थे.

चंडीदास ने चपरासी को भेजकर प्रसाद को अपने चैंबर में बुलवाया.

‘‘ नमस्‍ते सर! '' कहने के बाद प्रसाद चंडीदास के ठीक सामने बैठ गया.

चंडीदास प्रसाद को एकटक देखने लगा. जैसे वह किसी अजनबी को देख रहा हो.

‘‘ और... ‘‘टूर'' कैसा रहा ? '' अचानक चंडीदास ने प्रसाद से पूछा.

‘‘ सुपर्व! मजा आ गया... '' प्रसाद ने चहकते हुए कहा.

‘‘ आज मैं तुम्‍हें दावत देता हूँ... शाम को ब्‍लू स्‍टार चलते हैं...'' चंडीदास ने मुस्‍कुराते हुए कहा.

‘‘ किस खुशी में सर!...''

‘‘ बस...ऐसे ही...क्‍या मैं तुम्‍हें दावत नहीं दे सकता ?...'' चंडीदास ने प्रसाद को रहस्‍यपूर्ण दृष्‍टि से देखते हुए कहा.

‘‘ क्‍यों नहीं सर!.. '' प्रसाद ने धीरे से कहा.

रात में ठीक साढ़े आठ बजे चंडीदास और प्रसाद होटल ब्‍लू स्‍टार के अन्‍दर दाखिल हुए. दोनों सीधे बार में चले गए. फिर लड़खड़ाते हुए रेस्‍टोरेंट में आकर खाना खाने लगे.

‘‘ तुम्‍हें पूनम के बारे में भी कुछ सोचना चाहिए!...'' एकाएक चंडीदास ने गंभीर वाणी में कहा.

‘‘ क्‍या मतलब... ? '' प्रसाद चौंक गया.

‘‘ मतलब एकदम साफ है...पति की भी पत्‍नी के प्रति कुछ जिम्‍मेदारियाँ होती हैं. तुमने खुद पूनम को पसंद करके शादी किया था. तुम्‍हारी ज़िद के चलते उसने नौकरी भी छोड़ दिया. तुम अक्‍सर उसे मारते-पीटते रहते हो. ये सब मुझे बर्दाश्‍त नहीं...''

‘‘ ये सब किसने बताया आपको ?... '' प्रसाद ने चंडीदास को घूरते हुए पूछा.

‘‘ पूनम ने...'' चंडीदास ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा.

‘‘ तो आप मेरे अॉबसेंस में मेरे घर जाते थे ?...'' प्रसाद ने व्‍यंगात्‍मक लहजे में कहा. उसका चेहरा लाल होने लगा.

‘‘ हाँ! पूनम के आग्रह करने पर मैं कई बार तुम्‍हारे घर गया. क्‍या केवल तुम्‍हें ही यह जन्‍मसिद्ध अधिकार मिला हुआ है कि तुम कहीं भी मुंह मारते फिरो और तुम्‍हारी पत्‍नी सती-सावित्री बनी घर में बैठी रहे.! ''

चंडीदास के अंदर का जानवर बेकाबू होने लगा.

‘‘ एक दिन पूनम की ज़िद के चलते रात का खाना भी वहीं खाया था. अब इसके आगे और कुछ बताने की जरूरत मैं नहीं समझता...'' चंडीदास ने आगे कहा. उसके होठों पर कुटिल मुस्‍कान थिरकने लगी.

प्रसाद चंडीदास को एकटक देखने लगा. उसका चेहरा ऐंठने लगा.

‘‘ अब हमें चलना चहिए. '' कहते हुए चंडीदास खड़ा हो गया.

दोनों चुपचाप होटल के बाहर आ गए. फिर, टहलते हुए कार के पास आ गए. दोनों ही मौन ओढ़े हुए थे. चंडीदास प्रसाद के बगल वाली सीट पर बैठ गया. प्रसाद रोबोट की तरह चुपचाप कार चलाने लगा.

‘‘ अब आएगा मजा!... '' चंडीदास के भीतर का श्‍ौतान अट्‌टहास करने लगा.

‘‘ स्‍साली कुतिया! मेरे पीछे रंगरेलियाँ मनाती है और सामने कैसी गऊ बनी रहती है...बताता हूँ...आज खाल उधेड़ के रख दूँगा... आज मेरा विश्‍वास टूटा है विश्‍वास!...फिर क्‍या बचा ?.....कुछ नहीं...'' सोचते हुए प्रसाद के हाथ काँप गए.कार का अगला हिस्‍सा डिवाइडर से टकराते-टकराते बचा.

चंडीदास का दिल जोर से धड़क गया.उसने प्रसाद के कंधे को झिंझोड़ते हुए कहा- ‘‘ अरे यार! जरा संभाल के चलाओ!...

प्रसाद ने जैसे कुछ सुना ही नहीं.

कार की गति क्रमशः तेज होती गई. अचानक एक मोड़ पर जैसे ही प्रसाद ने कार को बांए मोड़ा, तेज रफ़्‍तार से आ रही एक ट्रक से टकरा कर कार चकनाचूर हो गई.

एक झटके के साथ चंडीदास की आँखों में घना अंधेरा भरने लगा. उसकी चेतना किसी गहरे शून्‍य में समाने लगी. उसे लगा जैसे उसके शरीर को कोई खींच रहा है.

���

‘‘ मरीज को होश आ चुका है....'' नर्स ने उत्‍साहित होकर कहा.

कामायनी ने नर्स को आशा भरी दृष्‍टि से देखा.

नर्स डॉ0 लाल को बुलाने चली गई.

‘‘ मैं कहाँ हूँ...? '' अचानक चंडीदास के मुँह से निकला.

‘‘ आप डॉ0 लाल नर्सिग होम में भर्ती हैं...रात में आपका एक्‍सीडेंट हो गया था... तब से आप बेहोश थे... अभी-अभी होश में आए हैं...भगवान ने चाहा तो सब ठीक हो जाएगा. '' कामायनी ने पति की जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा.

‘‘...मुझे यहाँ तक कौन लाया...? '' चंडीदास ने कराहते हुए पूछा.

‘‘ कुछ राहगीरों ने आपको इस नर्सिंगहोम तक पहुँचा दिया था... '' कामायनी ने विशाल के माथे को सहलाते हुए कहा.

डॉ0 लाल नर्स के साथ चंडीदास के बेड के पास आ कर उसका परीक्षण करने लगे.

एक्‍सरे-फिल्‍म को कई कोणों से देखने के बाद डॉ0 लाल ने जैसे ख्‍़ाुद से कहा-‘‘ दाहिने पैर में फ्रैक्‍चर है...शायद आपरेशन करना पड़े....आँखों में भी काफी चोट है...‘‘

‘‘ डाक्‍टर साहब! ये पूरी तरह से ठीक तो हो जाएंगे न!...'' कामायनी ने डॉक्‍टर लाल से पूछा.

‘‘ देखिए जी! ये अब पूरी तरह से खतरे से बाहर हैं. मैंने ‘‘ फर्स्‍ट एड '' दे दिया है... लगभग तीन-चार महीने तक इलाज चलेगा. यहाँ का खर्च लगभग एक-डेढ़ लाख तक आ सकता है....बाकी आँख और हड्‌डी के डाक्‍टर को भी बुलाना पड़ेगा. उनकी फीस अलग होगी... ''

‘‘ डाक्‍टर साहब! आप खर्चे की चिन्‍ता एकदम मत कीजिए!...बस ये ठीक भर हो जाएं....'' कामायनी ने सुबकते हुए कहा.

