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October 2011
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पिछली कड़ियाँ  - एक , दो , तीनचार, पांच

आओ कहें...दिल की बात

कैस जौनपुरी

मुझे माफ करो...!

मुरली,

मेरे प्यारे भाई,

मैं माफ़ी चाहता हूँ...अगर मैंने कभी तुम्हारा दिल दुखाया हो तो...मुझे पता है मैंने कई बार तुम्हारा दिल दुखाया है...दीपा की बात को लेकर...बचपन से लेकर आज तक तुमने कई बार मेरी मदद की...लेकिन मुझे इस बात का अहसास तब हुआ जब तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया...

अब...मुझे तुम्हारी कमी बहुत खलती है...मुझे सच में तुम्हारी कमी खलती है जब भी मुझे अपने कारोबार में तुम्हारे सहारे की जरुरत पड़ती है...मेहरबानी करके फिर से मेरे साथ आ जाओ...मैं अपने सभी दोस्तों से कहता हूँ कि तुम सिर्फ मेरे भाई नहीं मेरे दोस्त जैसे हो...!

अब...मेहरबानी करके मेरी जिन्दगी में वापस आ जाओ. मैं वादा करता हूँ हमारा रिश्ता राम और लक्ष्मण की तरह हमेशा बना रहेगा.

मुझे पता है मैं अब भी तुम्हारे दिल में हूँ...हमारा रिश्ता इतना कमजोर नहीं था जो इस तरह इतनी आसानी से टूट जाए. तुम सिर्फ मेरे भाई नहीं हो...तुम मेरे दोस्त भी हो.

मैं अपने रिश्ते को फिर से शुरू करना चाहता हूँ...जैसा पहले था...तुम्हारे साथ...तुम्हारी माँ के साथ...तुम्हारे पिताजी के साथ...हम सब तुम्हारे जल्दी से वापस आने का इन्तजार कर रहे हैं.

मेहरबानी करके मेरा फोन उठाओ...मैं तुमसे माफ़ी माँगना चाहता हूँ...मेहरबानी करके मुझे माफ करो...!

दीपा ने जो भी किया, इसमें उसकी खुशी थी. वो तुम्हारी बहन थी. क्या हुआ जो उसने अपनी मरजी से शादी कर ली...? क्या हुआ जो उसने गैरबिरादरी में शादी कर ली...? वो है तो तुम्हारी बहन ही ना...? अपनी बहन की खुशी के लिए उसे माफ भी नहीं कर सकते...?

मैंने तो बस दीपा की खुशी में अपनी रजामन्दी दिखाई थी...तुमने मुझसे ही रिश्ता तोड़ लिया...? मेरे भाई...! इस दुनिया में दीपा ऐसी पहली लड़की नहीं है जिसने ऐसा किया...बहुत से लोग करते हैं ऐसा...लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि हम सबसे रिश्ता तोड़ लें...! तुम दूसरों की बात छोड़ो...दीपा तो तुम्हारी अपनी बहन थी...मैंने तो तुम्हारी बहन की खुशी को स्वीकार किया...और तुमने मुझे ही अस्वीकार कर दिया...?

मेरे भाई...! आज जो भी है...दीपा खुश है...क्या मिला तुम्हें नाराज होके...? दीपा ने तो कर लिया उसने जो करना था...और उसने भी जो किया इसीलिए किया क्यूँकि उसे भरोसा नहीं था अपने ही घर वालों पे...उसे डर था कि तुमलोग उसकी बात नहीं समझोगे. ऐसा कब तक चलता रहेगा...? कब तक हम अपनों की ही बात नहीं समझेंगे...? और कब तक हमारे अपने ही हमसे छुप-छुप के शादियाँ करते रहेंगे...?

हम कुछ ऐसा क्यूँ नहीं करते जिससे फिर किसी दीपा को इस तरह छुप के शादी न करनी पड़े...? फिर किसी प्रदीप से उसका भाई मुरली अलग न हो...?

मुरली...! मैं बस इतना कहना चाहता हूँ, माफ कर दो दीपा को...माफ कर दो मुझे...!

तुम्हारा छोटा भाई

प्रदीप

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कैस जौनपुरी

qaisjaunpuri@gmail.com

www.qaisjaunpuri.com

बचपन में तो आम चुराते

कई कई बार गये पकड़े

जरा ठीक से याद करो तो

और किये थे क्या लफड़े ।

 

दादी की धोती खींची थी

और दादा की परदनिया

घोली थी मटके के जल में

हल्दी नमक और धनिया ।

 

टीचर का कार्टून बनाकर‌

ब्लेक बोर्ड रंग डाला था

बड़े गुरूजी ने डंडे से

कैसे फिर धुन डाला था ।

 

नाव चलाने की बातें तो

बचपन की सब करते हैं

नाक चाटते थे कितनी

यह कहने से क्यों डरते हैं ।

 

कच्ची दीवारों की मिट्टी

चाट चाट कितनी खाई

बच्चों पर लिखने वाले कवि

कुछ तो बतलाओ भाई ।

 

बचपन का खट्टा मीठापन‌

करूं याद मन मुस्काता

क्या बोलूं और किसे छुपा लूं

यह कुछ समझ नहीं आता ।

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चण्‍डीगढ़ ः साहित्य संस्‍था ‘मंथन' के सौजन्‍य से आज रविवार, दिनांक 23 अक्‍टूबर, 2011 को महावीर मुनी जैन मन्‍दिर, सैक्‍टर 23-डी, चण्‍डीगढ़ में एक साहित्‍यिक गोष्‍ठी का आयोजन सुप्रसिद्ध साहित्यकार व समालोचक मदन शर्मा ‘राकेश' की अध्‍यक्षता में हुआ, जिसमें मुख्‍यातिथि के रूप में कविराज बलवंत सिँह रावत ने शिरकत की। मंच संचालन ग़ज़लकार सुशील ‘हसरत' नरेलवी ने किया।

