संदेश

June, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

-------------------

अनीता मिश्र की कविता - कितने दुखी हो तुम

चित्र
क्‍या तुम्‍हारा दुख उससे बड़ा है ?सात साल की वो मासूमजो कचरे के ढेर से एक जोड़ी चप्‍पल मिलने पर खुश हैअपनी छोटी बहन को पहना करनाप देखती, फिर उतारतीफिर पहनाती और ......................मायूस हो जाती ,सही माप न आने परफिर लग जाती अपने काम में जैसे समझ लिया हो नंगे पांवचलना ही उसकी नियति होक्‍यातुम्‍हारा दुख उससे बडा है ?वोबूढ़ा जो उस भव्‍य शामियाने केबाहर खड़ा है उम्‍मीद से किशादी के बाद बचा खानाशायद फेंका जाए तोकुछ खाना उसे भी मिल सकेपर यहां कुछ आधुनिक तरह का भोज जिसे पर प्‍लेट पे सिस्‍टम कहाजातासो कुछ भी बाहर ना फेंका गयाभूखेयाआधे पेट रहना हीउसकी नियति है मान लिया उसनेक्‍यातुम्‍हारा दुख उससे बडा है ?जो बारह वर्ष की उम्र में पढ़ाई छोडकर दस घरों काचौकाबर्तनकरतीहै ,जिससेउसकेबाकीकेचारऔरभाईबहनोका भरसके पेटकभी कभी काम वाले घरों मेंखिलौनों और किताबों को उम्‍मीद से देखती है, फिरफ्राक मोड़ काम में जुट जाती जैसेकिअबयही उसकी नियति हैक्‍यातुम्‍हारा दुख इनसबसे बडा है ?अगर तुम्‍हेअबभीलगताहैकिहाँ..............तो,तुमइसपृथ्वी केसबसेदुखीव्‍यक्‍तिहोकितुम्‍हारेपासजीवनजीनेकीमूलभूतचीजेंभीनहींहैऔरतुमइनसबसेभीग…

प्रमोद भार्गव का आलेख - लड़की को लड़का बनाने की चाहत

चित्र
पितृसत्तात्‍मक मानसिकता और जीव वैज्ञानिक रूढ़िवाद हमारे देश के जन-मानस में कितनी गहरी पैठ बनाए हुए है, इसका पता लिंग परिवर्तन के लिए की जा रही उन शल्‍य क्रियाओं से चलता है, इनके जरिए लड़की को लड़का बनाया जा रहा है। समाज में बेटे की उग्र चाहत के चलते अभी तक हम कोख में ही गर्भ जल परीक्षण प्रणाली (अल्‍ट्रा साउण्‍ड) के जरिए कन्‍या भू्रण की पहचान कर उसे कोख में ही मार डालने के वीभत्‍स कारनामों से परिचित थे, लेकिन अब इस प्रणाली की अगली कड़ी ‘जेनिटोप्‍लास्‍टी' तकनीक जन्‍म ले चुकी है। इसके मार्फत मासूम बालिकाओं का वजूद खतरे में पड़ गया है। हाल ही में एक अंग्रेजी दैनिक ने पर्दाफाश किया है कि मध्‍यप्रदेश के इन्‍दौर में एक से पांच वर्ष तक की अबोध बालिकाओं का लिंग परिवर्तन कर उनका बालकों के रूप में कायांतरण कर अमानवीय कृत्‍य किया जा रहा है। अब तक सैंकड़ों बालिकाएं इस कायांतरण की प्रक्रिया से गुजर चुकी हैं। इस सिलसिले में चिकित्‍सकों की दलील तो यह है कि जिनका लिंग परिवर्तन किया गया है, वे बच्‍चे न तो पूर्ण स्‍त्री होते हैं और न ही पूर्ण पुरूष। मसलन ये हिजड़ों की नस्‍ल के होते हैं। लेकिन यह झू…