डॉ0 लाल नर्स के साथ कमरे से बाहर चले गए.

‘‘ और प्रसाद...ऽ...ऽ...? '' एकाएक चंडीदास के मुँह से निकला.

‘‘ प्रसाद भाई साहब तो नहीं रहे... '' कहते हुए कामायनी का गला भर्रा गया.

चंडीदास के भीतर जैसे कोई नाजुक सी चीज टूटकर बिखर गई. उसके मानस-पटल पर कुछ दृश्‍य उभरने लगे. पहले धूमिल! फिर एकदम स्‍पष्‍ट...

लगभग साल भर पहले!

चंडीदास टर्बो एंड टर्बो कंपनी के जनरल मैनेजर के तौर पर अपने चैंबर में आराम की मुद्रा में बैठा हुआ था. तभी एक चौबीस-पच्‍चीस साल का युवक उसके चैंबर में आया. ठिगना होते हुए भी अधिक मोटा न होने के कारण युवक काफी आकर्षक दीख रहा था.

‘‘ नमस्‍त सर!... मैं रोहन प्रसाद हूँ आज ही इस कंपनी में जूनियर मैनेजर की पोस्‍ट पर ज्‍वाइन किया हूँ.'' प्रसाद ने मुस्‍कुरते हुए कहा.

‘‘ बैठिए!...'' चंडीदास ने टेबल के दूसरी तरफ रखी हुई कुर्सियों की तरफ इशारा करते हुए कहा.

प्रसाद एक कुर्सी पर बैठ कर चंडीदास से बातें करने लगा.

चंडीदास- ‘‘ आप कहाँ के रहने वाले हैं ? ''

प्रसाद- ‘‘ सर! मैं तो दुर्ग का रहने वाला हूँ. मेरे पापा छत्‍तीसगढ़ कैडर में आई0ए0एस0 अधिकारी हैं.वे आजकल रायपुर में पोस्‍टेड हैं.मेरा परिवार वहीं रहता है...''

चंडीदास-‘‘ आप तो बहुत दूर आ गए!.कहाँ रायपुर और कहाँ दिल्‍ली....खैर! आपके परिवार में और कौन-कौन हैं ? ''

प्रसाद- ‘‘ मम्‍मी-पापा तो हैं ही. एक छोटा भाई भी है, एम0बी0ए0 कर रहा है...''

चंडीदास-‘‘ क्‍या आप बैचलर हैं ? ''

प्रसाद- ‘‘ नहीं, एक बीवी भी है. मेरे साथ रहती है. सर! आप कहाँ के रहने वाले हैं ? ''

चंडीदास-‘‘ मैं तो भागलपुर का रहने वाला हूँ. लेकिन, लगभग दस साल से दिल्‍ली में ही हूँ.''

थोड़ी देर तक कुछ औपचारिक बातें करने के बाद प्रसाद चंडीदास के चैंबर से बाहर चला गया.

पहली ही मुलाकात में चंडीदास प्रसाद से काफी प्रभावित हुआ था.

क्रमशः चंडीदास और प्रसाद के बीच घनिष्‍ठता बढ़ती गई.

सैंतीस वर्षीय चंडीदास वैसे तो प्रसाद का बॉस था और प्रसाद उसका मातहत.लेकिन व्‍यावहारिक तौर पर दोनों अच्‍छे दोस्‍त बन चुके थे. दोनों के बीच एक अनौपचारिक किस्‍म का रिश्‍ता पनपने लगा था. प्रसाद चंडीदास के फ्‍लैट से लगभग दो सौ मीटर की दूरी पर स्‍थित कंपनी के एक फ्‍लैट में अपनी पत्‍नी के साथ रहने लगा था. अक्‍सर चंडीदास प्रसाद की ही कार में बैठकर दफ़्‍तर जाने लगा था.

प्रसाद के व्‍यक्‍तित्‍व से दफ़्‍तर का हर मुलाजिम प्रभावित था.लेकिन रूबी उससे हद दर्जे तक प्रभावित थी. रूबी कंपनी में मार्केटिंग सुपरवाइजर के पद पर कार्यरत थी और कुंआरी थी. प्रसाद के सीधे नियंत्रण में काम करने के कारण रूबी हमेशा उसके संपर्क में रहती थी. प्रसाद और रूबी के बीच की घनिष्‍ठता दफ़्‍तर के लोगों के बीच चर्चा का विषय बनने लगी थी.

उस दिन दोनों दफ़्‍तर के कैंटिन में बैठकर कॉफी पी रहे थे.

‘‘ सर! मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ...'' अचानक प्रसाद ने चंडीदास से कहा.

चंडीदास ने प्रसाद को आश्‍चर्य से देखा.

‘‘ रूबी के साथ मेरा ‘‘ अफेयर '' चल रहा है...'' प्रसाद ने धीरे से कहा.

‘‘ ठीक है...इसमें मुझे क्‍या आपत्ति हो सकती है ? '' चंडीदास ने जबरदस्‍ती मुस्‍कुराते हुए कहा.

‘‘ सर! बसंत टाकीज में एक बहुत ही अच्‍छी फिल्‍म लगी है. चलिए! आज मेटिनी शो देख लेते हैं...'' प्रसाद ने मुस्‍कुराते हुए कहा.

‘‘ मैं तो अब पिक्‍चर-उक्‍चर देखता ही नहीं...'' चंडीदास ने कंधा उचकाते हुए कहा.

‘‘ क्‍यों सर ?... ''

‘‘ बस...ऐसे ही...इच्‍छा ही नहीं होती. आजकल की फिल्‍मों में बहुत गंदगी भरी रहती है. '' चंडीदास ने मुंह बिचकाते हुए कहा.

‘‘‘ मेरा तो मानना है कि दृश्‍य नहीं दृष्‍टि महत्‍वपूर्ण होती है. '' प्रसाद ने दार्शनिक लहजे में कहा.

चंडीदास कुछ सोचने लगा.

‘‘जानते हैं जिस फिल्‍म की मैं बात कर रहा हूँ, उसकी क्‍या खासियत है ?'' प्रसाद ने फुसफुसाते हुए कहा.

चंडीदास ने प्रसाद को कौतूहल से देखा.

‘‘ फिल्‍म के एक सीन में हिरोइन ने अपने सारे कपड़े उतार दिए हैं...‘' प्रसाद ने अंगड़ाई लेते हुए कहा.

‘‘ सारे कपड़े!...अरे! यह कैसे हो सकता है ? सेंसर ने कैसे पास कर दिया ? '' चंडीदास चौंक गया.

‘‘ सारे कपड़े सर!... लेकिन उसे देखकर दर्शकों के अन्‍दर किसी तरह की उत्‍तेजना नहीं जागती. यही तो खासियत है...''

‘‘ अब मैं ऐसी फिल्‍में नहीं देखता...'' चंडीदास ने सकुचाते हुए कहा.

‘‘ तो आप बूढ़े हो गए हैं क्‍या ?...आप भी न!...‘' कह कर प्रसाद काफी देर तक हंसता रहा.

अचानक चंडीदास के मस्‍तिष्‍क में रूबी का चेहरा कौंध गया. चंडीदास का मन कसैला हो गया. मन ही मन बुदबुदाया-‘‘ स्‍साली पतुरिया...छिनाल...''