गोष्‍ठी के पहले चरण में ‘साहित्यकार से एक मुलाकात' के तहत ऐतिहासिक स्‍थान तामलुक, मिदनापुर, पश्‍चिमी बंगाल में स्‍वतन्‍त्रता सेनानी अनंत माजी व बिमला माजी के घर में सन्‌ 1947 में जन्‍मे सुविख्‍यात बांग्‍ला साहित्यकार बिप्‍लब माजी से रू-ब-रू का आयोजन रहा। माजी का साहित्य सफ़र सन्‌ 1964 से प्रारम्‍भ होकर निरंतर चलायमान है। इन्‍होंने पब्‍लिकेशन हाउस ‘प्रकाशन' व प्रिंटिंग प्रेस का अपना कारोबार छोड़कर खुद को साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। साहित्य की विभिन्‍न विधाओं में अब तक बिप्‍लब माजी की साठ किताबें आ चुकी हैं, जिनमें कविता संग्रह 17, उपन्‍यास 04, बाल साहित्य पर 6 एवं अन्‍य विधाओं में 24 किताबें शामिल हैं। बिप्‍लब माजी द्वारा रचित कई पुस्‍तकों व रचनाओं का इंगलिश, रशियन, फ्रेंच, ज़र्मनी, इटालियन, ग्रीक, जापानी, बुलगेरियन, अरबी, वियतनामी, आइैसलेंडी व हिन्‍दी, उर्दू, तमिल, मलयालम, गुजराती, उड़िया, तेलगू, आसामी, मराठी एवं सन्‍थाली में अनुवाद हो चुका है। उन्‍हें अनेक अंतरराष्‍ट्रीय व राष्‍ट्रीय स्‍तर के पुरस्‍कारों से भी नवाज़ा जा चुका है। इन्‍होंने कई देशों की साहित्‍यिक यात्राएं कीं व कई अंतरराष्‍ट्रीय साहित्‍यिक समारोह में भाग लिया है जिनमें मास्‍को, ताशकन्‍द, लेनिनग्राद, बे्रस, मिन्‍सक,ब्‍लादीमीर एंड शूजदल आदि शामिल हैं।

बिप्‍लब माजी की रचनाओं में ग्रामीण जीवन व प्रकृति, रीतिरिवाज़, संस्‍कृति, पिछड़े वर्ग की उपेक्षा के प्रति पीड़ा तो वेश्‍वीकरण के चलते सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक असमानताओं के प्रति आक्रोश व उत्‍तर आधुनिकता का प्रभाव आम भारतीय जन पर देखने को मिलता है। उनका मानना है कि साहित्य जहाँ समाज का निर्माण व व्‍यक्‍तित्‍व के अनेक पक्षों को सकारात्‍मकता प्रदान करता है तो वहीं साहित्य व संस्‍कृति हमारे समाज के लिए सर्वोतम सुरक्षा कवच भी है। वे इस बात के पक्षधर हैं कि ‘ग्‍लोबलाइजेशन' का स्‍वरूप बदलना चाहिए क्‍योंकि वर्तमान में इसका लाभ केवल 23 प्रतिशत को ही मिल पाता है। बिप्‍लब माजी का कहना था कि ‘‘युवा बाज़ारवाद समर्थित मानसिकता का शिकार होते जा रहे हैं जिससे कि सामाजिक मूल्‍यों का हनन्‌ हो रहा है।'' इसके अतिरिक्‍त माजी ने अपनी कुछेक बंगाली व अंग्रेज़ी कविताओं को सुनाकर कवितामय माहौल को एक नया रंग दिया व ढेरों तालियाँ बटोरीं।

गोष्‍ठी के दूसरे चरण में कवि दरबार का शुभारम्‍भ ग़ज़लकार एस0 एल0 कौशल की शानदार नज़्‍म से हुआ, तदुपरान्‍त श्रुति भगत ने ग़ज़ल, बी0 आर0 रंगाड़ा ने पंजाबी कविता, कवयित्री उर्मिला कौशिक ‘सखी' ने क्षणिकाएं, तो कवि राजेश पंकज, विजय कपूर, कवयित्री शशि कौशल, कवि दीपक खेतरपाल, जोगिन्‍द्र सिँह, अश्‍विनी, आर0 के0 भगत, आर0 के0 मल्‍होत्रा, मदन शर्मा, सुभाष शर्मा ने कविताएं तो सुशील ‘हसरत' नरेलवी, नरेन्‍द्र ‘नाज़', अमरजीत ‘अमर', जयगोपाल ‘अश्‍क' अमृतसरी, बलवंत सिँह रावत एवं मदन शर्मा ‘राकेश' ने ग़ज़ल कहकर खूब वाह-वाही लूटी।

अध्‍यक्षीय भाषण में सुप्रस़िद्ध साहित्यकार मदन शर्मा ‘राकेश' ने अपने वक्‍तव्‍य में कहा कि ‘‘यह हमारा सौभाग्‍य है कि हमें आज बांग्‍ला के सुप्रसिद्ध साहित्यकार व उनके साहित्य को जानने व समझने का अवसर मिला।'' उन्‍होंने इस प्रयास के लिए ‘मंथन, चण्‍डीगढ़' को बधाई भी दी व पढ़ी गई सभी रचनाओं को सुन्‍दर व अर्थपूर्ण बताया। अन्‍त में, संस्‍था की ओर से सभी मंचासीन महानुभावों, पधारे हुए साहित्यकार, साहित्य प्रेमियों व श्रोतागणों का आभार कवि दीपक खेतरपाल ने प्रकट किया गया।

सुशील ‘हसरत' नरेलवी अध्‍यक्ष ‘मंथन' (अवैतनिक) मो0 ः 92165-01966

तुम मेरे दर्द की दवा भी हो,
तुम मेरे ज़ख़्मों पर फ़िदा भी हो।

इश्क़ का रोग ठीक होता नहीं,
ये दिले नादां को पता भी हो।

शह्रों की बदज़नी भी हो हासिल,
गांवों की बेख़ुदी अता भी हो।

पेट परदेश में भरे तो ठीक,
मुल्क में कब्र पर खुदा भी हो।

महलों की खुश्बू से न हो परहेज़,
साथ फ़ुटपाथ की हवा भी हो।

उस समन्दर में डूबना चाहूं,
जो किनारों को चाहता भी हो।

मैं ग़रीबी की आन रख लूंगा,
पर अमीरों की बद्दुआ भी हो।

हारे उन लोगों से बनाऊं फ़ौज़,
जिनके सीनों में हौसला भी हो।

आशिक़ी का ग़ुनाह कर लूं साथ
दानी,मां बाप की दुआ भी हो।

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माँ वीणा वादिनी, मधुर स्वर दो !
हर जिह्वा वैभवयुक्त कर दो !!
मन सारे स्नेहमय हो जाये,
जीवन में वो अमृत भर दो!!

