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June 2011
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क्‍या तुम्‍हारा दुख उससे बड़ा है ?

सात साल की वो मासूम

जो कचरे के ढेर से

एक जोड़ी चप्‍पल मिलने पर खुश है

अपनी छोटी बहन को पहना कर

नाप देखती, फिर उतारती

फिर पहनाती और ......................

मायूस हो जाती ,सही माप न आने पर

फिर लग जाती अपने काम में

जैसे समझ लिया हो नंगे पांव

चलना ही उसकी नियति हो

क्‍या तुम्‍हारा दुख उससे बडा है ?

 

वो बूढ़ा जो उस भव्‍य शामियाने के

बाहर खड़ा है उम्‍मीद से कि

शादी के बाद बचा खाना

शायद फेंका जाए तो

कुछ खाना उसे भी मिल सके

पर यहां कुछ आधुनिक तरह का भोज

जिसे पर प्‍लेट पे सिस्‍टम कहा जाता

सो कुछ भी बाहर ना फेंका गया

भूखे या आधे पेट रहना ही

उसकी नियति है मान लिया उसने

क्‍या तुम्‍हारा दुख उससे बडा है ?

 

जो बारह वर्ष की उम्र में

पढ़ाई छोडकर दस घरों का

चौका बर्तन करती है ,जिससे

उसके बाकी के चार और

भाई बहनो का भर सके पेट

कभी कभी काम वाले घरों में

खिलौनों और किताबों को

उम्‍मीद से देखती है, फिर

फ्राक मोड़ काम में जुट जाती

जैसे कि अब यही उसकी नियति है

क्‍या तुम्‍हारा दुख

इन सबसे बडा है ?

 

अगर तुम्‍हे अब भी लगता है

कि हाँ..............तो ,तुम

इस पृथ्वी के सबसे दुखी व्‍यक्‍ति हो

कि तुम्‍हारे पास जीवन जीने की

मूलभूत चीजें भी नहीं है

और तुम इन सबसे भी

गए बीते हालात में हो

तब तो तुम्‍हें बेशक मर जाना चाहिए

मर ही जाना चाहिए।

 

अनीता मिश्रा

लड़की को लड़का बनाने की चाहत

पितृसत्तात्‍मक मानसिकता और जीव वैज्ञानिक रूढ़िवाद हमारे देश के जन-मानस में कितनी गहरी पैठ बनाए हुए है, इसका पता लिंग परिवर्तन के लिए की जा रही उन शल्‍य क्रियाओं से चलता है, इनके जरिए लड़की को लड़का बनाया जा रहा है। समाज में बेटे की उग्र चाहत के चलते अभी तक हम कोख में ही गर्भ जल परीक्षण प्रणाली (अल्‍ट्रा साउण्‍ड) के जरिए कन्‍या भू्रण की पहचान कर उसे कोख में ही मार डालने के वीभत्‍स कारनामों से परिचित थे, लेकिन अब इस प्रणाली की

अगली कड़ी ‘जेनिटोप्‍लास्‍टी' तकनीक जन्‍म ले चुकी है। इसके मार्फत मासूम बालिकाओं का वजूद खतरे में पड़ गया है। हाल ही में एक अंग्रेजी दैनिक ने पर्दाफाश किया है कि मध्‍यप्रदेश के इन्‍दौर में एक से पांच वर्ष तक की अबोध बालिकाओं का लिंग परिवर्तन कर उनका बालकों के रूप में कायांतरण कर अमानवीय कृत्‍य किया जा रहा है। अब तक सैंकड़ों बालिकाएं इस कायांतरण की प्रक्रिया से गुजर चुकी हैं। इस सिलसिले में चिकित्‍सकों की दलील तो यह है कि जिनका लिंग परिवर्तन किया गया है, वे बच्‍चे न तो पूर्ण स्‍त्री होते हैं और न ही पूर्ण पुरूष। मसलन ये हिजड़ों की नस्‍ल के होते हैं। लेकिन यह झूठ लालची चिकित्‍सकों द्वारा किए जा रहे पाप पर पर्दा डालने की कोशिश भर है। हकीकत तो यह है कि सामान्‍य बालिकाओं का ही लिंग परिवर्तन कर उन्‍हें बालकों के रूप में तब्‍दील किया जा रहा है। किसी लड़के को लड़की बनाए जाने की जानकारी सामने नहीं आई है।

पुत्र की चाहत ने जहां हमारे समाज को अंध विश्‍वासी बनाने का काम किया है, वहीं इस बीमार मानसिकता का दोहन हमारे लालची और जाहिल चिकित्‍सक धन-लिप्‍सा के चलते कर रहे हैं। लिंग परिवर्तन की इस प्रक्रिया में बहाना तो यह बनाया जा रहा है कि चिकित्‍सक केवल उन बच्‍चों को जीवनदान दे रहे हैं जो जन्‍मजात अधूरे जननांग लेकर पैदा हुए हैं। मसलन वे न पूर्ण बालक हैं और न ही बालिका। इसे ठीक से समझने के लिए यूं भी परिभाषित कर सकते हैं कि ऐसे बच्‍चे जिनके बाहरी जननांग तो स्‍त्रियों के हैं, लेकिन दुर्भाग्‍य से अंदरूनी पुरूषों के हैं। लिहाजा इंटरसेक्‍स या हिजड़ों का अभिशाप ये बच्‍चे क्‍यों भोगें, इसलिए वे इन्‍हें चिकित्‍सीय तकनीक के जरिए एक संपूर्ण व्‍यक्‍तित्‍व देकर अपंग मानव जाति के लिए पुण्‍य का काम कर रहे हैं। यह दलील इसलिए बेवुनियाद है क्‍योंकि अब तक जितनी भी जानकारियां उजागर हुई हैं, उनके जरिए लड़कियों को लड़कों में रूपांतरित किया गया है। ठीक वैसे ही, जैसे कि गर्भ में लिंग की पहचान के बाद लड़की को मार दिया जाता है। हालांकि ये रूपांतरित बालक भी वयस्‍क होने पर संतान पैदा करने में सक्षम नहीं होंगे, इसके बावजूद इन्‍हें अभिभावक कालांतर में वंश वृद्धि का जरिया मानकर चल रहे हैं।

अब तक इस प्रणाली का प्रचलन थाईलैण्‍ड, मलेशिया और सिंगापुर में था। इन देशों में हमारे देश के धनाढ्‌य लोग पुत्र की चाह में अभी भी जाते हैं। जिससे की वे जेनिटोप्‍लास्‍टी तकनीक के जरिए चिकित्‍सालय में ही गर्भाधान कराकर लड़की को लड़के के रूप में तब्‍दील कराकर स्‍वदेश लौट आएं। और किसी को खबर भी न लगे कि उन्‍होंने पुत्री को पुत्र में तब्‍दील होने का घिनौना कृत्‍य किया है। लेकिन अब इन्‍दौर के चिकित्‍सक ही लिंग परिवर्तन की इस अनूठी पद्धाति में पारंगम हो गए हैं। ये पश्‍चिमी देशों से प्रशिक्षित होने का दावा भी करते हैं। हकीकत में जिन नवजात बच्‍चियों का लिंग परिवर्तन किया जा रहा है, जरूरी नहीं कि वे अधूरा व्‍यक्‍तित्‍व लेकर पैदा हुई हो ? दरअसल खुद माता-पिता पुत्र मोह में स्‍वस्‍थ और संपूर्ण स्‍त्री का लिंग परिवर्तन कराने में जुटे हैं। उपचार के लिए लाई गई ऐसी बच्‍चियों के शरीर में पहले कुछ हारमोन डाले जाते हैं, जिससे विपरीत लिंगी अंग और लक्षणों का उभार शरीर में दिखाई देने लगे। फिर ऑपरेशन के जरिए लड़की का लड़के में कायांतरण कर दिया जाता है। हालांकि चिकित्‍सा विज्ञान का मानना है कि ये पुरूष संतान तो पैदा नहीं कर पाएंगे, लेकिन नपुंसक भी नहीं होंगे। यह दलील ऐसे अभिभावकों के लिए एक चेतावनी भी है जो वंश वेल जारी रखने के नजरिए से लिंग परिवर्तन करा रहे हैं। इस ऑपरेशन में महज डेढ़ से दो लाख रूपए खर्च आता है। कन्‍या के प्रति यह नजरिया रखने वाले माता-पिता के लिए यह कोई बड़ी धन राशि नहीं है। यही वजह है कि इन्‍दौर में दिल्‍ली, मुंबई और कोलकाता से पुत्र प्रेमी दंपतियों का तांता लगा है।

ये हालात पुरूष की तुलना में स्‍त्रियों की संख्‍या घटाने में बड़ा कारण बनने जा रहे हैं। करीब तीन माह पहले आए जनगणना के आंकड़ों में बच्‍चा-बच्‍ची का अनुपात बिगड़ने की स्‍थिति सामने आने पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कन्‍या भू्रण हत्‍या को राष्‍ट्रीय शर्म माना था। एक तरफ देश में महिलाएं कामयाबी के लगातार मील के पत्‍थर गाड़ रही हैं, वहीं उन्‍हें अवांक्षित मानकर हत्‍या की जा रही है। राजनीति में महिलाओं का जबरदस्‍त दखल उभरकर सामने आने के बावजूद भारतीय समाज अभी भी स्‍त्रीजन्‍य पुरातन मानसिकता और पूर्व ग्रहों में जकड़ा हुआ है। देश में जो तबका सबसे ज्‍यादा उच्‍च शिक्षित, उच्‍च पदस्‍थ व संपन्‍न है, इसी तबके के बीस फीसदी परिवारों में कन्‍या भू्रण हत्‍या जारी है। नतीजतन नई जनगणना के मुताबिक उच्‍च तबकों में प्रति हजार पुरूषों पर 750 स्‍त्रियों का अनुपात सिमटकर रह गया है। जबकि जिस तबके को हम पिछड़ा, अशिक्षित, वंचित और तमाम रूढ़ि और जड़ताओं का जिम्‍मेबार मानने का मुगालता पाले हुए हैं, उनके बीच बालिकाओं में आशातीत वृद्धि दर्ज की गई है। इसी विसंगति के चलते हरियाणा और पंजाब जैसे समृद्धशाली प्रदेशों में तो ये हालात पैदा हो गए हैं कि यहां के लड़कों को दुल्‍हिनें नहीं मिल रहीं, लिहाजा इनकी पूर्ति ओड़ीसा और छत्तीसगढ़ के पिछडे़ माने जाने वाले क्षेत्रों से लड़कियां खरीदकर वधुओं के रूप में लाई जा रही हैं।

जेनिटोप्‍लास्‍टी एक नई तकनीक है इसलिए अभी इसे प्रतिबंधित करने संबंधी कोई स्‍पष्‍ट कानून नहीं है। अल्‍ट्रासाउण्‍ड परीक्षण की तरह प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम 1994 (पीएनडीटी एक्‍ट) की तरह इस बावत भी कड़े कानूनी प्रावधान बनाया जाना जरूरी है। इसके बावजूद यह एक अच्‍छी बात है कि इन्‍दौर की इस घटना का अखबार में खुलासे के तत्‍काल बाद ‘राष्‍ट्रीय बाल संरक्षण एवं अधिकार आयोग (एनसीपीसीआर) ने इसे संज्ञान में लेकर प्रदेश सरकार को जांच के निर्देश दिए हैं।

आधुनिक चिकित्‍सा तकनीक तथा सूचना और प्रौद्योगिकी का जैसे-जैसे इजाफा हो रहा है, वैसे-वैसे स्‍त्री जाति के अस्‍तित्‍व पर खतरा मंडराता जा रहा है। इंटरनेट ने जहां दुनिया को बहुत छोटा कर दिया है, वहीं इसके चौंकाने वाले खतरे भी कम नहीं हैं। इंटरनेट पर ‘चूज द सेक्‍स ऑफ योर बेबी डाट कॉम', ‘4' जेंडर सलेक्‍शन डाट कॉम और ‘प्रेग्‍नेंसी स्‍टोर डाट कॉम' जैसे वेब ठिकानों पर गर्भस्‍थ शिशु के लिंग परीक्षण संबंधी सेवाएं और सामग्री हासिल हैं। इन साइटों पर पेश किए गए लिंग निर्धारण किट खरीदकर के घर पर ही डीएनए विश्‍लेषण के माध्‍यम से भू्रण लिंग बताने में मदद करते हैं। इन कंपनियों के विज्ञापन लगातार जारी है। एक वेबसाइड पर पेश विज्ञापन में किट का नाम ‘बेबी जेंडर मेटर होम डीएनए टेस्‍ट किट' है। अमेरिका और कनाडा में ऐसे किट्‌स की कीमत 15 से 20 हजार रूपए है।

ऐसी आसान सुविधाओं के चलते ही चिकित्‍सा जगत की अंतरराष्‍ट्रीय पत्रिका ‘लैंसेट' ने अपने एक अध्‍ययन के जरिए बताया है कि भारत में पिछले तीन दशक के दौरान एक करोड़ 21 लाख कन्‍याओं को गर्भ में ही मार डाला गया। कानूनों के अमल में ढिलाई और प्रशासनिक भ्रष्‍टता के चलते हम इस तथ्‍य को एकाएक झुठला भी नहीं सकते। इन हालातों से यह जाहिर होता है कि पुत्र मोह से जुड़ी मानसिकता जहां पितृसत्तात्‍मक रूढ़ियों को संजीवनी दे रही हैं, वहीं वैज्ञानिक तकनीक की आसान उपलब्‍धता इसे अभिशाप में बदलने का काम कर रही है। लिहाजा कन्‍या भू्रण हत्‍या और लिंग परिवर्तन जैसे कारनामों को हर स्‍तर पर प्रतिबंधित करना तो जरूरी है ही, मां को भी अपनी ही कोख से पैदा होने वाली बच्‍ची की रक्षा के लिए आवाज बुलंद करनी जरूरी है, अन्‍यथा बेटियों को परिवार व समाज में वाजिब हक व जगह मिलना मुश्‍किल ही है।

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pramod.bhargava15@gmail.com

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है ।

     

बीते हुए दिन
मस्तीभरी अब वो शमाँ नहीं है
पहले जैसी यह जहाँ  नहीं है.

ग़ुम है मतवाली कोयल की कूक
साबुन,पानी,बुलबुले और फूँक .

कहाँ  है वो फुर्सत के  लम्हे!
अब रहते है सब सहमे-सहमे

आँगन में गौरैया का फुदक-फुदकना
बाहर बच्चों का वो   कूद-कुदकना

राजा-रानी की वो सरस-कहानी
इस युग के बच्चों ने कहाँ है जानी !

सरसों के वो पीले फूल दहकते,
अब किसी से कुछ क्यूँ नहीं कहते!

पेड़ो पर चढ़ना,छुप कर  सो जाना
तब होती थी ये बातें रोजाना.

टायर लुढ़काते जाना विश्व-भ्रमण
किस्सों में हरिश्चंद्र और श्रवन.

गुड्डे-गुड्डियों की धूमधाम से शादी,
टीवी-विडियो ने कबकी बंद करवा दी

चंदा मामा दिन में कहाँ है जाते?
ऐसे प्रश्न अब  कम  ही  आते.

रेडियो के अंदर कौन बोल रहा है?
अँधेरे में डाली पर कौन डोल रहा है?

लंगड़ी मैना की ऐसी चाल है क्यूँ?
बंदर के पीछे आखिर लाल है क्यूँ?

पेड़ो के पत्तों की वो सरसराहट
अँधेरे में अनजानी कोई आहट.

बांस-खोपचे के बने वो 'मवनी
मवनी भर 'लाइ',एक चवन्नी.

अलकतरे के बने,बिकते वो लट्टू
मरते थे जिसपर बब्बन और बिट्टू.

चने के भूंजे, सोंधी मकई के लावा
अब तो मैग्गी,चाऊ  पे धावा

पेड़ों पर सर्र से चढ़ती गिलहरियाँ
नील गगन में वगुलों की लड़ियाँ

ऊंचे पेड़ों पर आकर बैठा तोता
देख-देख मन कितना खुश होता!