प्रसाद मेज पर पड़े पेपरवेट को इधर-उधर लुढ़काने लगा.

‘‘ लेकिन मेटिनी शो कैसे देख पाएंगे ? पाँच-साढे़ पाँच बजे से पहले तो यहीं से नहीं निकल सकते...'' चंडीदास ने धीरे से कहा.

‘‘ अरे सर! चुपके से खिसक लेते हैं...'' प्रसाद ने रहस्‍यमय ढंग से कहा.

‘‘ नहीं, ये ठीक नहीं रहेगा, ऐसा करते हैं... छै से नौ देखते हैं... '' चंडीदास ने प्रसाद को समझाया.

प्रसाद मान गया.

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दफ़्‍तर से निकल कर चंडीदास प्रसाद की कार में बैठकर सीधे फिल्‍म देखने चला गया.

‘‘ पहले कुछ खाते-पीते हैं, फिर घर चला जाएगा...'' पिक्‍चर हॉल से निकलने के बाद प्रसाद ने चंडीदास से कहा.

हॉल के पास ही सड़क के दूसरी ओर एक रेस्‍टोरेंट था.

‘‘ चलो! इसी में खा लेते हैं. '' चंडीदास ने रेस्‍टोरेंट की तरफ इशारा करते हुए कहा.

‘‘ यह रेस्‍टोरेंट तो देखने में ही सड़ियल लग रहा है. हम लोग कहाँ रोज़-रोज़ घर से बाहर खाते हैं... चलिए! किसी अच्‍छे होटल में चलते हैं.'' प्रसाद ने सुझाव दिया.

‘‘ फिर कहाँ चला जाए ? ''

‘‘ आप कभी ब्‍लू स्‍टार गए हैं ? '' प्रसाद ने चंडीदास से पूछा.

‘‘ नहीं, वहाँ तो मैं कभी नहीं गया. ''

‘‘ तो फिर चलिए! आज मैं आपको वहीं ले चलता हूँ.खाने के साथ-साथ गाने का भी मज़ा लीजिएगा! '' प्रसाद ने मुस्‍कुराते हुए कहा.

चंडीदास मान गया.

साढ़े नौ बजे दोनो होटल ब्‍लू स्‍टार पहुँच गए. पार्किग में कार खड़ी करने के बाद प्रसाद चंडीदास के साथ होटल के मुख्‍यद्वार पर आ गया. वहाँ पर पूरी तरह से मुस्‍तैद वर्दीधारी दरबान ने पहले तो उन दोनों को झुक कर सलाम ठोंका. फिर, धीरे से प्रवेशद्वार को खोल दिया.दोनों एक साथ होटल के अन्‍दर दाखिल हुए.अन्‍दर का हॉल वातानुकूलित था. चंडीदास को हल्‍की-सी सिहरन हुई. वह वहाँ की भव्‍यता और चकाचौंध से अभिभूत होने लगा.

‘‘ पहले बार में चलकर पीते हैं, फिर खाना खाएंगे. '' सीढ़ियों की तरफ बढ़ते हुए प्रसाद ने कहा.

‘‘ लेकिन मेरी तो एकदम इच्‍छा नहीं है.'' चंडीदास ने बुरा-सा मुंह बनाया.

‘‘ कभी-कभी तो लेते हैं न! बस मेरा साथ देने के लिए एक पैग ले लीजिएगा!... प्रसाद ने आग्रह किया.चंडीदास मना नहीं कर पाया.

बार में रंग-बिरंगी रोशनी झिलमिला रही थी. प्रसाद और चंडीदास टेबल नंबर दस के पास पड़े हुए सोफे पर पसर कर बैठ गए. बार के अन्‍दर खूबसूरत और बिंदास किस्‍म की लड़कियाँ विभिन्‍न टेबलों पर जाकर अॉर्डर ले रही थीं और अॉर्डर के अनुसार पैग सर्व कर रही थीं. जींस का तंग पैंट और टॉप पहनी हुई बीस-इक्‍कीस साल की एक दुबली-पतली लड़की ने टेबल नंबर दस के ग्राहकों को अटैंड किया. उसके नाभि के ठीक नीचे स्‍थित पैंट के हुक से एक कीमती मोबाइल फोन लटक रहा था.

‘‘ और, स्‍वीट हार्ट! कैसी हो ? '' प्रसाद ने मुस्‍कुराते हुए लड़की से पूछा.

‘‘ फाइन सर! लेकिन आप तो बहुत दिनों के बाद आए! मैं सोच रही थी कि कहीं आप ये शहर छोड़ कर तो नही चले गए...'' लड़की ने मचलते हुए कहा. फिर, जिज्ञासु भाव से चंडीदास को देखने लगी.

‘‘ इन दिनों कुछ ज्‍यादे ही बिजी था, इसलिए नहीं आ पाया...ये मेरे सर हैं. यहाँ पहली बार आए हैं. '' प्रसाद ने लड़की की जिज्ञासा को शांत किया.

आर्डर लेकर लड़की चली गई.

‘‘ यह लड़की तो तुमसे काफी घुली-मिली लगती है.'' चंडीदास ने मुस्‍कुराते हुए प्रसाद से कहा.

‘‘ सर! ये शालिनी है. इस बार में काम करने वाली हर लड़की को मैं जानता हूँ. वह जो काउंटर के पास काले रंग का स्‍कर्ट पहने हुए खड़ी है...वह रीता है. बहुत ही मजेदार लड़की है. और...वह... जो पैग तैयार कर रही है उसका नाम डॉली है.'' प्रसाद ने फुसफुसाते हुए कहा.

शालिनी ट्रे में खाने-पीने के लिए ज़रूरी चीजें लेकर वापस आई और उन्‍हें करीने से टेबल पर लगा दिया. दोनों खाने-पीने में लग गए.

‘‘ रूबी का क्‍या हालचाल है...? चंडीदास ने प्रसाद से पूछा.

‘‘ ठीक है सर! मैं तो आपको बताना ही भूल गया था. आपको याद होगा, पिछले महीने जब मैंने एक हफ़्‍ते के लिए छुट्‌टी लिया था तो रूबी ने भी छुट्‌टी लिया था. हम दोनों बंगलौर घूमने चले गए थे. वहाँ पर हम होटल के एक ही कमरे में ठहरे थे, पति-पत्‍नी बन कर...अब इसके आगे और कुछ बताने की जरूरत मैं नहीं समझता...'' प्रसाद ने गिलास खाली करते हुए कहा.

चंडीदास को लगा जैसे उसके अंदर कई कुत्‍ते भौंकने लगे हैं. पिछले महीने रूबी ने उससे एक हफ़्‍ते का अवकाश मांगा था. वह बहुत दुखी लग रही थी.

‘‘ क्‍या कोई जरूरी काम है ? '' चंडीदास ने पूछा था.

‘‘ हाँ सर! मेरी ‘‘मदर'' बहुत बीमार हैं. उनका आपरेशन होना है.'' रूबी ने उदास होकर कहा था. चंडीदास ने उसका अवकाश स्‍वीकृत कर दिया था.

‘‘ वैसे रूबी के माँ-बाप क्‍या करते हैं ? '' चंडीदास ने प्रसाद से पूछा.

‘‘ इस दुनिया में उसका कोई नहीं है सर! बेचारी एकदम अकेली है.उसकी माँ तो बचपन में ही मर गयी थी और बाप दूसरी शादी करके लंदन में बस गया है. अपने मामा-मामी के साथ रहकर पली-बढ़ी है.'' प्रसाद ने उदास होकर कहा.

