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ज्‍योति सिंह की कविता - तो क्या वो गलत है...

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तो क्‍या वो गलत हैसुबह की किरणों के साथ जब पिता अपने बच्‍चों को सहारा देता है तो क्‍या वो गलत है अपने अस्‍तित्‍व को बनाये रखने के लिए अपने बच्‍चों का सहारा लेता है तो क्‍या वो गलत है हर राह में उसे अच्‍छाई से वाकिफ कराता है तो क्‍या वो गलत है अपनी इज्‍जत को बनाये रखने के लिए अगर अपने बच्‍चों को गलत करने से रोकता है तो क्‍या वो गलत है अपने घर में खुशियों का माहौल बना रहने देना चाहता है तो क्‍या वो गलत है ‘‘क्‍यों इस बात पर उसे पुराने विचार और रूढ़िवादी होने का ताना सहना पड़ता है क्‍यों उसके आखों के आँसू दिखाई नहीं देते जिसका सहारा लेकर हमारे कदम जमीन पर चलना सीखे थे क्‍यों अगर वो आज अपनी इज्‍जत बचा के रखना चाहते हैं तो ये कहा जाता है कि इज्‍जत क्‍या होती है क्‍यों हम ये भूल जाते हैं कि जिसकी उंगलियों का सहारा लेकर हमारे कदम आगे बढ़े थे क्‍या वो पिता गलत था जिसने हमें सहारा दिया क्‍या हम उन्‍हें सोचने पे मजबूर कर दें कि आपका सहारा देना आपके लिए ही एक दिन कलंक बन जायेगा'' -- ज्‍योति सिंह पीएच.डी (हिन्‍दी)वनस्‍थली विद्यापीठ राजस्‍थान-304022 rajputs…

मालिनी गौतम का गीत - स्याह अमा की रातों में

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स्याह अमा की रातों में प्रिय, स्याह अमा की रातों में तुम लक्ष्य तलक चलते ही रहो, मैं ज्योत्स्ना बन न सकूँ तो क्या? बस, दीपक बन जलती ही रहूँ ! इस राग-द्वेष की दुनियाँ में तुम निर्मल बन बढ़ते ही रहो मैं सागर बन न सकूँ तो क्या? बस, सरिता बन बहती ही रहूँ ! प्रिय, बाट जोहती आँखों में तुम बन उपवन फलते ही रहो मैं मंजरी बन न सकूँ तो क्या? बन पीत-पात झरती ही रहूँ ! इस सूखी-बंजर धरती पर तुम पावस बन झरते ही रहो मैं बदली बन न सकूँ तो क्या? बस चातक बन तकती ही रहूँ ! हर शोकाकुल आहत मन में तुम बंसी बन बजते ही रहो मैं राधा बन न सकूँ तो क्या? बन स्वर-लहरी बहती ही रहूँ ! डॉ. मालिनी गौतम

रामदीन के हास्य व्यंग्य दोहे - सन्‍त कर रहे हैं आन्‍दोलन, औ सैनिक करते योग। डाक्‍टरों की फौज खड़ी हैं, पता नहीं है रोग।

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अर्ध्‍य-सत्‍यभ्रष्‍टों पर हँसने की हिम्‍मत, क्‍यों ना करते लालाली। भारी हो गई भू तिहाड़ की, सोचा कभी है लालाजी। मंहगाई काबू से बाहर, कैसे हो गई लालाजी। हर चौथे दिन मूल्‍य वृद्धि पर, चुप क्‍यों रहते लालाजी। सन्‍त कर रहे हैं आन्‍दोलन, औ सैनिक करते योग। डाक्‍टरों की फौज खड़ी हैं, पता नहीं है रोग। भरत मिलाप देख मेले में, भोला बहुत ही रोया। पर, तनिक बात पर सगे बन्‍धु को, सरे आम लठियाया। बहुत काम करने को सिर पर, मत तरसाओं लालाजी। फटे हाल हो गये गिरधारी, कमर टूट गई लालाजी। बैंको की फिर ब्‍याज बढ़ गई, रूकी न कीमत लालाजी। एक साल में सात करोड़ी, कैसे हो गये लालाजी। बोझ तिहाड़ का कम करवाओं, पित्रपक्ष है लालाजी। सबके पुरखों की आत्‍माएं, भटक रही है लालाजी। जेल में चक्‍की अब नाही हैं, मिले सभी कुछ लालाजी। आज किसी घर से भी ज्‍यादा, सुखी हैं जेलें लालाजी। कर्णधार ये न्‍याय बदल लें, अपने ढंग का लालाजी। अफसर और व्‍यवस्‍था बदलें, अपने सुख को लालाजी। पर, नहीं बदलते कुछ ईमानी होते जिद्‌दी, लालाजी। रावहजारे, जय प्रकाश से होते हैं, कुछ लालाजी। भ्रष्‍टों पर हँसने की ताकत, छिपी है इनमें लालाजी। सजा अदालत से …