गूंजती चैती,बिरहा और फाग
देसी घी की लिट्टी, चने की साग .

भोरे-भोरे जाना गंगा-स्नान
खेतो में  पुतले और मचान

जान-बुझकर  बारिश में भींगना
फिर डर के मारे धीरे से छींकना

लकड़-सुंघवा का डर ,लकड़ी सुंघाना
दिन में ना सोने का तरह-तरह बहाना .

जाड़े में सब बैठते अलाव को घेरे
कैसे-कैसे गप्प,किस्से बहुतेरे .

आसमान में है कितने तारे ,अब
गिनते-गिनते परेशां बच्चे सारे.

क्या कभी नहीं बोलते मौनी बाबा?
कहां है काशी ?कहां है काबा?

क्या नाक रगडने से मिलते भगवान्?
नाक हुई लहू-लुहान ,अरे नादाँ!

दोने में जलेबी, उसपर गिद्ध-झपटना
पानी-जहाज से जाना  पटना .

दूध आता धाना-फुआ के घर से
उनके बिना सब दूध को तरसे

घर में बाबूजी की ग़ज़ब डिसिप्लिन
कोई काम पूरी होती ना माँ बिन

हर संकट-मोचक के रूप में माँ
अब कोई इस जग में कहाँ !
 

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v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS
BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

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अपनी कविता पढ़कर

 

अपनी कविता पढ़कर

उसे याद करता

भूली भूली  सी याद को

फिर आंखों भरता हूँ

खड़ी है

अब भी वही

देख रही है मुझ को

ह्दय हर कोने में उसको ही पाता हूँ

शब्द होते नदी नदी

शब्द होते सागर सागर

प्यार ही प्यार  से दूर हो जाता ।

 

मेरे कमरे मै तितली आई

 

मेरे कमरे मै तितली आई

मन में खुशियां भर लाई

चहक गया सारा संसार

पंख फैलाये वह आई  ।

 

नयन- सुंदर-सें

मृग के नयन - फीके थे

बात – बात- मुस्कुराती

जीवन मे चाह जगाती ।

 

हर चीज मुझे - सुहाती

तुम ही मेरे हो-

कहते – कहते  रूक सी जाती

मेरे कमरे मै तितली आई ।

 

यह उसका प्यार मुझे प्यारा

लगता-

आवाज देने पर चुप - सा रहता

मेरे कमरे मै तितली आई ।

मुहब्बत तेरी मेरी कहानी के सिवा क्या है,
विरह के धूप में तपती जवानी के सिवा क्या है।

तुम्हारी दीद की उम्मीद में बैठा हूं तेरे दर,
तुम्हारे झूठे वादों की गुलामी के सिवा क्या है।

समन्दर ने किनारों की ज़मानत बेवजह क्यूं ली,
इबादत-ए-बला आसमानी के सिवा क्या है।

तेरी ज़ुल्फ़ों के गुलशन में गुले-दिल पीला पड़ जाता,
तेरे मन में सितम की बाग़वानी के सिवा क्या है।

पतंगे-दिल को कोई थामने वाला मिले ना तो,
थकी हारी हवाओं की रवानी के सिवा क्या है।

न इतराओ ज़मीने ज़िन्दगी की इस बुलन्दी पर,
हक़ीक़त में तेरी फ़स्लें, लगानी के सिवा क्या है।

शिकम का तर्क देकर बैठा है परदेश में हमदम,
विदेशों में हवस की पासबानी के सिवा क्या है।

ग़रीबों के सिसकते आंसुओं का मोल दानी अब,
अमीरों के लिये आंखों के पानी के सिवा क्या है।

मुक्त होती औरत - प्रमोद भार्गव

समीक्षा - कथा संग्रह - मुक्‍त होती औरत -

समकालीनता की दास्‍तान ‘मुक्‍त होती औरत'

समीक्षक - शीना एन. बी.

स्‍वस्‍थ सामाजिक जीवन के निर्माण के लिए सुदृढ़ राष्‍ट्रीय एवं आर्थिक परिस्‍थितियों की तरह स्‍वस्‍थ भावनात्‍मक तत्‍वों की भी अह्‌म भूमिका है। दूसरे शब्‍दों में कह सकते हैं कि भावनात्‍मक अंशों में प्रतिबंध लगाना स्‍वस्‍थ सामाजिकता के खिलाफ है। ऐसी ही एक भावनात्‍मकता है प्रणय। प्रणय हर एक मनुष्‍य का हक है। क्‍योंकि यह एक जैविक जरूरत एवं जिन्‍दगी की तीव्रताओं को अतिक्रमित करने की आत्‍मीयता भी है। यह शरीरबद्ध हो सकता है या नहीं भी हो सकता है। लेकिन एक विकल समाज प्रणय जैसे मूल्‍य को स्‍वीकारने के लिए कभी भी तैयार नहीं है। फलतः प्रणय सदा कपट सदाचार के चाबुक से प्रताड़ित होता है।

‘सदाचार' अधिकार का एक विकृत रूप है। किसी भी मूल्‍य का अस्‍तित्‍व उसे स्‍वीकार नहीं। सवाल यह है कि किस प्रकार ‘सदाचार' प्रणय रूपी मूल्‍य का हनन करता है। ‘सदाचार' प्रणय को अपने विशाल अर्थ एवं संदर्भ में देखने के लिए तैयार नहीं, क्षणिक भोग में सिमटकर दिखाता है। पर शारीरिक मिलन प्रणय का पूर्ण रूप नहीं, बल्‍कि यह तो इसका अंश मात्र है। प्रणय का यह अवमूल्‍यन भावनात्‍मक अराजकता के अलावा कुछ भी नहीं छोड़ता। कहानी संग्रह की ‘सती का सत' कहानी में कनकलता नामक स्‍त्री पात्र ऐसे ही अराजकता का शिकार है। वह जीवन की संध्‍यावेला में पहुंची एक विधवा है। अपनी पैंतालीस उम्र में विधवा बनी कनकलता दूसरा विवाह न करके बच्‍चों की परवरिश में जुट जाती है। अब बच्‍चे सब अपने-अपने भविष्‍य बना चुके हैं। कनकलता अब अकेली रहती है और वह अपनी जिन्‍दगी के नष्‍टप्रायः प्रणय की संभावनाओं के बारे में सोचकर चिंतित है। शारीरिक मिलन की जिस जैविक आवश्‍यकता से वह बरसों से वंचित रही थी, अब उसे तड़फाने लगी है। यौवन की अपेक्षा प्रौढ़ावस्‍था में उपजी उसकी यह चाह शारीरिक जरूर है, पर वह मात्र शारीरिक भी नहीं है। शारीरिक मिलन के जरिए वह अपनापन के उस क्षण को पाना चाहती है, जहां पहुंच कर वह अपने जीवन भर के तनाव, अकेलापन और थकान को दूर कर सके। प्रणय की यह भावनात्‍मक तृष्‍ति हर एक स्‍त्री का हक है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि स्‍त्री का यह नष्‍टप्रायः हक किसी ‘प्रगतिशील सामाजिक सोच' को परेशान नहीं करता। परिणामतः स्‍त्री समाज के प्रति अपने संपूर्ण कर्त्तव्‍यपालन के बाद भी आंतरिक तौर पर निर्जीव महसूस करती है।

प्रणयविहीन अवस्‍था से जन्‍मी स्‍त्री की आंतरिक निर्जीवता, कई आर्थिक एवं सामाजिक कारणों से भी प्रबल बनती है। ‘किरायेदारिन' कहानी की विधवा भी इन्‍हीं आर्थिक एवं सामाजिक कारकों से बार-बार प्रताड़ित होती है। तब वह किसी मर्द से पुनः विवाह करने की इच्‍छा प्रकट करती है। यहां प्रणय का अतिजीवन पक्ष उजागर होता है। प्रणय के सुरक्षा कवच में जीने की इच्‍छा प्रकट करने वाले स्‍त्री पात्र को उसके चरित्र विकास के संदर्भ में लेखक ने उसे ‘मर्द औरत' तो जरूर कहा है। पर उसकी इस इच्‍छा के पीछे तो मर्दानापन कम और स्‍त्रीत्‍व ज्‍यादा है। क्‍योंकि जिंदगी की कठोरता के बीच में भी वह कोमल पक्षों का मूल्‍य बखूबी समझती है। स्‍त्रीत्‍व की यह समझ ‘मुक्‍त होती औरत' की मुक्‍ता में भी देख सकते हैं। फलतः वह आध्‍यात्‍मिकता के चोले को उतारकर, स्‍थित सदाचार को कपट घोषित करके, हिम्‍मत के साथ प्रणय की आत्‍मीयता में तल्‍लीन होती है। यहां आध्‍यात्‍मिकता की अपेक्षा प्रणय जैसे मूल्‍य का चुनाव एक क्रांति है। क्‍योंकि प्रणय की संभावनाओं की अवहेलना करके एक परिष्‍कृत समाज की निर्मिति संभव नहीं है।

इस संग्रह में जनतांत्रिक गतिविधियों की परख करने वाली कई कहानियां हैं। यहां जनतंत्र से तात्‍पर्य सिर्फ बहुमत की गिनती से नहीं है। जनतंत्र एक संस्‍कृति है, लेकिन आज जनतंत्र का यह सांस्‍कृतिक पक्ष विलुप्‍त होता जा रहा है। क्‍योंकि जनतंत्र व्‍यवस्‍था में सबसे अधिक उपेक्षा जिनकी होती है वह है, जनता बनाम आम-आदमी की। फिर भी आम-आदमी की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति सारे वर्चस्‍ववादियों की आइडियोलजी है। यह वर्चस्‍ववादियों को एक समाजवादी छवि प्रदान करती है। आइडियोलजी का यह अपहरण बिल्‍कुल एक गंभीर समस्‍या है। समाजवाद के छद्‌म छवि रखने वाले कई स्‍वार्थी एवं वर्चस्‍वलोलुप लोग कभी क्रांति के नाम पर और कभी आतंकवाद के दबाव के नाम पर आपस में मुठ-भिड़ते हैं। दुर्भाग्‍य की बात है कि इस मुठ-भेड़ का सबसे बड़ा शिकार वह आदमी हैं, जिनका इन मुठ भेडों से किसी प्रकार का संबंध ही नहीं है। ‘मुखबिर' कहानी इस यथार्थ का खुलासा है। इसमें गंगाराम गड़रिया नामक गरीब आदमी सत्ताधारियों एवं डकैतों के बीच में पड़ जाता है। उसके सामने उन लोगों की तरह कोई सैद्धांतिक समस्‍या नहीं है। उसकी सिर्फ एक ही समस्‍या है, वह है भूख। यह वह भूख है, जो उसे इन दोनों के बीच ले जाती है। लेकिन उसकी यह भूख न डकैतों की समस्‍या, है न अधिकारियों की। लेकिन दोनों लड़ते हैं, उन जैसों के नाम। कहानी के अंत में गंगाराम अधिकारियों एवं डकैतों के बीच होने वाले एक शर्मनाक समझौते का साक्षी बनता है। यह समझौता वास्‍तव में आम-आदमी के अस्‍तित्‍व को मिटाने का षड्‌यंत्र ही है। इससे यह स्‍पष्‍ट जाहिर होता है कि जनता के नाम पर जो लोग यहां स्‍थित हैं, वे लोग वास्‍तव में जनता के खिलाफ हैं।

जनतंत्र का मूल्‍यांकन उसकी उदार नीतियों के संदर्भ में भी करना जरूरी है। महिला आरक्षण विधेयक की चर्चा इस संदर्भ में परिणति है। लेकिन एक उदार जनतांत्रिक दृष्‍टिकोण की परिणति है। लेकिन इस उदार कानून के बावजूद भी

स्‍त्रियों को राजनीतिक सहभागिता का हक मिलने की बात संदिग्‍ध है। जिन लोगों को अधिकार की आदत पड़, गयी है वे लोग कभी भी इसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। वे लोग ऐसी स्‍त्रियों को टिकट देंगे, जो या तो उनके सगे-संबंधी हैं या उन्‍हें, जिसे वर्चस्‍ववादियों की गुलामी करने के अलावा किसी से कोई सरोकार ही नहीं है। ‘जूली' कहानी की जूली नामक आदिवासी महिला चुनाव तो जीत लेती है, पर वह जनतंत्र की प्रतिबद्धताओं से वंचित है। उसके लिए मालिकों का आज्ञा पालन ही सबसे बड़ा धर्म है। यहां जन-प्रतिनिधि वर्चस्‍व का प्रतिनिधि बन गया है। जनतांत्रिक व्‍यवस्‍था में जन-प्रतिनिधित्‍व की बात वास्‍तव में एक छल है। यहां वह व्‍यक्‍ति ही जन-प्रतिनिधि बन सकता है, जो वर्चस्‍व का प्रतिनिधि बनने के लिए तैयार है। अन्‍यथा उसे किसी भी पार्टी का टिकट मिलना तक मुश्‍किल है। ‘कहानी विधायक विद्याधर शर्मा की' शीर्षक कहानी भी इसी विषय पर केंद्रित है। ये कहानियां व्‍यक्‍त करती हैं कि स्‍थित जनतंत्र व्‍यवस्‍था बाहरी तौर पर ही उदार है। यहां जनतंत्र के सांस्‍कृतिक पक्ष की निरंतर अवहेलना होती रहती है। ऐसा जनतंत्र बेशक एक अपसंस्‍कृति है।

विकल जनतंत्र व्‍यवस्‍था का सह-उत्‍पाद है, पूंजीवाद ! पूंजीवाद का बदलता स्‍वरूप समकालीन कहानी का विषय है। ‘गंगा बाटाईदार' कहानी इस पर केंद्रित है। इसमें पूंजीवाद कहीं भी किसी के प्रति कठोर नहीं है। सभी के प्रति वह ‘उदार' है। अपनी ‘उदारता' से वह किसानों को झूठे सपने दिखाता है। इसके लिए वह जैविक संभावनाओं तक को भी व्‍यापार तंत्र का हिस्‍सा बना देता है। इस गूढ़ तंत्र का परिणाम है किसान का अपने खेत से बरखास्‍त होना, पर सरकार तो अब भी खेती के लिए तरह-तरह की उदार नीतियां बना रही है। तरह-तरह की सब्‍सिडियां दे रही है। जब ज्‍यादातर किसान अपने खेत से भगा दिया गया है तो ऐसी नीतियों का क्‍या फायदा ? सवाल यह भी है कि आखिर यथार्थ से आंख मूंदकर नीतियां किसके लिए बनायी जा रही हैं।

पूंजीवाद का अस्‍तित्‍व आज जितना प्रत्‍यक्ष है, उतना ही अप्रत्‍यक्ष भी है। आज पूंजीवाद हर एक व्‍यक्‍ति के मन मस्‍तिष्‍क में विद्यामान है। फलतः व्‍यक्‍ति सिर्फ एक ही पैमाने से सभी स्‍थितियों को आंकता है, वह है लाभ। ‘पिता का मरना' कहानी में पिता एक सरकारी कर्मचारी हैं। अब वह बीमार होकर अस्‍पताल में लेटा हुआ है। लाइलाज अवस्‍था में पहुंच चुके उसके इलाज पर अब और पैसा खर्च करना फिजूलखर्ची जताकर उसकी पत्‍नी और बेटे उसे ग्‍वालियर अथवा दिल्‍ली ले जाने से इनकार कर देते हैं। वे सोचते हैं कि पिता के मरने पर बेटे को अनुकम्‍पा नियुक्‍ति मिल जाएगी। बीमा, भविष्‍यनिधि और ग्रेच्‍युटी से बेटी का ब्‍याह ढंग से संपन्‍न हो जाएगा। प्रस्‍तुत कहानी में पिता के मरने के पहले ही एक और मौत हुई है, वह है परिवार वालों की संवेदना की। यह मौत अत्‍यंत खतरनाक है।

संवेदन शून्‍य आदमी यंत्रों के समान है। यंत्र हमेशा सूचनाओं से संचालित हैं। भावनाओं और अनुभवों की दुनिया से उसका कोई संबंध ही नहीं है। आदमी जब यंत्र बनाता है तो वह संस्‍कृति के आधार बने इन तबकों से कोसों दूर चला जाता है। तब सारे रिश्‍ते-नाते उसके लिए अनुभव न बनकर, निभाने की औपचारिकता मात्र बनकर रह जाते हैं। तब वह ‘परखनली का आदमी' मौत की खबर सुनकर, भावना शून्‍य होकर कंप्‍यूटर में ऐसा शोक-संदेश प्रेषित कर सकता है कि आकस्‍मिक मृत्‍यु पर मुझे बेहद दुःख हुआ। ईश्‍वर उनकी आत्‍मा को शांति प्रदान करे। मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित।''

पूंजीवादी स्‍थितियों की विकरालता का आकलन करना मात्र समकालीन कहानी का उद्‌देश्‍य नहीं है। इन स्‍थितियों का प्रतिरोध लेखन का उद्‌देश्‍य है। ‘इंतजार करती मां कहानी की आयुषी बहुत ही महत्‍वाकांक्षी है। अपनी काबिलियत से वह उपलब्‍धियों की कई सीढ़ियां चढ़ती गयी। लेकिन जब उसे यह पता चलता है कि ‘नो सेक्‍स सिंड्रोम' की वह गिरफ्‍त में वह आ गई है और इस कारण से वह मां नहीं बन सकती है, तो वह सारी महत्‍वाकांक्षाएं एवं उससे मिलने वाली उपलब्‍धियों को छोड़ने के लिए तैयार हो जाती है। यहां कहानी यह घोतित करती है कि जिन्‍हें हम उपलब्‍धियां कहते हैं, वे वास्‍तव में उपलब्‍धियां हैं ही नहीं। क्‍योंकि इनका आधार सिर्फ आर्थिक है, मानवीय नहीं।

प्रमोद भार्गव की कहानियों में व्‍यक्‍ति की आंतरिक अनुभूतियों को अतिसूक्ष्‍म धरातल पर उतारा है। ये आंतरिक अनुभूतियां सामाजिक अंतर्विरोधों की तीक्ष्‍णताओं को दर्शाने का उपक्रम हैं। वैयक्‍तिक एवं सामाजिक संतुलितावस्‍था की मांग इन कहानियों का लक्ष्‍य है।

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SHEENA N.B.