‘‘ स्‍साली...छिनाल...पतुरिया...कुतिया!'' चंडीदास मन ही मन बड़बड़ाया.

‘‘ कल तुम अॉर्डर लेने के लिए लखनऊ जा रहे हो न! '' चंडीदास ने विषयान्‍तर करते हुए कहा.

‘‘ आपका आदेश है तो जाना तो पड़ेगा ही...वरना रूबी को छोड़कर कहीं जाने का मन ही नहीं करता है...एक बात है सर! कंपनी जो टी0ए0-डी0ए0 देती है, वह तो बहुत ही कम है.इसके लिए भी आपको कुछ करना चाहिए.'‘ प्रसाद ने मचलते हुए कहा.

‘‘ ठीक है, मैं कोशिश करूंगा. '' चंडीदास ने प्रसाद को आश्‍वासन दिया.

शालिनी ने बिल लाकर टेबल पर रख दिया. प्रसाद ने बिल देखा. चौदह सौ पैंतीस रूपये...बिल के नीचे पंद्रह सौ रूपये रखते हुए प्रसाद ने शालिनी से कहा,-‘‘ बाकी तुम रख लेना!...''

‘‘ फिर जल्‍दी आना सर! मैं आपको बहुत ‘‘मिस'' करती हूँ.'' शालिनी ने मुस्‍कुराते हुए कहा.

‘‘ अब खाना खा लेते हैं.'' प्रसाद ने उठते हुए कहा.

दोनों सीढ़ियों से उतर कर रेस्‍टोरेंट में चले आए. प्रसाद ने चंडीदास से परामर्श करने के बाद खाने के लिए अॉर्डर किया.रेस्‍टोरेंट के आगे वाले हिस्‍से में फर्श पर मखमली कालीन बिछा हुआ था, जिस पर बैठकर एक अधेड़ उम्र का आदमी हारमोनियम बजाते हुए ग़ज़ल गा रहा था. उसके दाईं ओर बैठा हुआ एक लड़का तबले पर संगत कर रहा था और बायीं तरफ बैठी हुई एक लड़की अपनी कोमल उंगलियों से सितार के तारों को सहला रही थी.

दोनों ग़ज़ल सुनने लगे.

‘‘ ये झूठे अलला रहा है. ये नहीं कि कोई ढंग का गाना-वाना सुनाए. गजल-वजल तो मेरे पल्‍ले ही नहीं पड़ती है. पता नहीं लोग कैसे झेलते हैं ? '' प्रसाद ने जम्‍हाई लेते हुए कहा.

‘‘ खैर! समझ में तो मेरे भी नहीं आती है. लेकिन गा अच्‍छा रहा है.'' चंडीदास ने लड़खड़ाती हुई जुबान से कहा.

टेबल पर खाना लगाया जा चुका था. दोनो खाना खाने लगे.

‘‘ मुझे तो लगता है तुम रूबी को बहुत प्‍यार करने लगे हो. कहीं अपनी पत्‍नी को तलाक देकर उससे शादी करने का तो इरादा नहीं है ? '' अचानक चंडीदास ने प्रसाद से पूछा.

‘‘ क्‍या ?...प्‍यार!...'' प्रसाद ने चौंकते हुए कहा जैसे उसे बिजली का तेज झटका लगा हो. ‘‘ मैं प्‍यार-वार के बारे में नहीं सोचता, केवल मौज-मस्‍ती में यकीन करता हूँ... यूज एण्‍ड थ्रो!...''

‘‘ लेकिन यह तो अच्‍छी बात नहीं है. तुम्‍हें नहीं लगता कि तुम गलत कर रहे हो ?'' चंडीदास ने धीरे से कहा.

‘‘ क्‍यों ?... क्‍या गलत कर रहा हूँ मैं ? मैं उसके साथ कोई ज़ोर-ज़बरदस्‍ती तो नहीं करता. इसमें उसकी भी मर्जी शामिल है. अब तक उस पर लगभग पचास हजार खर्च कर चुका हूँ...'' प्रसाद ने उत्‍तेजित होते हुए कहा.

कुछ देर के लिए दोनो मौन हो गए. चंडीदास सिर पर हाथ फेरने लगा. और, प्रसाद कुछ सोचने लगा.

खाने-पीने के बाद दोनों होटल से बाहर आ गए.

���

एक दिन प्रसाद ने चंडीदास को ‘‘डिनर'' के लिए अपने घर पर आमंत्रित किया.

अक्‍टूबर का महीना था...गुलाबी ठंड शुरू हो चुकी थी. ठीक आठ बजे प्रसाद चंडीदास के साथ अपने घर पहुँच गया. इसके पहले चंडीदास कभी प्रसाद के घर नहीं गया था. दोनों ड्रउइंगरूम में बैठ कर बतियाने लगे. कुछ देर बाद लगभग तेईस-चौबीस साल की एक औरत घर के अंदर से ड्राइंगरूम में आई. चंडीदास ने उस औरत को एकटक देखने लगा. गौर वर्ण, छरहरी काया, उन्‍नत वक्षस्‍थल, सुडौल नितम्‍बों तक लहराते घने काले केश और गोल-मटोल गुलाबी चेहरा...शिकारी की आहट से भयभीत हिरनी की आँखों जैसी सहमी हुई आखें....

‘‘ नमस्‍ते सर!'' औरत ने दोनों हाथों को जोड़ते हुए चंडीदास से कहा.

‘‘ नमस्‍ते ! '' चंडीदास ने मुस्‍कुराते हुए कहा.

‘‘ ये हैं माई वाइफ पूनम प्रसाद!... '' प्रसाद ने चंडीदास को औरत के बारे में बताया.

पूनम एक झटके के साथ घर के अंदर चली गयी.

‘‘ खाने से पहले एक-दो पैग ले लेते हैं...'' प्रसाद ने चंडीदास से कहा.

‘‘ क्‍या है ? '' चंडीदास ने प्रसाद से पूछा.

‘‘ रम है...इस सीजन में प्रायः मैं रम ही पीता हूँ...''

‘‘ तुम्‍हारी इच्‍छा है तो मैं भी एक-दो घूँट ले लूँगा. '' चंडीदास ने जम्‍हाई लेते हुए कहा.

‘‘ पूनम!...'' प्रसाद जोर से चिल्‍लाया.

‘‘ पूनम ड्राइंगरूम में आकर स्‍टैच्‍यू की तरह खड़ी हो गई.

‘‘ सोडा की दो बोतलें,दो गिलास और नमकीन लेती आओ! '' प्रसाद ने आदेश दिया.

‘‘ जी!'' कह कर पूनम अंदर चली गयी.

प्रसाद ने ड्राइंगरूम के किनारे की आलमारी को खोलकर एक बोतल निकाला. फिर उसकी सील तोड़ने के बाद टेबल पर रख दिया.

पूनम एक ट्रे में सोडा की दो बोतलें, दो गिलास और नमकीन से भरा प्‍लेट लेकर वापस आई.जैसे ही सोडा की बोतलों को पूनम ने टेबल पर रखा, एक बोतल लुढ़क कर नीचे फर्श पर गिर गई.

‘‘ एकदम गधी हो तुम! एक काम भी ढंग से नहीं कर पाती हो... जाओ! जल्‍दी से सलाद काट कर लेती आओ!..'' प्रसाद ने चिड़चिड़ाते हुए कहा.

