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August, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता - हम जानते हैं

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हम जानते हैं हर इंसान में सरकार होती है एक दिन के लिए जिम्‍मा मिले तो आश्‍वस्‍त करता हूं दर्द की परछाइयाँ भूली-बिसरी बात होगी बदल जायेगी सत्‍ता की परिभाषा नहीं होगी घोटाले बाज की बेल अन्‍ना को जेल संसद, सांसदों की नही जनता की होगी जन के अधिकारों की अब नही कटौती होगी होने को कुछ भी हो सकता है ? हे राम ! अलविदा भाजपा या कांग्रेस बेमानी लोकशाही जब लोक के लिए होगी जनता तब चुप नहीं होगी। --- -सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्रीराजसदन- 120/132बेलदारी लेन, लालबागलखनऊमो0ः 9415508695

गंगा प्रसाद शर्मा गुणशेखर की कविता - अब और नहीं बरगला पाओगे सरकार!

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तुम्हारे आलीशान बंगले की  रखवाली करता हुआ मेरा चाचा  केवल तुम्हें अच्छी लगने के कारण तुम्हारे हरम में आजन्म कुँआरी बैठी मेरी बुआ  गली-गली तुम्हारी विरुदावली  गाता हुआ मेरा मामा  तुम्हारी आलीशान कोठी  और कोठे का मुनीम  मेरा मौसिया तुम्हारी मीठी-मीठी  बातों में आकर  बेगार कर रहे नौकर-चाकर हों या  वसीयत करके घर बैठे हुए मेरे पिता लगता है सब के सब बौरा गए हैं  सबकेसब सड़क पर हैं मेरे आका! और, पूरा कापूरा हरम खाली पड़ा है सरकार! तुम्हारे बहादुर सिपाही बेहद डरे हुए हैं  उनके मुगलिया पाजामे गीले  और नाड़े ढीले हो गए हैं  उनकी संगीनें गमगीन हैं  इक्कीस तोपों की एक साथ सलामी देने वाले  तुम्हारे बड़के तोपची तोपोंमें गोलों की ज़गह अपने-अपने मुँह तोपे पड़े हैं  तुम्हारे पाले हुए सारे तोते  या तो खुद उड़ गए हैं या उड़ा दिए गए हैं 'तू कौन है बे! दीवाने खास में..'  मैं... मैं..!  आपके पवित्र पैरों की गंदी जूती  बेहद आम से बना खास  दासानुदास.. सरकार!!  गुलाम से सूबेदार   'अच्छा...अच्छा!!  जाओ डराओ,बहलाओ, फुसलाओ चुग्गा डालो    कुछ भी करो    पर उन्हें उनकी अपनी पुरानी जगहों पर पहुँचाओ'  &#…

दामोदर लाल ‘जांगिड़' की अन्ना हजारे को समर्पित ग़ज़ल

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ग़ज़ल जो सुने ना प्रजा की हुंकार । बिलकुल बहरी है सरकार॥ प्रजातंत्र की पीर अपार, बन गयी ‘अन्‍ना' का दरबार। राज मुकुट सिंहासन डोले, सुन कर ‘अन्‍ना' की ललकार। डटे रहेंगे डट कर जो हम, झुक जायेगी ये सरकार। कई साल से सोयी थी जो, जागी जनता फिर इक बार। उनके तेवर देखे समझा, क्‍यो पसरा हैं भ्रष्‍टाचार। प्रजातंत्र की हर धमनी में, हुआ नये खून का फिर संचार।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ के कुछ हाइकु

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उदासी (हाइकु)1 छोड़ो उदासीकि नदिया भी प्यासीमिले न जल2 बीता है आजरीता बहुत कुछभरेगा कल3मूँदो न नैनादेखो इधर भीधारा तरल4 दूर नभ मेंचुप तारा अकेला खोजे मीत को5रजनी-वधूआँचल में समेटेमधु प्रीत को6तेरी उदासीमुझ पर है भारीस्मित बिखेरो7छाई उदासीमन-मरुभूमि मेंअँखियाँ प्यासी8बाट है सूनीनहीं आया बटोहीव्यथा है दूनी9कुछ न सूझे गुमसुम आँगनभीगा है मन10मन में क्या है ?मन ही नहीं जानेकिए जतन11तारे गिनतेसब रातें कटतींनींद उड़ी है12किससे पूछें-हो सुधियों से तर हूक उठी क्यों ?-0-

दिनेश पाठक 'शशि' का व्यंग्य - जाही विधि राखे राम...