माँ वीणा की झंकार भर दो !
दिल में नवल संचार कर दो !!
हर डाली खुश्बूमय हो जाये ,
ऐसे सब गुलज़ार कर दो !!

अंतस तम को दूर कर दो !
अंधियारे को नूर कर दो !!
मन से मन का हो मिलन,
भेद सारे चूर कर दो !!

गान कर माँ रागिनी का !
भान कर माँ वादिनी का !!
पूरी हो माँ सब कामनाएं,
दो सुर माँ रागिनी का !!
__डॉक्टर सत्यवान वर्मा सौरभ

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चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  फतुहा, पटना की कलाकृति

'' ज़मीर की आवाज ''

दूध के पतीले को देखते ही मिश्रा जी की पत्‍नी ने अंगारे उगलते हुए कहा कि मैं कई दिन से कह रही हॅू कि यह हमारा दूध वाला रोज दूध में पानी डाल कर दे जाता है। परंतु आप भी पता नहीं किस मिट्टी से बने हुए हो कि रोज मेरा इतना चीखने चिल्‍लाने के बावजूद भी आपके कान पर जूं तक नहीं रेंगती। पत्‍नी का इतना शोर सुनने के बाद मिश्रा जी ने अगले ही पल उस दूध वाले को सबक सिखाने के लिये कमर कस ली। अपनी पत्‍नी को दिलासा देते हुए बोले कि मैं आज उस बदमाश की अक्‍कल ठिकाने लगा कर ही रहूंगा। कुछ ही देर बाद मिश्रा जी दूध वाले को दूध में मिलावट करने का आरोपी ठहराते हुए उसे खरी-खरी सुना रहे थे। मिश्रा जी उस दूध वाले को बुरा-भला कहने के साथ कह रहे थे कि मुझे लगता है चंद पैसों के लालच में तुमने अपनी इज्‍जत तो बेच ही दी है साथ ही तुम्‍हारा ज़मीर भी मर गया है।

दूध वाले ने कहा कि आपको कैसे मालूम कि मेरा ज़मीर मर चुका है। मिश्रा जी ने कहा कि तुम्‍हारी यह बेशर्मी वाली हरकतें ही साफ ब्‍यां कर रही है कि तुम्‍हारा ज़मीर मर चुका है। दूध वाले ने हैरान होते हुए कहा कि साहब जी आप तो आज पहली बार मेरी डैयरी पर आए हो और आप मेरे ज़मीर के बारे में सब कुछ कैसे जानते हो? मिश्रा जी ने पूछा कि तुम किस ज़मीर की बात कर रहे हो? दूध वाले ने कहा कि मेरी भैंस के बछड़े का नाम ज़मीर था और वो बेचारा पिछले हफ्‍ते ही मर गया था। मिश्रा जी को कुछ समझ नही आ रहा था कि यह दूध वाला सच में इतना भोला है कि इसे ज़मीर के बारे में कुछ मालूम नहीं या यह मुझे ही बेवकूफ बना रहा है। मिश्रा जी ने दूध वाले के मन को टटोलते हुए कहा कि जो लोग चेहरे पर नकली मुखौटे लगा कर अपनी असलियत को छिपाते है उन लोगों के बारे में यह कहा जाता है कि इनका ज़मीर मर गया है।

दूध वाले ने कहा कि मैं तो जैसा हॅू वैसा ही आपके सामने खड़ा हॅू मैंने तो अपने चेहरे पर कोई मुखौटा नहीं लगाया हुआ फिर आप यह सब कुछ मुझे क्‍यूं समझा रहे हो? मिश्रा जी ने उसे डांटने की बजाए प्‍यार से बात करते हुए कहा कि असल में मेरा कहने का मतलब यह है कि कुछ लोग पैसा कमाने के लालच में अपने ईमान को बेच देते हैं। मैने यह सब कुछ तुम्‍हें इस लिये कहा क्‍योंकि कई दिन से मेरी पत्‍नी शिकायत कर रही है कि तुम दूध में पानी मिला कर लाते हो। दूध वाले ने झट से कसम खाते हुए कहा साहब जी मुझे आपकी कसम, मैंने आज तक दूध में कभी पानी नहीं मिलाया। मिश्रा जी ने उससे कहा कि इतना तो मैं भी जानता हॅू कि जितने भोले तुम दिखते हो असल में इतने भोले तुम हो नहीं। अगर तुम दूध में पानी नहीं मिलाते तो फिर मेरी पत्‍नी कुछ दिनों से दूध पतला होने की शिकायत क्‍यू कर रही है? देखो भाई, भूल और गलती किसी से भी हो सकती है, अगर तुमने ऐसा कुछ किया है तो मुझे सब कुछ सच-सच बता दो। एक बार तुम यदि सब कुछ सच कह दोगे तो तुम्‍हारा ज़मीर मरने से बच जायेगा। दूध वाले ने फिर से ज़मीर का जिक्र आते ही पूछा कि साहब जी पहले तो ठीक से यह बताओ कि आप कौन से ज़़मीर की बात कर रहे हो, क्‍योंकि मैं तो किसी और ज़मीर को जानता ही नहीं।

मिश्रा जी ने उसकी नादानी को भांपने के बाद उसे सलाह देते हुए कहा कि कुछ लोग अधिक से अधिक पैसा कमाने और सुख पाने की चाह में अपने मन की आवाज को अनसुना करते हुए हताश एवं निराश होकर जब कोई गलत काम करने लगते है। ऐसे में हमारी आत्‍मा हमें उसके लिये झिंझोड़ती है। उस आत्‍मा की सकारत्‍मक आवाज को ही ज़मीर कहते है। अब दूध वाले को सारा किस्‍सा समझ आ गया था। मिश्रा जी के बात करने के तरीके से वो इतना प्रभावित हुआ कि उसने बिना देरी किये यह स्‍वीकार कर लिया कि वो दूध में पानी नहीं बल्‍कि पानी में दूध मिलाता है दूध वाले ने यह भी कबूल कर लिया कि जब भी वो यह सब कुछ करता है तो उसके मन से जरूर एक आवाज उठती थी कि तुम यह गलत कर रहे हो। लेकिन घर-परिवार की बढ़ती जरूरतों ने मुझे यह सब कुछ करने पर मजबूर कर दिया था। मिश्रा जी ने जब दूध वाले से उसकी मजबूरी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि कुछ मुफ्‍तखोर दोस्‍त और रिश्‍तेदार ऐसे पल्‍ले पड़े हुए है कि आऐ दिन उनको खुश करने के लिये मुझे काफी खर्चा करना पड़ता है। उन से पिंण्‍ड छुड़ाने के लिये चाहे उन्‍हें कुछ भी कहते रहो, लेकिन वो पीछा छोड़ते ही नहीं।