‘‘ जी! अभी लाई...'' कह कर पूनम फिर अंदर चली गयी.

‘‘ तुम्‍हें इस तरह से नहीं डाँटना चाहिए था...बेचारी कितनी सहम गई थी. '' चंडीदास ने धीरे से कहा.

‘‘ क्‍या करूँ सर! एकदम गंवार औरत से पाला पड़ा है...'' प्रसाद ने कुछ झेंपते हुए कहा.

प्रसाद और चंडीदास ने एक साथ गिलास उठाकर उन्‍हें टकराते हुए ‘‘चियर्स!'' कहा. फिर दोनों खाने-पीने लगे.

‘‘ सर! आपसे एक बात कहनी है...'' एकाएक प्रसाद ने चंडीदास से कहा.

‘‘ हाँ-हाँ, कहो! क्‍या बात है ?''

दोनों की ही जुबान लड़खड़ाने लगी थी.

‘‘ मुझे और रूबी को एक हफ़्‍ते की छुट्‌टी चाहिए. हम गोवा घूमने जा रहे हैं. हमने प्रोग्राम बना लिया है.प्‍लीज सर! मना मत करिएगा! नहीं तो हमारा दिल टूट जाएगा...'' प्रसाद ने अनुरोध किया.

‘‘ ठीक है...चले जाना!...'' चंडीदास ने गिलास खाली करते हुए कहा.

‘‘ एक पैग और बनाऊँ सर! '' प्रसाद ने पूछा.

‘‘ नहीं यार! फिर तो मेरे लिए चलना-फिरना भी मुश्‍किल हो जाएगा. ''

‘‘बस एक लिटिल पैग! '' प्रसाद ने आग्रह किया.

‘‘ ठीक है, बना दो!...'' चंडीदास ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा.

तभी पूनम ड्राइंगरूम में आकर खड़ी हो गई.

‘‘ क्‍या बात है ?...'' प्रसाद ने कुछ तेज आवाज में पूछा.

‘‘ जी! खाना तैयार है, कहिए तो लगा दँूँ!...'' पूनम ने सहमते हुए कहा.

‘‘ ठीक है...लगा दो!..'' प्रसाद ने धीरे से कहा.

खाना खाने के बाद जब चंडीदास बेसिन पर हाथ धोने गया तो लड़खड़ाकर गिरते-गिरते बचा. पूनम बेसिन के पास में ही खड़ी थी. उसने फुसफुसाते हुए कहा,- ‘‘ इतना मत पिया करिए सर! ये कोई अच्‍छी चीज तो है नहीं...''

चंडीदास ने पलट कर पूनम को देखा. उसके मुँह से अनायास ही निकला गया- ‘‘ सॉरी!..''

प्रसाद ने चंडीदास को उसके फ्‍लैट तक छोड़ दिया.

अपने ड्राइंगरूम में आकर चंडीदास टी0वी0 देखने लगा. अंग्रेजी भाषा में फिल्‍म चल रही थी.लगभग पाँच मिनट तक फिल्‍म देखने के बाद उसने रिमोट से चैनल बदल दिया.अब समाचार आने लगा. इसमें उसका मन नहीं लगा. वह लगातार चैनल बदलता रहा. कोई भी प्रोग्राम उसे अच्‍छा नहीं लग रहा था.

चंडीदास टी0वी0 बंद कर बेडरूम में चला गया. ट्‌यूबलाइट बुझाने के बाद बिस्‍तर पर लेट कर सोने की कोशिश करने लगा.

‘‘ मत पिया करिए. ये कोई अच्‍छी चीज तो है नहीं...'' बार-बार चंडीदास के दिमाग में कौंधने लगा. तरह-तरह की मुद्राओं में पूनम उसके मानस पटल पर उभरने लगी. देर रात तक उसे नींद नहीं आई.

���

प्रसाद और रूबी एक हफ़्‍ते के लिए अवकाश पर चले गए.

अॉफिस के पते पर प्रसाद का एक पत्र आया हुआ था. चंडीदास ने प्रसाद के घर पर पत्र पहुँचाने के लिए डाकिए से पत्र लेकर अपने बैग में रख लिया.

शाम साढ़े पाँच बजे चंडीदास प्रसाद के फ्‍लैट के मेनगेट के सामने पहुँच कर धीरे से कॉलबेल के स्‍विच को दबा दिया. थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला. चंडीदास के सामने पूनम खड़ी थी.

‘‘ अरे सर! आप!... पूनम ने चौंकते हुए कहा.

‘‘ अॉफिस में प्रसाद के नाम एक लेटर आया हुआ था, सोचा आपको देता चलूँ....'' चंडीदास ने पत्र पूनम को पकड़ाते हुए कहा.

पत्र लेकर पूनम ने विह्‌वल होते हुए कहा,-‘‘ अरे! ये तो मेरी मम्‍मी का लेटर है...आप अंदर आ जाइए न! बाहर क्‍यों खड़े हैं ? ''

‘‘ नहीं...अब मैं चलता हूँ. अॉफिस से सीधे यहीं आ गया था...''

‘‘ आइए न! एक कप चाय पीकर चले जाइएगा ! '' पूनम ने चंडीदास से आग्रह किया.

चंडीदास ड्राइंगरूम में आकर सोफे पर बैठ गया.

‘‘ मैं बस पाँच मिनट में चाय बनाकर लाती हूँ. '' कहते हुए पूनम घर के अन्‍दर चली गयी.चंडीदास टेबल पर पड़े हुए अख़बार को उलटने-पलटने लगा.

कुछ देर बाद पूनम ड्राइंगरूम में वापस आई. नमकीन का प्‍लेट और चाय के कप टेबल पर रखने के बाद चंडीदास के सामने के सोफे पर बैठ गई. दोनों चाय पीते हुए बातें करने लगे.

‘‘ कब तक वापस लौटेंगे प्रसाद जी!...आपको तो पता होगा...'' पूनम ने चंडीदास से पूछा.

‘‘ प्रसाद जी आफिस के ज़रूरी काम से गए हैं, हो सकता है...'' चंडीदास ने अटकते हुए कहा.

‘‘ आप भी मुझे बनाने लगे. जैसे मुझे मालूम ही न हो कि वे किस ज़रूरी काम से गए हैं...'' पूनम ने चंडीदास को घूरते हुए कहा.

चंडीदास बुरी तरह से झेंप गया.

‘‘ वे आपके जूनियर भी हैं और दोस्‍त भी... उन्‍हें आप समझाते क्‍यों नहीं हैं ? ये कोई अच्‍छी बात तो है नहीं...'' कहते हुए पूनम की आँखों में नमी भर गई.

इतना सुनते ही चंडीदास पर जैसे कोई भूत सवार हो गया. वह बड़बड़ाने लगा-‘‘ बिलकुल अच्‍छी बात नहीं है भाभी जी! मैने प्रसाद को कई बार समझाया, लेकिन वह माने तब न! सच कहूँ तो मुझे रूबी एकदम अच्‍छी नहीं लगती है. पता नहीं प्रसाद ने उस चिचुके हुए आम जैसी लड़की में ऐसा क्‍या देख लिया कि उस पर लटटू हो गया है...''

पूनम हंसने लगी. चंडीदास ने उसे आश्‍चर्य से देखा.