उमेश कुमार चौरसिया की तीन लघुकथाएँ

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संवेदनाआज आन्‍दोलन को आठ दिन हो गए हैं। प्रदेश भर में जगह-जगह धरने, प्रदर्शन हो रहे हैं, रास्‍ते जाम हो रहे हैं, रेल की पटरियां उखाड़ी जा रही हैं। राजनीतिज्ञों को अपनी कुर्सी और वोट की चिन्‍ता है तो आन्‍दोलनकारियों को अपनी मांगे मनवाने के स्‍वार्थ की फिक्र। रोज हाथठेले से माल ठोकर मजदूरी कमाने वाला भोला आठ दिन से बेकाम बैठा है, उसके बच्‍चों को दो वक्‍त की रोटी भी नसीब नहीं हो रही। मजदूरों की कच्‍ची बस्‍ती में मातम-सा छाया है। बन्‍द रास्‍तों के कारण श्रीवास्‍तव जी की दोनों लड़कियां कैरियर के लिए आवश्‍यक परीक्षा नहीं दे पाने के कारण व्‍यथित हैं। समाचार मिला है कि गांव से ट्रैक्‍टर में बैठकर शहर के स्‍कूल जा रहे बच्‍चों को बन्‍द का रौब दिखाकर मारा-पीटा गया और ट्रैक्‍टर में आग लगा दी गई। मंडी में सब्‍जियों के दाम आसमान छूने लगे हैं। हजारों यात्री ट्रेनें रद्‌द होने से स्‍टेशनों पर फंसे हुए हैं। चारों ओर आमजन हैरान-परेशान है। आन्‍दोलनकारी रेल की पटरियों और राजमार्ग पर डेरा डाले, अलाव के ताप में छक कर खा-पी रहे हैं और ढ़ोल-नगाड़ों की ताल पर खुशी से नाच-गा रहे हैं। टी.वी. पर यह सब दृश्‍य दे…

शशांक मिश्र भारती की हास्य व्यंग्य कविता - गधों की सभा

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गधों की सभामैंने देखा- आज शहर के सर्वाधिक व्‍यस्‍त चौराहे पर गधों को सभा करते ढेंचू-ढेंचू से अपने बन्‍धु-बान्‍धवों की जिज्ञासा शान्‍त करते, पहुंचकर मैंने जब पूछा- अरे भाईयों, क्‍या हो रहा है- किस तरह का आप सबका यहां जमाबाड़ा चल रहा है, सभा तो ऐसी मनुष्‍यों की होती, परन्‍तु- स्‍वर ढेंचू का ही मेरे कानों मे पड़ रहा है क्‍या अड़कर दुलत्‍ती भी मार दे रहे हैं आप अपने बन्‍धु-बान्‍धवों को। सुनते ही मेरे मुंह से इतना बोल पड़ा, उनमें से एक बूढ़ा गधा जनाब जुबान को लगाम दीजिए- हम बात वाले हैं, बाप रखते हैं दुलत्‍ती और ढेंचू का नाम मत लीजिये ये तो हमारी जाति के गौरव का नमूना है जिससे प्रभावित होकर अनेक आप जैसे मेरी जाति में सम्‍मिलित हैं होते, हम तो पीछे से ही मारते हैं, वह चारों ओर से मरते हैं और गधाश्री की उपाधि पाते हैं, तो कभी मूर्ख गधा भी बन जाते हैं। हम सभी ढेंचू ही करते कभी अपने मालिक को धोखा नहीं देते और फिर हम केवल शरीर से गधे हैं न कि मस्‍तिष्‍क से। लेकिन- आपने तो मेरे बच्‍चों का जीना ही मुश्‍किल किया है जब निकले- तो कोई न कोई उंगली उठाता और है कहता-रे, गधे के बच्‍चे देख वो सामने गधा खड…