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‘‘जाही विधि राखे राम, ताही विधि रहिए’’ वाक्य को तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में जिस सन्दर्भ में कहा है उसमें प्राणी मात्र की एक निरीहता ही प्रकट होती है किन्तु यदि इसकी गहराई में उतरा जाए तो सभी प्राणी हजार झंझटों से सहज ही बच सकते हैं। जाही विधि राखे राम,राम यानि आपका संरक्षक, आपका रोजगार दाता, आपका पड़ोसी या फिर आपका एक्स वाई जेड... ये एक ऐसी पंक्ति है जो आपको कदम-कदम पर संरक्षा प्रदान करेगी,आपके अशाान्त मन को शीतलता प्रदान करेगी और आपको अनेक झंझटों से मुक्ति दिला देगी। इस बात के एक नहीं अनेक उदाहरण आपके आस-पास ही नहीं चहुँ ओर बिखरे पड़े हैं। अब देखिए, आपने अपने घर के बाहर दीवार के सहारे बार-बार उग आने वाली घास एवं गंदगी से निजात पाने के लिए अपने घर के सामने पक्का फर्स बनवा दिया। ‘‘वाह क्या बात है, बहुत सुन्दर लग रहा है अब तो घर के सामने’’, देखने वालों ने प्रशंसा की तो आपकी आत्मा भी बाग-बाग हो उठी। कुछ दिन बाद आपने अपने घर के सामने पक्के बनवाए फर्स पर अपनी मोटर साईकिल खड़ी करने का आनंद भी उठाना शुरु कर दिया। मगर आपकी आत्मा में एक चीत्कार तब उठने लगी जब आपके पड़ोसी श्री लट्ठछाप चौधरी…

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की कविताएँ

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और ख़्वाब देखना मना हैजागते रहो, अपनी आँखों मे उगंलियाँ डाल कर क्योंकि सोने में खतरा है ख्वाब देखने का, और ख़्वाब देखना मना है । हो सकता है, तुम्हें डर हो अपनी मौत से, पर यहाँ तो खतरा है ज़िन्दगी से, मौत के बाद, कम से कम नहीं कोई रहेगा रक्त का हिसाब और प्यार की कीमत लेने वाला नहीं कोई मिलेगा जो परंपराओं को लाकर करा सके तुम्हारा मुँह बन्द सोचो मत, सोचने से खतरा है सच बोलने का और सच बोलने वाले को या तो दे दिया जाता है ज़हर या चढ़ा दिया जाता है सूली पर । चलते रहो, खड़े होने में खतरा है किसी साजिश के शिकार होने का और साजिश नहीं देखती इंसान की नीयत । अपनी इच्छाऒं को सूली पर टांग कर सूअर की तरह खाओ मैला तो देखो ज़िन्दगी कितनी आसान है, चिल्लाओ मत , नक्कारखानें की तूती अन्धेरे के जुगनूँ ज़िन्दगी ऐसे नहीं गुजरती .......! ---- प्रेम पानी हैप्रेम अब भी है दिलों में धड़कन की तरह प्रेम कंपकपाते होंठों पे आते हैं लरजते बोल की तरह पेड़ों की कोंपलें बन फूट पड़ते हैं प्रेम प्रेम के सहारे मॉ पाल जाती है बच्चों को, प्रेम के सहारे बुढ़ा जाती है मॉं प्रेम के सहारे ही बाप सह लेता है सारे अपमान प्रेम के सहा…

रामदीन की अर्द्धसत्य कविता

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अर्द्ध-सत्‍यमिटती है सब रार, मिटाने वाला चाहिए। मिटता है अत्‍याचार, मिटाने वाला चाहिए। जादू की जब छड़ी चलाये, जनता अपने दम पर। दूध छठी का याद दिलाये, जनमत अपने दम पर। पानी भरते बड़े-बड़े हैं, अनशन वाला चाहिए। मिटती है सब रार, मिटाने वाला चाहिए। लोकतंत्र की मर्यादा को, तार-तार फिर करते क्‍यों ? शैतानों की बनी जेल में, जन-सेवक को भरते क्‍यों ? क्‍यों ऐसी गुस्‍ताखी कर दी, बताने वाला चाहिए। गधे पंजीरी ना खा पायें, कुछ ऐसा करना चाहिए। मिटती है सब रार, मिटाने वाला चाहिए। ' पद्‌मश्री को ना जाने क्‍यों, कैसे भ्रष्‍ट बता डाला ? '' पद्‌मविभूषित एक फकीर को, अपराधी सा जेल में डाला। एक यती संयमी पुरूष ने, अब तो सस्‍ते में धो डाला। अभी समय है अब भी चेतो, खुद अपनी ना कब्र खोदना। बहुत दुखी जनता आक्रोशित, बंद करो ये नाटक करना। सुबह को बंदी, शाम रिहाई, ऐसा क्‍या मिल गया बहाना ? बदकिस्‍मत सा दर-दर भटके, रमदसुआ, पगला, दीवाना। मान प्रतिष्‍ठा भारत जन की पुनः बचानी चाहिए। बचेगा प्‍यारा देष हमारा, बचाने वाला चाहिए। मिटता है अत्‍याचार, मिटाने वाला चाहिए। मिटती है सब रार, मिटाने वाला चाहिए। ' प…