‘‘ मैं आपसे कितनी छोटी हूँ, आप मुझे पूनम कह सकते हैं. आपने भाभी जी कहा तो मुझे कुछ अजीब-सा लगा...'' पूनम ने मुस्‍कुराते हुए कहा.

फिर दोनों कुछ देर के लिए मौन हो गए.

‘‘ मैं तो सोचती थी कि रूबी बहुत सुन्‍दर होगी...'' पूनम ने बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहा.

‘‘ सुंदर! हुंह...खाक़ सुन्‍दर है... मुझे तो एकदम छिपकली जैसी लगती है.जींस का पैंट-शर्ट पहनने ...बॉब कट बाल कटा लेने और लिपिस्‍टिक लगाने से ही कोई लड़की सुन्‍दर नहीं हो जाती है. वह तो तुम्‍हारे पैरों की धूल के बराबर भी नहीं है. प्रसाद भी पता नहीं कैसे उस चुड़ैल के चक्‍कर में पड़ गया है. मुझे तो लगता है कि प्रसाद अब सुधरने वाला नहीं...'' चंडीदास ने आवेश से भरकर कहा.

‘‘ ऐसा मत कहिए सर! मैं तो बस उम्‍मीद में जी रही हूँ.'' पूनम ने बुझे हुए लहजे में कहा.

‘‘ लेकिन तुम बिलकुल चिन्‍ता मत करना! मैं प्रसाद को समझाने की कोशिश करूंगा. '' चंडीदास ने पूनम को तसल्‍ली दिया.

पूनम सामने की दीवार को घूरने लगी.

‘‘ अच्‍छा, अब मैं चलूँगा. '' चंडीदास ने उठते हुए कहा.

‘‘ सर! कल बच्‍चों के साथ आइए न! मुझे अच्‍छा लगेगा. '' पूनम ने कुछ गंभीर होकर कहा.

‘‘ बच्‍चे मेरे साथ नहीं रहते हैं. मैं अकेले रहता हूँ. '' चंडीदास ने धीरे से कहा.

‘‘ क्‍यों ? बच्‍चे साथ क्‍यों नहीं रहते ? '' पूनम ने चौंकते हुए पूछा.

‘‘ मेरी पत्‍नी जानसन एंड मेरी कंपनी में एरिया मैनेजर है. आजकल कानपुर ब्रांच में पोस्‍टेड है.'' चंडीदास ने पूनम को बताया.

‘‘ कितने बच्‍चे हैं ? ''

‘‘ बस एक बेटा है, सातवीं में पढ़ता है. ''

‘‘ खाने-पीने का कैसे करते हैं ? ''

‘‘ कंपनी के मेस में खाता हूँ...'' कहते हुए चंडीदास ड्राइंगरूम से बाहर आ गया.

‘‘ फिर कभी आइएगा सर!... '' पूनम ने मुस्‍कुराते हुए कहा. फिर, दरवाजा अन्‍दर से बन्‍द कर लिया.

���

उस दिन रविवार था. दोपहर का खाना खाने के बाद चंडीदास टी0वी0 में फैशन शो देखने लगा. कुछ अति आधुनिक बालाएँ अपने शरीर के लगभग दसवें हिस्‍से को ढंककर विभिन्‍न मुद्राओं में चहलकदमी कर रही थीं. तभी अचानक एक दुबली-पतली लड़की के सीने पर बंधा हुआ रेशमी कपड़े का टुकड़ा सरक कर उसके पेट के पास आ गया. शायद संयोगवश ऐसा हो गया था. इसमें उसका कोई दुराशय नहीं था. चंडीदास टी0वी0 बन्‍द कर कपड़े पहनने लगा. मेनगेट पर ताला लगाने के बाद चंडीदास प्रसाद के फ्‍लैट की ओर चल दिया.

कुछ देर बाद चंडीदास प्रसाद के फ्‍लैट के सामने पहुँच गया. उसने धीरे से कालबेल बजा दिया.

पूनम ने दरवाजा खोला. उसकी दोनों हथेलियों में गीला आटा लगा हुआ था.

‘‘ अरे सर आप! आइए!...'' पूनम ने एक कदम पीछे हटते हुए कहा.

‘‘ इधर से गुजर रहा था तो सोचा तुम्‍हारा हाल-चाल लेता चलूँ...'' कहते हुए चंडीदास ड्राइंगरूम के अन्‍दर आकर सोफे पर बैठ गया.

पूनम नीले रंग का सूट पहने हुए थी. उसके गले के नीचे का उभार खुला हुआ था, जिस पर चंडीदास की दृष्‍टि अटक गई.

‘‘ मैं अभी आई...'' कहकर पूनम झट से अंदर चली गई.

कुछ देर बाद जब पूनम ड्राइंगरूम में वापस आई,उसके गले में सफेद रंग का दुपट्‌टा लिपटा हुआ था.

‘‘ लगता है तुम किचन में थी ? '' चंडीदास ने पूछा.

‘‘ हाँ सर! आटा गूँथ रही थी..'' पूनम ने जवाब दिया.

‘‘ साढ़े बारह बज रहे हैं, अभी तक तुमने खाना नहीं खाया ? फिर तो मैंने तुम्‍हें ‘‘ डिस्‍टर्ब '' कर दिया. ''

‘‘ अरे! नहीं सर! ऐसी कोई बात नहीं है. बस अपने लिए ही तो बनाना-खाना है.जब मर्जी होती है,बना कर खा लेती हूँ. मैं आपके लिए चाय बनाकर लाती हूँ....'' पूनम ने मुस्‍कुराते हुए कहा.

‘‘ चाय पीने की एकदम इच्‍छा नहीं है... अब मैं चलता हूँ...तुम बनाओ-खाओ! '' कहते हुए चंडीदास खड़ा हो गया.

‘‘ थोड़ी देर और बैठिए न! खाने की तो बस ‘‘ फारमैलिटी '' भर पूरी करनी है.'' पूनम ने धीरे से कहा.

चंडीदास फिर सोफे पर बैठ गया. दोनों बातें करने लगे.

‘‘ प्रसाद का कोई फोन-वोन आया कि नहीं...?'' चंडीदास ने पूनम से पूछा.

‘‘ नहीं आया...''

‘‘ उस रात के बाद फिर मैंने कभी शराब नहीं पिया...'' चंडीदास ने धीरे से कहा.

‘‘ यह तो आपने बहुत अच्‍छा किया...'' पूनम ने चंडीदास को घूरते हुए कहा.

फिर कुछ देर के लिए दोनों के बीच सन्‍नाटा पसर गया.

‘‘ पूनम तुम कहाँ तक पढ़ी हो ? '' एकाएक चंडीदास ने पूछा.

‘‘ सर! मैं संस्‍कृत में एम0ए0 हूँ... मुझे तो नौकरी भी मिल गई थी...एक कालेज में पढ़ाती थी. लेकिन शादी के बाद प्रसाद जी और उनके परिवार वाले नहीं चाहते थे कि मैं नौकरी करूँ...छुड़वा दिए...'' पूनम ने चंडीदास को एकटक देखते हुए कहा. उसके चेहरे पर घनी उदासी छा गई.

‘‘ क्‍या तुम दोनों ने ‘‘ लव मैरिज '' किया था ? '' चंडीदास ने पूछा.