विजय वर्मा की रचना - बीते हुए दिन

चित्र
बीते हुए दिन
मस्तीभरी अब वो शमाँ नहीं है
पहले जैसी यह जहाँ  नहीं है.ग़ुम है मतवाली कोयल की कूक
साबुन,पानी,बुलबुले और फूँक .कहाँ  है वो फुर्सत के  लम्हे!
अब रहते है सब सहमे-सहमेआँगन में गौरैया का फुदक-फुदकना
बाहर बच्चों का वो   कूद-कुदकनाराजा-रानी की वो सरस-कहानी
इस युग के बच्चों ने कहाँ है जानी !सरसों के वो पीले फूल दहकते,
अब किसी से कुछ क्यूँ नहीं कहते!पेड़ो पर चढ़ना,छुप कर  सो जाना
तब होती थी ये बातें रोजाना.टायर लुढ़काते जाना विश्व-भ्रमण
किस्सों में हरिश्चंद्र और श्रवन.गुड्डे-गुड्डियों की धूमधाम से शादी,
टीवी-विडियो ने कबकी बंद करवा दीचंदा मामा दिन में कहाँ है जाते?
ऐसे प्रश्न अब  कम  ही  आते.रेडियो के अंदर कौन बोल रहा है?
अँधेरे में डाली पर कौन डोल रहा है?लंगड़ी मैना की ऐसी चाल है क्यूँ?
बंदर के पीछे आखिर लाल है क्यूँ?पेड़ो के पत्तों की वो सरसराहट
अँधेरे में अनजानी कोई आहट.बांस-खोपचे के बने वो 'मवनी
मवनी भर 'लाइ',एक चवन्नी.अलकतरे के बने,बिकते वो लट्टू
मरते थे जिसपर बब्बन और बिट्टू.चने के भूंजे, सोंधी मकई के लावा
अब तो मैग्गी,चाऊ  पे धावा पेड़ों पर सर्र से चढ़ती गिलहरियाँ
नील गगन में …

पुरुषोत्तम व्यास की कविता - अपनी कविता पढ़कर

चित्र
अपनी कविता पढ़करअपनी कविता पढ़करउसे याद करताभूली भूली  सी याद कोफिर आंखों भरता हूँखड़ी हैअब भी वहीदेख रही है मुझ कोह्दय हर कोने में उसको ही पाता हूँशब्द होते नदी नदीशब्द होते सागर सागरप्यार ही प्यार  से दूर हो जाता ।मेरे कमरे मै तितली आईमेरे कमरे मै तितली आईमन में खुशियां भर लाईचहक गया सारा संसारपंख फैलाये वह आई  ।नयन- सुंदर-सेंमृग के नयन - फीके थेबात – बात- मुस्कुरातीजीवन मे चाह जगाती ।हर चीज मुझे - सुहातीतुम ही मेरे हो-कहते – कहते  रूक सी जातीमेरे कमरे मै तितली आई ।यह उसका प्यार मुझे प्यारालगता-आवाज देने पर चुप - सा रहतामेरे कमरे मै तितली आई ।

संजय दानी की ग़ज़ल - मुहब्बत विरह के धूप में तपती जवानी के सिवा क्या है...

चित्र
मुहब्बत तेरी मेरी कहानी के सिवा क्या है,
विरह के धूप में तपती जवानी के सिवा क्या है।तुम्हारी दीद की उम्मीद में बैठा हूं तेरे दर,
तुम्हारे झूठे वादों की गुलामी के सिवा क्या है।समन्दर ने किनारों की ज़मानत बेवजह क्यूं ली,
इबादत-ए-बला आसमानी के सिवा क्या है।तेरी ज़ुल्फ़ों के गुलशन में गुले-दिल पीला पड़ जाता,
तेरे मन में सितम की बाग़वानी के सिवा क्या है।पतंगे-दिल को कोई थामने वाला मिले ना तो,
थकी हारी हवाओं की रवानी के सिवा क्या है।न इतराओ ज़मीने ज़िन्दगी की इस बुलन्दी पर,
हक़ीक़त में तेरी फ़स्लें, लगानी के सिवा क्या है।शिकम का तर्क देकर बैठा है परदेश में हमदम,
विदेशों में हवस की पासबानी के सिवा क्या है।ग़रीबों के सिसकते आंसुओं का मोल दानी अब,
अमीरों के लिये आंखों के पानी के सिवा क्या है।