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - पत्नी की बीमारी

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जैसा कि आप जानते हैं, पत्‍नियां जो हैं, वे जब पति के घर आती हैं तब भी बीमार होती हैं और जब जाती हैं तब भी बीमार होती हैं । पत्‍नी या बीवी का बीमार होना एक ऐसा कटु सत्‍य है जिसे हर एक को भोगना पड़ता है । करेले के रस की तरह बीबी की बीमारी का स्‍वाद सभी को कसेला लगता है । मगर इसे भोगे बिना इस असार संसार में गुजारा नहीं है । जो सुखी पति होते हैं वे भी पत्‍नी की बीमारी के नाम से ही दुखी हो जाते हैं । यदि मैं कवि या शायर होता तो पत्‍नी की बीमारी पर शेर या कविता या गजल या नज्‍म लिखता मगर चूंकि मैं कवि या शायर नहीं हूं अतः श्रीमान्‌ की सेवा में यह व्‍यंग्‍य प्रस्‍तुत कर रहा हूं । पत्‍नियों के शरीर में कहीं एक कमर नाम की चीज होती है जो शादी से पूर्व क्षीणकटि कहलाती है, मगर कुछ समय बाद कमरा बन जाती है ! सारी परेशानियों की जड़ यहीं से शुरू होती है। सुबह-सुबह उठ कर आप भगवान का नाम लेना चाहते हैं, मगर तभी भागवान आकर मासूम-सी सूचना देती है कि उनके कमर में दर्द है । इस छोटे से वाक्‍य से पारिवारिक राजनीति में भीषण तूफान आ जाता है । नाश्‍ता कौन बनायेगा, बच्‍चों को कौन तैयार करेगा । खाने, बर्तन तथा कपड…

शोभा रस्तोगी शोभा की कविता - बिछौना भर

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उसने भी चाहा था उड़ना नील गगन में
चलना समंदर की लहरों पे
भर लेना खुशियों को अंक में दौड़ लगाना मखमली घास पर खुशबू को समेट लेना सांसों में पर --उसे कहाँ मालूम था ?वह तो एक बिछोना भर है बिछना और बिछना भर ही उसकी नियति है वह एक स्त्री है | -------- ---

साहित्‍य संस्‍था ‘मंथन, चण्‍डीगढ़ में भ्रष्‍टाचार पर कविताओं से वार

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चण्‍डीगढ़ । साहित्‍य संस्‍था मंथन' के सौजन्‍य से आज रविवार, दिनांक 28अगस्‍त, 2011को महावीर मुनी जैन मन्‍दिर, सैक्‍टर 23-डी, चण्‍डीगढ़ में भ्रष्‍टाचार विषय को लेकर एक कवि दरबार का आयोजन सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार व समालोचक डॉ.कैलाश आहलूवालिया की अध्‍यक्षता में हुआ, जिसमें मुख्‍यातिथि के रूप में कहानीकार अनन्‍त शर्मा अनन्‍त' ने शिरकत की। मंच संचालन ग़ज़लकार सुशील हसरत' नरेलवी ने किया।भ्रष्‍टाचार मुक्‍त राष्‍ट्र के संघर्ष को समर्पित इस कवि दरबार का शुभारम्‍भ कवि पवन बतरा की कविता ग़रीबी की मार' भ्रष्‍टाचार' से हुआ। तत्‍पश्‍चात सुशील हसरत' नरेवली ने राजनैतिक भ्रष्‍टाचार पर वार करते हुए अपनी ग़ज़ल में कहा कि ‘‘इस क़दर बदतर हुए हालात मेरे देश में/लोग अनशन पे, सियासत ठाठ से सोती रही'', कवि दीपक खेतरपाल ने व्‍यंग्‍य कविता अवलोकन' के ज़रीये कहा कि ‘‘कितनी कुर्बानियाँ, कितने सत्‍याग्रह, कितने अनशन'', कवि राजेश पंकज ने कविता मूल्‍य वृ़द्धि' में कहा कि ‘‘रेट बढ़ जाएंगे घूस के, सोमवार से'' तो राजन ग़रीब ने कविता भ्रष्‍टाचार' सुनाकर…

संजय दानी की ग़ज़ल - रमजान का उपवास

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इक धूप का टुकड़ा भी मेरे पास नहीं है,
पर अहले जहां को कोई संत्रास नहीं है।