अब तक मिश्रा जी को दूध वाले की सारी मंशा ठीक से समझ आ चुकी थी। उन्‍होंने उससे कहा कि तुम जिन लोगों के बारे में बता रहे हो, ऐसे लोगों का ज़मीर कभी नहीं जागता बल्‍कि इस तरह के लोग तो समझाने पर और अधिक दांत फाड़ कर बेशर्मी पर उतर आते है। ऐसा महसूस होता है कि आजकल लोगों ने अपनी इज्‍ज़त, सम्‍मान सब कुछ भूल कर अपने ज़मीर को बाजार में नीलाम कर दिया है। मिश्रा जी ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि जिंदगी के रिश्‍तों को निभाने के लिये कई बार हमारे लिये मन के विपरीत जाना भी जरूरी हो जाता है। हमारे जीवन में बहुत से ऐसे काम होते है जो हमें अच्‍छे नहीं लगते परंतु हमें उनको करना पड़ता है। कई दोस्‍त और रिश्‍तेदार ऐसे होते जो हमें अच्‍छे नहीं लगते लेकिन हर हाल में हमें उनके साथ रहना पड़ता है। लेकिन तुम एक बात अपने पल्‍ले बांध लो कि जो कोई अपने ज़मीर की आवाज सुन कर भलाई की डगर पर चलने का प्रयास करते है उनके दुख और कष्‍ट खुद-ब-खुद दूर होने लगते है। उनकी यही सोच उनके जीवन से अंधियारों को मिटा कर उज़ालों में तबदील कर देते है। जब आप दूसरों के दुखों को कम करने के लिये कदम उठाते हो तो आपके दुख ओर परेशानियां अपने आप ही कम होनी शुरू हो जाती है।

इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि कुछ भी गलत काम करने से पहले एक बार तो हर किसी का ज़मीर उसको झिंझोड़ता ही है। वो बात अलग है कि कुछ लोग अपने फायदे के लिये इधर उधर की दलीलें देकर सच को झुठलाने की नाकाम कोशिश करते है, प्रभु ऐसे लोगों को यह अक्‍कल दे कि सच हमेशा सच ही होता है। सच कभी भी, किसी भी हालात में नहीं बदलता। जो कोई सदा ही अपने ज़मीर की बात मान कर चलते है उनका सारा जीवन सुख में ही व्‍यतीत होता है। मिश्रा जी के प्रवचन सुनने के बाद जौली अंकल प्रभु से यही प्रार्थना करते है कि हमें इतना ज्ञान और शक्‍ति देना कि हम कोई भी ऐसा गलत काम न करे जिसमें हमारा ज़मीर हमारे ही हक में आवाज न दें सके।

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'' चांद की सैर ''

एक शाम वीरू काम से लौट कर अपने घर में टीवी पर समाचार देख रहा था। हर चैनल पर मारपीट, हत्‍या, लूटपाट और सरकारी घोटालों के अलावा कोई ढंग का समाचार उसे देखने को नही मिल रहा था। इन खबरों से ऊब कर वीरू ने जैसे ही टीवी बंद करने के रिमोट उठाया तो एक चैनल पर ब्रेकिंग न्‍यूज आ रही थी कि वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्‍हें चांद पर पानी मिल गया है। इस खबर को सुनते ही वीरू ने पास बैठी अपनी पत्‍नी बसन्‍ती से कहा कि अपने शहर में तो आऐ दिन पानी की किल्‍लत बहुत सताती रहती है, मैं सोच रहा हूं कि क्‍यूं न ऐसे मैं चांद पर ही जाकर रहना शुरू कर दूं। बसन्‍ती ने बिना एक क्षण भी व्‍यर्थ गवाएं हुए वीरू पर धावा बोलते हुए कहा कि कोई और चांद पर जायें या न जायें आप तो सबसे पहले वहां जाओगे। वीरू ने पत्‍नी से कहा कि तुम्‍हारी परेशानी क्‍या है, तुम्‍हारे से कोई घर की बात करो या बाहर की तुम मुझे हर बात में क्‍यूं घसीट लेती हो। वीरू की पत्‍नी ने कहा कि मैं सब कुछ जानती हूं कि तुम चांद पर क्‍यूं जाना चाहते हो? कुछ दिन पहले खबर आई थी चांद पर बर्फ मिल गई है और आज पानी मिलने का नया वृतान्‍त टीवी वालों ने सुना दिया है। मैं तुम्‍हारे दारू पीने के चस्‍के को अच्‍छे से जानती हूं। हर दिन शाम होते ही तुम्‍हें दारू पीकर गुलछर्रे उड़ाने के लिये सिर्फ इन्‍हीं दो चीजों की जरूरत होती है। अब तो सिर्फ दारू की बोतल अपने साथ ले जा कर तुम चांद पर चैन से आनंद उठाना चाहते हो।

वीरू ने बात को थोड़ा संभालने के प्रयास में बसन्‍ती से कहा कि मेरा तुम्‍हारा तो जन्‍म-जन्‍म से चोली-दामन का साथ है। मेरे लिये तो तुम ही चांद से बढ़ कर हो। बसन्‍ती ने भी घाट-घाट का पानी पीया हुआ है इसलिये वो इतनी जल्‍दी वीरू की इन चिकनी-चुपड़ी बातों में आने वाली नही थी। वीरू द्वारा बसन्ती को समझाने की जब सभी कोशिशें बेकार होने लगी तो उसने अपना आपा खोते हुए कहा कि चांद की सैर करना कोई गुडियों का खेल नही। वैसे भी तुम क्‍या सोच रही हो कि सरकार ने चांद पर जाने के लिये मेरे राशन कार्ड पर मोहर लगा दी है और मैं सड़क से आटो लेकर अभी चांद पर चला जाऊगा। अब इसके बाद तुमने जरा सी भी ची-चुपड़ की तो तुम्‍हारी हड्डियां तोड़ दूंगा। वैसे एक बात बताओ कि आखिर तुम क्‍या चाहती हो कि सारी उम्र कोल्‍हू का बैल बन कर बस सिर्फ तुम्‍हारी सेवा में जुटा रहूं। तुम ने तो कसम खाई हुई है कि हम कभी भी कहीं न जायें बस कुएं के मेंढ़क की तरह सारा जीवन इसी धरती पर ही गुजार दें।