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Post Office Kanbsasankadavu

Thrissur Dist.

Keral-680613

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टीप - संपूर्ण कहानी संग्रह आप रचनाकार के जनवरी 2011 के पृष्ठों में पढ़ सकते हैं.

त्रिकोणीय

harish naval

न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी

बचपन में एक गाना सुनते थे, ‘मधुवन में राधिका नाची रे।' कितनी भली थी तब राधिका जो बिना किसी हील ओ, हुज्‍जत के नाच लेती थी। वह मधुवन ‘मधु' नामक राक्षस के नाम से था जो कालान्‍तर में ‘वृन्‍दावन' कहलाने लगा था। कहते हैं मधु के नाम से ही ‘मथुरा' नगरी थी जो ‘मथुरा' में बदल गई। ‘मधु' का वध किया श्रीकृष्‍ण ने। श्रीकृष्‍ण की ही प्रेयसी, प्रेरणा थी राधा जो खुद भी नाचती थी और श्रीकृष्‍ण को भी नचा लेती थी। जिसे ‘रास' का नाम दिया गया। लगभग साढ़े पांच हजार साल पहले द्वापर-युग की वह राधा एक शालीन राधा थी, तभी बिना किसी शर्त के कर्मरत रहती थी।

कलियुग की राधा नाचना जानती है, नाच सकती है लेकिन सशर्त नाचती है। किसी भी दफ्तर में चले जाइए, एक ‘फाइल' इस टेबल से उस टेबल तक बिना शर्त के जा नहीं सकती। राधा एक प्रतीक है। राधा एक संकेत है। राधा एक इरादा है। यह राधा-राधा ही क्‍यों? कुछ भी हो सकती है। राधा क्‍लर्क है, राधा अफसर है, राधा प्रशासक है, राधा छात्रा है, राधा अध्यापिका है, राधा इंजीनियर है, राधा डॉक्‍टर है। राधा लेखिका है. . .यानी राधा बहुत कुछ है. . . मिलिए पहले उस राधा से जिसे कहा गया कि भई, तुम्‍हें नाचना है, तुम्‍हारी नियुक्‍ति इसीलिए हुई है कि तुम नाचो।

वह तैयार है लेकिन उसकी एक शर्त है कि पहले नौ मन तेल लाओ फिर नाचूंगी। नाचने का तेल से क्‍या संबंध, यह शोध का विषय है। ब्‍यूटी पार्लर जाना होता, मसाज करानी होती तो भी बात थी, तब भी नौ मन तेल से पार्लर के लिए पांच साल तक का स्‍टाक हो जाता। घुंघरु मांगती तो वाजिब था। विशेष लहंगा, चूनरी, आभूषण चाहती तो बात थी लेकिन उसे तो चाहिए तेल वह भी नौ मन। जब यह कहावत बनी तब मीट्रिक प्रणाली का माप-तौल नहीं था, वह तो आया लगभग पैंतीस-चालीस साल पहले। यानि यह तेल वाली राधा की घटना कम से कम चालीस-पचास साल पहले की तो है ही। तेल उस समय एकत्रित किया गया होगा लेकिन तौल में नौ मन नहीं हुआ होगा, लिहाजा राधा नहीं नाची होगी।

अब राधा होती है कुछ ऐसी- राधा दफ्तर में काम करती है। साढ़े आठ बजे घर का काम निपटा बस में बैठ या खड़े होकर दफ्तर आती है, काम करती है, साढ़े पांच बजे की चार्टर्ड पकड़ कर लौटती है। घर जाते ही जुट जाती है, दस बज जाते हैं- सीरियल देखते-देखते सो जाती है। रोज सोचती है अमुक वस्‍तु लेनी थी, अमुक मुन्‍नू के लिए जरूरी है, शनिवार, रविवार कपड़े धोते-धोते, फर्श रगड़ते-रगड़ते बीत जाता है, जब समय मिलता है बजट बनाती है- पति भी कागज पेन लिए हिसाब करते हैं। दस जरूरी वस्‍तुओं में से आधी या पौनी ही ले सकते हैं, दोनों थक जाते हैं। न उतने पैसे होंगे न अमुक जरूरी वस्‍तुएं आएंगी। यदि बजट अनुकूल बन जाता तो संभव था खुशी के मारे राधा नाच उठती, झूम उठती, पर नहीं झूम सकी, नहीं नाच सकी. . . 

राधा अफसर है। बी.ए. किया, एम.ए. किया, ‘टॉप' किया, प्रतियोगिता परीक्षा में बैठी- अफसर बनी। नेक इरादे हैं, बहुत कुछ कर गुजरने की तमन्‍ना है। राधा आफिस संभालती है। अरमान से काम में लगती है। सही वक्‍त सही निर्णय लेती है। निर्णयों को अमल में लाने के लिए कटिबद्ध है लेकिन शीघ्र ही कटि डोल जाती है, कटि लचक जाती है, कटि टूट जाती है। निर्णयों का स्‍वागत तो होता है। निर्णयों की अभ्‍यर्थना तो होती है। निर्णयों की फेहरिस्‍त मंजूर तो होती है, लेकिन अमल में लाने के लिए नहीं, अमल में लाने के लिए वक्‍त नहीं, रोक लग जाती है, टोक लग जाती है। कह दिया जाता है जब ये इतना हो जाएगा, या उतना हो जाएगा तब निर्णयों को अमल में लाया जाएगा।

लेकिन नौ मन तेल एकत्रित नहीं होता, और राधा नाच नहीं पाती।

राधा विद्यार्थी है। अच्‍छे कॉलेज में दाखिला मिला है। कोर्स भी अच्‍छा है। राधा टाइम टेबल के अनुसार कक्षाओं में जाती है- लेकिन कभी उसके अतिरिक्‍त कोई अन्‍य विद्यार्थी कक्षा में नहीं, कभी प्राध्यापक महीनों तक नदारद, कभी प्राध्यापक हाजिर तो छात्रा नेता हड़ताल पर, कभी सब मौजूद पर कर्मचारी असहयोग पर, वे कमरे का ताला नहीं खोलते। कक्षाएं लगती ही नहीं। कोर्स रह गया, परीक्षाएं टली नहीं, राधा की चली नहीं, जो कुछ अपने बल पर कर सकती थी किया लेकिन कहां माना जिया, उसका कौन-सा अरमान पूरा किया? नौ मन तेल के अभाव में राधा नहीं नाच पाई। थर्ड डिविजन ही आई।

राधा अध्यापिका है। शिक्षा के प्रति समर्पित है। बरसों से बरसों तक एक-सी चाल-ढाल, वही ढाक के तीन पात। वही पाठ्‌यक्रम, नीरस, उबाउ। वही परीक्षा पद्धति अवैज्ञानिक, असंतुलित। सुबह होती है शाम होती है टीचिंग यूं ही तमाम होती है। कैसे नाचे वह, कैसे खुशियां मनाए। वह भी उसी मशीन का एक घिसा हुआ पुर्जा हो जाती है। समर्पण-भाव मिलने वाले वेतनमान तक ही सीमित हो जाता है, नौ तो बहुत दूर, एक सेर तेल भी नहीं हो पाता। नाचना भूल जाती है।

राधा इंजीनियर है। नवनिर्माण के लिए उत्‍सुक है। उत्फुल्ल है। पुल बनाना है, भवन बनाना है। सड़कें बनानी हैं- ठोस, मजबूत, दीर्घ-जीवी। योजनाएं बनाती है। मंजूरी पाती है। ठेके के लिए निविदा निकलवाती है। स्‍टेटमेंट तैयार करती है। लेकिन नहीं जानती कैसे, किसको, क्‍यों ठेका मिलता है। पुल टूटता है, भवन गिरता है, सड़क पथरा जाती है. . .और पथरा जाती है राधा। गिर जाती है। राधा टूट जाती है। वह गवेषणा नहीं कर पाती है। कार्यपूर्ति सही न होने पर ईमानदारी की राह पर चलने के कारण वह ‘सस्‍पेंड' हो जाती है। पुनर्नियुक्‍ति के लिए दी गई शर्तें साढ़े पांच हजार साल वाली राधा के लिए नहीं हैं, नवीन राधा के लिए हैं, नौ मन तेल कहां है? राधा अपनी बनाई गई सड़क पर आ जाती है।

राधा डॉक्‍टर है। राधा पूरी फीस देकर रातों-रातों जागकर डॉक्‍टर बनी है। जनता अस्‍पताल में जनता सेवार्थ लगी है। सही जांच करती है। सही दवाएं लिखती है। परची बढ़ती है। दवाएं आती हैं। मरीज नियम से खाते हैं। राधा हैरान है। परेशान है। फर्क नहीं पड़ता। मरीज निरोग नहीं होता। राधा का मन जार-जार रोता। दवाएं बदलो खूब जांचो। विशेष पुस्‍तकें बांचो। नई परची। नई दवा। लेकिन सब हवा। दवाएं नकली हैं। दाम उनके पर असली हैं। सही बात। सही दवा। सही जांच-राधा के लिए नौ मन तेल है, नहीं आएगा। राधा नहीं नाचेगी। यूं ही आहिस्‍ता-आहिस्‍ता उम्र के पड़ाव पर पहुंच जाएगी। रिटायर हो जाएगी। . . .

राधा लेखिका है। सच्‍चा लिखेगी सच्‍चा बताएगी। नहीं जानती कि ऐसा कर गच्‍चा खाएगी। उसके साथ वही होता है जो क्‍लर्क राधा के साथ हुआ, जो अफसर राधा के साथ हुआ, जो विद्यार्थी राधा के साथ हुआ, जो अध्यापिका राधा के साथ हुआ। जो इंजीनियर राधा के साथ हुआ, जो डॉक्‍टर राधा के साथ हुआ। लिखते-लिखते कुछ सही न हुआ अलबत्ता उसकी अपनी लेखनी टूट गई। दूसरी दी गई लेखनी से लिखने लगी लेखिका राधा. . .  . . .

और भी बहुत-सी राधाएं हैं। सब पर आती बाधाएं हैं। सब उदास सब निराश। नहीं नाचती सो नहीं नाचती। दरअसल यह राधा का सही रूप था जो विद्रूप है, वही आजकल मुखरित है, जो विसंगत है, उसी की संगत है। संवेदना की जगह विडम्‍बना है। 

आज की रक्षक राधा भक्षक हो सकती है। जो दफ्तर में काम करने जाती है लेकिन करती नहीं। तभी करेगी, जब उसकी शर्तें मान ली जाएंगी यानी पदोन्‍नति बिना कुछ किए होती रहे। वेतनमान बढ़ते रहें। भत्ते पर भत्ते मिलते रहें। जितना मांगा उतना नहीं मिलता भत्ता। राधा काम को देती धता। नहीं नाचेगी जब तक नौ मन तेल न होगा। अफसर राधा अफसरी के नशे में है। वह केवल सुविधाएं गिनती है- काम करने के लिए उसके चंद आदेश हैं जो पल-पल बदलने वाले आवेश हैं। विद्यार्थी राधा अपने अधिकारों के प्रति जरूरत से ज्‍यादा सचेत है। पढ़ने के मामले में अचेत है। कर्तव्‍य किस चिड़िया का नाम है, नहीं जानती। वह छात्रा चेतना की समर्थक है। शिक्षक की क्‍लास उसके लिए बक-बक है। 

अध्यापिका राधा जहां है बस वहीं है। उसे आगे नहीं बढ़ना। किताबें नहीं पढ़ना। वह परमानेंट है, उसे फिक्र नहीं कि रिजल्‍ट कितने परसेंट है। बिल्‍डिंग नई बनेगी- कोर्स पूरा करा देगी। नई बिल्‍डिंग बनती नहीं है, उसे पढ़ाना नहीं है। इंजीनियर राधा तभी साथ देगी नवनिर्माण में जब ठेकेदार लाभांश में उसका साथ देगा। देश, समाज, जन के लिए जरूर काम करेगी। जब उसकी तिजोरी भरे उसकी तिजोरी बेहद बड़ी है, तीस साल में भरेगी तब देश के लिए, समाज के लिए, जन के लिए जरूर नाचेगी। कुछ-कुछ ऐसा ही है डॉक्‍टर राधा के साथ, कुछ-कुछ ऐसा ही है लेखिका राधा के साथ. . . 

और कुछ-कुछ ऐसा ही है बाकी सारी राधाओं के साथ. . . सब नाच सकती हैं पर सभी के अपने-अपने नौ मन तेल हैं। जिनके तेल का तौल पूरा हो जाता है वे नाच देती हैं और उनका तो भगवान ही मालिक है जो बिना तेल के भी नाचती फिरती हैं। 

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तुसी कर दे की हो 

मैं कॉलेज से छुट्‌टी लेकर अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा था। उन्‍हीं दिनों तोषी मासी, वही मेरी पत्‍नी की मौसी संतोष पाल हमारे घर आईं। पहली बार आई थीं अतः पत्‍नी ने खातिरदारी में कसर न छोड़ी थी। 

मौसी को पधारे चौथा दिन था, मैं अपने कमरे में पढ़ रहा था, मौसी मेरी पत्‍नी के साथ बगल वाले कमरे में बतिया रही थीं। अचानक मौसी का तेज स्‍वर बहुत मंद हो गया। मुझे शेयर बाजार की गिरावट लगी। मैं संभल गया और उनके मंद स्‍वर के सुनने की कोशिश करने लगा. . .मौसी की आवाज आई, ‘सुध तेरा खसम करदा की है?' मैंने किताब बंद कर दी और उसके बदले में अपने कान पूरे खोल लिए। सुध ने उत्तर दिया था, ‘क्‍यों मौसी, मैं समझी नहीं, क्‍यों पूछ रही हैं?' ‘बेटा' मौसी की आवाज आई थी, ‘मैं ओनूं काम ते जांदे वेख्‍या नईं। चार दिन ते हो गए पुत्तर ओ कित्ते तैयार होके गया ई नईं। ना तो बीमार लग रया है, ना ही थक्‍या होया। जो बच्‍चे काम कर दे नें, ओ काम ते जांदे जरूर ने, ओ की कर दा है?' 