नन्दलाल भारती की कविताएँ

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वर दे दे....याद है बचपन के वो सूनी आंखों सपनेमां-बाप की आंखों के खाली पन्‍ने ।क्‍या खता थी तूने नफरत किये,विष बीज बोयेनाम - काम तेरा विजयतूने दीन के सपनों को मौत दिये ।क्‍या माफ करेंगे रिसते आंसूकिया-कराया कत्‍ल कल कातुझको क्‍या सजा दूं ।खैर मैं सजा क्‍या दूंगा......परवर निगार देगामेरी बद्‌दुआ तूझे बस इतनी वक्‍त ना माफ करेगा ।तेरे भेद ने बदनसीब बना दिया मुझेमेरे कल की अर्थी मेरे कंधों पर डाल दिया तूने ।क्‍या दीन-दरिद्र या चौथे दर्जे का होना कसूर था,पेट में भूख आंखों में सपने,लेकर जीना कसूर था ।गुनाहगार तू जन्‍मजन्‍मान्‍तर का रहेगावक्‍त ना माफ करेगाकातिल है तू बूढी आखों के सपनों कातूने ऐसी चाल चली अमानुष ना बना पाया खुली आंखों के सपनों को अपना ।जाम टकराया बदनाम कर सपनों का खून कियाअरे अमानुष कैसी सजा, तूने बेगुनाह को दिया ।क्‍या हाशिये के आदमी को हक नहीपूरी आंख सपने देखो और तरक्‍की करेसब हक तुम्‍हें अमानुष नफरत में बौराये शोषित के तालीम और योग्‍यता का वध कर दे ।हम क्‍या थूकेंगे दुनिया थूक रहीवो भी थूक रहे जो तेरे संग जाम टकराये थेमरे सपनों का मोल यही प्रभु मेहनतकश हाशिये के आदमी को तरक…

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का आलेख : बुंदेली लोक परम्परा में विवाह के अवसर पर बनाये जाने वाले दिखनी के पकवान

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भारत लोक में बसा है। विभिन्न भाषायें विभिन्न परम्परायें विभिन्न बोलियां और विभिन्न धर्मों में बसे भारत के रीति रिवाज भी क्षेत्रीयता के मान से अलग अलग हैं। मध्यप्रदेश का उत्त्तरीय भाग जिसमें संपूर्ण सागर संभाग रायसेन विदिशा गुना नरसिंहपुर होशंगाबाद छिंदवाड़ा सिवनी बालाघाट क्षेत्र भी शामिल हैं और उत्तर प्रदेश का संपूर्ण झांसी संभाग उसके जिले मिलाकर बना क्षेत्र बुंदेलखंड कहलाता है। यहां की परंपरायें लोक रिवाज अपनी अनोखी और अलग पहचान बनाये हैं। उत्तर में यमुना से नरमदा और पूर्व में टमस से चंबल तक का भूभाग अपनी पुरातन संस्कृति एवं संस्कारों को संजोये है। लाल कवि की पंक्तियां कि इत यमुना उत नर्मदा इत चंबल उत टोंस क्षत्रसाल से लरन को रहो न काहू होंस, क्षत्रसाल के बुंदेलखंड की सोंधी महक का अहसास करा जातीं हैं। आल्हा ऊदल लोक कवि ईसुरी और लोक पूजित हरदौल की गाथाओं में रचे बसे बुंदेलखंड का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। बूंदेली लोक गीतों की आज भी सारे देश में गूंज मची रहती है। बुंदेली विवाहों की भी अपनी अदभुत एवं अनोखी परम्परा है। लोकगीतों की भरमार जिन्हें गारीं कहा जाता है,ढोलक के साथ संगत फिर न…