बसन्‍ती के साथ नोंक-झोंक में चांद की सैर के सपने लिए न जाने कब वीरू नींद के आगोश में खो गया। कुछ ही देर में वीरू ने देखा कि उसने चांद पर जाने की सारी तैयारियां पूरी कर ली है। वीरू जैसे ही अपना सामान लेकर चांद की सैर के लिये निकलने लगा तो बसन्‍ती ने पूछा कि अभी थोड़ी देर पहले ही चांद के मसले को लेकर हमारा इतना झगड़ा हुआ है और अब तुम यह सामान लेकर कहां जाने के चक्‍कर में हो? वीरू ने उससे कहा कि तुम तो हर समय खामख्‍वाह परेशान होती रहती हो, मैं तो सिर्फ कुछ दिनों के लिये चांद की सैर पर जा रहा हूॅ। वो तो ठीक है लेकिन पहले यह बताओ कि जिस आदमी ने दिल्‍ली जैसे शहर में रहते हुए आज तक लालकिला और कुतुबमीनार नहीं देखे उसे चांद पर जाने की क्‍या जरूरत आन पड़ी है? इससे पहले की वीरू बसन्‍ती के सवालों को समझ कर कोई जवाब देता बसन्‍ती ने एक और सवाल का तीर छोड़ते हुए कहा कि यह बताओ कि किस के साथ जा रहे हो। क्‍योंकि मैं तुम्‍हारे बारे में इतना तो जानती हूं कि तुममें इतनी हिम्‍मत भी नहीं है कि अकेले रेलवे स्टेशन तक जा सको, ऐसे में चांद पर अकेले कैसे जाओगे? मुझे यह भी ठीक से बताओ कि वापिस कब आओगे?

बसन्‍ती के इस तरह खोद-खोद कर सवाल पूछने पर वीरू का मन तो उसे खरी-खरी सुनाने को कर रहा था। इसी के साथ वीरू के दिल से यही आवाज उठ रही थी कि बसन्‍ती को कहे कि ऐ जहर की पुड़िया अब और जहर उगलना बंद कर। परंतु बसन्‍ती हाव-भाव को देख ऐसा लग रहा था कि बसन्‍ती ने भी कसम खा रखी है कि वो चुप नही बैठेगी। दूसरी और चांद की सैर को लेकर वीरू के मन में इतने लड्डू फूट रहे थे कि उसने महौल को और खराब करने की बजाए अपनी जुबान पर लगाम लगाऐ रखने में ही भलाई समझी। वीरू जैसे ही सामान उठा कर चलने लगा तो बसन्‍ती ने कहा कि सारी दुनियां धरती से ही चांद को देखती है तुम भी यही से देख लो, इतनी दूर जाकर क्‍या करोगे? अगर यहां से तुम्‍हें चांद ठीक से नहीं दिखे तो अपनी छत पर जाकर देख लो। बसन्‍ती ने जब देखा कि उसके सवालों के सभी आक्रमण बेकार हो रहे है तो उसने आत्‍मसमर्पण करते हुए वीरू से कहा कि अगर चांद पर जा ही रहे हो तो वापिसी में बच्‍चों के वहां से कुछ खिलाने और मिठाईयां लेते आना।

वीरू ने भी उसे अपनी और खींचते हुए कहा कि तुम अपने बारे में भी बता दो, तुम्‍हारे लिये क्‍या लेकर आऊ? बसन्‍ती ने कहा जी मुझे तो कुछ नहीं चाहिये हां आजकल यहां आलू, प्‍याज बहुत मंहगे हो रहे है, घर के लिये थोड़ी सब्‍जी लेते आना। कुछ देर से अपने सवालों पर काबू रख कर बैठी बसन्‍ती ने वीरू से पूछा कि जाने से पहले इतना तो बताते जाओ कि यह चांद दिखने में कैसा होता है? अब तक वीरू बसन्‍ती के सवालों से बहुत चिढ़ चुका था, उसने कहा कि बिल्‍कुल नर्क की तरह। क्‍यूं वहां से कुछ और लाना हो तो वो भी बता दो। बसन्‍ती ने अपना हाथ खींचते हुए कहा कि फिर तो वहां से अपनी एक वीडियो बनवा लाना, बच्‍चे तुम्‍हें वहां देख कर बहुत खुश हो जायेंगे। कुछ ही देर में वीरू ने देखा कि वो राकेट में बैठ कर चांद की सैर करने जा रहा है। रास्‍ते में राकेट के ड्राईवर से बातचीत करते हुए मालूम हुआ कि आज तो अमावस है, आज चांद पर जाने से क्‍या फायदा क्‍योंकि आज के दिन तो चांद छु्ट्टी पर रहता है।

इतने में गली से निकलते हुए अखबार वाले ने अखबार का बंडल बरामदे में सो रहे वीरू के मुंह पर फेंका तो उसे ऐसा लगा कि जैसे किसी ने उसे चांद से धक्‍का देकर नीचे धरती पर फैंक दिया हो। वीरू की इन हरकतों को देखकर तो कोई भी व्‍यक्‍ति यही कहेगा कि जो मूर्ख अपनी मूर्खता को जानता है, वह तो धीरे-धीरे सीख सकता है, परंतु जो मूर्ख खुद को सबसे अधिक बुद्धिमान समझता हो, उसका रोग कोई नहीं ठीक कर सकता। वीरू के इस ख्‍वाब को देख जौली अंकल उसे यही सलाह देना चाहते है कि ख्‍वाब देखने पर हर किसी को पूरा अधिकार है। लेकिन यदि आपके कर्म अच्‍छे है और आप में एकाग्रता की कला है तो हर क्षेत्र में आपकी सफलता निश्चित है फिर चाहे वो चांद की सैर ही क्‍यूं न हो?