मुक्त होती औरत - पुस्तक समीक्षा

चित्र
समीक्षा - कथा संग्रह - मुक्‍त होती औरत -समकालीनता की दास्‍तान ‘मुक्‍त होती औरत'समीक्षक - शीना एन. बी.स्‍वस्‍थ सामाजिक जीवन के निर्माण के लिए सुदृढ़ राष्‍ट्रीय एवं आर्थिक परिस्‍थितियों की तरह स्‍वस्‍थ भावनात्‍मक तत्‍वों की भी अह्‌म भूमिका है। दूसरे शब्‍दों में कह सकते हैं कि भावनात्‍मक अंशों में प्रतिबंध लगाना स्‍वस्‍थ सामाजिकता के खिलाफ है। ऐसी ही एक भावनात्‍मकता है प्रणय। प्रणय हर एक मनुष्‍य का हक है। क्‍योंकि यह एक जैविक जरूरत एवं जिन्‍दगी की तीव्रताओं को अतिक्रमित करने की आत्‍मीयता भी है। यह शरीरबद्ध हो सकता है या नहीं भी हो सकता है। लेकिन एक विकल समाज प्रणय जैसे मूल्‍य को स्‍वीकारने के लिए कभी भी तैयार नहीं है। फलतः प्रणय सदा कपट सदाचार के चाबुक से प्रताड़ित होता है। ‘सदाचार' अधिकार का एक विकृत रूप है। किसी भी मूल्‍य का अस्‍तित्‍व उसे स्‍वीकार नहीं। सवाल यह है कि किस प्रकार ‘सदाचार' प्रणय रूपी मूल्‍य का हनन करता है। ‘सदाचार' प्रणय को अपने विशाल अर्थ एवं संदर्भ में देखने के लिए तैयार नहीं, क्षणिक भोग में सिमटकर दिखाता है। पर शारीरिक मिलन प्रणय का पूर्ण रूप नहीं, बल्…

हरीश नवल की तीन व्यंग्य रचनाएँ

चित्र
त्रिकोणीय
न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी बचपन में एक गाना सुनते थे, ‘मधुवन में राधिका नाची रे।' कितनी भली थी तब राधिका जो बिना किसी हील ओ, हुज्‍जत के नाच लेती थी। वह मधुवन ‘मधु' नामक राक्षस के नाम से था जो कालान्‍तर में ‘वृन्‍दावन' कहलाने लगा था। कहते हैं मधु के नाम से ही ‘मथुरा' नगरी थी जो ‘मथुरा' में बदल गई। ‘मधु' का वध किया श्रीकृष्‍ण ने। श्रीकृष्‍ण की ही प्रेयसी, प्रेरणा थी राधा जो खुद भी नाचती थी और श्रीकृष्‍ण को भी नचा लेती थी। जिसे ‘रास' का नाम दिया गया। लगभग साढ़े पांच हजार साल पहले द्वापर-युग की वह राधा एक शालीन राधा थी, तभी बिना किसी शर्त के कर्मरत रहती थी। कलियुग की राधा नाचना जानती है, नाच सकती है लेकिन सशर्त नाचती है। किसी भी दफ्तर में चले जाइए, एक ‘फाइल' इस टेबल से उस टेबल तक बिना शर्त के जा नहीं सकती। राधा एक प्रतीक है। राधा एक संकेत है। राधा एक इरादा है। यह राधा-राधा ही क्‍यों? कुछ भी हो सकती है। राधा क्‍लर्क है, राधा अफसर है, राधा प्रशासक है, राधा छात्रा है, राधा अध्यापिका है, राधा इंजीनियर है, राधा डॉक्‍टर है। राधा लेखिका है. . .यानी र…

शोभा रस्तोगी 'शोभा' की कविता - मेरी बिटिया

चित्र
हंसती, मुस्काती , नाचती , गाती
हर्षाती, इठलाती,बतियाती,
मनाती कभी मनवाती
कौन ...... मेरी बिटियाआंगन में खेल बड़ी हो रही
रुनझुन करती, कुनमुन करती
भाई की सूनी कलाई को
राखी के धागे से सजाती
चारों ओर खुशियाँ बिखराती
कौन ......मेरी बिटिया |घर की रौनक को बढाती
अंधियारे मन में दिया जलाती
तीज-त्यौहार उसके आसरे
झनन-झनन सा नाच दिखाती
चिड़िया सी कलरव करती
कौन......मेरी बिटियादुःख में मेरे  सुख छनकाती
तप्त मस्तक पे ओस टपकाती
पल पल पल पल बढती जाती
इक दिन बेगानी हो जाएगी
मनन गहन कराती जाती
कौन ......मेरी बिटियाकितनी अपनी  पराई होगी
तब उसकी स्मृतियाँ नाचेंगी
उसको आँचल में लेने को
दिल कितना मचलाएगा
मन की परतों तक रुलवाती
कौन ...... मेरी बिटियाबेटी- सुन्दरतम रचना जीवन की
कैसी व्यथा है उनके मन की
जो खुद को ही छल लेते है
जग में आने से पहले ही हत्या बेटी की कर देते है
बिन बेटी घर शापित करवाती
कौन ...... मेरी बिटिया |
                             ........................                   
-------शोभा रस्तोगी  शोभा
          Mob-09650267277�����������������������������������������������������������������������������������������������…