‘‘ नहीं सर! मेरे मम्‍मी-पापा भी रायपुर में ही रहते हैं. मैं अपने माँ-बाप की इकलौती संतान हूँ. मेरे पापा बिजनेस करते हैं. एक दिन कालेज से लौटते समय, मैं प्रसाद जी के सामने पड़ गई.बस उसके बाद तो ये मेरे पीछे ही पड़ गए.एक दिन अपने परिवार के साथ मेरे घर आ गए और मेरे पिताजी के सामने मुझसे शादी करने का ‘‘प्रपोजल'' रख दिये. पापा को एक आई0ए0एस0 का बेटा दामाद के रूप में मिल रहा था...मेरे लिए इतना अच्‍छा रिश्‍ता उन्‍हें कहाँ मिलता ? वे मेरी शादी प्रसाद जी से करने के लिए तैयार हो गए...'' कहते हुए पूनम का गला भर्रा गया.

‘‘ तो प्रसाद ने तुम्‍हें पसंद करके शादी किया था, फिर भी...'' चंडीदास ने अफसोस व्‍यक्‍त करते हुए कहा.

‘‘ हाँ सर! मुझे तो लगता है कि मेरी किस्‍मत में ही कुछ खोट है...शुरू-शुरू में प्रसाद जी मुझे बहुत मानते थे.मेरी हर इच्‍छा पूरी करते थे. लेकिन इधर लगभग साल भर से सीधे मुँह बात भी नहीं करते हैं. बात-बात पर झल्‍लाने लगते हैं. कभी-कभी तो मुझ पर हाथ भी उठा देते हैं. अब हमारे बीच पति-पत्‍नी जैसा कोई रिश्‍ता ही नहीं रह गया है. हम साथ-साथ रहते भर हैं...'' कहते हुए पूनम कुछ झेंप-सी गई.

‘‘ क्‍या...? प्रसाद तुम्‍हें मारता भी है! वह इतना गिरा हुआ आदमी होगा, यह तो मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था...'' चंडीदास ने उत्‍तेजित होते हुए कहा. फिर बड़बड़ाने लगा-‘‘ सदियों से पुरुष नारी पर अत्‍याचार करता आ रहा है. उसका शोषण करता आ रहा है और नारी बेचारी मौन रह कर पुरुष का सारा अन्‍याय-अत्‍याचार सह रही है.लेकिन अब वक़्‍त आ गया है कि नारी में भी जागृति आए,वह अपने हक़ के लिए पुरुष से लड़े. ईंट का जवाब पत्‍थर से दे...आने दो प्रसाद को... बताता हूँ...''

‘‘ नहीं सर! मैंने तो आपको अपना हमदर्द समझ कर ये सब बता दिया.आप उनसे कुछ भी मत बताइएगा! नहीं तो वे मुझे मारने-पीटने लगेंगे...दरसल वे बहुत शक्‍की स्‍वभाव के आदमी हैं.आप उन्‍हें एकदम मत बताइएगा कि मैंने ये सब आपको बताया है. यह भी मत बताइगा कि आप मुझसे मिलते थे. बस अपने ढंग से उन्‍हें समझाने की कोशिश करिएगा! '' पूनम ने अटकते हुए कहा.

‘‘ ठीक है, तुम कहती हैं तो नहीं बताऊँगा.लेकिन ये सब कब तक चलेगा ? तुम कब तक सहती रहोगी.? '' चंडीदास ने फुसफुसाते हुए कहा.

‘‘ जब तक मेरी किस्‍मत में लिखा होगा. मैं तो बस उम्‍मीद में जी रही हूँ सर!...हो सकता है भगवान कभी उनका मन बदल दे...कभी मेरे भी अच्‍छे दिन आएं...'' पूनम ने शांत लहजे में कहा.

‘‘ अरे! तुम इतनी पढ़ी-लिखी होकर भी इन सब बातों में विश्‍वास करती हो...मैं तो नहीं मानता!...'' चंडीदास ने पूनम को अपलक देखते हुए कहा.

‘‘ लेकिन मैं तो मानती हूँ...'' पूनम ने धीरे से कहा.

‘‘ अब मैं चलता हूँ...तुम कुछ बना-खा लो! '' चंडीदास ने उठते हुए कहा.

‘‘ रविवार को तो रात में मेस बंद रहता होगा..? '' पूनम ने चंडीदास को एकटक देखते हुए पूछा.

‘‘ हाँ, रात में बन्‍द रहता है...''

‘‘ तो रात का खाना आप यहीं खा लीजिएगा!...'' पूनम ने कहा.

‘‘ अरे! तुम क्‍यों परेशान होओगी ?...मैं होटल में खा लूँगा.'' चंडीदास ने झिझकते हुए कहा.

‘‘ होटल में क्‍यों खा लेंगे ? इसमें परेशान होने वाली कौन-सी बात है ? अपने लिए तो बनाऊँगी ही...आप आ जाइएगा! '' पूनम ने चंडीदास को घूरते हुए कहा.

‘‘ ठीक है, आ जाऊँगा. '' चंडीदास ने बाहर निकलते हुए कहा.

अपने फ्‍लैट की ओर मंथर गति से चलते हुए चंडीदास उत्‍साह से भरा हुआ था.

���

पूनम के पास जाने के लिए चंडीदास पूरी तरह से तैयार होकर ठीक साढ़े आठ बजे अपने फ्‍लैट से बाहर निकला. उसके अंदर उथल-पुथल मची हुई थी. पैरों में कुछ कंपन भी थी और दिल की धड़कनें बढ़ गई थीं. उन्‍हें नियंत्रित करने के लिए चंडीदास ने कई बार गहरी सांस लिया.सड़क पर चलते हुए वह बार-बार चौंक जाता. फिर, इधर-उधर देखने लगता. जैसे सुनिश्‍चित करना चाहता हो कि उसे कोई देख नहीं रहा है. जगह-जगह खड़े बिजली के खंभों पर लगी हुई ट्‌यूबलाइटें रोशनी से जगमगा रही थीं. तभी अचानक बिजली चली गई.हर तरफ घना अंधेरा लहराने लगा.चंडीदास ने जैसे कुछ राहत महसूस किया.लगभग दौड़ते हुए पूनम के फ्‍लैट के सामने पहुँच कर धीरे से कॉलबेल का स्‍विच दबा दिया.

पूनम ने दरवाजा खोला. चंडीदास झट से ड्राइंगरूम में आकर सोफे पर पसर गया.

‘‘ मैं आपके लिए चाय बना कर लाती हूँ.'' पूनम ने कहा.

‘‘ चाय रहने दो! बस एक गिलास ठंडा पानी पिला दो! बहुत तेज प्‍यास लगी है...'' चंडीदास ने होठों पर जीभ फेरते हुए कहा.़

‘‘ लाती हूँ... '' कह कर पूनम अंदर चली गयी.

पानी लेकर पूनम वापस आई. चंडीदास गिलास का सारा पानी एक ही सांस में गटक गया.

पूनम चंडीदास के सामने बैठ गई.दोनों बातें करने लगे.

‘‘ प्रसाद जी को हर महीने लगभग कितनी तनख्‍वाह मिलती होगी सर! '' पूनम ने पूछा.

‘‘ यही कोई पच्‍चीस-छब्‍बीस हजार! क्‍यों ? प्रसाद तुम्‍हें बताता नहीं है क्‍या ? ''

‘‘ नहीं, मुझे कहाँ कुछ बताते हैं... हर महीने पाँच हजार रूपये पकड़ाते हुए कहते हैं कि इतने में ही पूरे महीने का खर्च चलाना.इससे अधिक एक पैसा नहीं मिलेगा...''