‘मौसी जी वो कॉलेज में पढ़ाते हैं, आपको पता नहीं था क्‍या?' तनिक खीझकर पत्‍नी ने कहा था। ‘पुत्तर, पर ओ तां चार दिनों ते कॉलेज गया ही नईं, ओत्‍थे हड़ताल है?' मौसी ने पूछा था। ‘नहीं, हड़ताल नहीं है। वो छुट्‌टी पर हैं।' पत्‍नी बोली। ‘छुट्‌टी ते है? हैं तो बिलकुल वैल, इल तां नईं हैं, फेर वी काम तां करे।' मौसी ने कहा। ‘मौसा जी, वो काम ही कर रहे हैं। पी-एच.डी. कर रहे हैं।' ‘पुत्तर ए की पी-एच.डी. दी बमारी लग गई है। छड परे, जवानी च नईं करेगा तो कद करेगा, काम करना चाईदा है।' मौसीजी' तुनकते हुए पत्‍नी की वाणी बिखरी, ‘मौसी वो बहुत काम करते हैं। पढ़ाने के अलावा कहानी लिखते हैं, कविता लिखते हैं।' 

‘पुत्तर, ओ पढ़ाए, कुछ वी लिख्‍खे पर काम तां करे।' ‘मौसी वो रेडियो, टीवी, अखबार के लिए भी लिखते हैं।' 

‘पुत्तर लिख्‍खे, मैं कद मनां कित्ता है, बट कुछ करया ते करे। चार दिन तों वेख रईं हें। अपने रूम तो बाहर आंदा है, फ्रिज खोलदा है, कुछ खांदा है, फेर चाय दा आर्डर देके अंदर चला जांदा है। ना कपड़े बदल दा है, न शेव करदा है। बिना काम कित्ते लाइफ चलेगी किदां, ओनूं कह कि काम वी करे।' 

लगभग गुस्‍से से भरी पत्‍नी की आवाज आई थी, ‘मौसी जी, कितनी बार बताउं कि वो इतना. . .' बीच में ही मौसी का उंचा स्‍वर आ गया, ‘पुत्तर, मैं बेकूफ नई हैं। मैं जानदी हैं कि परोफेसर है, कॉलेज च पढ़ांदा है। ठीक है परोफेसरी करे पर कुज कम वी तां करे। मैं कई लेकचरारां परोफेसरां नूं जाण दी हैं, जो पढ़ांदे वी हैं पर काम वी कर दे नें। इक प्रोपरटी डीलर है- दो कारें नें ओदे पास, तेराहाले स्‍कूटर ते ही है। इक ने परचून दी दुकान खोली होई है, ओदी वी कोठी बन गई है- टाई सौ गज दी। ओ मलावी दा जवाई वी नवां नवां लेकचरार है, ओ वी लाटरी दा काम करदा है। सारे इंटैलिजेंट काम कर दे हैं, बस इक तेरा ही नईं कर दा, मैं तेरे पले दी कै रई हैं- कल नूं बच्‍चयां दी शादियां वी करनिया हैं- तू सोच सुधा, कुछ सोच. . .'  . . .

सुध ने सोचा या नहीं पर मैंने काम के बारे में सोचते-सोचते कान बंद किए और किताब खोली, पर उसके हर पृष्‍ठ में यही प्रश्‍न लिखा पाया, ‘तुसी कर दे की हो? .    . .तुसी करदे की हो. . .?'

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देखना और नहीं देखना 


राजकीय कॉलेज के आगे लड़कों- लड़कियों की अटखेलियों की आवाजें गूंज रही थीं। हंसी, ठट्‌ठा, रेलमपेल के बीच रंजन वहीं खड़े एक खोमचे वाले के भठूरे छोले का स्‍वाद ले रहा था। मंद गति से आती हुई मोटरसाइकिलें और कारें अचानक कैसे तेज होती हैं और उन पर सवार अंधेड़ कैसे तूफान में तब्‍दील होते हैं, देख-देख रंजन मन ही मन मुस्‍करा भी रहा था। उसी सड़क पर एक नन्‍हा-सा पिल्‍ला दूसरी ओर पहुंच ही रहा था कि एक गतिवान कार के नीचे दब गया, कार क्षण भर को रुकी और फिर सरपट चल दी। रंजन का कौर हाथ में ही रह गया, उसने पाया पिल्‍ले की आंखें बंद थी और निश्‍चेष्‍ट सड़क से चिपका पड़ा था. . . 

सड़क के किनारे खड़े विद्यार्थियों ने यह दृश्‍य देखा, कुछ युवतियों के मुख से निकले दुखवाचक शब्‍दों को सुन पलक मारते ही दो मोटरसाइकिलों पर सवार होकर चार युवक तेजी से पीछा करते हुए उस कार तक पहुंच गए, कार चालक को घेरकर नीचे निकाला और पीटते-घसीटते दुर्घटना-स्‍थल तक ले आए. . . 

रंजन रेख रहा था कि सड़क के इस पार चालक पिट रहा था और सड़क पार वही पिल्‍ला लंगड़ी टांग उठाए मां का दूध पी रहा था, मां उसे प्‍यार से साथ-साथ चाट रही थी.  . .

और जो रंजन नहीं देख पाया. . .कार चालक की मां अपने बेटे के लिए खून दे रही थी जो नौ घंटे से आई.सी. यू. में अचेत पड़ा जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा था।

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15 सी, हिंदू कॉलेज निवास दिल्‍ली-110007

(साभार - व्यंग्य यात्रा - जनवरी जून 2011)

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हंसती, मुस्काती , नाचती , गाती
हर्षाती, इठलाती,बतियाती,
मनाती कभी मनवाती
कौन ...... मेरी बिटिया

आंगन में खेल बड़ी हो रही
रुनझुन करती, कुनमुन करती
भाई की सूनी कलाई को
राखी के धागे से सजाती
चारों ओर खुशियाँ बिखराती
कौन ......मेरी बिटिया |

घर की रौनक को बढाती
अंधियारे मन में दिया जलाती
तीज-त्यौहार उसके आसरे
झनन-झनन सा नाच दिखाती
चिड़िया सी कलरव करती
कौन......मेरी बिटिया

दुःख में मेरे  सुख छनकाती
तप्त मस्तक पे ओस टपकाती
पल पल पल पल बढती जाती
इक दिन बेगानी हो जाएगी
मनन गहन कराती जाती
कौन ......मेरी बिटिया

कितनी अपनी  पराई होगी
तब उसकी स्मृतियाँ नाचेंगी
उसको आँचल में लेने को
दिल कितना मचलाएगा
मन की परतों तक रुलवाती
कौन ...... मेरी बिटिया

बेटी- सुन्दरतम रचना जीवन की
कैसी व्यथा है उनके मन की
जो खुद को ही छल लेते है
जग में आने से पहले ही हत्या बेटी की कर देते है
बिन बेटी घर शापित करवाती
कौन ...... मेरी बिटिया |
                             ........................                   
-------शोभा रस्तोगी  शोभा
          Mob-09650267277                                                                                               

                                                                          आत्म परिचय
नाम-   शोभा रस्तोगी  शोभा
शिक्षा - एम. ए. [अंग्रेजी-हिंदी ], बी. एड. , शिक्षा विशारद, संगीत प्रभाकर [ तबला ]          
जन्म - 26- अक्तूबर 1968 ,  अलीगढ [ उ. प्र. ]
सम्प्रति - सरकारी विद्यालय दिल्ली  में अध्यापिका
पता - RZ-D.-- 208, B, डी.डी.ए. पार्क रोड, राज नगर - || पालम कालोनी, नई दिल्ली - 77.
   
 
     मेरी प्रकाशित रचनाएँ.  पंजाब केसरी, राष्ट्र किंकर, हम सब साथ साथ, केपिटल रिपोर्टर,कथा संसार,  बहुजन विकास, न्यू ऑब्जर्वर पोस्ट, आदि   में  लघुकथा, कविता, कहानी, लेख आदि प्रकाशित | ' खिडकियों पर टंगे लोग ' लघुकथा  संग्रह  में लघुकथाएं संकलित | ह्ससासा द्वारा अ. भा. लघुकथाकार सम्मान प्राप्त |आकाशवाणी भोपाल से लेख प्रसारित |
                                   
   आन लाइन पोर्टल पर प्रकाशित ---  laghukatha.com , srijangatha,com, shabdakar.com ,  rachanakar.com  तथा newobserverpost.tk में प्रकाशित लघुकथाएं    


        पत्रकारिता के नए माध्यम आभासी (ऑन लाइन) मीडिया को क्रांति का वाहक माना जा रहा है। इसे वैकल्पिक या भविष्य का मीडिया भी कहा जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि मिस्त्र और ट्यूनिशिया में क्रांति का जो मुखर रुप देखने को मिला, वह फेसबुक ट्विटर या इस तर्ज की अन्य समाजिक अंतरजाल सेवाओं ;सोशल नेटवर्किंगद्ध का पर्याय था। लेकिन हाल ही में जर्मनी के बॉन में अंतरराष्टीय स्तर पर आयोजित ‘वैश्विक मीडिया संगोष्ठी’ में एक नए विचार के साथ नया शब्द ‘स्टीट बुक’ उभरकर आया है। मसलन ऐसी क्रांति जो आभासी मीडिया और सड़क दोनों पर संयुक्त रुप से लड़ी जा रही हो। क्योंकि सड़क पर उतरे बिना न तो कोई क्रांति संभव है और न ही कोई नीतिगत बदलाव लाना संभव है।

आभासी मीडिया व्यक्ति को अभिप्रेरित करने का सार्थक माध्यम तो हो सकता है, लेकिन कुंभकरणी नींद में सोए सत्तालोलुप शासन प्रशासन को सड़कों पर उतरी प्रत्यक्ष भीड़ के आंदोलन और उद्घोष से ही जगाया जा सकता है। देखने में आ रहा है कि आभासी मीडिया के जरिए विचार संप्रेषण की व्यापकता के बावजूद दुनिया में मानवाधिकारियों का हनन बढ़ रहा है और प्रकृति पर आश्रित रहने वाले समुदाय असुरक्षा के दायरे में आने के साथ आधुनिक विकास के संकट से जुझ रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में इस मीडिया की काई जनपक्षधरता सामने नहीं आ पा रही है, लिहाजा सड़कों - गलियों में उतरे भीड़ तंत्र के बिना राज्य सत्ताएं केवल आभासी दबाव में आ जाएंगी, ऐसा मुश्किल ही है।

        डॉयचे वेले की संपन्न हुई इस वैश्विक मीडिया संगोष्ठी में निकलकर आए इस विचार को महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए कि शोसल नेटवर्किंग अपनी भूमिका जरुर निभाते हैं, लेकिन सड़क पर उतरे बगैर उससे न कोई क्रांति की उम्मीद की जा सकती है और न ही कोई क्रांतिकारी बदलाव लाया जा सकता है। इसी यथार्थ विचार को मिस्त्र के युवा ब्लॉगर अह्मद जिदान ने ताकत दी। अहमद ने एक अन्य विचार यह भी दिया कि ऑन लाइन मीडिया से जुड़ा हर व्यक्ति पत्रकार है। लेकिन इसे लोगों ने भ्रम बताया कि इस माध्यम से जुड़ जाने भर से कोई व्यक्ति पत्रकारिता की काबलीयत हासिल करने में कामयाब हो जाता है।

वैसे भी हकीकत में पत्रकारिता एक गंभीर और रचनात्मक दायित्व बोध है और इसे इसी परिप्रेक्ष्य में लेना चाहिए। अंतरजाल या आभासी माध्यमों से हमें पर्याप्त संदर्भ सामग्री और किसी भी आंदोलन या गतिविधि से जुड़ी विश्वव्यापी जानकारी तो मिल सकती है, लेकिन उसका असर यदि राज्य सत्ताओं पर केंद्रित करना है ता इस मकसदपूर्ति के लिए भीड़ को सड़कों पर उतरना लाजिमी है। क्योंकि रुस और फ्रांस की क्रांति, भारत का स्वंतत्रता आंदोलन और फिर जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति का आहवान किसी आभासी मीडिया के बूते संभव नहीं हुआ था, विभिन्न नेतृत्वकर्त्ताओं की अगुआई में व्यापक जन समर्थन से ही इन क्रांतियों की को फलीभूत सार्थकता हासिल हुई थी।

        आभासी मीडिया विस्फोटक बदलाव का वाहक इसलिए भी नहीं बन सकता क्योंकि उसमें व्यक्ति की अभिव्यक्ति मामूली टिप्पणियों और प्रतिक्रियाओं के रुप में सामने आती है। इनमें विचार तत्व या तो होता ही नहीं है और यदि होता भी है तो नगण्य रुप में होता है। वह भी कहीं से लिया हुआ अथवा उठाया हुआ होता है। इसमें विचार या मत संबंधी भिन्नता भी कम दिखाई देती है, क्योंकि आभासी मीडिया के ज्यादातर खातेदार टिप्पणियों की प्रतिलिपियों का ही संप्रेषण करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। इसके बावजूद ये प्रतिक्रियाएं व्यक्ति की मनस्थिति में बदलाव का भले ही एकाएक कारक न बन पाती हों, लेकिन व्यापक जनसमर्थन जुटाने में इनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। अण्णा हजारे और बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों के परिप्रेक्ष्य में भी आभासी मीडिया का आभास विश्व व्यापी स्तर पर देखने में आया।

        दरअसल किसी भी क्रांति का लक्ष्य महज सत्ता परिवर्तन जैसे फौरी बदलावों तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि व्यक्ति और समाज के चरित्र को बदलना होता है। चरित्र को बदले बिना न तो नीतिगत बदलाव संभव हैं और न ही उन पर ईमानदारी से क्रियान्वयन संभव है। इसलिए भारत समेत अन्य लोकतांत्रिक देशों में देखने में आता है कि राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के बावजूद प्रशासनिक व्यवस्था यथावत बनी रहती है। शासन-प्रशासन में तमाम संवैधानिक बदलावों के बावजूद हमारे देश में उत्तरोत्तर बढ़ता भ्रष्टाचार, निरंकुश होता प्रशासन इस बात का गवाह है कि चरित्र में बदलाव लाए बिना व्यक्तिगत आचरण में बदलाव संभव नहीं है। इसीलिए हमारे यहां कानूनी बदलाव प्रशासन की दहलीज पर जाकर ठिठक जाते हैं।

        क्रांति के लिए व्यक्ति-समूहों का संघर्ष, संागठनिक ढांचा, प्रचार तंत्र और एक प्रखर नेतृत्वकर्ता की जरुरत भी होती है। आभासी मीडिया प्रचार-तंत्र की मजबूत कड़ी तो बन सकता है, लेकिन संघर्ष, संगठन और नेतृत्व की उम्मीद व्यक्ति और बगैर व्यक्ति समूहों के नहीं की जा सकती है। इस तारतम्य में देखने में आ रहा है कि आधुनिक और प्रौद्योगिकी विकास मनुष्य के मौलिक अधिकारों को न केवल कुचलकर बल्कि उन्हें उनके मूल निवास स्थलों से बेदखल करके हासिल किया जा रहा है। इस सिलसिलें में भारत ही नहीं पूरी दुनिया में इलेक्टोनिक मीडिया लाचारी की अवस्था में खड़ा है। जनपक्षधरता से मुहं फेर लेने की वजह से ही इलेक्टोनिक मीडिया के विकल्प के रुप में आभासी मीडिया की पृष्ठभूमि तैयार होने की परिकल्पना वैकल्पिक मीडियाकार कर रहे है। इलेक्टोनिक मीडिया वही दिखा रहा है जिसमें पूंजीपतियों के हित सधते हैं। मीडिया से गांव और ग्रामीण बाहर कर दिए गए हैं। घोर व्यावसायिकता की गुंजलक में फंसे मीडिया ने न्यूजरुम में बैठे मीडियाकारों के हाथ बांध दिए हैं। यहां तक की कहीं - कहीं मीडिया टेड यूनियनों की हड़ताल और जन पक्षधरता से जुड़े आंदोलनों से भी किनारा करने लगा है। गोया जरुरी है कि कारपोरेट मीडिया को जनता और जनसमस्याओं के प्रति उत्तरदायी और श्रमजीवी पत्रकार कानून को सशक्त बनाया जाए। मीडिया जिस तरह से विज्ञापनदाताओं तक उपभोक्ता को पहुचाने की मुहिम चला रहा है, उसे भी बाधित करने की जरुरत है।