प्रमोद भार्गव का आलेख - आभासी मीडिया और क्रांति की संभावना

चित्र
पत्रकारिता के नए माध्यम आभासी (ऑन लाइन) मीडिया को क्रांति का वाहक माना जा रहा है। इसे वैकल्पिक या भविष्य का मीडिया भी कहा जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि मिस्त्र और ट्यूनिशिया में क्रांति का जो मुखर रुप देखने को मिला, वह फेसबुक ट्विटर या इस तर्ज की अन्य समाजिक अंतरजाल सेवाओं ;सोशल नेटवर्किंगद्ध का पर्याय था। लेकिन हाल ही में जर्मनी के बॉन में अंतरराष्टीय स्तर पर आयोजित ‘वैश्विक मीडिया संगोष्ठी’ में एक नए विचार के साथ नया शब्द ‘स्टीट बुक’ उभरकर आया है। मसलन ऐसी क्रांति जो आभासी मीडिया और सड़क दोनों पर संयुक्त रुप से लड़ी जा रही हो। क्योंकि सड़क पर उतरे बिना न तो कोई क्रांति संभव है और न ही कोई नीतिगत बदलाव लाना संभव है।

आभासी मीडिया व्यक्ति को अभिप्रेरित करने का सार्थक माध्यम तो हो सकता है, लेकिन कुंभकरणी नींद में सोए सत्तालोलुप शासन प्रशासन को सड़कों पर उतरी प्रत्यक्ष भीड़ के आंदोलन और उद्घोष से ही जगाया जा सकता है। देखने में आ रहा है कि आभासी मीडिया के जरिए विचार संप्रेषण की व्यापकता के बावजूद दुनिया में मानवाधिकारियों का हनन बढ़ रहा है और प्रकृति पर आश्रित रहने वाले समुदाय असुरक…

हरदीप कौर सन्धु की कविता - "चिड़िया - कबूतर पकड़ना"

चित्र
बचपन में नन्हों की नन्हीं नन्हीं सी बातें टोकरी ले छोटी सी छड़ी से थोड़ा टेड़ा करते छड़ी को एक लम्बी रस्सी बाँधते टोकरी के नीचे रोटी का चूरा मुट्ठी भर दाने थोड़ा सा पानी रखते ‌फिर किसी कोने में चुपके से जा छुपते शोर मत करना साथियों को कहते पक्षी उड़ते उड़ते देख कर रोटी दाने..... पानी बिन टोकरी देखे जैसे ही करीब आते अपनी समझ में हम फुर्ती दिखाते धीरे से... रस्सी खींचते टोकरी गिरते पक्षी उड़ते.... चिड़िया फुर्र....र..र कबूतर फुर्र....र..र पक्षी फु्र्र  कर जाते हाथ मलते हम रह जाते बिन साहस हारे दोस्तों के सहारे फिर टोकरी रखते कभी- न- कभी कोई- न- कोई कबूतर - चिड़िया पकड़ी जाती पंखों को कर   हरा गुलाबी छोड़ देते खुले आकाश में लगा कर अपने-अपने नाम की परची ये मेरी चिड़िया..... वो तेरा कबूतर.....
डॉ. हरदीप कौर सन्धु (सिडनी - आस्ट्रेलिया

सुरेन्द्र अग्निहोत्री का आलेख - आपात् काल का खतरा अभी टला नहीं

चित्र
(25 जून 1975 पर विशेष जब इस देश में इस काले कानून को लागू करके नागरिक अधिकारों का हनन हुआ था)

‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ (दिनकर) परन्तु सिंहासन आसानी से खाली नहीं किया गया। आपातकाल की घोषणा प्रेस की सेंसर नसबन्दी, अनुशासन की सख्तियों, पुलिस की ज्यादतियों का नंगा नाच के बीच इन्दिरा गांधी से भी अधिक उनके पुत्र संजय गांधी का अधिनायक वाद....... सारा देश चन्द मुठ्ठियों में भिंच कर टूट गया!