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"पुरुषोत्तम राम" चौदह साल के वनवास के बाद घर लौट रहे थे...

पूरा शहर बहुत खुश था। आज उनके चहेते राम, लक्ष्मण और सीता के साथ वापस आ रहे थे। सारा शहर जग-मग सजा हुआ था। आज का दिन "दीपावली" के नाम से मनाया जाने वाला था।

शहर भर में दीये जले हुए थे ऐसा लग रहा थ जैसे आकाश से सारे तारे ज़मीन पर आ गये हों। जहाँ तहाँ सड़कों पर, घरों के छतों पर, खिड़कियों पर, दरवाज़ों पर बस दीये ही दीये...और हर घर के आगे रंगोली..बहुत ही अद्भुत दृश्य था। अभी राम बस शहर के बाहर थे...

जैसे ही वह शहर में घुसे उन्हें घरों से आवाज़ें आ रही थी..."चलो, पहले पूजा कर लें फटा-फट फिर दीवाली मनायेंगे, पुरुषोत्तम राम बस आते ही होंगे"। राम, सीता और लक्ष्मण यह सब देख और सुन बहुत प्रसन्न थे...

जैसे जैसे राम शहर में आते गये वैसे वैसे घरों में, पूजा या तो ख़त्म हो चुकी थी या शुरु हो रही थी, दीवाली मनाने के पहले सब पूजा कर लेना चाहते थे और राम बहुत उत्सुक थे कि पूजा के बाद ऐसा तो क्या होने वाला है जिसकी इन सब को इतनी जल्दी है? "मेरे आने की खुशी में दीवाली कैसे मनाने वाले हैं, मेरे शहर के लोग?" ..सोच सोच वह मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे...

अब राम शहर के ज़रा और अन्दर आ चुके थे..उन्होंने देखा कहीं कहीं ताश के पत्ते बाहर आने लगे, और कहीं कहीं ’बोतल’ खुलने लगी...धीरे धीरे सब घरों में परिवार ,दोस्त इकठ्ठा होने लगे..ताश के पत्ते बाँटे जाने लगे और ’पेग’ बनाये जाने लगे...देखते ही देखते सारा शहर ज़ोरों से शराब पीने लगा और खुल कर जुआ खेलने लगा..जैसे जैसे राम और शहर में घुसे वैसे वैसे लोग "पटाखे" जलाने लगे..और धीरे धीरे सारा शहर पटाखों की आवाज़ से गूंजने लगा...बहुत शोर...कान फट जाये उतनी आवाज़..और बारूद के बदबू वाले धुएं से साँस लेना मुश्किल होने लगा..सीता और लक्ष्मण का भी दम घुटने लगा।

अचानक एक लावारिस "रॉकेट" लक्ष्मण की धोती के बहुत करीब से ’जम्म्म’ करके गुज़रा, उनकी धोती में छेद होते होते बचा, इस बात का शुक्र तो वह मना ही रहे थे कि धोती जल नहीं गयी वरना उतार, फेंकनी पड़ जाती...अचानक सीता ने इशारा किया तो राम ने देखा कि वह रॉकेट अब एक खिड़की से किसी घर में घुस गया, और उस घर के परदे में आग लग गयी और वह आग फिर करीब रखे पटाखों पर फैली और सारे पटाखे आनन फानन जलने-फटने लगे...जो भाग सकते थे भागे, एक सज्ज्न के मुँह पर ही एक पटाख़ा ऐसा फटा कि वह वहीं बेहोश हो गये...और उस घर में धीरे धीरे आग बढने लगी...और फिर उस "फ़्लैट" से आग बाकी की बिल्डिंग में फैलने लगी..

राम ने किसी से कहा अरे जाकर "फ़ायर ब्रिगेड" को फ़ोन करो, तो पता चला कुछ दिन पहले ही मुनिसिपल कॉरपोरेशन ने खुदाई की थी, "ब्रोड बैंड" केबल डालने के लिये सो इस इलाके के फ़ोन चल नहीं रहे..तो राम चिल्लाये.."अरे तो अपने मोबाईल से फ़ोन क्यूं नहीं करते"..जवाब आया.."अब हम पहले मोबाईल का ही इस्तेमाल करते हैं लेकिन आज त्यौहार है, आप आने वाले थे, सब बहुत खुश हैं, एक दूसरे को बधाई देते नहीं थक रहे सो मोबाईल लाइन्स जैम हो गयी हैं"...

राम कोई उपाय सोच ही रहे थे कि अचानक उन्होंने देखा एक बच्चे के माँ बाप अपने बच्चे को गोद में लिये अस्पताल की ओर भाग रहे हैं..उस दस साल के बच्चे का हाथ लगभग जल चुका था...उन्होंने देखा कि वह गाड़ी से उतर भाग रहे थे, क्योंकि रास्ते खचा खच जाम थे, गाडियाँ न आगे जा रही थी न पीछे...और चारों तरफ़ "पैं-पैं” की आवाज़ें..पीछे ट्राफ़िक में कहीं एक बेचारी सी "फ़ायर ब्रिगेड" की वैन अपना "टुन टुना" बजाते हुए रास्ता बनाने की कोशिश में थी, जो था ही नहीं...

अचानक लक्ष्मण ने देखा कि किसी एक घर से लोग बहुत ज़ोरों से लड़ते झगड़्ते बाहर आ निकले, एक आदमी दूसरे आदमी को बहुत ज़ोरों से कूट रहा था..क्यूं?..तो पता चला कि उनमें से एक ने दूसरे की बहन को शराब के नशे में छेड दिया, और बात मार पीट तक उतर आयी...उतने में अचानक देखा गया कि सामने सड़क पर एक आदमी के पीछे तीन आदमी भाग रहे थे उनमें से एक के हाथ में एक ख़तरनाक दिखता छुरा था..जुए में एक पैसा हार के भाग रहा था और बाकी उस से पैसे रखवाने के लिये उसका पीछा कर रहे थे, उसे जान से मार डालने की धमकी दे रहे थे..

चारों तरफ़ आनन फ़ानन एक अजीब डरावना सा विध्वंस मचा हुआ था..दूर एक और बिल्डिंग में आग लगी हुई थी..कुछ लोग घबराकर बचने के लिये दस और ग्यारह मंज़िल की खिड़की से कूद रहे थे...