ज्योति चौहान की कविता - मैं हर हाल में खुश हूँ

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मैं खुश हूंजिन्दगी है छोटी, मगर हर पल में खुश हूँ, स्कूल में खुश हूं ,घर में खुश हूँ, आज पनीर नहीं है, दाल में ही खुश हूँ आज कार नहीं है, तो दो कदम चल के ही खुश हूँ आज दोस्तों का साथ नहीं ,किताब पढ़के ही खुश हूँ आज कोई नाराज है उसके इस अंदाज़ में भी खुश हूँ जिसे देख नहीं सकती उसकी आवाज़ सुनकर ही खुश हूँ जिसे पा नहीं सकती उसकी याद में ही खुश हूँ बीता हुआ कल जा चुका है, उस कल की मीठी याद में खुश हूँ आने वाले पल का पता नहीं, सपनों में ही खुश हूँ मैं हर हाल में खुश हूँ --- ज्योति चौहानसेक्टर-२२, नॉएडाjyotipatent@gmail.com

रवि गोहदपुरी की कविता - शिक्षा

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कविता....शिक्षा जातिवाद की ये पाठशाला खुले आम चलती हैं समाज की गंदी धारा में शिक्षा निरंतर बिकती है खूब पैसा खर्च किया तब पायी ये डिग्रियां खून पसीना बहाया अपार फिर भी ना समझे दुनिया शिक्षा बिकती बाजारों में छात्र बने इसके खरीददार शिक्षक हैं इसको बेचने वाले पर कौन करे शिक्षा पर प्रतिहार शिक्षा की धांधली को अब हम कैसे मिटायें शिक्षा हमारा जीवन है इसे कैसे आगे बढायें --- रवि गोहदपुरी गोहद--(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com , फतुहा पटना की कलाकृति)

कान्ति प्रकाश त्यागी की हास्य व्यंग्य कविता : स्वर्ग-नर्क

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स्वर्ग- नर्कएक लड़की साधु के पास आईचरण छूकर, यह व्यथा सुनाई,बाबा! मुझे नींद नहीं आतीकोई भी चीज़, नहीं सुहाती।न भूख़ लगती है,न प्यास लगती है।घर वाले दबाब डाल रहे हैं,मैं शादी अवश्य करूं।मैं समझ नहीं पा रही ,शादी करूं या ना करूं।शादी शुदा भी दुखी हैं ,बगैर शादी शुदा दुखी हैं।आदमी शादी करता क्यूं है ?.फिर करके पछताता क्यूं है ?.Iबाबा! , मैं हूँ बहुत परेशान ,आप ही निकालिए समाधान।बच्चा! शादी एक लड्डू है ,प्रत्येक के मन में फूटता है।हो जाय तो भी ना हो भी ,हर तरह से मन टूटता है।जो खाय, वह पछताय ,जो न खाय, वह पछताय।कभी यह सख़्त हो जाता है ,क्भी यह नरम हो जाता है।फिर भी तुम शादी कर लो ,मन के अरमान पूरे कर लो।शादी के बाद जब मृत्यु लोक जाओगी ,तब ही इसका मतलब समझ पाओगी।स्वर्ग मिलेगा, तो अच्छा लगेगा।नरक मिला, तो घर जैसा लगेगा।


Dr.K.P.Tyagi
Prof.& HOD. Mech.Engg.Dept.
Krishna।nstitute of Engineering and Technology
13 KM. Stone, Ghaziabad-Meerut Road, 201206, Ghaziabad, UP--(चित्र - अमरेन्द्र {aryanartist@gmail.com } - फतुहा, पटना  की कलाकृति.)

राजीव श्रीवास्तवा की कविता - नैनों की भाषा

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नैनों की भाषामरूभूमि सी वीरान कभी
कभी उपवन सी सुंदर दिखती है
कल-कल बहता झरना कभी
कभी चट्टानों सी तपती है

कभी ममता की मूरत बन
ये प्रेम सुधा बरसाती है
इसके आँचल की छाँव तले
धरती स्वर्ग बन जाती है

कभी खामोशी का रूप धर
हर बात बयाँ कर जाती है
बिन कहे एक भी शब्द
मन की मनसा दर्शाती है

जब रुद्र रूप धारण करती
ये अग्नि कुंड बन जाती है
दुश्मन पर तीखे वार कर
ये महाकाल कहलाती है

कभी प्रेम रस की वाणी बन
मधुर मिलन करवाती है
इज़हार मोहब्बत कर देती
जब जुबां शिथिल पड़ जाती है

कभी लज्जा की चादर ओढ़े
ये मंद मंद मुस्काती है
कुंदन की काया धरी रहे
जब शर्म से ये झुक जाती है

यहाँ भाषाओं की भीड़ है
हर मोड़ पे बदल जाती है
हम प्रेम सूत्र में बँधे हैं
क्योंकि नैनों की भाषा होती है --

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

संजय दानी की ग़जल - जब फ़स्ले-उम्र सूख चुकी तब वो आई है, मरते समय इलाज़ से कुछ फ़ायदा नहीं...