मंझधार से लड़ने का मज़ा कुछ और है यारो,
मुरदार किनारों को ये अहसास नहीं है।

कल के लिये हम पैसा जमा कर रहे हैं ख़ूब,
कितनी बची है ज़िन्दगी ये आभास नहीं है।

मासूम चराग़ों की ज़मानत ले चुका हूं,
तूफ़ां की वक़ालत मुझे अब रास नहीं है।

मैं हुस्न के वादों की परीक्षा ले रहा हूं,
वो होगी कभी पास ये विश्वास नहीं है।

अब सब्र के दरिया में चलाऊंगा मैं कश्ती,
पहले कभी भी इसका गो अभ्यास नहीं है।

ग़ुरबत का बुढापा भी जवानी से कहां कम,
मेहनत की लड़ाई का कभी फ़ांस नहीं है।

आज़ादी का हम जश्न मनाने खड़े हैं आज,
बेकार ,सियासी कोई अवकाश नहीं है।

अब भूख से मरना मेरी मजबूरी है दानी,
हक़ में मेरे रमज़ान का उपवास नहीं है।
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के. नन्‍दन ‘अमित' की अन्ना को समर्पित दो कविताएँ

लोकपाल की निगरानीचला अकेला अन्‍ना लेकिन नहीं अकेला रह जाए
जनता की बातों को जनमत के जोर से कह जाए
है देष गरीबों का, लेकिन सरकार यहाँ पूँजीवादी
लोकतंत्र में जनता की आँखों से आँसू बह जाएयह देष वही भारत है जिसके गांधी नेहरू आजाद थे
था कर रहा गुलामी देष किन्‍तु उनके सपने आजाद थे
सरकार विदेशी थी, फिर भी नारे स्वदेश के चलते थे
गांधी के पीछे अनगिनत पाँव साथ-साथ पर चलते थेढूंढो अपराधी कौन यहाँ यह जनता है या है सरकार
अन्‍ना माँग रहा हक अपना मिला उसे क्‍यूँ कारागार
अपनी बात कहे जनता क्‍या उसको है अधिकार नहीं
है अभी यहाँ जनतंत्र, चाहिए हमको ये सरकार नहीं
क्‍यों सत्ता और शासन एक हुए भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त हुए
है देष करोड़ों का फिर भी यह भ्रष्‍टाचारी संक्षिप्‍त हुए
हैं कौन, कहाँ से आए हैं ? जनता इनकी पहचान करे
इस लोकपाल की निगरानी देखो, न कोई संदिग्‍ध करे---अन्‍नाहोने वाली है क्रान्‍ति दिख रही जन-गण मन में,
अधिनायक अन्‍ना सा होगा भारत-भाग्‍य विधाता।
है स्वदेशी सरकार भेजती जन-नायक को कारा,
आश्चर्य है! जिस अन्‍ना को गांधी राग है भाता।
भ्रष्‍टाचारी हो सरकारी, कोई बात नहीं क्‍यों ?
मंत्री जी से नातेदारी, कोई बात नहीं क्…

पिलकेंद्र अरोरा के कुछ सड़कछाप दोहे

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निर्माण तेरा बुदबुदा, अस मानुस की जात
रात बनत उखड़ जात है, ये सड़क प्रभातसड़क में गड्ढे गड्ढे में सड़क, भीतर बाहर है मिट्टी
मिट्टी गिट्टी में मिली, गुमी निगम की सिट्टी पिट्टीकाल गिरे सो आज गिर, आज गिरे सो अब
डामर ठंडा बिछ जाएगा, तू बहुरि गिरेगा कब?लिस्ट जो देखन में चला, ब्लैक न मिलिया कोय
दुर्भाग्य जो खोजा आपना, उस-सा ब्लैक न कोयटेंडर का टुकड़ा बुरा, दो दो आंगुल दाँत
फिक्सिंग करे तो पास हो, नारद मारे लातठेकेदार इतना दीजिए, जामे डिपार्टमेंट समाय
इंजीनियर भूखा न रहे, अफसर न भूखा जाएनेता अफसर दोऊ खड़े, पहले काके लागू पाए
बलिहारी नेता आपकी अफसर दियो बताए(संत कवि कबीर से क्षमा याचना सहित)(साभार - पत्रिका, इंदौर संस्करण - 29-8-11 )