आपात्काल स्वाधीनता के बाद इस देश का सबसे बड़ा कुकर्म है जिसे किसी भी हालत में भूला नही जा सकता है। आपातकाल ने इस देश में अराजकता अनाचार के साथ सत्ता का दुरूपयोग के लिऐ सत्ता लोलुप व्यक्तियों को वह खतरनाक राह दिखाई है जिसके कारण आज पूरे देश में हालात हाथ से निकलते दिख रहे है। लोकतंत्र जिस पर देश गर्व करता था। उसकी शक्ति को क्षीण करने की कोशिश तब से अब तक लगातार बड़ती जा रही है। जिसके कारण देश में लोकतंत्र कब तक सुरक्षित रहेगा। यह सवाल खड़ा हो गया है? राष्ट्रकवि  दिनकर के शब्दों में -

समर शेष है नही पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी अपराध
आपातकाल को याद करने के पीछे मन में जुड़ी उन स्म…

पुस्तक समीक्षा - दिल ले दर्पण के अक्स बने "वक्त के मंज़र"

चित्र
दिल ले दर्पण के अक्स बने   "वक्त के मंज़र"


ग़ज़ल-संग्रह: वक़्त के मंज़र
लेखक: डा॰ ब्रहमजीत गौतम


अपनी ग़ज़लों के लिए अपनी ज़ुबानी क्या कहूँ
कैक्टस हैं ये सभी या रात रानी क्या कहूँ?
डॉ. ब्रह्मजीत गौतम जी के ग़ज़ल संग्रह "वक्त के मंज़र" में जहाँ रचयिता की अनुभूतियां और उनकी खूबियाँ शब्दों से उकेरे हर बिम्ब में साफ़ साफ़ नज़र आईं हैं, साथ में सादगी से अनुभूतियों को अंतस में उतारने की कला का अद्भुत प्रयास पाया जाता है.  किसी ने खूब कहा है 'कवि और शब्द का अटूट बंधन होता है, कवि के बिना शब्द तो हो सकते हैं, परंतु शब्द बिना कवि नहीं होता. एक हद तक यह सही है, पर दूसरी और कविता केवल शब्दों का समूह नहीं,. कविता शब्द के सहारे अपने भावों को भाषा में अभिव्यक्त करने की कला है. गौतम जी के अशयार इसी कला के हर गुण के ज़ामिन हैं. उनकी कलात्मक अनुभूतियाँ शब्द, शिल्प एवं व्याकरण से गुंथी हुई रचनाएं सुंदर शब्द-कौशल का एक नमूना है. एक हमारे सामने है......

कैक्टस हैं ये सभी या रात रानी क्या कहूं?गौतम जी की रचनाधर्मिता पग-पग ही मुखर दिखाई पड़ती है और यही उनकी शक्सियत को अनूठी बुलंदी पर पहुंचती है. अपन…

अजय कुमार तिवारी की कविता - हम जीतेंगे

हम जीतेंगे
मैने  देखा  आसमान में  खिचड़ी बँटते ,
हरिश्चंद्र के  चेलों को  वादों से  नटते ।

गाली बकते हैं जिसको  पानी पी पीकर ,
उसके एक इशारे पर  रातों को  खटते ।

सबकी क्या है मजबूरी  कैसे ये  कहूँ मैं ,
त्यागी के सपने कुचलें ? कैसे ये सहूँ मैं ।

फिर भी गर मुँह खोला तो सूरज चमकेगा ,
दहलाएगा  मुझको  जलाकर वो चहकेगा ।

रोज नए - नए  फंदे  फेंके    जाएँगे ,
तारे  सब चुगली  करते पकड़े  जाएँगे ।

नदियों को देखा समुद्र की ओर ही बहते ,
पेड़-पहाड़ हैं  आसमान से  बातें  करते ।

जहाँ प्रशासन प्रकृति , कहाँ है साथ हमारे ,
चोर  उचक्के हरदम   जीते हम  हैं हारे ।

अपनी भी हठ है कि आज   भले  रीतेंगे ,
अन्ना और हम साथ साथ हैं, हम जीतेंगे ।

अजय कुमार तिवारी,
बी-14,डी.ए.व्ही.कालोनी,
जरही,भटगाँव,जिला-सरगुजा,
छत्तीसगढ़, 497235

नमन दत्त की ग़ज़ल

ग़ज़ल =
दुनिया है बाज़ार, सुन बाबा.
     हर नज़र करे व्यापार, सुन बाबा.