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अब इश्क़ की गली में कोई पारसा नहीं,
सुख, त्याग के सफ़र कोई जानता नहीं।ये दौर है हवस का सभी अपना सोचते,
रिश्तों की अहमियत से कोई वास्ता नहीं।जब फ़स्ले-उम्र सूख चुकी तब वो आई है,
मरते समय इलाज़ से कुछ फ़ायदा नहीं।मंझधार कश्तियों की मदद करनी चाहे पर,
मगरूर साहिलों का कहीं कुछ पता नहीं।ये वक़्त है कारखानों का खेती क्यूं करें,
मजबूरी की ये इन्तहा है इब्तिदा नहीं।मंदिर की शिक्षा बदले की,मस्जिद में वार का
अब धर्म ओ ग़ुनाह में कुछ फ़ासला नहीं।फुटपाथ पर ग़रीबी ठिठुरती सी बैठी है,,
ज़रदारे शह्र अब किसी की सोचता नहीं।वे क़िस्से लैला मजनूं के सुन के करेंगे क्या,
आदेश हिज्र का कोई जब मानता  नहीं।दिल के चराग़ों को जला, सदियों से बैठा हूं,
कैसे कहूं हवा-ए-सनम में वफ़ा नहीं।
( पारसा-- पवित्र,   ज़रदार- धनवान,  हिज्र- विरह)

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - मुर्गा

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मुर्गा रामू ने देखा कि उसके पूर्व सहपाठी राघव और रमेश उसके कालेज कैम्पस में घूम रहे हैं। तीन वर्ष पूर्व की यादें ताजा हो गईं। उसने पुकारा- “राघव ! राघव” ! राघव और रमेश ने रामू को मुड़कर देखा और एक दूसरे को पहचानते देर न लगी। उन लोगों ने बताया कि लेखपाल के पोस्ट का विज्ञापन निकला हुआ है। जो तहसील से मिलेगा और वही जमा भी होगा। इसी सिलसिले में यहाँ आए हैं। इस कॉलेज का बहुत नाम सुना था, तो सोचा चलो कॉलेज भी देख लेते हैं। अब यहाँ से तहसील जायेंगे। रास्ता भी नहीं मालूम है, पूछते हुए जाना पड़ेगा। रामू बोला उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। क्योंकि यहाँ रहते हुए तीन साल से अधिक हो गया है। सारे रास्ते मालूम है। चलो चलते हैं। लेकिन वहाँ जाने से पहले चलो कुछ खा-पी लेते हैं। तुम लोगों के भी भूख लगी होगी। पूरे अस्सी किलोमीटर चल के आये हो। रामू ने उन लोगों के मना करने पर भी होटल में खाना खिलाया। और एक रिक्शे पर तीनों लोग सवार होकर चल दिए। रास्ते में रमेश ने राघव के कान में धीरे से कहा। चलो अच्छा मुर्गा मिल गया। कोई दिक्कत नहीं हुई। रामू का मन खिन्न हो गया। वह आगे कुछ बोल न सका। केवल यही सोचता रहा कि जिन्हें म…