इधर इलेक्टोनिक मीडिया में एक नए चलन की शुरुआत मालिकों ने की है। मीडिया में जो पत्रकार क्रांतिकारी दर्जे की निर्णायक भूमिका के हकदार कहे जाते रहे हैं, उन्हें संसथा का शेयरधारी बनाया जा रहा है। इस कारण उनका मूल स्व्भाव न्यूज रुम में वह नहीं रह गया है जो इलेक्टोनिक मीडिया के शुरुआती दौर में था। इन सब कारणों की प्रतिच्छाया में आभासी मीडिया से आम आदमी की चिंता उभर सकती थी, लेकिन इस मीडिया में भी संकट इलेक्टोनि मीडिया जैसा ही है। इसमे भी गांव, ग्रामीण और मजदूर तो गायब हैं ही, अपना पक्ष या समस्या सीधे-सीधे रखने के लिए यह तबका, फेसबुक या ट्विटर का खातेदार भी नहीं है।

        इसलिए हम देख रहे हैं कि आभासी मीडिया के विस्तार व असर के तमाम दावों के बावजूद दुनिया में मनुष्य के अधिकारों की रक्षा में मानवीयता की झलक दिखाई नहीं दे रही है। विश्व में अमेरिका के बढ़ते प्रभुत्व और अरब देशों में तेल के लिए उसके निरंकुश दखल को नकारा जाना संभव नहीं हो पा रहा है। अमेरिका के चंद मित्र देशों ने अपनी बहुराष्टीय कंपनियों को विकासशील देशों में प्राकृतिक  संपदा के दोहन के लिए खुला छोड़ दिया है। इन औद्योगिक घरानों द्वारा मानवाधिकारों के हनन के खुले उल्लंघन के बावजूद इन पर अंकुश के कोई उपाय आभासी मीडिया के आभासी धरातल पर परीलक्षित नहीं हो रहे हैं। पूंजीवादी तंत्र की मजबूती के चलते ही भूमि अधिग्रह अधिनियम, खाद्य सुरक्षा अधिनियम और लोकपाल जैसे जनहितैषी विधयकों को टाला जा रहा है जबकि अमेरिकी दबाव में परमाणु उर्जा विधेयक लाने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी सरकार तक कुर्बान करने को तैयार दिखाई दिए थे।

        इस दृष्टि से चीन की विस्तारवादी नीतियों पर भी नजर डालना जरुरी है। चीन का वजूद भी पूरी दुनिया में लगातार बढ़ रहा है। सकल घरेलू उत्पाद में उसने जापान को पीछे छोड़ दिया है और अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है। चीन के कुल उत्पादों की खपत अकेले अमेरिका में पचास फीसदी है। इस दखल से अमेरिका आतांकित है। इसलिए बराक ओबामा बार-बार चीन और भारत के बौद्धिक खतरे से अपने देश के युवाओं को चेताते रहते हैं। चीन में मीडिया पर पांबदियां तो हैं ही, मानवाधिकारों का हनन भी वहां सबसे ज्यादा देखने में आ रहा है। चीन तिब्बत को कमोबेश संपूर्ण लील जाने का उपक्रम जारी रखते हुए वहां की मानवीय नस्ल भी बड़े पैमाने पर बदली जा रही है। इसके बावजूद वहां आभासी अथवा वैकल्पिक मीडिया क्रांति की कोई आवाज बुलंद नहीं कर पा रहा है।

फिर भी विचारों की प्रस्तुति के लिए यह एक ऐसा माध्यम जरुर है, जहां आप अपना विचार किसी संपादकीय बाधा के बिना पेश करने के लिए स्वतंत्र हैं। यहां संपादक की कैंची निरापद है। इसलिए इस मीडिया को चाहे आभासी मीडिया कहा जाए अथवा न्यू मीडिया, यह वैकल्पिक मीडिया के रुप में अपनी उपस्थिति जरुर बरकरार रखेगा।

प्रमोद भार्गव


शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।



बचपन में
नन्हों की
नन्हीं नन्हीं सी बातें
टोकरी ले
छोटी सी छड़ी से
थोड़ा टेड़ा करते
छड़ी को
एक लम्बी रस्सी बाँधते
टोकरी के नीचे
रोटी का चूरा
मुट्ठी भर दाने
थोड़ा सा पानी रखते
‌फिर किसी कोने में
चुपके से जा छुपते
शोर मत करना
साथियों को कहते
पक्षी उड़ते उड़ते
देख कर रोटी
दाने..... पानी
बिन टोकरी देखे
जैसे ही करीब आते
अपनी समझ में
हम फुर्ती दिखाते
धीरे से...
रस्सी खींचते
टोकरी गिरते
पक्षी उड़ते....
चिड़िया फुर्र....र..र
कबूतर फुर्र....र..र
पक्षी फु्र्र  कर जाते
हाथ मलते हम रह जाते
बिन साहस हारे
दोस्तों के सहारे
फिर टोकरी रखते
कभी- न- कभी
कोई- न- कोई
कबूतर - चिड़िया
पकड़ी जाती
पंखों को कर 
 हरा गुलाबी
छोड़ देते
खुले आकाश में
लगा कर अपने-अपने
नाम की परची
ये मेरी चिड़िया.....
वो तेरा कबूतर.....

डॉ. हरदीप कौर सन्धु (सिडनी - आस्ट्रेलिया


(25 जून 1975 पर विशेष जब इस देश में इस काले कानून को लागू करके नागरिक अधिकारों का हनन हुआ था)

‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ (दिनकर) परन्तु सिंहासन आसानी से खाली नहीं किया गया। आपातकाल की घोषणा प्रेस की सेंसर नसबन्दी, अनुशासन की सख्तियों, पुलिस की ज्यादतियों का नंगा नाच के बीच इन्दिरा गांधी से भी अधिक उनके पुत्र संजय गांधी का अधिनायक वाद....... सारा देश चन्द मुठ्ठियों में भिंच कर टूट गया!

आपात्काल स्वाधीनता के बाद इस देश का सबसे बड़ा कुकर्म है जिसे किसी भी हालत में भूला नही जा सकता है। आपातकाल ने इस देश में अराजकता अनाचार के साथ सत्ता का दुरूपयोग के लिऐ सत्ता लोलुप व्यक्तियों को वह खतरनाक राह दिखाई है जिसके कारण आज पूरे देश में हालात हाथ से निकलते दिख रहे है। लोकतंत्र जिस पर देश गर्व करता था। उसकी शक्ति को क्षीण करने की कोशिश तब से अब तक लगातार बड़ती जा रही है। जिसके कारण देश में लोकतंत्र कब तक सुरक्षित रहेगा। यह सवाल खड़ा हो गया है? राष्ट्रकवि  दिनकर के शब्दों में -

समर शेष है नही पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी अपराध
आपातकाल को याद करने के पीछे मन में जुड़ी उन स्मृतियों के सहारे अनैतिक जघन्य कुकृत्य और प्रशासन की अमानवीय क्रूरता से रूबरू कराना है। एक महिला स्वतन्त्रता सेनानी को, जो विधायक समाजसेविका भी की थी, जेल में ऐसे बन्दी रखा कि उनके साथ एक तरफ एवं कोढ़िन थी और दूसरी तरफ चीखती चिल्लाती पगली, लड़की को रखा गया था, जननायक जय प्रकाश नारायण के साथ भी जेल में सरकार द्वारा कराया गया अत्याचार कम नही था उनको कुछ समय तक ऐसी काल कोठरी में रखा गया जिसके कारण उन्होंने लम्बे समय तक सूर्य की रोशनी तक नही मिली। सूर्य अस्त होने के बाद ही कोठरी से बाहर निकल पाते थे। 73 वर्ष की उम्र उनके साथ यह व्यवहार, इतना अंधेर क्या इसका न्याय कही या कभी होगा? सत्ताधीशों के चरण  चापने में अग्रतर भूमिका निभाने वाली नौकरशाही की जवाबदेही देश के प्रति और देश के संविधान के प्रति होने के बावजूद इस तरह के आचरण के बाद भी उन्हें इस कृत्य के लिए सजा न मिलने के के कारण ही यह देश अंधकार के गर्त में गिर रहा है।

जय प्रकाश नारायन ने कहा था, भ्रष्टाचार अपराध को राजनीति से अलग करने के लिए भ्रष्ट सत्ता धारियों को स्वयं त्यागपत्र दे देना चाहिए वरन सत्ता के गलियारों में चुन कर भेजने वाली जनता को उन्हें वापस बुला लेने का अधिकार होना चाहिए।
डा. धर्मवीर भारती ने ‘मुनादी’ नामक अपनी कविता में सत्ता के जन विरोधी चरित्र को कुछ इस तरह व्यक्त किया
खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का
हुकुम शहर कोतवाल का
हर खास ओ आम को आगाह किया जाता है
कि खबरदार रहे
और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से
कुण्डी चढ़ाकर बन्द कर लें
गिरा ले खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर
न भेजे,
क्योंकि एक बहत्तर बरस का
बूढ़ा अपनी कॉपती कमजोर
आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल
पड़ा है..............
उसे सड़क पर निकलने से रोकने के लिऐ ताकि वह 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जनता को सम्बोधन न कर सके पटना से हवाई जहाज चला ही नही, किन्तु दूसरे दिन जे.पी. दिल्ली पहुंच गए। उन्हें सुनने के लिऐ राजधानी की जनता के अतरिक्त आसपास के गाँव-कस्बों और नगरों से किसी न किसी प्रकार लोग रामलीला मैदान में जुटे थे। केन्द्र सरकार की सब प्रकार की रूकावटों, अड़चनों और बाधाओं के बावजूद रामलीला मैदान श्रोताओं से खचाखच भरा था तब जे.पी. ने सम्पर्ण क्रान्ति का आवाहन किया और उसी रात उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया देश में आपातकाल लागू हो चुका था जो उन्नीस माह रहा, इस समय इन्दिरा सरकार के दमन चक्र ने पूरे मुल्क को थर्रा दिया। निर्लज्ज, निर्मम निरंकुश-नादिरशाही के विरूद्ध जे.पी. की रणभेरी ने जुल्मों की रातों का अन्त के साथ इन्दिरा गांधी और उनकी दमनकारी कांग्रेस का देश भर में करारी पराजय दी।

लेकिन कांग्रेस उस सबक को सीखने के बजाय एक बार फिर देश को आपातकाल के पूर्व वाले हालातो में ले जाने की कोशिश कर रही है और लाठी के बल पर लोक को रौदने का नादिरशाही रूख अख्तियार कर रही है।

रामलीला मैदान में पिछले दिनों बाबा रामदेव के आन्दोलन को कुचलने के बाद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह द्वारा कहा गया कि यदि गांधीवादी अन्ना हजारे द्वारा कड़े लोकपाल बिल के लिये 16 अगस्त से प्रस्तावित आमरण अन्शन शुरू किया गया तो उनके साथ ही वैसा ही सुलूक होगा जैसा योग गुरू रामदेव बाबा के साथ हुआ था। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस एक बार फिर इस देश में लोकतन्त्र का गला घोटने के लिये भारत की लोकशाही को पंगू बनाने की कोशिश कर रही है।

देश की जनता को फैसला करना होगा कि लोकशाही को बचाने के लिये लोक और सरकारी अधिनायक वाद को समाप्त करने आपातकाल के काले दिनों को याद करते हुये सोचना होगा मुद्दो पर सहमति असहमति हो सकती है लेकिन  आवाज को कुन्द करने का षडयन्त्र एक गहरी साजिश जान पड़ती है। जिसके प्रति समय रहते जागरूक होना ही होगा। वर्ना देश की आजादी के लिये शहीदों का बलिदान व्यर्थ ही चला जायेगा। दूसरी आजादी की लड़ाई के लिये तैयार रहने का वक्त है। ज्ञानेन्द्र पति के शब्दों में -
कभी आता है एक भूकम्प ऐसा भी, जैसा कि अभी
इंसानी जमीन पर
कि दशाब्दियां जमी-पथरायी हुई
तानाशाही की परतें दरकने लगती हैं
और अचानक छोटी हो आती है
बेअन्त लगने वाली तानाशाहियों की उम्र
एक बे बाद एक

-सुरेन्द्र अग्निहोत्री
राजसदन-120/132
बेलदारी लेन
लालबाग, लखनऊ

दिल ले दर्पण के अक्स बने   "वक्त के मंज़र"


ग़ज़ल-संग्रह: वक़्त के मंज़र
लेखक: डा॰ ब्रहमजीत गौतम


अपनी ग़ज़लों के लिए अपनी ज़ुबानी क्या कहूँ
कैक्टस हैं ये सभी या रात रानी क्या कहूँ?
डॉ. ब्रह्मजीत गौतम जी के ग़ज़ल संग्रह "वक्त के मंज़र" में जहाँ रचयिता की अनुभूतियां और उनकी खूबियाँ शब्दों से उकेरे हर बिम्ब में साफ़ साफ़ नज़र आईं हैं, साथ में सादगी से अनुभूतियों को अंतस में उतारने की कला का अद्भुत प्रयास पाया जाता है.  किसी ने खूब कहा है 'कवि और शब्द का अटूट बंधन होता है, कवि के बिना शब्द तो हो सकते हैं, परंतु शब्द बिना कवि नहीं होता. एक हद तक यह सही है, पर दूसरी और कविता केवल शब्दों का समूह नहीं,. कविता शब्द के सहारे अपने भावों को भाषा में अभिव्यक्त करने की कला है. गौतम जी के अशयार इसी कला के हर गुण के ज़ामिन हैं. उनकी कलात्मक अनुभूतियाँ शब्द, शिल्प एवं व्याकरण से गुंथी हुई रचनाएं सुंदर शब्द-कौशल का एक नमूना है. एक हमारे सामने है......