राहुल तिवारी की कविता - गांधी की नयी तस्वीर

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गाँधी की नयी तस्वीरकुछ यूं किसी ने आस जगाई है न कोई दल न मजहब न जाती की लड़ाई  है अन्ना तेरी जिद ने गाँधी की नयी तस्वीर बनाई है भ्रष्टाचारी नेताओं ने हर बाजी मुंह की खाई है पर तेरी सच्ची निष्ठा से सत्ता भी शरमाई  है अन्ना तेरी जिद ने गाँधी की नयी तस्वीर बनाई है भारत की कुछ रस्मों पर
जीवन फिर से मुस्काई है
लोकपाल न आये फिर भी
युवा लोकतंत्र की अंगड़ाई है
बुझ चुके एहसासों में
फिर तूने चिंगारी भड़काई है
अन्ना तेरी जिद ने
गाँधी की नयी तस्वीर बनाई हैजनता है, जूझती घेरे महंगाईहै
पर सत्ता को कैसी चिंता
उनके पास तो सारी मलाई है
पर हम मालिक वो नौकर हैं
यह अधिकारों की लड़ाई है
लोकतंत्र में लोगो की महता
आज तूने समझाई है
अन्ना तेरी जिद ने
गाँधी की नई तस्वीर बनाई हैहै कैसा ये लोक.... तंत्र
बिच में गहरी खाई है
हिन्दू मुस्लिम अलग नहीं हैं
वो तो भाई -भाई हैं
एक तिरंगे के नीचे
अहिंसा की ताक़त तूने समझाई है
अन्ना तेरी जिद ने
गाँधी की नयी तस्वीर बनाई है…………………………………राहुल तिवारी
c /o बाल्मीकि तिवारी
नमना कला (पानी टंकी के पास )
अंबिकापुर
जिला - सरगुजा . पिन - 497001
(छत्तीसगढ़)E-mail – rahultiwari131985@gmail.com

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - जज्बात

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जज्बात भ्रष्टाचार के विरुद्ध हो रहे प्रदर्शनों को देख-सुनकर रामू से भी नहीं रहा गया। अपने कुछ दोस्तों को साथ लेकर शहर के भगत सिंह चौराहे पर पहुँचकर जोर-जोर से नारे लगाने लगा। देखते ही देखते कई सो लोग इकट्ठा हो गए। रामू ने बोलना शुरू किया। भ्रष्टाचार! भ्रष्टाचार! भ्रष्टाचार! आखिर यह जनतंत्र है कि भ्रष्टतंत्र। क्या शहीदों ने इसी भारत के लिए कुर्बानी दी थी कि हम विश्व के भ्रष्टतम देशों में शुमार हो जाएँ ? जनतंत्र में जनहित और देशहित से सर्बोच्च कुछ भी नहीं हो सकता। न कोई परम्परा, न कोई पदाधिकारी, न कोई व्यक्ति, न कोई नियम, न कोई कानून और न ही कुछ और। यदि इनसे देश हित में बाधा पहुँचती है, देश के विकास का मार्ग अवरुद्ध होता है, देश की एकता और अखंडता अक्षुण्ण नहीं रह सकती तो हमें अवश्य बदलना होगा। अतः हमें एक सख्त पारदर्शी कानून की जरूरत है, जिसके दायरे से कोई भी अछूता न रहने पाए, जिससे भ्रष्टाचार पर अकुंश लगाया जा सके और भ्रष्टाचारियों को कटघरे में खड़ा करके उनकी अकूत सम्पत्ति जब्त करके देश हित में लगाया जा सके। रामू बोलता जा रहा था। विधायक जी ने आके उसकी पीठ थपथपाई और बोले मैं तुम्हारे …

शंकर लाल इंदौर की अन्ना को समर्पित कविताएँ

जन लोकपाल: अन्ना और सरकार
अनशन पर बैठ गए अन्ना हजारे
बोले भ्रष्टाचार मिटाने को
भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाने को
जन लोकपाल कानून बनाये सरकारें|सरकार पहले तो तमतमायी फिर भड़की
और देने लगी अंदर कर देने की धमकी
लेकिन जब देखे सड़कों के नज़ारे
हर तरफ उठ रही थी लोकपाल की माँग
और लग रहे थे अन्ना जिंदाबाद के नारे|देखकर वो जन सैलाब
सरकार इतनी हिल गयी
की मंजूर है सारी माँगे
ये एग्रीमेंट भी साइन कर गयी |इस पर राजनेता और मंत्री सरकार से भिड़ गये
बोले यदि देश में लोकपाल कानून बन जायेगा
तो हमारा एक बड़ा तबका जेल में नजर आएगा
फिर इस देश को कौन चलायेगा ?

यदि राजनेता करप्शन नहीं करेगा
लाखों करोड़ों से घर नहीं भरेगा
तो ये ऐशो आराम कहाँ से करेगा ?
फिर आम-आदमी और नेता में
फर्क ही क्या रहेगा ?
और कोई कैसे तो चुनाव लड़ेगा
और कैसे जीतेगा ?
ऐसे में राजपाट सब छुट जायेगा
और हर राजनेता
बेरोजगार हो सड़कों पर नजर आएगा |वो भयानक भविष्य सोचकर
भ्रष्ट नेताओ की आत्मा बुरी तरह से डर गई 
वो बोले नहीं-नहीं ये सब नहीं चलेगा
हमारे रहते इस देश में कोई
जन लोकपाल कानून नहीं बनेगा|आखिर हम चुने हुए राजा है
इस देश पर हम अपना ही हुक्म चलायेंगे
जो …