सृजन के तत्वावधान में हिन्‍दी व्‍यंग्‍य साहित्‍य चर्चा

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हिन्‍दी साहित्‍य, संस्‍कृति एवं रंगमंच को समर्पित संस्‍था सृजन ने आज डाबा गार्डेन्‍स के पवन एनक्‍लेव मे हिन्‍दी व्‍यंग्‍य साहित्‍य चर्चा का आयोजन किया। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता सृजन के सचिव डॉ टी महादेव राव ने किया जबकि अध्‍यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने कार्यक्रम का संचालन किया। स्‍वागत भाषण देते हुए डॉ टी महादेव राव ने व्‍यंग्‍य साहित्‍य चर्चा कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्‍होंने कहा कि व्‍यंग्‍य को साहित्‍य में विधा के रूप में मान्‍यता नहीं मिली जबकि वह हिन्‍दी साहित्‍य में भारतेन्‍दु हरिश्‍चंद्र के समय से आज तक पूरी शिद्दत के साथ विद्यमान है। नीरव कुमार वर्मा ने कहा जिनके लिये लिखा गया है, व्‍यंग्‍य उन पर परोक्ष रूप से आघात करता है। हास्‍य और व्‍यंग्‍य के बीच एक महीन सीमा रेखा होती है। लेखकों को इस पर विशेष ध्‍यान देने की आवश्‍यकता है। सबसे पहले सीमा वर्मा ने अपनी कविता ‘ जीवन का सत्‍य और व्‍यंग्‍य’ में जिंदगी के हर पहलू में व्‍याप्‍त व्‍यंग्‍य पर अपने विचार व्‍यक्‍त किये। श्‍वेता कुमारी ने अपनी रचना ‘ फेस बुक ’ के माध्‍यम से आज के मानव की बदलती व्‍यस्‍तता और प्राथमिकताओं …

व्येंकटेश्वारानन्द मिश्र की कविता - ख्वाब

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ख्वाबअकसर सिहर जाते हैं नफरतों के साए में . परख नहीं कर पाते अपने और  पराये में . रंजिशों की तपन में जलते हैं साथ  मेरे ,  ये ख्वाब हैं मेरी जिन्दगी के.. दुनिया कसर नहीं छोड़ती अधूरा करने में. ये  छोड़ देते  है  पसीना खुद  को पूरा करने में. खुद के लिए दुनिया बदलते हैं साथ मेरे, ये ख्वाब हैं मेरी जिन्दगी के.. वह टूटना नहीं जानते हैं तोड़ दिए जाते हैं मंजिलों से कुछ दूर पहले छोड़ दिए जाते हैं निकल कर आँखों से बहते हैं साथ मेरे , ये ख्वाब हैं मेरी जिन्दगी के ........      ( व्येंकटेश्वारानन्द मिश्र  ) भरजुना, सतना  (मध्य प्रदेश ) --- (चित्र - अमरेन्द्र {aryanartist@gmail.com } , फतुहा, पटना की कलाकृति.)

अभिनव प्रयास के आयोजन में तीसरी आँख साहित्य लेखन पुरस्कार/ सम्मान श्रृंखला हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित

सम्मानित लेखकगण, आप सभी के लाभार्थ एक विशेष विज्ञप्‍ति प्रस्तुत है। निम्नांकित पुरस्कार-योजनाओं में भाग लेना आपके लिए उचित होगा। विदित हो कि त्रैमासिक अभिनव प्रयास(अलीगढ, उप्र) में प्रकाशित देश का बहुचर्चित साहित्यिक स्तम्भ तीसरी आँखअपनी निष्‍पक्षता के लिए जाना जाता है। ये सभी वार्षिक पुरस्कार/सम्मान उसी ‘तीसरी आँख’ नामक स्तम्भ द्वारा समारोहपूर्वक प्रदान किये जाते हैं। आशा है, यह सूचना ‘नव्या’ के पाठकों/रचनाकारों के लिए उपयोगी होंगे। धन्यवाद, समाचार प्रस्तुतकर्ता: अश्‍विनी कुमार रॉय ‘प्रखर’ ..................................................................................................... बहुचर्चित साहित्यिक स्तम्भ तीसरी आँखकी पुरस्कार/सम्मान-श्रृंखला: पुरस्कार क्रमांक-1: श्रीमती सरस्वती सिंह स्मृति: श्रेष्ठ सृजन सम्मान(1100/-रुपये + प्रमाण-पत्र)वैदिक क्रांति परिषद की संस्थापिका एवं ‘सरस्वती प्रकाशन’ की प्रेरणास्रोत श्रीमती सरस्वती सिंह जी की पावन स्मृति में निर्धारित उक्त सम्मान साहित्य की किसी भी विधा (गद्य-पद्य) के रचनाकार को देय होगा जिसके लिए प्रविष्‍टियाँ निम्नांकित स…