कैक्टस हैं ये सभी या रात रानी क्या कहूं?
गौतम जी की रचनाधर्मिता पग-पग ही मुखर दिखाई पड़ती है और यही उनकी शक्सियत को अनूठी बुलंदी पर पहुंचती है. अपने परिचय में एक कड़ी और जोड़ती इस कड़ी का शब्द-सौन्दर्य और शिल्प देखिये-
न गौतम न गाँधी हूँ, विनोबा भी नहीं हूँ मैं
मगर महसूस करता हूँ कि कर दूं अब क्षमा उसको
काफ़िये का होश है न वज्न से है वास्ता
कह रहे हैं वो ग़ज़ल बेबहर मेरे देश में
शाइरी केवल सोच कि उपज नहीं, वेदना कि गहन अनुभूति के क्षणों में जब रचनाकार शब्द शिल्पी बनकर सोच को एक आकार देकर तराशते हैं तब शायरी बनती है.  और फिर रचनात्मक ऊर्जा की परिधि में जब संवेदना का संचार होता है, तब कहीं अपनी जाकर वह अपनी अंदर की दुनिया को बाहर से जोड़ता है. अपने चिंतन के माध्यम से कवि समाज और सामाजिक सरोकारों के विभिन्न आयाम उजगार करता है. इस संग्रह में कवि ने सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक विडम्बनाओं, विद्रुपताओं, मानवीय संवेदनाओं पर दो पंक्तियों में शब्दों की शिल्पाकृतियों के माध्यम से अपनी जद्दो-जहद को व्यक्त किया है. उनके मनोभावों को इन अद्भुत अश्यार में टटोलिये--
हमने जिसको भी बनाया सारथी इस देश का
है सदा ढाया उन्होंने कहर मेरे देश में
हो चुकी संवेदनाएं शून्य
लाश के ओढे कफ़न हैं हम
मर गया वो मुफ़लिसी में चित्रकार
चित्र जिसके स्वर्ण से मढ़ते रहे
बड़ी सादगी और सरलता से शब्द 'संवेदना-शून्य" का इस्तेमाल इस मिसरे में हुआ है, बिकुल सहज सहज, यह देखा और महसूस किया जा सकता है. श्री गौतम जी ने ज़िन्दगी के 'महाभारत' को लगातार जाना है, लड़ा है.  नए विचारों को नए अंदाज़ में केवल दो पंक्तियों में बांधने का काम,  दरिया को कूजे में समोहित करने जैसा दुष्कर प्रयास वे सुगमता से कर गए हैं. अपनी ग़ज़लों द्वारा वे देश, काल, परिस्थिति, टूटते रिश्तों और जीवन दर्शन को एक दिशा दे पाए हैं,  जो मानसिक उद्वेलन के साथ वैचारिकता की पृष्टभूमि भी तैयार करते हैं. देखिये उनकी इस बानगी में...
वक़्त कि टेडी नज़र के सामने
अच्छे-अच्छे सर झुकाकर चल दिए
बेचकर ईमान अपना क़ातिलों के हाथ
बेकसों के आंसुओं पर पल रहे हैं लोग
काव्य की सबसे छोटी कविता ग़ज़ल है, जो संक्षेप्ता में बहुत कुछ कहती है. उसके शब्दों की बुनावट और कसावट पाठक को आकर्षित करती है. गौतम जी की लेखनी में उनका संस्कार, आचरण उनकी पहचान का प्रतीक है. जब वे अपनी बोलचाल की भाषा एवं राष्ट-भाषा हिंदी की बात करते हैं तो उनके तेवर महसूस करने योग्य होते हैं-
हिंदी-दिवस पर कीजिये गुणगान हिंदी का
पर बाद में सब भूलकर अंग्रेजी बोलिये
मानव- जीवन से जुड़े अनुभवों, जीवन-मूल्यों में निरंतर होते ह्रास और समाज में व्याप्त कुनीतियों व् कुप्रथाओं को उन्होंने बखूबी अपनी ग़ज़लों की विषयवस्तु बनाकर पेश किया है--
इल्म की है क़द्र रत्ती भर नहीं
काम होते है यहाँ पहचान से
हाथ का मज़हब न पंछी देखते
जो भी दाना दे ख़ुशी से खा गये
हिन्दू, मुस्लिम,सिख खड़े देता सबको छाँव
पेड नहीं है मानता मज़हब की प्राचीर
गौतम जी की रचनायें मानव जीवन के इतिवृत को लक्षित करती हैं. डॉ.श्याम दिवाकर के शब्दों में "यहाँ सुख के क्षण भी हैं, दुःख भी है, आंसू भी हैं, हास भी.यहाँ असफलता भी है, गिरकर उठने का साहस भी, और इसी कशमकश के बीच से गुज़ारना है, अँधेरे से रोशनी लानी है." जहाँ चमन सूखता जा रहा है और मालियों को चिंता नहीं, वहां भी गौतम जी की सकारात्मक सोच प्यार के रिश्ते को मज़बूती प्रदान करती है. उन्हें के शब्दों में आइए सुनते हैं--
प्यार के बूटे खिलेंगे नढ़रतों की शाख़ पर
अपने दुश्मन को नज़र भर देखिये तो प्यार से
शाइर नदीम बाबा का कथन है " ग़ज़ल एक सहराई पौधे की तरह होती है, जो पानी की कमी के बावजूद अपना विकास जारी रखता है." इसी विकास की दिशा में गौतम जी से और भी आशाएं सुधी पाठकों और ग़ज़ल के  शायकों को हैं. उनकी क़लम की सशक्तता अपना परिचय खुद देती आ रही है, मैं क्या कहूं?
दर्ज है पृष्ट पर उनकी कहानी क्या कहूं
एक निर्झर झरने जैसे है रवानी क्या कहूं?

दिली मुबारकबाद एवं शुभकामनाओं सहित

प्रस्तुतकर्ता: देवी नागरानी

ग़ज़ल-संग्रह: वक़्त के मंज़र, लेखक: डा॰ ब्रहमजीत गौतम, पन्नेः ७२, मूल्य: रु.100. प्रकाशक: नमन प्रकाशन, नई दिल्ली.

हम जीतेंगे
मैने  देखा  आसमान में  खिचड़ी बँटते ,
हरिश्चंद्र के  चेलों को  वादों से  नटते ।

गाली बकते हैं जिसको  पानी पी पीकर ,
उसके एक इशारे पर  रातों को  खटते ।

सबकी क्या है मजबूरी  कैसे ये  कहूँ मैं ,
त्यागी के सपने कुचलें ? कैसे ये सहूँ मैं ।

फिर भी गर मुँह खोला तो सूरज चमकेगा ,
दहलाएगा  मुझको  जलाकर वो चहकेगा ।

रोज नए - नए  फंदे  फेंके    जाएँगे ,
तारे  सब चुगली  करते पकड़े  जाएँगे ।

नदियों को देखा समुद्र की ओर ही बहते ,
पेड़-पहाड़ हैं  आसमान से  बातें  करते ।

जहाँ प्रशासन प्रकृति , कहाँ है साथ हमारे ,
चोर  उचक्के हरदम   जीते हम  हैं हारे ।

अपनी भी हठ है कि आज   भले  रीतेंगे ,
अन्ना और हम साथ साथ हैं, हम जीतेंगे ।

अजय कुमार तिवारी,
बी-14,डी.ए.व्ही.कालोनी,
जरही,भटगाँव,जिला-सरगुजा,
छत्तीसगढ़, 497235

ग़ज़ल =
दुनिया है बाज़ार, सुन बाबा.
     हर नज़र करे व्यापार, सुन बाबा.

बेमानी है एहसासों की बात यहाँ,
     ख़ुदग़र्ज़ी है प्यार, सुन बाबा.

मेला चार दिनों का है, सब छोड़ यहीं,
     जाना है उस पार, सुन बाबा.

तेरी चादर तेरी लाज बचा पाए,
     उतने पाँव पसार, सुन बाबा.

कैसे रिश्ते नाते ? क्या मेरा तेरा ?
     मतलब का संसार, सुन बाबा.

कुछ पाने को, क्या कुछ खो डाला तूने,
     अब तो सोच विचार, सुन बाबा.

ख़ाली हाथ चले जाना है दुनिया से,
     बस इतना है सार, सुन बाबा.

हर इक गरेबाँ तर है लहू से, देखो तो-
     ये कैसा त्यौहार, सुन बाबा.

मस्जिद में हों राम, ख़ुदा मंदिर पाऊँ,
     ऐसा मंतर मार, सुन बाबा.

इंसानियत जो ज़हनों में भर दे "साबिर"
     हुनर वही दरकार, सुन बाबा.

             *******


-- डॉ. नमन दत्त, खैरागढ़.

गरीब बच्चों के साथ सरकारी स्कूल में पढ़ती है कलेक्टर की बेटी:-

समान शिक्षा की आदर्श मिसाल

प्रमोद भार्गव


        सरकारी शिक्षा में सुधार के तमाम प्रयोगों के दौरान एक आदर्श मिसाल इरोड के नौजवान कलेक्टर डॉ आनंद कुमार ने पेश की है। उन्होंने अपनी लाडली बिटिया गोपिका को पश्चिमी तमिलनाडू के एक पिछड़े जिले इरोड की कुमलन कुट्टई ग्राम पंचायत संघ के प्राथमिक विद्यालय में दाखिला कराया है। जब राजनेताओं, नौकरशाहों और यहां तक कि आम आदमी में भी उत्कृष्ट अंग्रेजी माध्यमों के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की जद्दोजहद चरम पर हो, तब एक जिलाधीश द्वारा तमिल माध्यम के साधन विहीन विद्यालय में बेटी का नाम दर्ज कराना एक ऐसी आदर्श और अनूठी पहल है, जिसे समान शिक्षा का एक कारगर उपाय माना जा सकता है। यदि इस व्यवस्था को लागू करने का वीड़ा देश का प्रशासनिक तंत्र उठा ले तो सरकारी शिक्षा प्रयोगशाला बनने से तो मुक्त होगी ही, शिक्षा की गुणवत्ता में भी अपेक्षित सुधार एकाएक आ जाएगा। कलेक्टर आनंद का आचरण इसलिए भी अनुकरणीय है, क्योकि उन्होंन बेटी का दाखिला पत्नी श्रीमती विद्या के साथ कतार में लग कर एक साधारण नागरिक की तरह तो कराया ही, शाला के अध्यापकों को निर्देश भी दिया कि उनकी बेटी के साथ अन्य बच्चों जैसा ही बर्ताव किया जाए।

        हमारे देश में समान शिक्षा लागू करने की मंशा तो आजादी हासिल करने के तत्काल बाद से ही जताई जा रही है। इस बाबत उत्कृष्ट, रोजगार मूलक और बालकों की आयु के अनुपात में मानसिक विकास व स्थितियों के अनुरुप शिक्षा के लिए गठित आयोग व शिक्षाविद् समान शिक्षा लागू करने की वकालत भी करते रहे हैं, लेकिन नौकरशाहों और पब्लिक स्कूलों के निजी हितों को बरकरार रखने के कुटिल मंसूबों के चलते आयोगों के प्रतिवेदनों और  शिक्षाविदों की सलाहों को अब तक ठण्डे बस्ते में ही डाला जाता रहा है। यहां तक की अपने बचपन में ‘राष्टपति हो या भंगी की संतान, सबकी शिक्षा हो एक समान’ का नारा लगाते हुए पिछड़े व निम्न वर्ग से आए लालू, मुलायम जैसे नेता भी आखिरकार समान शिक्षा व पढ़ाई का माध्यम मातृभाषा हो की अनिवार्यता से तब छिटक गए, जब वे प्रदेशों की सत्ता उनके हाथों में थी। जबकि यही वह समय था जब वे इस भेद को मिटाकर समान शिक्षा लागू कर एक उच्चतम आदर्श प्रस्तुत कर सकते थे। लेकिन इसके उलट वे भी अंग्रेजी शिक्षा के अनुयायी हो गए। मायावती, शिवराज सिंह चौहान और नरेन्द्र मोदी ने भी इस दृष्टि से कोई अनूठी पहल नहीं की। हाल ही में बंगाल में सत्ता संभालने वाली  ममता बनर्जी समान शिक्षा के प्रति क्या रुख अपनाती हैं, इसका कुछ समय बाद पता चलेगा। समान शिक्षा के पहलू को नकारने की प्रवृत्ति के चलते ही शिक्षा का अधिकार कानून बनने के बावजूद बेअसर साबित हो रहा है। गरीब व वंचित समूह के बच्चों को 25 फीसदी दाखिले के कानूनी प्रावधान के बावजूद पब्लिक स्कूल इस वर्ग के छात्र-छात्राओं को प्रवेश नहीं दे रहे हैं।

        भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को सामाजिक न्याय व अन्य सामाजिक स्तरों जैसे बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के लिए समान अवसर प्रदान करने का भरोसा देता है। शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति को निजी स्तर पर सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में प्रगति व स्थापना के लिए ताकतवर बनाता है। इसलिए नीति-नियंताओं व सत्ता संचालकों का यह उत्तरदायित्व बढ़ जाता है कि वे हर नागरिक को शिक्षा प्रणाली के माध्यम से सामाजिक न्याय उपलब्ध कराने के समान अवसर मुहैया कराएं, ताकि दलित, पिछड़े व अभावग्रस्त वर्गों के बच्चों को शिक्षा हासिल करने के एक समान अवसर मिल सकें। समाज के इसी मकसद पूर्ति के लिए संविधान की धारा 45 में दर्ज नीति-निर्देशक सिद्धांत सभी के लिए शैक्षिक अवसरों की समानता तय करने का प्रावधान प्रकट करते हैं। इसी उद्देश्य से 14 वर्ष की आयु तक के सभी बालक-बालिकाओं को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने की दृष्टि से शिक्षा का अधिकार कानून बनाया गया, लेकिन निजी स्कूलों की दहलीज पर जाकर यह दम तोड़ता नजर आ रहा है।

        पुरातन जातिवादी व्यवस्था में शिक्षा सवर्ण जातियों के एकाधिकार का हिस्सा थी। आजादी के बाद इस सोच को ताकत संविधान के अनुच्छेद 21ए से मिली। जिसमें शिक्षा को मौलिक अधिकार की श्रेणी में रखा गया है। इसी भ्रम के चलते एक ओर तो शिक्षा में असमानता का दायरा बढ़ता चला गया, दूसरे निजी व अंग्रेजी स्कूलों के हित पोषित होते रहे। हालांकि 1966 में ही कोठारी आयोग ने समान शिक्षा प्रणाली लागू करने की अनुशंसा कर दी थी। इसके बाद 1985-86 की नई शिक्षा नीति में भी समान शिक्षा प्रणाली को मान्यता दी गई, लेकिन इन प्रणालियों पर अमल आज तक नहीं हो पाया। अलबत्ता संविधान के अनुच्छेद 21 ए में दर्ज शिक्षा को मौलिक अधिकार मान लिए जाने का मुगलता ही एक ऐसा बुनियादी कारण रहा, जिसके चलते मौजूदा शिक्षा प्रणाली में भेदभाव की खाई चौड़ी होती चली गई। इसी असमानता ने एक ऐसे प्रभु वर्ग को जन्म देकर ताकतवर बना दिया है, जिसमें याग्यता की बजाय धन के आधार पर शिक्षा हासिल कर प्रभु वर्ग का वर्चस्व हासिल किय। यही वह वर्ग है जिसने उपभोग, लूट व हिंसा की संस्कृति को बढ़ावा देते हुए सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर जबरदस्त अधिकार व अर्थ दोहन का सिलसिला जारी रखा हुआ है। हमारे नीति नियंता और नौकरशाह कोई भी नया कानून बनाते वक्त दावा तो ऐसा करते हैं कि बस इसके वजूद में आते ही समस्या का जादुई हल आनन-फानन में निकल आएगा। लेकिन शिक्षा का अधिकार कानून अमल में आने  के बाद हमने देख लिया है कि भेदभाव से वजूद में लाए गए कानूनी प्रावधानों का क्या हश्र होता है।
        ऐसे में इरोड के कलेक्टर डॉ आनंद कुमार ने अपनी बेटी को तमिल भाषी स्कूल में भर्ती कराकर एक ऐसा पाठ प्रस्तुत किया है, जिससे सबक लेकर हमारे नीति-नियंता शिक्षा में आमूल-चूल बदलाव ला सकते हैं। दरअसल अब जरुरत है कि हम एक ऐसा बाध्यकारी कानून बनाएं, जिसके तहत जरुरी हो कि देश के सभी सांसद, विधायक, नौकरशाह, सरकारी कर्मचारी व पंचायत पदाधिकारियों के सभी बच्चे सरकारी पाठशालाओं में पढ़ें। ऐसा न करने पर उनको पद से पृथक करने का अधिकार हो। क्योंकि मौजूदा हालात तो ये है, कि पाठशाला का शिक्षक भी अपने बच्चे को उस पाठशाला में नहीं पढ़ता जिसमें वह शिक्षा का दान कर रहा होता है। इससे जाहिर होता है कि उसे उस शिक्षा पर ही भरोसा नहीं जिसे वह खुद बांट रहा है। लिहाजा समान व समाजोपयोगी शिक्षा के लिए जरुरी है कि सरकारी शिक्षा से  नेता और नौकरशाहों के बच्चों को जोड़ा जाए। इस उपाय से दमतोड़ रही मातृ भाषाओं को भी जीवनदान मिलेगा।


प्रमोद भार्गव
  

शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

      

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दीप्ति परमार

फितरत

चाहत यूं ही  मिल जाये
कीमत नहीं होती
जिन्दगी यूं ही मिल जाये
कीमत नहीं होती ।

जो मिल जाये आसानी से
उसे सम्हालने की
फितरत नहीं होती
उसे संजोये रखने की
नियत नहीं होती ।