बेमानी है एहसासों की बात यहाँ,
     ख़ुदग़र्ज़ी है प्यार, सुन बाबा.

मेला चार दिनों का है, सब छोड़ यहीं,
     जाना है उस पार, सुन बाबा.

तेरी चादर तेरी लाज बचा पाए,
     उतने पाँव पसार, सुन बाबा.

कैसे रिश्ते नाते ? क्या मेरा तेरा ?
     मतलब का संसार, सुन बाबा.

कुछ पाने को, क्या कुछ खो डाला तूने,
     अब तो सोच विचार, सुन बाबा.

ख़ाली हाथ चले जाना है दुनिया से,
     बस इतना है सार, सुन बाबा.

हर इक गरेबाँ तर है लहू से, देखो तो-
     ये कैसा त्यौहार, सुन बाबा.

मस्जिद में हों राम, ख़ुदा मंदिर पाऊँ,
     ऐसा मंतर मार, सुन बाबा.

इंसानियत जो ज़हनों में भर दे "साबिर"
     हुनर वही दरकार, सुन बाबा.

             *******


-- डॉ. नमन दत्त, खैरागढ़.

प्रमोद भार्गव का आलेख - समान शिक्षा की आदर्श मिसाल

चित्र
गरीब बच्चों के साथ सरकारी स्कूल में पढ़ती है कलेक्टर की बेटी:-

समान शिक्षा की आदर्श मिसाल

प्रमोद भार्गव


        सरकारी शिक्षा में सुधार के तमाम प्रयोगों के दौरान एक आदर्श मिसाल इरोड के नौजवान कलेक्टर डॉ आनंद कुमार ने पेश की है। उन्होंने अपनी लाडली बिटिया गोपिका को पश्चिमी तमिलनाडू के एक पिछड़े जिले इरोड की कुमलन कुट्टई ग्राम पंचायत संघ के प्राथमिक विद्यालय में दाखिला कराया है। जब राजनेताओं, नौकरशाहों और यहां तक कि आम आदमी में भी उत्कृष्ट अंग्रेजी माध्यमों के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की जद्दोजहद चरम पर हो, तब एक जिलाधीश द्वारा तमिल माध्यम के साधन विहीन विद्यालय में बेटी का नाम दर्ज कराना एक ऐसी आदर्श और अनूठी पहल है, जिसे समान शिक्षा का एक कारगर उपाय माना जा सकता है। यदि इस व्यवस्था को लागू करने का वीड़ा देश का प्रशासनिक तंत्र उठा ले तो सरकारी शिक्षा प्रयोगशाला बनने से तो मुक्त होगी ही, शिक्षा की गुणवत्ता में भी अपेक्षित सुधार एकाएक आ जाएगा। कलेक्टर आनंद का आचरण इसलिए भी अनुकरणीय है, क्योकि उन्होंन बेटी का दाखिला पत्नी श्रीमती विद्या के साथ कतार में लग कर एक साधारण नागरिक की तरह तो करा…

रचनाकार के नियमित ग्राहकों की संख्या (रेगुलर सब्सक्राइबर) 1000 से ऊपर पहुँची

चित्र
हिंदी साइटों के लिए 1 हजार  की जादुई  संख्या कोई कम नहीं है.आज रचनाकार के नियमित ग्राहकों की संख्या 1007 तक पहुँच गई. नीचे स्क्रीनशॉट देखें -रचनाकार के पाठकों व रचनाकारों को उनके अमूल्य सहयोग के लिए हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ.***500 से अधिक प्रशंसक 1,000 से अधिक नियमित ग्राहक प्रतिमाह 50,000 से अधिक पाठक 3,200 से ज्यादा हर विधा की रचनाएँ अपनी रचनाओं को नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें***