कान्ति प्रकाश त्यागी की हास्य कविता - गधे के सींग

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गधे के सींग
डा० कान्ति प्रकाश त्यागीअदालत में एक विशेष केस पेश हुआ,
केस सुनकर न्यायाधीश बेहोश हुआ।हूज़ूर ! फ़रज़ू का कहना है,
धरमू उसका गधा मांगने आया,
काम के बाद, जब गधा लौटाने आया,
वह बिना सींग का गधा लौटाने लाया।
फ़रज़ू के साथ न्याय किया जाय,
उसके गधे के सींघ लौटये जाय
धरमू का कहना है,
जो गधा वह ले गया था,
उस गधे के सींग नहीं थे,
अतः सींगवाला गधा, कहां से लौटाय
फ़रज़ू को झूठ की सज़ा दी जाय।दोनों पक्ष के वकील बहस शुरु करें,
अपना पक्ष विस्तार से प्रस्तुत करें।हूज़ूर ! गर्धभराज हैं, हमारे बैशाखनंदन,
घास खाकर करते रहते नित क्रन्दन।
हमारा गधा बहुत काम का है,
यह बहुत ही बड़े नाम का है।
अल्ला ने इसे बहुत अवसर दिये,
परन्तु  सब के सब ठुकरा दिये।
तुम गधा छोड़ कर, हाथी घोड़ा कुछ भी बन जाओ,
प्रभु ! इसी जीवन से खुश हूँ, अधिक ना ललचाओ।
हूज़ूर! इसके पास नैतिकता है, जो किसी के पास नहीं है,
इसकी वाणी में पवित्रता है, जो किसी की वाणी में नहीं है।
बेचारे ने बिना घास खाए, धरमू का काम किया ,
धरमू ने क्या किया, उसे बिना सींग वापिस किया।
जनता में, एक दूसरे से विश्वास उठ जायेगा,
फिर भी गधा ही, आदमी के काम आयेगा।दूसरे पक्ष के वकील को बुलाया जाय…

आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक 'शशि' - दिनेश पाठक 'शशि' की कहानी : एक और अभिमन्यु

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कहानी संग्रह आदमखोर(दहेज विषयक कहानियाँ)संपादकडॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’संस्करण : 2011 मूल्य : 150 प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन विवेक विहार, शाहदरा दिल्ली-32 शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा ----एक और अभिमन्युडॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’उसे लगा कि थोड़ी देर में उसके सारे शरीर का खून खुद-ब-खुद निचुड़ जायेगा और वह हड्डियों का कंकाल मात्र रह जायेगा। कैसे दिखाएगा वह समाज में अब मुँह, और क्या बताएगा लोगों को। सब थू-थू नहीं करेंगे क्या? यही सोच-सोचकर उसके चेहरे का रंग पतझड़ के पत्तों-सा पीला पड़ता जा रहा है। वह सोच-सोचकर हैरान है कि समय कितना बदल गया है। पुत्री ने जैसे ही सोलह वसन्त पार किए, उनके लिए सुयोग्य वर की तलाश शुरु कर दी थी उसने। सुराही-सी गर्दन, तोते-सी पतली नाक और चंचल हिरनी-सी आँखों वाली गोरी-चिट्टी अपनी पुत्री की ओर एक नजर उठाकर जब वह देखता तो उसे लगता-भला इतनी सुन्दर पुत्री के विवाह में क्या अड़चन आयेगी। जिसे भी चुनकर एक बार लायेगा, वही उसकी पुत्री को देख खुश हो जायेगा। और बस, पुत्री का विवाह कर वह दायित्व से मुक्त हो जायेगा। नारी-उत्थान एवं दहेज-विरोधी संस्था का सचिव होने के कारण, …

आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - 18 - शशि पाठक की कहानी : मकड़जाल

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कहानी संग्रह आदमखोर(दहेज विषयक कहानियाँ)संपादकडॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’संस्करण : 2011 मूल्य : 150 प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन विवेक विहार, शाहदरा दिल्ली-32 शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा ----मकड़ जालश्रीमती शशि पाठकमैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे द्वारा बोये गये बीज का इतना दैत्याकार वृक्ष बन जायेगा जो अन्य नवपल्लवित वृक्षों को अपने अस्तित्व के नीचे दबा देगा और मैं मूक दर्शक बनी सब देखती रह जाऊंगी। आखिर इसे उखाड़कर फेंकू तो कैसे? उसकी जड़ें इतने गहरे तक समा गई हैं कि ऐसा असम्भव है। अब तो उस पर फल भी आने वाला है। एक ऐसा फल जिसे खाना तो दूर चखना भी जीवन के लिए घातक है। पर अब क्या हो सकता है। मेरे लाख समझाने पर भी कोई यकीन नहीं करेगा। यकीन करे भी तो कैसे? मैंने ही तो कूट-कूट कर इन लोगों के मन में, मम्मी-पापा व समाज के बारे में, वह सब भर दिया था जिसे सत्य मान, अब ये किसी भी हालत में झुठला नहीं पा रहे हैं। मेरी बात को एक भारतीय नारी की विडम्बना मान, मुझे लाचार व बेबस जान, मेरे सुसरालियों को दोषी मानते हुए बुरा-भला कह रहे हैं। जबकि हकीकत क्या है, इसका उन्हें पता नहीं। बर्निंग व…

आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - 17 - चरण सिंह जादौन की कहानी : दहेज के लिए

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कहानी संग्रह आदमखोर(दहेज विषयक कहानियाँ)संपादकडॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’संस्करण : 2011 मूल्य : 150 प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन विवेक विहार, शाहदरा दिल्ली-32 शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा ----दहेज के लिएश्री चरण सिंह जादौनअमृत विला आज जगमगा रहा है। हजारों बल्बों के जाल से कोठी ढकी हुई है। कोठी का कोई भी ऐसा भाग नहीं है जो न जगमगा रहा हो। अकेली रोशनी का ठेका ‘‘राजहन्स इलैक्ट्रिकल्स’’ ने 10 हजार में लिया है। आज राय साहब सेठ अमृतलाल के इकलौते पुत्र् जगमोहन लाला का दूसरा विवाह है। आज से डेढ़ वर्ष पूर्व भी ठीक इसी ङ्क्तकार से अमृत विला जगमगाया था जब जगमोहन लाल का पहला विवाह गौरधन दास की पुत्र्ी सरला के साथ हुआ था। अपने क्वार्टर में ही सेठ अमृतलाल का घरेलू नौकर सूखा अमृत बिला की जगमगाहट को देख रहा है। जगमोहनलाल के ङ्क्तथम विवाह पर वह बड़ा खुश था। विवाह में शामिल हुआ था। परन्तु आज उसे कोई खुशी नहीं है। हो भी कैसे? उसी के सामने ठीक एक माह पूर्व ही तो जगमोहन की पहली पत्नी का देहान्त हुआ था और आज दूसरा विवाह रचाया जा रहा था। बूढ़ा सूखा सब कुछ जानता है। उसने अमृतविला की हर बात को देखा है उस…

आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - 16 - माधुरी शास्त्री की कहानी : सीढ़ियाँ चढ़ती धूप

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कहानी संग्रह आदमखोर(दहेज विषयक कहानियाँ)संपादकडॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’संस्करण : 2011 मूल्य : 150 प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन विवेक विहार, शाहदरा दिल्ली-32 शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा ----सीढ़ियाँ चढ़ती धूपश्रीमती माधुरी शास्त्री‘‘कुलच्छनी इतना अधिक बोलना तुझे कैसे आ गया?’’ बाबा ने भरे मंडप में अपनी पोती पर हाथ उठा दिया लेकिन उनके मित्र् सामवेदी जी ने बढ़ता हाथ, फौरन जहाँ का तहाँ थाम लिया। ‘‘यह क्या तमाशा है पंडित जी? पढ़ी-लिखी बिटिया पर हाथ उठाते हो?’’ बाबा को कुछ तो समधी की धृष्टता पर और कुछ लक्ष्मी के बड़बोलेपन पर गुस्सा आ रहा था। तभी मिसिर जी अपनी कुर्सी से उठकर इन दोनों के पास चले आये और समझौता कराने की मुद्रा में बोल उठे ‘‘पं. जी जरा बिटिया से भी तो पूछ कर देखलो, आखिर वह चाहती क्या है। उसने इस नये युग में आँख खोली हैं तो उसकी राय भी जान लेना जरुरी है।’’ अभी ये लोग आपस में बातचीत कर ही रहे थे कि तब तक लक्ष्मी ने धरती पर पड़ी बाबा की टोपी तथाकथित ससुर के पैरों के पास से उठा ली। वह उस टोपी को लेकर ऐसे खड़ी हो गई जैसे टोपी, टोपी न होकर बाबा का लहुलुहान सर ही हो। लक्ष्मी की आ…

आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - 15 - राज चतुर्वेदी की कहानी : दहेज