चाहत से चाहत न मिले
किस्मत नहीं होती
जिन्दगी को जिन्दगी न मिले
किस्मत नहीं होती ।

जो नहीं मिलता किसी तरह
उसे न पाने की
पीड़ा कम नहीं होती
उसे भूल जाने की
कोशिश कम नहीं होती ।

क्योंकि जो मिल जाता है
कौड़ी हो जाता है
यह मनुष्य की फितरत
परिवर्तित नहीं होती ।

---

परिभाषा प्रेम की

खो रही है संवेदना,सहृदयता,सौम्यता
बदल रही है दुनिया
आधुनिकता के रंग में रंगकर
बदल रही है परिभाषा प्रेम की ।

अब झुरते नहीं प्रेमी विरह में
ढूँढ लेते है कोई नया
क्योंकि
सोच बदल गयी है लैला मजनु की ।

अब प्रेम की गहराई से नहीं
पैसों की फैलाई से मतलब है
अब विश्वास का नहीं
स्वार्थ का रंग गहरा है ।

अब प्रेम
आदर्श नहीं
समर्पण नहीं
व्यापार स्थली और रंगभूमि बन गया है ।

क्योंकि
बदल रही है परिभाषा प्रेम की
मनुष्य की सहूलियत से
दिन, प्रतिदिन प्रतिमानस ।
--------
डॉ दीप्ति बी परमार , एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी- विभाग
आर आर  पटेल महाविद्यालय , राजकोट

मेरी तेरी जब से कुछ पहचान है,
मुश्किलों में तब से मेरी जान है।

प्यार का इज़हार करना चाहूं पर,
डर का चाबुक सांसों का दरबान है।

इश्क़ में दरवेशी का कासा धरे,
बेसबब चलने का वरदान है।

जब से तेरै ज़ुल्फ़ों की खम देखी है,
तब से सांसत मे मेरा ईमान है।

मत झुकाओ नीमकश आखों को और,
और कुछ दिन जीने का अरमान है।

ज़िन्दगी भर ईद की ईदी तुझे,
मेरे हक़ में उम्र भार रमजान है।

सब्र की पगडदियां मेरे लिये,
तू हवस के खेल की मैदान है।

मेरे दिल के कमरे अक्सर रोते हैं,
तू वफ़ा की छत से क्यूं अन्जान है।

तेरे बिन जीना सज़ा से कम नहीं,
मरना भी दानी कहां आसान है।

DSCN4133 (Custom)
ग़ज़ल
खूब  करली  खुद  गरज  संसार की बातें।
आ  बैठ  करलें  चंद  लम्‍हें सार की बातें॥
 
बासी खबर बन रह गयी जिन्‍दा जली दुल्‍हन,
बस है बहस में आज के अखबार की बातें।
 
अब नफा नुकसान से आगे तो सोचें कुंद हैं,
चल  पड़े  मैयत  पे  भी व्‍यापार की बातें।
 
शोहरत पे जले वो मिले मोहताज सफा के,
मैंनें  सुनी  हैं  उनमें से दो चार की बातें।
 
फर्ज उनके भी जो हैं उनको बताइए,
करते हैं सुबहो शाम जो अधिकार की बातें।
 
          दामोदर लाल जांगिड़
         पो0लादड़िया
         नागौर राज


व्‍यंग्‍य रचना- ‘‘आदत से लाचार'' बनाम ‘‘हम नहीं सुधरेंगे''
डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि'
अरे वाह! क्‍या बात करते हैं आप भी, भला सुधरने की कौन सी बात हुई इसमें। सुधरने की बात तो तब हो जब हम बिगड़े हों। अगर आप सुधरने की जिद करेंगे तो पहले हमें बिगड़ना पड़ेगा और फिर उसके बाद सुधरने का प्रयास करेंगे।

ये उत्तर था, हमारे प्रश्‍न के जवाब में श्री छैलविहारी जी का, छैलविहारी यानि हमारे मुहल्‍ले का डाकिया, मुहल्‍ले का माने, हमारे मुहल्‍ले में रहने वाला नहीं बल्‍कि हमारे मुहल्‍ले में डाक बाँटने वाले से है।
छैल विहारी, यानि एक ऐसी शख्‍सियत जिसपर किसी की हुकूमत नहीं चल सकती, वह चाहे तो आपकी चिट्‌ठी-पत्री आप तक पहुँचाने रात के आठ बजे भी चला आये और न चाहे तो सारी की सारी चिटि्‌ठयाँ जमुना मैया की गोद में प्रवाहित होने में देर नहीं।

ये सारी बात मैं ऐसे ही, सोते-लेटे नहीं कह रहा हूँ बल्‍कि पूरे होशो हवास में आपके सुपुर्द कर रहा हूँ।

हुआ यूँ कि एक दिन श्री छैलाविहारी डाक विभाग के एक बड़े से थैले में लगभग 15 किलो वजनी चिट्‌ठी-पत्रियों को कंधे पर लटकाये, चुपके से जमुना मैया के सीने पर बने बैराज पर जाकर जमुना मैया को समर्पित कर ही रहे थे कि पीछे से हमने उनके इस शुभकर्म को देख लिया। हमारा देखना था कि अचानक ही छैलबिहारी की नजर भी हम पर पड़ गई, फिर क्‍या था, नैना चार होते ही छैलविहारी सकपकाये और उन्‍होंने आव देखा न ताव, डाकतार विभाग के उस थैले को भी जमुना भैया को समर्पित कर दिया, और फिर इस तरह हड़बड़ाने का नाटक किया कि हम समझें- छैल बिहारी ने उस थैले की जानबूझ कर बलि नहीं चढ़ाई बल्‍कि अनजाने में ही वह थैला अचानक आत्‍महत्‍या के मूढ़ में आकर, छैलविहारी से फन्‍दा छुड़ा कर जमुना मैया में कूद पड़ा हो।

खैर साहब, हमने तुरन्‍त गोताखोरों को बुलवाया, खोजी नावों को उस स्‍थान पर चलवाया और कुल मिलाकर नतीजा ये निकला कि कुछ लोगों के महत्‍वपूर्ण पत्रों एवं नियुक्‍ति पत्रों की जान बचाने में हम सफल हो गये। जिसमें छैलविहारी के 4 साल से चप्‍पल चटका रहे बेटे का नियुक्‍ति पत्र भी था। उस दिन के बाद से छैलविहारी ने जमुना मैया की गोदी में, पत्रों को समर्पित करने के पुनीत कार्य को तो छोड़ दिया पर वो कहावत है न कि ‘‘चोर चोरी से जाये हेरा फेरी से न जाये'' अब छैलविहारी पत्र बांटने आते तो हैं पर आते तभी हैं जब मेरा किसी पत्रिका से किसी रचना का पारिश्रमिक आया हो। पारिश्रमिक की राशि देते समय वे कुछ बड़े नोटों के साथ कुछ छोटे-नोट जैसे 10 का नोट, 5 का नोट देना नहीं भूलते ताकि मुझे उनके कुछ टिप देने में छूटे पैसे जुटाने के चक्‍कर में परेशानी न करनी पड़े। इस प्रकार वे पारिश्रमिक के साथ-साथ मेरे 10-15 दिन से इकट्‌ठे किए जा रहे पत्रों को भी मुझे थमाकर, मुझ पर कृपाशील रहते हैं तथा दुआ करते हैं कि जल्‍दी से मेरा फिर किसी पत्रिका से पारिश्रमिक आये और उसी के साथ मेरी डाक भी मेरे पास तक पहुँचायें वो।

इसके अलावा भी छैलविहारी जी के किस्‍से तो बहुत हैं, एक आदत से और लाचार हैं वे, वह ये कि अपने भुलक्‍कड़पन से बेखबर हैं, वे किसी चीज को ऐसे सहज भाव से भूलते हैं कि उनकी इस अदा पर बलिहारी जाना पड़ता है। कभी-कभी तो वे अपने दफ्‍तर से सारी चिट्‌ठी-पत्री को अपने घर लाकर पटक देते हैं और फिर भूल जाते हैं कि इन्‍हें इनके असली हकदारों के पास पहुँचाना भी है, यानि इनके असली हकदारों के पास न पहुँचाने पर कोई किसी शादी-व्‍याह के उत्‍सव में समय से शामिल होने से वंचित रह जायेगा, या कि किसी के दुःखभरे क्षणों में शामिल नहीं हो पायेगा, याकि किसी की रोजी-रोटी यानि नौकरी, इण्‍टरव्‍यू के लिए जाने की तारीख निकल जायेगी वगैरा, वगैरा।

हुआ यूँ कि जब मैं अपना पुराना मकान छोड़कर इस नई वसी कॉलोनी में रहने लगा तो स्‍वाभाविक था कि पहले मुझे डाकिया को खोजना था क्‍योंकि लेखन, पत्रकारिता से जुड़े व्‍यक्‍तियों को भले ही खाने को रोटी न मिले पर यदि प्रतिदिन डाक से दो चार अखबार, पत्रिका और 4-6 सम्‍पादकों के पत्र, रचना की स्‍वीकृतियाँ आदि न मिलें तो समझो कि उसको सारा दिन सूना-सूना और निरर्थक सा लगने लगता है।

तो बस हमने भी एक दिन डाकिया जी को धर दबोचा। अपने नवनिर्मित घर में उन्‍हें बुलाकर, आदर के साथ सोफा पर बिठाया, चाय पिलाई, कुछ मिष्‍ठान वगैरा से मुँह मीठा भी कराया और फिर उन्‍हें अपना नाम और पता लिखा कागज थमाते हुए, अपनी प्रतिदिन आने वाली महत्‍वपूर्ण डाक के बारे में भी जानकारी दी। परोक्ष रूप से उसे यह भी अहसास दिला दिया कि पिछले 30 साल से वे पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं अतः ज्‍यादा बदमाशी की तो अखबार में निकलवा देंगे।

खैर साहब, छैल बिहारी ने सभी मिष्‍ठान, नमकीन और चाय आदि पूरे इत्‍मीनान के साथ भक्षण किया और चलते-चलते वायदा किया कि वह आपकी डाक पहुँचायेगा जरूर, भले ही थोड़ी देर हो जाये।

उसकी बात का विश्‍वास कर लेना अब हमारा फर्ज था या मजबूरी, सो किया और उसे दरवाजे के बाहर तक विदा कर आये। मेन गेट का दरवाजा बन्‍द कर जब ड्राइंग रूम में प्रवेश किया तो क्‍या देखते हैं कि छैलविहारी, हमारी डाक तो देकर गया ही था, साथ में अन्‍य चिटि्‌ठयों के बण्‍डल को भी हमारे सोफा पर रखा छोड़ गया है। हमने दौड़कर दरवाजा खोला कि शायद आमने-सामने किसी की डाक देने के लिए वह गया हो और लौट कर आये, पर कहाँ? वह तो अपनी साइकिल उठाकर उड़न छू हो चुका था। अब क्‍या करें, जाने किसकी, कौन सी महत्‍वपूर्ण डाक इसमें शामिल हों।

हमने सोचा कल जब उसे याद आयेगी तो वह हमारे पास भागा आयेगा और डाक का बण्‍डल बाँटने के लिए उठाकर ले जायेगा लेकिन ये क्‍या, एक दिन बीता, दो दिन बीते, बीतते-बीतते 5 दिन बीत गये तो हमारी संवेदन शीलता ने जोर पकड़ा, पता नहीं किसकी कौन सी महत्‍वपूर्ण डाक इसमें छुपी हो, सोचकर हमने डाक के बण्‍डल को खोला और पास-पड़ोस में पूछ-पूछ कर जैसे-तैसे स्‍वयं ही कुछ महत्‍वपूर्ण पत्रों को उनके मालिकों तक पहुँचाया।

सातवें दिन जब छैलविहारी हमारे यहाँ प्रकट हुआ तो हमने उसे डाक के बण्‍डल के बारे में बताया। सुनकर, चाय की चुस्‍की लेते हुए उसने अपनी बत्तीसी दिखाई- ‘‘अरे, साब, वह बण्‍डल आपके यहाँ रह गया था मैंने समझा जाने कहाँ गिर गया।'' कहकर अब वह बर्फी का टुकड़ा अपने मुँह में प्रविष्‍ट कर रहा था।

हमने अपनी 30 साल पुरानी पत्रकारिता सम्‍बन्‍धी बात का स्‍मरण एक बार फिर से उसे कराकर रौब झाड़ना चाहा- ‘‘देखो भाई, छैलविहारी, अगर तुमने इस बण्‍डल की तरह ही, हमारी डाक भी कहीं गुम कर दी तो फिर समझ लेना..........।''

‘‘अरे साब, मैंने कहा न आपसे, आपकी डाक गुम नहीं होगी, हाँ लाने में देरी जरूर हो सकती है। देखो न कितना बड़ा क्षेत्र है और ले-दे के मैं अकेला डाकिया हूँ इस सारे क्षेत्र का, आप तो देख ही रहे हैं, रात के आठ-आठ बज जाते हैं डाक बांटते-बांटते।''

उसकी बात सुनकर हमें भी तरस आया। वास्‍तव में वह अक्‍सर रात के आठ बजे ही हमारी डाक का बण्‍डल पहुँचाने आता था। इसके पीछे वास्‍तव में ही उसकी कार्य व्‍यस्‍तता थी कि अक्‍सर दिन में हमारे दफ्‍तर में होने के कारण, दिन में आने पर बच्‍चों द्वारा इतनी खातिरदारी और टिप से वंचित रह जाने का कारण था या फिर अन्‍य मोहल्‍ला वासियों से नजर बचाना।

खैर साहब, छैलविहारी ने अपने वायदे के अनुसार 7-7 दिन, 10-10 दिन तक हमारी डाक को इकट्‌ठा करके पूरे बण्‍डल को 9-10 दिन में एक बार पहुँचाना शुरु कर दिया। पूरी ईमानदारी के साथ कि साब आपकी एक भी चिट्‌ठी गुम नहीं की है। और जब छैलविहारी के जाने के बाद हमने उस डाक के बण्‍डल को खोलकर देखा तो उसमें कई ऐसी डाक निकली जिसे पढ़कर हमने अपना माथा ठोक लिया, उस डाक में आकाशवाणी का अनुबन्‍ध पत्र था जिसमें रिकार्डिंग की तारीख 4 दिन पहले ही बीत चुकी थी। एक चैक निकला जिसकी जमा करने की तारीख भी निकल चुकी थी, एक ऐसा भी पत्र निकला जिसमें चैन्‍नै से हिन्‍दी अधिकारी ने हमारी सभी पुस्‍तकों की 10-10 प्रतियाँ हमसे बिल पर मांगी थी। किन्‍तु पुस्‍तकें भेजने की तारीख को निकले पूरे 10 दिन बीत चुके थे। यानि कई हजार का एक साथ झटका।