दीप्ति परमार की कविताएँ - परिभाषा प्रेम की

चित्र
फितरतचाहत यूं ही  मिल जाये
कीमत नहीं होती
जिन्दगी यूं ही मिल जाये
कीमत नहीं होती ।जो मिल जाये आसानी से
उसे सम्हालने की
फितरत नहीं होती
उसे संजोये रखने की
नियत नहीं होती ।चाहत से चाहत न मिले
किस्मत नहीं होती
जिन्दगी को जिन्दगी न मिले
किस्मत नहीं होती ।जो नहीं मिलता किसी तरह
उसे न पाने की
पीड़ा कम नहीं होती
उसे भूल जाने की
कोशिश कम नहीं होती ।क्योंकि जो मिल जाता है
कौड़ी हो जाता है
यह मनुष्य की फितरत
परिवर्तित नहीं होती ।---
परिभाषा प्रेम की खो रही है संवेदना,सहृदयता,सौम्यता
बदल रही है दुनिया
आधुनिकता के रंग में रंगकर
बदल रही है परिभाषा प्रेम की ।अब झुरते नहीं प्रेमी विरह में
ढूँढ लेते है कोई नया
क्योंकि
सोच बदल गयी है लैला मजनु की ।अब प्रेम की गहराई से नहीं
पैसों की फैलाई से मतलब है
अब विश्वास का नहीं
स्वार्थ का रंग गहरा है ।अब प्रेम
आदर्श नहीं
समर्पण नहीं
व्यापार स्थली और रंगभूमि बन गया है ।क्योंकि
बदल रही है परिभाषा प्रेम की
मनुष्य की सहूलियत से
दिन, प्रतिदिन प्रतिमानस ।
--------
डॉ दीप्ति बी परमार , एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी- विभाग
आर आर  पटेल महाविद्यालय , राजकोट

संजय दानी की ग़ज़ल - मत झुकाओ नीमकश आखों को और, और कुछ दिन जीने का अरमान है।

चित्र
मेरी तेरी जब से कुछ पहचान है,
मुश्किलों में तब से मेरी जान है।

प्यार का इज़हार करना चाहूं पर,
डर का चाबुक सांसों का दरबान है।

इश्क़ में दरवेशी का कासा धरे,
बेसबब चलने का वरदान है।

जब से तेरै ज़ुल्फ़ों की खम देखी है,
तब से सांसत मे मेरा ईमान है।

मत झुकाओ नीमकश आखों को और,
और कुछ दिन जीने का अरमान है।

ज़िन्दगी भर ईद की ईदी तुझे,
मेरे हक़ में उम्र भार रमजान है।

सब्र की पगडदियां मेरे लिये,
तू हवस के खेल की मैदान है।

मेरे दिल के कमरे अक्सर रोते हैं,
तू वफ़ा की छत से क्यूं अन्जान है।

तेरे बिन जीना सज़ा से कम नहीं,
मरना भी दानी कहां आसान है।

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़ल - बस है बहस में आज के अखबार की बातें...

चित्र
ग़ज़लखूब  करली  खुद  गरज  संसार की बातें।आ  बैठ  करलें  चंद  लम्‍हें सार की बातें॥बासी खबर बन रह गयी जिन्‍दा जली दुल्‍हन,बस है बहस में आज के अखबार की बातें।अब नफा नुकसान से आगे तो सोचें कुंद हैं,चल  पड़े  मैयत  पे  भी व्‍यापार की बातें।शोहरत पे जले वो मिले मोहताज सफा के,मैंनें  सुनी  हैं  उनमें से दो चार की बातें।फर्ज उनके भी जो हैं उनको बताइए,करते हैं सुबहो शाम जो अधिकार की बातें।          दामोदर लाल जांगिड़         पो0लादड़िया         नागौर राज

दिनेश पाठक ‘शशि' का व्यंग्य - आदत से लाचार'' बनाम ‘‘हम नहीं सुधरेंगे

चित्र
व्‍यंग्‍य रचना- ‘‘आदत से लाचार'' बनाम ‘‘हम नहीं सुधरेंगे''
डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि'
अरे वाह! क्‍या बात करते हैं आप भी, भला सुधरने की कौन सी बात हुई इसमें। सुधरने की बात तो तब हो जब हम बिगड़े हों। अगर आप सुधरने की जिद करेंगे तो पहले हमें बिगड़ना पड़ेगा और फिर उसके बाद सुधरने का प्रयास करेंगे।