राम बौखला गये..उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें और अभी तो आधा शहर ही देखा था..लक्षमण एक झगड़ा छुड़ाते तो कोई दूसरा शुरू हो जाता...वह भी थकने लगे थे..सो राम को लगा कि अब तो हनुमान को बुलाना ही पड़ेगा..उनके पास एक करामाती बाण था..लेकिन यह एक बाण चलाकर इस सारे शहर को बचाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था..अब उन्हें क्या पता था कि ऐसे और बाणों की ज़रूरत पड़ेगी क्योंकि अब तो वह घर लौट रहे थे सो वनवास से लौट्ते लौट्ते वह रास्ते भर में "सोवेनीयर" ( जाते हुए एक भेंट..) के तौर पर लोगों को यह करामाती बाण बाँटते आ रहे थे और एक उन्होंने अपने पास यादगार के रूप में लिये रख लिया था।

शहर का हाल देखते हुए उन्हें लगा कि, इस बाण को शहर बचाने के बजाय हनुमान को बुलाने में खर्च करना चाहिये और फिर हनुमान संकेत मिलते ही अपनी वानर सेना के साथ आ शहर के लिये कुछ कर पाये..आखिर जो रावण से अकेले टकरा सकता है और सारी लंका में आग लगा देता है वह हनुमान यहाँ कुछ नहीं कर पायेगा तो कौन कर पायेगा? सो राम ने अपना धनुष कंधे से उतारा और वह करामाती तीर दूर ऊपर हवा में छोड़ा...

दूर, शहर के बाहर, जंगल में बैठे हनुमान ने आकाश में राम का बाण देखा...बाण की नोक पर "एस ओ एस" लिखा नीओन साईन चमक रहा था..हनुमान तब खाना खा रहे थे लेकिन राम का ”एस ओ एस” बाण देख सब छोड़ कर भागे और उनके एक इशारे पर सारी वानर सेना इक्कठा हो उनके पीछे दौड़ पड़ी...

अब वह तो बेचारे सब थे तो जंगले के बाशिंदे..."बॉम्ब" क्या होता है उन्हें क्या पता था..वह तो तीर कमान, भाला,गदा इत्यादि समझते थे...सो कुछ् तो शहर में घुसने के पहले ही "धमा-धम" की आवाज़ सुन सरपट वापस जंगल की ओर हो लिये..बाकी शहर के और अन्दर तक पहुँचे और अलग अलग इलाकों में फैल गये...एक जगह कुछ सात आठ वानर राहत कार्य में इतने व्यस्त थे कि कुछ बच्चों ने कब उनकी पूँछ पर सौ-सौ की लड़ी लगा दी उनको पता भी नहीं चला और फिर अचानक जब लड़ी ज़ोरों से आवाज़ करते हुए फटने लगी तब उनकी जान निकल गयी और वह डर के मारे यहाँ वहाँ भागने लगे और उनकी पूँछ पर लगी आग इधर उधर फैलने लगी..

एक बेचारे वानर ने आव देखा न ताव और सामने से आती गाड़ी को देख उस जलते हुए पटाखे को बुझाने के लिये पटाखे पर लपका..किसी बच्चे ने देखे बग़ैर वह पटाखा जलाकर बीच सड़क फेंक दिया था...अगर वह गाड़ी के आते आते ठीक उसके नीचे फटता तो बहुत बुरा अकस्मात हो सकता था, अब वह वानर पटाखे पर हड़्बड़ी में कूद तो गया और उस पटाखे को बुझा भी दिया और उस बुझे हुए पटाखे को किनारे फैंक ही रहा था कि गाड़ी से एक आदमी बाहर निकला और वानर के मुँह पर तमाचा दे मारा.."साले! चलती गाड़ी के सामने आता है?!..जाहिल!..कुछ हो जाता तुझे, तो मेनका गाँधी मेरी जान को रोती!"...

वानर बेचारा भौंचक्का सा सोचता ही रह गया कि "मैं तो शायद मदद ही कर रहा था.." और तब तक वह आदमी गाड़ी में बैठ आगे चल दिया...एक एक करके वानर बेचारे अपनी जान बचा भागने लगे...शहर का यह प्रकोप उनसे झेला नहीं जा रहा था, वानर सेना के शहर में आने के कुछ दस मिनट के अन्दर अन्दर सारे वानर दुम दबा वापस जंगल को भाग लिये..

उधर हनुमान बेचारे किसी घर में लगी आग से दो तीन को बचा कर नीचे लाते तो तुरन्त किसी और बिल्डिंग मे आग लग जाती...बेचारे हाँफ़ने लगे थे पर राम का आदेश था सो पीछे नहीं हट सकते थे...कभी ट्राफ़िक के बीच से उठा कर किसी "फ़ायर ब्रिगेड" वैन को किसी इलाके तक पहुँचा देते ताकी उनका काम उतना कम हो..पर कहीं कहीं जितनी ऊँची बिल्डिंग थी उतनी ऊँची फ़ायर ब्रिगेड् के पास सीढी नहीं थी..सो वहाँ तो उन्हें ही जाना पड़ता...फ़ायर ब्रिगेड का कोई ख़ास फ़ायदा नज़र नहीं आ रहा था...क्षेत्रीय सरकार ने बिल्डरों के साथ मिलकर पैसे खाने के चक्कर में जितने और जैसे तैसे प्लान एप्रूव कर दिये थे उतना खर्चा शहर की बाकी व्यवस्था पर नहीं किया था क्योंकि उन कामों में उन्हें ख़ुद कोई ख़ास फ़ायदा नहीं था..सो यदा कदा समाज के नाम पर किसी सड़क, स्टेशन या एयरपोर्ट का नाम बदलने के अलावा उन्होंने और किसी बात पर विषेश ध्यान देना उचित नहीं समझा था...

सो लेदेकर हनुमान आखिर थक हार राम के पास आधी बेहोशी की हालत में माफ़ी माँग लौटने लगे...लेकिन उन्होंने यह ज़रूर कहा कि "स्वामी, आप कहें तो मैं आपको और भाई लक्ष्मण और सीतामाता को अपने कंधे पर बिठा यहाँ से बाहर ले जा सकता हूँ, इस से ज़्यादा मैं कुछ न कर पाउँगा"..