प्रभाशंकर उपाध्याय का व्यंग्य संग्रह - ऊँट भी खरगोश था - अंतिम किश्त

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ऊँट भी खरगोश थाव्‍यंग्‍य - संग्रह-प्रभाशंकर उपाध्‍याय

(  पिछले अंक 9 से जारी...)
तीक्ष्‍णक का बुखार
     संस्‍कृति से सरोकार रखने वाली संस्‍था गुणपारखी द्वारा एक अवसर पर कुछेक समाज सेवकों एवं साहित्‍यकारों का सम्‍मान किया गया। अत्‍यन्‍त गरिमापूर्ण उस आयोजन के विशिष्‍ट अतिथि थे, राष्‍ट्राध्‍यक्ष डा․ समानधर्मा, हिन्‍दी-अंग्र्रेजी के उत्‍कट विद्वान। समारोह की अध्‍यक्षता लब्‍धप्रतिष्‍ठ साहित्‍यकार प्रोफेसर 'उपेक्षित' ने की। अनेक खबरनवीस उस आयोजन में उपस्‍थित थे। संस्‍था द्वारा प्रकाशनार्थ प्रेस-विज्ञप्‍तियां तथा फैक्‍स तत्‍क्षण प्रिंट तथा इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया तक पहुंचा दिए गए। न्‍यूज एजेसिंयों को भी विज्ञप्‍तियां भेजी गईं।     

सामान्‍यतया, समाचार जगत में ऐसी खबरों का कोई खास नोटिस नहीं लिया जाता। उस खबर को भी अधिक स्‍थान नहीं मिला। फौरी  तरीके से  अखबारों ने जगह दी। किन्‍तु श्रृव्‍य-दृश्‍य माध्‍यम तो चुप्‍पी मार गया।    
गुणपारखी का सचिव एक संवेदनशील किस्‍म का नौजवान था। वह मीडिया के नार्मल रवैये से बड़ा 'एबनार्मल' हुआ। सर्वप्रथम उसने न्‍यूज-एजेन्‍सियों से सम्‍पर्क साधा…

प्रभाशंकर उपाध्याय का व्यंग्य संग्रह - ऊँट भी खरगोश था - भाग 9

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ऊँट भी खरगोश थाव्‍यंग्‍य - संग्रह-प्रभाशंकर उपाध्‍याय( पिछले अंक से जारी...)जमानत पर छूटे विश्‍वगुरू की प्रेस काँफ्रेंस     जमानत पर रिहा स्‍वामी प्रचंड प्रभुजी महाराज की प्रेस काफ्रेंस का आयोजन था। ऊंचे और भव्‍य आसन पर संतजी विराजे थे। पचासों चेले-चेलियां यत्र-तत्र चुलबुला रहे थे। सैंकड़ों उल्‍लासित भक्‍त, अनवरत जय जयकार से धरती-आसमां को थर्रा देने हेतु यत्‍नशील थे।     मीडिया के कैमरे की जद में आने वाला एक सुनहरा बैनर, महाराज जी के ठीक पीछे टंगा हुआ था। और उस बैनर पर लिखा था-‘‘ श्री श्री 108, पूज्‍यपाद, प्रातः स्‍मरणीय, मठाधिपति, विश्‍वगुरू, स्‍वामी प्रचंड प्रभु जी महाराजधिराज․․․․․․․․․․।''    सामने प्रेस की कुर्सियां थीं। वहां, इलेक्‍ट्रोनिक तथा प्रि्रंट मीडिया के हिन्‍दी और अंग्र्रेजी पत्रकारों का खासा हुजूम नजर आ रहा था। और वहां कुछ ‘एंगल-जर्नलिस्‍ट भी मौजूद थे।;आधुनिक पत्रकारिता की एक विधा को ‘एंगल-जर्नलिज्‍म‘ कहा जाता हैद्ध। मेरे बगल में बैठे एक 'एंगल-जर्नलिस्‍ट' ने बैनर की ओर इंगित करते हुए पूछा- ''इन बाबाओं के नाम के साथ 108 बार श्री शब्‍द क्‍यों लगाया …

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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