‘‘ फिर वह बाकी पैसों का क्‍या करता है ? बाकी पैसे रूबी पर खर्च कर देता होगा.'' चंडीदास ने स्‍वंय ही अपने सवाल का जवाब भी दे दिया.

‘‘ पता नहीं क्‍या करते हैं.'' पूनम ने मुंह बनाते हुए कहा. ‘‘ अभी पिछले हफ्‍ते की बात है. मैंने अपने लिए कुछ कपड़े खरीदने के लिए कहा तो बड़ी मुश्‍किल से मुझे लेकर मार्केट गए.एक दुकान में जाकर मैं अपने लिए सूट पसंद करने लगी.तभी ये सिगरेट पीने के लिए दुकान से बाहर चले गए.दुकानदार बहुत हंसमुख था. हंसते हुए मुझसे बातें करने लगा.उसकी किसी बात पर मैं भी हंसने लगी. तभी ये दुकान के अन्‍दर आए.इनका चेहरा ऐंठने लगा.मुझे डाँटते हुए कहने लगे- ‘‘ कभी-कभी ‘सीरियस' भी रहा करो! हर समय खीसें निपोरती रहती हो. '' मैं तो बुरी तरह से झेंप गई. घर लौटने के बाद भी इनका मूड ठीक नहीं हुआ.मुझसे लड़ने लगे.बात बढ़ गई तो बेंत से मुझे पीटने लगे. अभी तक मेरा हाथ सूजा हुआ है.देखिए न! '' पूनम ने अपना दांया हाथ चंडीदास की ओर बढ़ाते हुए कहा.

चंडीदास पूनम के दांए हाथ को पकड़ कर सूजन देखने लगा. कलाई के ऊपर तीन नीले निशान उभरे हुए थे. पूनम ने झट से अपनी कलाई को वापस खींच लिया.

‘‘ यह तो एकदम जानवरों जैसी हरकत है. छीः! मुझे तो अब प्रसाद से घृणा होने लगी है.अपनी बीवी पर हाथ उठाना कहाँ की मर्दानगी है. तुम्‍हें भी अब अपने अन्‍दर बदलाव लाना चाहिए... पूरी ताकत के साथ प्रसाद के इन अत्‍याचारों का विरोध करना चाहिए...''

‘‘ ...सर! अब मैं खाना लगा देती हूँ. खाना तैयार है.'' कहते हुए पूनम अन्‍दर चली गई.

पूनम ने खाना लगा दिया. चंडीदास खाना खाने लगा.

‘‘ पूनम! तुम खाना बहुत अच्‍छा बनाती हो. '' चंडीदास ने खाना खाते हुए कहा.

पूनम ने उसे कृतज्ञ दृष्‍टि से देखा.

खाना खाने के बाद चंडीदास कुछ सोचने लगा.

जब काफी देर तक चंडीदास कुछ नहीं बोला, पूनम ने मुस्‍कुराते हुए कहा-

‘‘ कहाँ खो गए हैं सर ?...''

चंडीदास चौंक गया.

‘‘ पूनम मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ...'' अचानक चंडीदास ने अटकते हुए कहा.

‘‘ तो कहिए न! क्‍या कहना चाहते हैं ? '' पूनम ने चंडीदास को घूरते हुए कहा.

कुछ देर तक मौन रहने के बाद चंडीदास ने धीरे से कहा,-‘‘ कालोनी में किसी को भी पता नहीं है कि मैं इस समय यहाँ पर हूँ, तुम्‍हारे साथ. कहो तो आज की रात यहीं रुक जाऊँ!..तुम्‍हारे साथ!...सुबह तड़के ही चला जाऊँगा. किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा...''

इतना सुनते ही पूनम का चेहरा अंगार की तरह लाल हो गया. उसने तड़पते हुए कहा,-‘‘ आप ये कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं सर! आपका दिमाग तो नहीं फिर गया है...? ''

चंडीदास ने भावुक होते हुए कहा,-‘‘ पूनम! मैं तुम्‍हें प्‍यार करने लगा हूँ...बस एक रात!...''

‘‘ प्‍यार करने लगे हैं, इसलिए एक रात मेरे साथ गुजारना चाहते हैं. क्‍यो ? आप तुरन्‍त यहाँ से चले जाइए! मैं तो आपको एक अच्‍छा इंसान समझती थी. लेकिन आप तो निहायत घटिया किस्‍म के आदमी निकले.'' पूनम ने बिफरते हुए कहा.

‘‘...आज की रात तो मैं तुम्‍हारे साथ ही सोऊँगा...'' कहते हुए चंडीदास ने पूनम को अपनी बाहों में जकड़ लिया. उसके मुंह से शराब की बदबू आ रही थी. पूनम का जी मिचलाने लगा.

‘‘ प्‍लीज! छोड़िए मुझे. इस समय आप होश में नहीं हैं... मैने कभी भी आपको इस दृष्‍टि से नहीं देखा. हमेशा आपको अपना बड़ा भाई समझती रही. '' पूनम ने स्‍वंय को चंडीदास की पकड़ से मुक्‍त करने की कोशिश करते हुए कहा.

‘‘ जानती हो पूनम! इस समय प्रसाद किसी आलीशान होटल के सुसज्‍जित कमरे में एक आरामदेह बिस्‍तर पर रूबी को अपनी बाहों में लिए हुए पड़ा होगा और तुम यहाँ सती-सावित्री बनी पतिव्रता-धर्म निभा रही हो...मैं तो कहता हूँ कि ‘‘ टिट फार टैट '' (जैसे को तैसा) - बस यही मौका है प्रसाद से हिसाब-किताब बराबर करने का....'' चंडीदास पूनम को उकसाने लगा.

‘‘ फालतू बकवास मत करिए!... मेरा पति चाहे जैसा भी है, आपसे तो अच्‍छा ही है. जो है, प्रत्‍यक्ष है,सबके सामने है.आपकी तरह दुहरी ज़िन्‍दगी तो नहीं जीता. आप सारी दुनिया के सामने तो संत बने फिरते हैं, लेकिन हकीकत में कितने गंदे हैं ? कितने गिरे हुए...'' पूनम ने गुर्राते हुए कहा.

‘‘ तुम कुछ भी कहो पूनम!...आज तो मैं तुम्‍हें अपना बना के ही रहूँगा...प्‍लीज पूनम! मुझे समझने की कोशिश करो!...'' चंडीदास घिघियाने लगा.

जब चंडीदास की बाहों का दबाव बढ़ने लगा पूनम ने पूरी ताकत के साथ चंडीदास को धक्‍का दिया. चंडीदास फर्श पर भहरा गया.

‘‘ मैं अभी बाहर जाकर कालोनी वालों को इकट्‌ठा करके आपकी करतूत के बारे में बताती हूँ.‘' पूनम ने दरवाजा खोलते हुए कहा.

‘‘ जा रहा हूँ...'' चंडीदास ने खिसियाते हुए कहा और एक झटके के साथ बाहर निकल गया.

पूनम ने झट से दरवाजा अंदर से बन्‍द कर लिया. फिर, फूट-फूट कर रोने लगी.

‘‘ आप बिलकुल चिंता मत करिए!...सब ठीक हो जाएगा...'' कामायनी ने चंडीदास के माथे को सहलाते हुए कहा.

चंडीदास एकाएक अपने वर्तमान में लौट आया.

(समाप्‍त)

-

-लक्ष्‍मीकांत त्रिपाठी

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