ये उत्तर था, हमारे प्रश्‍न के जवाब में श्री छैलविहारी जी का, छैलविहारी यानि हमारे मुहल्‍ले का डाकिया, मुहल्‍ले का माने, हमारे मुहल्‍ले में रहने वाला नहीं बल्‍कि हमारे मुहल्‍ले में डाक बाँटने वाले से है।
छैल विहारी, यानि एक ऐसी शख्‍सियत जिसपर किसी की हुकूमत नहीं चल सकती, वह चाहे तो आपकी चिट्‌ठी-पत्री आप तक पहुँचाने रात के आठ बजे भी चला आये और न चाहे तो सारी की सारी चिटि्‌ठयाँ जमुना मैया की गोद में प्रवाहित होने में देर नहीं।

ये सारी बात मैं ऐसे ही, सोते-लेटे नहीं कह रहा हूँ बल्‍कि पूरे होशो हवास में आपके सुपुर्द कर रहा हूँ।

हुआ यूँ कि एक दिन श्री छैलाविहारी डाक विभाग के एक बड़े से थैले में लगभग 15 किलो वजनी चिट्‌ठी-पत्रियों को कंधे पर लटकाये, चुपके से जमुना मैया के सी…

हिमकर श्‍याम की पितृदिवस विशेष कविता

प्राणों पे उपकार पिता केजीवन के आधार में
लयबद्ध संस्‍कार में
नाम में, पहचान में
झंझावतों, तूफान में
प्राणों पे उपकार पिता केडांट में, फटकार में
प्‍यार और दुलार में
बंदिशों, नसीहतों में
सबकी जरूरतों में
कांधे पर हैं हाथ पिता केमनचाहे वरदान में
हर आंसू, मुस्‍कान में
अनजाने विश्‍वास में
सुरक्षा के अहसास में
मत भूलो अहसान पिता केसादगी की सूरत में
करूणा की मूरत में
जीने के शऊर में
अम्‍मा के सिंदूर में
निश्‍छल हैं जज्‍बात पिता के
सिंधु सी लहक में
शौर्य की दमक में
अद्‌भुत संघर्ष में
अथाह सामर्थ्‍य में
अलहदा ख्‍यालात पिता के
देह के आवरण में
नेह के आचरण में
रिश्‍तों के बंधन में
वंदन और नमन में
चरणों में कायनात पिता केहिमकर श्‍याम
द्वारा ः एन. पी. श्रीवास्‍तव
5, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,
रांची ः 8, झारखंड।

दयानंद पांडेय का आलेख - अरविंद कुमार को शलाका सम्मान : एक सार्थक और प्रेरक ज़िंदगी जी है अरविंद कुमार ने

चित्र
"...और अब अरविंद कुमार ने 1947 के देशभक्ति के अपने मूल मंत्र का पालन करते हुए बनाया है इंटरनेट पर ज़ारी होने वाला अनोखा अरविंद लैक्सिकन. लैक्सिकन के विशाल शब्द महसागर में 9,00,000 से ज़्यादा इंग्लिश और हिंदी अभिव्यक्तियाँ हैँ. माउस से क्लिक कीजिए - पूरा रत्नभंडार खुल जाएगा... उदाहरण के लिए सुंदर शब्द के इंग्लिश मेँ 200 से और हिंदी मेँ 500 से ज़्यादा पर्याय हैँ. यह 15 अगस्त 2011 से राष्ट्र ही नहीँ दुनिया भर के भाषाप्रेमियोँ को उपलब्ध होगा. ..."(तत्कालीन राष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा को समांतर कोश की पहली प्रति भेंट करते अरविंद कुमार दंपति. 13 दिसंबर 1996. यह अरविंद कुमार की पहली प्रकाशित पुस्तक थी. तब अरविंद 66वाँ वर्ष पूरा कर रहे थे.)आजजब अरविंद कुमार को हिंदी अकादेमी दिल्ली ने शलाका सम्मान से विभूषित किया है तो उन्हेँ याद आते हैँ 1945 से शुरू होते कुछ दिन. जनवरी मेँ वह पंदरह साल के हुए थे, मैट्रिक की परीक्षा मेँ बैठ चुके थे, अंतिम पर्चा 26 मार्च को हुआ था और पहली अप्रैल से ही सरिता के प्रकाशकोँ के दिल्ली प्रैस मेँ बतौर कंपोज़ीटर-डिस्ट्रीब्यूर काम करने लगे थे. साथ साथ आज़ाद…

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.