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कहानी संग्रह आदमखोर(दहेज विषयक कहानियाँ)संपादकडॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’संस्करण : 2011 मूल्य : 150 प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन विवेक विहार, शाहदरा दिल्ली-32 शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा ----दहेज श्रीमती राज चतुर्वेदीरविवार की अलसाई-सुबह वह देर से सोकर उठी। वैसे भी कामकाजी महिलाओं का शनिवार से ही यह प्लान बनने लगता है - चलो भई कल तो इतवार है, देर से सोकर उठेंगे.........पूर्व में ही एक राहत का अहसास होने लगता है। रविवार के कार्यक्रम में सवेरे देर से सोकर उठने का अहसास सदैव शीर्ष स्थान पर रहता है। कारण रोजमर्रा, की भागती दौड़ती जिन्दगी में रविवार की सुबह की सुखद शैया जितनी ङ्क्तसन्नता का अहसास दिलाती है उसकी तुलना केवल देवता के ङ्क्तसाद से ही की जा सकती है। इसी सुखद अहसास के वशीभूत मैं भी देर से सोकर उठ पाई। एक प्याली चाय बनाकर आराम से बालकनी में जा बैठी। तभी देखा, मेरी बाई दौड़ती-भागती, जल्दी-जल्दी कदम उठाते हुए चली आ रही है। उसे इतनी जल्दी-जल्दी घर की तरफ आते हुए देखकर स्वभावतः मुझे आश्चर्य-मिश्रित ङ्क्तसन्नता हुई क्योंकि छुट्टी के दिन या तो वो काम पर आती ही नहीं है और अगर आती भ…

आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - 14 - प्रेम दत्त मिश्र मैथिल की कहानी : आत्मदाह

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कहानी संग्रहआदमखोर(दहेज विषयक कहानियाँ)संपादकडॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’संस्करण : 2011 मूल्य : 150 प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन विवेक विहार, शाहदरा दिल्ली-32 शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा ----आत्मदाह डॉ. प्रेम दत्त मिश्र मैथिल‘‘अरे भाई लड़कियों को पढ़ाने-लिखाने और उन्हें योग्य बनाने से क्या लाभ है? खर्च बढ़ाना और हत्या मोल लेना है।’’ ठाकुर दास ने तर्क पूर्ण प्रश्न ‘नारीशिक्षा’ की वकालत करने वाले महानुभावों की मण्डली में किया।’’ ठाकुरदास के प्रश्न को सुनकर ‘नारी-शिक्षा‘ के प्रचार-प्रसारक प्रबुद्धजनों के माथे पर एकदम बल पड़ गया? लोग सोचने लगे कि शिक्षित एवं विचारक प्रगतिशीलता के पक्षधर ठाकुरदास को क्या हो गया है? अभी कल तक घर-घर जाकर कहते-फिरते थे कि फलाने तू अपनी लड़की को स्कूल में पढ़ने क्यों नहीं भेजता है। देख गेंदा ने तो अपनी छोरी का सरस्वती शिशु मन्दिर में नाम लिखा दिया। उसकी देखा-देखी चेता ने भी अपनी बेटी चित्रा को पाठशाला में प्रवेश दिलाने के लिये राजी हो गया है। ‘‘भाई ठाकुरदास! जमाना बदल गया है। लड़का-लड़की सभी समान हैं। सबको पढ़ने-लिखने का समान अधिकार है। पढ़ी-लिखी लड़कियाँ…

आदमखोर (कहानी संकलन) संपादक - डॉ. दिनेश पाठक शशि - 13 - मंजुला गुप्ता की कहानी : नीड़ के पंछी

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कहानी संग्रहआदमखोर(दहेज विषयक कहानियाँ)संपादकडॉ0 दिनेश पाठक ‘शशि’संस्करण : 2011 मूल्य : 150 प्रकाशन : जाह्नवी प्रकाशन विवेक विहार, शाहदरा दिल्ली-32 शब्द संयोजन : सागर कम्प्यूटर्स, मथुरा ----श्रीमती मंजुला गुप्तानीड़ के पंछीदिन के तीन बजने को थे। फाइलों पर झुकी-झुकी काम करती हुई सुनीता थककर निढाल हो चुकी थी। उसने पैन को बंद कर एक तरफ रख दिया। बंद कर बैठ गई। हाथों के साथ-साथ जैसे उनकी आँखों ने भी काम करने से इनकार कर दिया हो! छः घंटों तक लगातार फाइलों में दर्ज एकाउंट्स को चैक करते-करते उसकी समझ में यह नहीं आ पा रहा था कि फाइनल चैकिंग के बावजूद भी उनमें इतनी सारी गलतियां कैसे रह गई? वे त्रुटियां उसकी पैनी निगाहों से किसी भी तरह नहीं बच पा रहीं थीं। बैंक के इस उच्च पद पर आसीन हुए सुनीता को दस वर्ष हो गए हैं। इस सीढ़ी पर पहुँचने के लिए बैंक की परीक्षा उत्तीर्ण करना उसके लिए इतनी कठिन बात न थी जितनी कि पुरुष सहकर्मियों की कलुषित मानसिकता के बीच अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखना। आज नारी-शिक्षा, नारी-पुरुष समानता पर कितने भाषण, नारे और लेख अपनी बुलंदियों पर छाए हुए हैं! परंतु वास्तविकता क…

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