हमें झटका लगा सो लगा, अपनी इस भूलने की आदत के कारण छैलविहारी ने खुद ही एक बार ऐसा झटका खाया था कि आज तक नहीं सुधर पाया है। बहुत पुरानी बात है तब तक आज जैसी फोन की सुविधा नहीं हुई थी। हुआ यूँ कि छैलविहारी की सास सुरग सिधार गईं। ससुराल से जो सूचना की चिट्‌ठी आई इसे छैलविहारी ने अपनी आदत के मुताबिक डाक के गट्‌ठर से खोलकर ही नहीं देखा और रखकर भूल गया। काफी समय बाद जब ससुर जी का उलाहना आया तो छैलविहारी की पत्‍नी को अपनी माँ के सुरग सिधार जाने की खबर मिली। फिर क्‍या था, छैलविहारी की पत्‍नी ने राते-रोते ही छैलविहारी का कुर्ता एक ही झटके में दो कर दिया और छैल विहारी की छाती पर (दोनों हाथों से) हत्‍थड़ पेले सो अलग। छैलविहारी कुछ माजरा समझ पाते तब तक तो पत्‍नी उसके कुर्ता-पाजामा को तार-तार कर चुकी थी। वो तो गनीमत थी कि छैलविहारी मजबूत अण्‍डर गारमेण्‍ट पहने हुए थे। आज तक भी पत्‍नी छैलविहारी से खपा है जिसका इलाज छैलविहारी खोजते-फिरते हैं।
तो ये थी श्री छैलविहारी यानि हमारे मुहल्‍ले के डाकिया की भूलने की आदत से लाचार होने की कहानी। हो सकता है आपका वास्‍ता भी कभी ऐसे डाकिया से पड़ा हो। छैलविहारी के अलावा भी बहुत सी विभूतियाँ ऐसी हैं तो आदत से लाचार होती हैं, जैसे चुनावों में किये गये वायदों को भूलने की आदत से लाचार हमारे जन प्रतिनिधि। यात्रा करते समय पान की जुगाली करते-करते बस या रेलगाड़ी की खिड़की से पिच्‍च से बाहर थूक देने की आदत से लाचारी भले ही सड़क पर चल रहे रिक्‍शा, स्‍कूटर, मोटर साइकिल या पैदल सवार के सारे कपड़े खराब हो जायें। इसी सन्‍दर्भ में एक सज्‍जन की आदत की आचारी की याद आ गई। मैं एक समारोह में सम्‍मिलित होने हेतु सजधज कर जा रहा था। एक गली से जैसे ही गुजरा कि बराबर की खिड़की से किसी ने पान के पीक की ऐसी पिचकारी चलाई कि बस्‍स और मुझे लौटकर घर आना पड़ा।

ट्रक वाले पहिये में पंचर हो जाने पर सड़क पर ही चारों ओर ईंट पत्‍थर फैला देते हैं और फिर पंचर ठीक हो जाने के बाद ईंट-पत्‍थरों को यूं ही सड़क पर पड़ा छोड़ जाने की आदत से लाचार होते हैं।

अध्‍यापिकाएं पूरे साल क्‍लास में बच्‍चों को पढ़ाने की बजाय स्‍वैटर बुनने की आदत से लाचार होती हैं। हरि अनन्‍त हरि कथा अनन्‍ता की भाँति बहुत सारे उदाहरण हैं आदत से लाचारी के। अभी इतना ही, बाकी के फिर कभी।

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डॉ. दिनेश पाठक शशि
28, सारंग विहार, पोस्‍ट-रिफायनरी नगर,
मथुरा - 281006
drdinesh57@gmail.com

प्राणों पे उपकार पिता के

जीवन के आधार में
लयबद्ध संस्‍कार में
नाम में, पहचान में
झंझावतों, तूफान में
प्राणों पे उपकार पिता के

डांट में, फटकार में
प्‍यार और दुलार में
बंदिशों, नसीहतों में
सबकी जरूरतों में
कांधे पर हैं हाथ पिता के

मनचाहे वरदान में
हर आंसू, मुस्‍कान में
अनजाने विश्‍वास में
सुरक्षा के अहसास में
मत भूलो अहसान पिता के

सादगी की सूरत में
करूणा की मूरत में
जीने के शऊर में
अम्‍मा के सिंदूर में
निश्‍छल हैं जज्‍बात पिता के


सिंधु सी लहक में
शौर्य की दमक में
अद्‌भुत संघर्ष में
अथाह सामर्थ्‍य में
अलहदा ख्‍यालात पिता के


देह के आवरण में
नेह के आचरण में
रिश्‍तों के बंधन में
वंदन और नमन में
चरणों में कायनात पिता के

 

हिमकर श्‍याम
द्वारा ः एन. पी. श्रीवास्‍तव
5, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,
रांची ः 8, झारखंड।

"...और अब अरविंद कुमार ने 1947 के देशभक्ति के अपने मूल मंत्र का पालन करते हुए बनाया है इंटरनेट पर ज़ारी होने वाला अनोखा अरविंद लैक्सिकन. लैक्सिकन के विशाल शब्द महसागर में 9,00,000 से ज़्यादा इंग्लिश और हिंदी अभिव्यक्तियाँ हैँ. माउस से क्लिक कीजिए - पूरा रत्नभंडार खुल जाएगा... उदाहरण के लिए सुंदर शब्द के इंग्लिश मेँ 200 से और हिंदी मेँ 500 से ज़्यादा पर्याय हैँ. यह 15 अगस्त 2011 से राष्ट्र ही नहीँ दुनिया भर के भाषाप्रेमियोँ को उपलब्ध होगा. ..."

 

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(तत्कालीन राष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा को समांतर कोश की पहली प्रति भेंट करते अरविंद कुमार दंपति. 13 दिसंबर 1996. यह अरविंद कुमार की पहली प्रकाशित पुस्तक थी. तब अरविंद 66वाँ वर्ष पूरा कर रहे थे.)

आज जब अरविंद कुमार को हिंदी अकादेमी दिल्ली ने शलाका सम्मान से विभूषित किया है तो उन्हेँ याद आते हैँ 1945 से शुरू होते कुछ दिन. जनवरी मेँ वह पंदरह साल के हुए थे, मैट्रिक की परीक्षा मेँ बैठ चुके थे, अंतिम पर्चा 26 मार्च को हुआ था और पहली अप्रैल से ही सरिता के प्रकाशकोँ के दिल्ली प्रैस मेँ बतौर कंपोज़ीटर-डिस्ट्रीब्यूर काम करने लगे थे. साथ साथ आज़ादी की लड़ाई मेँ तरुण सैनिक की तरह दिल्ली के करोह बाग़ उपनगर मेँ पूरी तरह सक्रिय थे. और कांग्रेस सेवादल के साथ साथ जुझारू लाल क़िला ग्रुप के सदस्य थे. जिन दिनोँ महात्मा गाँधी नई दिल्ली की भंगी कालोनी (आजकल हरिजन बस्ती) मेँ रहते थे, तो पूरे एक महीने वहाँ स्वयंसेवक के रूप में उपस्थित रहे थे. आज़ादी के लिए ब्रिटिश सरकार से जो बातचीत चल रही थी, उस पर विचार विमर्श करने के लिए पंडित नेहरू, मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल जैसे नेता वहाँ गाँधी जी से मिलने आते जाते रहते थे.

जीवन का महामंत्र

15 अगस्त को पहले स्वाधीनता दिवस पर लाल क़िले से पंडित नेहरू का ओजस्वी भाषण सुनने अरविंद कुमार भारी भीड़ मेँ मौजूद थे. पंडितजी ने भारत के प्राचीन गौरव का वर्णन करते भविष्य का जो ख़ाक़ा बुना वह अब तक अरविंद के कानोँ मेँ गूँजता है. उन के सभी मित्रोँ के सामने सवाल था आज़ाद हिंदुस्तान मेँ देशभक्ति का मतलब क्या? अरविंद कुमार का मानना था कि अब वही आदमी देशभक्त माना जाना चाहिए जो अपना हर काम मेहनत से, पूरी तनदेही से, ईमानदारी से करे और निजी विकास कर के देश को आगे बढ़ाए. कोरी नारेबाज़ी को नए दौर मेँ देशभक्ति नहीँ कहा जा सकता.

बस यह उन्होँने अपने जीवन का महामंत्र बना लिया.

1948 आते आते दिन भर प्रैस मेँ नौकरी के बाद शाम के समय आगे की पढ़ाई शुरू कर दी. मैट्रिक मेँ उन्हेँ चार विषयोँ में डिस्टिंक्शन मिला था. 1956 तक शाम को चलने वाले पंजाब विश्वविद्यालय के ईविंग कालिज से इंग्लिश लिटरेचर मेँ ऐमए कर लिया. तब तक वह दिल्ली प्रैस मेँ पहले प्रूफ़ रीडर, फिर उप संपादक सरिता, बाद में उप संपादक (इंग्लिश) कैरेवान बन चुके थे. फिर धीरे धीरे वहाँ की सभी पत्रिकाओँ के प्रभारी सहायक संपादक बन गए थे.

इसी बीच 1953 मेँ उन का परिचय हुआ इंग्लिश के पहले थिसारस से. ठीक 101 साल पहले लंदन मेँ इस ऐतिहासिक कोश की रचना फ़्राँसीसी मूल के वैज्ञानिक और भाषाप्रेमी रोजेट ने की थी. यह किताब क्या देखी, अरविंद जी दीवाने हो गए. दिनरात अपने पास रखते, जब तब पन्ने पलटते, शब्दोँ के अनमोल भंडार मेँ विचरते, इंग्लिश की शब्दशक्ति बढ़ाते रहते… और सोचते चाहते रहते कि हिंदी मेँ भी कोई ऐसा कोश हो तो क्या हो! वाह हो! हिंदी का भला हो, हिंदी आगे बढ़े, तेज़ी से बढ़े. 23 साल की उमर के अरविंद यह सोच ही नहीँ सकते थे कि इस के 43 साल बाद आज़ादी का पचासवाँ साल आते आते उन्हीँ के हाथ का बना हिंदी का पहला थिसारस छपेगा और उसकी पहली प्रति वह स्वयं और उन की पत्नी कुसुम भारत के राष्ट्रपति को भेंट करेँगे. अपनी देशभक्ति और हिंदी प्रेम का साकार प्रमाण पेश करेँगे. वह तो बस यही सोचते थे कि भारत सरकार ने हिंदी कोशकारिता के लिए इतने सारे आयोग बनाए हैँ. वहाँ से कभी न कभी हिंदी का थिसारस भी आएगा ही.

लेकिन यहाँ तक का सफ़र कोई आसान सफ़र नहीँ था. वह जो सपना था, 1973 के दिसंबर की 26-27 तारीख़ तक सपना ही बना रहा था. इस बीच वह सरिता कैरेवान छोड़ कर मुंबई (तब बंबई) से टाइम्स आफ़ इंडिया के लिए फ़िल्म पत्रिका माधुरी का संपादन करने पहुँच चुके थे (नवंबर 1963). तब वह हिंदी के डाक्टर धर्मवीर भारती, महावीर अधिकारी, चंद्रगुप्त विद्यालंकार और आनंदप्रकाश जैन और इंग्लिश के शामनाथ, डाक्टर रांगणेकर, ख़ुशवंत सिंह और बी.के. करंजिया जैसे संपादकोँ के बीच टाइम्स संस्थान के सब से कम उम्र के संपादक थे. उन्होँने माधुरी को सस्ती स्टार-क्रेज़ी फ़िल्म पत्रकारिता से दूर रखा था, हिंदी मेँ कलात्मक और सुरुचिपूर्ण फ़िल्मोँ को प्रोत्साहन देने के लिए समांतर सिनेमा आंदोलन की मुखपत्रिका बना दिया.

माधुरी के संपादन के आरंभिक काल मेँ ही उन्हेँ गीतकार शैलेंद्र, निर्माता-निर्देशक राज कपूर, देव आनंद, बी.आर. चोपड़ा, शक्तिसामंत, मृणाल सेन, संगीतकार नौशाद, ख़य्याम, जयदेव, शंकर जयकिशन जैसे दिग्गजोँ से फ़िल्म कला के बारे मेँ जानने को बहुत कुछ मिला. लेकिन 1973 तक आते आते उन्हें लगने लगा था कि वह कोरे फ़िल्म पत्रकार बनने के लिए नहीँ जनमे हैँ. उन्हें तो अपना कुछ ऐसा करना है जिस के लिए वह पैदा हुए हैँ, जो उन का अपना निजी सपना हो.

सपना तेरा है तू ही साकार कर

तभी दिसंबर 26-27 की रात उन्हेँ याद आया वह रोजेट का थिसारस और उस जैसी कोई किताब हिंदी मेँ होने की आकांक्षा. तब रात के अँधेरे मेँ किसी ने उन से कहा – “सपना तेरा था, तो कोई दूसरा क्योँ साकार करेगा. तुझे ही यह करना है, तू ही हिंदी को थिसारस दे.” और 27 की सुबह हैंगिंग गार्डन मेँ सैर के समय अरविंद और कुसुम ने तय कर लिया कि वही यह कोश बनाएँगे.

कहीं से कैसी भी आर्थिक सहायता की संभावना नहीँ थी. तय किया कि फ़िलहाल शाम के सुबह और समय मुंबई मेँ ही घर पर काम करें, किफ़ायती जीवन जी कर बचत बढ़ाएँ और 1978 की मई तक माधुरी छोड़ कर दिल्ली अपने घर चले जाएँ. उस दिन से जीवन को नई राह मिल गई.

1978 मेँ वह मुंबई फ़िल्म पत्रकारिता में शीर्ष पर थे. मायानगरी की मोहमाया छोड़ कर दिल्ली चले आए. पर मुसीबतेँ तो अभी शुरू होनी थीं. सितंबर में माडल टाउन को यमुना की बाढ़ ने घेर लिया. मुंबई से लाया सब साज़ सामान पानी की भेंट चढ़ गया. कुछ बचा तो बचे थे समांतर कोश के कार्ड… भूत काल बहा ले गई थी, यमुना भविष्य को सुरक्षित छोड़ गई थी.

तभी दूसरी मुसीबत आई. पिताजी ने बाढ़ से परेशान हो कर वह मकान सस्ते मेँ बेच दिया. अब गाज़ियाबाद के सूर्यनगर-चंद्रनगर इलाक़े में आए. जो बचत थी वह सब हवा हो गई. रीडर्स डाइजेस्ट का हिंदी संस्करण सर्वोत्तम निकालने की जिम्मेदारी लेनी पड़ी. लेकिन वहाँ कुल पाँच साल (1980-1985) काम किया. आर्थिक दशा कामचलाऊ होते ही सर्वोत्तम छोड़ दिया और समांतर कोश के काम मेँ पूरी तरह लग गए.

और तब 1989 मेँ दिल का भारी दौरा पड़ा. सफल आपरेशन हुआ. कुछ दिन बाद ही जांडिस ने घेर लिया. उस से निकल कर फिर पति पत्नी दिनरात समांतर कोश पर काम करने लगे. बेटे डाक्टर सुमीत ने सुझाव दिया और इस के लिए आर्थिक संसाधन जुटाए कि सारा काम कंप्यूटर पर किया जाए. 63 साल के अरविंद ने कंप्यूटर पर काम शुरू किया. पुराना डाटा किसी से फ़ीड करवाया. नया डाटा अपने आप जोड़ा.

जो काम कुल दो साल मेँ पूरा करने का अनुमान था, वह बड़ी जद्दोजहद के बात 23 साल बाद 1996 मेँ पूरा हुआ. और नेशनल बुक ट्रस्ट ने स्वाधीनता के पचासवेँ वर्ष की पुस्तकोँ में सम्मिलित करते हुए प्रकाशित किया.

पर अरविंद का काम अभी ख़त्म नहीँ हुआ था. अब उस डाटा मेँ इंग्लिश डालने की धुन सवार हुई. दस साल की मेहनत के बाद स्वाधीनता के साठवेँ वर्ष मेँ विश्व का तीन खंडोँ वाला विशालतम द्विभाषी थिसारस पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी प्रकाशित हुआ.

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( अरविंद लैक्सिकन में सुंदर के पर्यायोँ का पहला पेज )

और अब अरविंद कुमार ने 1947 के देशभक्ति के अपने मूल मंत्र का पालन करते हुए बनाया है इंटरनेट पर ज़ारी होने वाला अनोखा अरविंद लैक्सिकन. लैक्सिकन के विशाल शब्द महसागर में 9,00,000 से ज़्यादा इंग्लिश और हिंदी अभिव्यक्तियाँ हैँ. माउस से क्लिक कीजिए - पूरा रत्नभंडार खुल जाएगा... उदाहरण के लिए सुंदर शब्द के इंग्लिश मेँ 200 से और हिंदी मेँ 500 से ज़्यादा पर्याय हैँ. यह 15 अगस्त 2011 से राष्ट्र ही नहीँ दुनिया भर के भाषाप्रेमियोँ को उपलब्ध होगा.

इस के बाद अरविंद निष्क्रिय बैठने वाले नहीँ हैँ. अब वह इस में तमिल और चीनी भाषाएँ जोड़ने की योजना बना रहे हैँ. उन का कहना है चलना जीवन की कहानी रुकना मौत की निशानी.

--दयानंद पांडेय

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/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
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