राम ने सोचा ऐसे कैसे हार मान ली जाए..सो राम,सीता,लक्ष्मण और हनुमान के बीच किसी एक पचास मंज़िला बिल्डिंग की छत पर एकान्त में एक ’ब्रेन स्टोर्मिंग’ सेशन चला और कुछ ही मिनिटों में यह तय किया गया कि अमरीका से सुपरमैन या बैट्मैन या दोनों को बुलाया जाय..नीचे जलते-कटते शहर की हालत देख यह तय किया गया कि दोनों को ही बुला लिया जाय...हनुमान अपनी पूरी शक्ति लगा अमरीका की तरफ़ उडे, करीब पंद्रह मिनट् में वह वहाँ पहुँचे और दोनों को आने के लिये कहा..दोनों ने यशस्वी राम की कहानी गूगल में पढी थी और बहुत प्रभावित भी हुए थे सो वह हनुमान के साथ एक पल में हो लिये...

राम ने आकाश की ओर देखा और उनकी छाती फूल गयी..क्या दृश्य था..सीता और लक्ष्मण भी यह द्रुश्य एक टक देखते रह गये..दूर आसमान में एक तरफ़ सुपरमैन दूसरी तरफ़ बैट्मैन और बीच में हनुमान..आकाश में उड़ते हुए उनकी तरफ़ आ रहे थे...राम को लगा अब तो शहर बच जायेगा...

पचासवीं मंज़िल की छत पे खड़े होकर काले आसमान के नीचे पूरे शहर को तहस नहस देख दोनों सुपरमैन और बैट्मैन की हवा निकल गयी..उन्होंने कहा कि हम मदद तो कर सकते थे लेकिन शहर की दूसरी राहत एजेंसियों का काम करना आवश्यक है..हमारे अमरीका में तो उनके साथ मि्लकर ही हम काम करते हैं, उन एजेन्सियों की बहुत मदद मिलती है और जहाँ वह नहीं पहुंच पाते वहाँ वहाँ हम ध्यान दे पाते हैं और इस तरह दोनों मिलकर राहत कार्य संभालते हैं..

यहाँ तो आपके शहर में फ़ायर ब्रिगेड की सीढी बहुत से बहुत पंद्रह्वीं मंज़िल तक जाती है उसके बाद का तो सारा हमें करना पडेगा..फिर ट्राफ़िक जाम देखिये..लगभग सारे फ़ायर ब्रिगेड वैन तो यहाँ वहाँ अपना "टुन-टुना" बजाते जाम में अटके हुए हैं तो पहले उनको उठा उठा अपनी जगह पहुँचायें या लोगों को बचायें..

सब तो होगा नहीं और फिर सारी मेहनत के बाद भी हम बदनाम होंगे..और यह हम होने नहीं दे सकते क्योंकि इस वक़्त हम दोनों ’होलीवुड" में काफ़ी "पॉप्यूलर" हैं और हम पर एक के बाद एक फ़िल्में बन रही हैं सो हम अपना नाम ख़राब नहीं होने दे सकते, हमारी "मार्किट" पर असर पड़ेगा और फ़िल्में बननी बन्द हो सकती हैं और वैसे भी देखिये, आप तो "सर्वव्यापी’ हैं..सारे शहर में आपके "क्लोन" भाग दौड़ में लगे हुए हैं फिर भी कुछ हो नहीं पा रहा...इस मारा मारी में आप जैसे यश्स्वी के भी "क्लोन", आधे थक के किनारे बैठे हैं और कुछ "ओवर एग्ज़रशन" के मारे बेहोशी की हालत में हैं..और हमें तो आप-सा वरदान भी नहीं हम तो वैसे भी ’एक व्यापी" हैं..प्रभु हमें माफ़ करें...इतना कह वह दोनों चंगू-मंगू वहाँ से लमपट हो लिये...

कुछ देर राम ने नीचे सारे शहर का नज़ारा देखा..आग, धुआँ, शोर, चीखना, चिल्लाना, जुआ, शराब, पैं-पैं, पूँ-पूँ...तब लक्ष्मण ने उन्हें आवाज़ दी, देखा तो सीता मारे "पोल्यूशन" के बेहोश हो गयी थीं..सारा गंध तो हवा के सहारे ऊपर ही आ रहा था..और आज तो वह "बारूद” वाला बदबू मारता घना धुंआँ भी था..सीता, चैदह साल के स्वच्छ हवा पानी के बाद यह सब नहीं झेल पायीं..

लक्ष्मण ने झट हनुमान को संजीवनी बूटी लाने को कहा तो हनुमान ने समझाया कि वह जड़ीबूटी काम तो करती है पर उसे भी तो काम करने के लिये अमुक वातावरण चाहिये, और इधर जो हाल है उसमें तो बूटी यहाँ पहुँचते पहुँचते मुर्झा जायेगी सो सीतामाता को उस बूटी के पास ले जाना ही ठीक रहेगा...लक्ष्मण ने कुछ बहस करनी चाही तो राम ने उसे इशारे से चुप किया और हनुमान की ओर देखा..हनुमान ने अपनी "पोज़िशन" बनायी..राम सीता को ले हनुमान के एक कंधे पर बैठे और लक्ष्मण दूसरे कंधे पर ...नीचे शहर अपना किया अब खुद ही झेल रहा था और उड़ते हुए हनुमान के कंधे पर बैठे राम, सीता और लक्ष्मण वापस जंगल की ओर लौटते हुए काले आकाश में ओझल हो गये...

हर्ष छाया...

 

साभार - जीन्स गुरू

(http://harshchhaya.blogspot.com/2011/10/blog-post_25.html)

दीपावली आई

(१)

आई-आई दीपावली आई ।

अपने संग ये खुशियाँ लाई ।।

घर-घर की हो गई सफाई ।

अच्छी-अच्छी बनी मिठाई ।।

(२)

बच्चे, बूढ़े लोग लुगाई ।

सब खाते अतिसय हर्षाई ।।

कहते आई दीपावली आई ।

घर-घर में आ धूम मचाई ।।

(३)

घर-घर में नाना पकवान ।

चाहे निर्धन या धनवान ।।

श्री, गणपति पूजे भगवान ।

दीजे प्रभु सबको धन धान ।।

(४)

गली-मोहल्ले घर बाजार ।

दुल्हन ज्यों सज सब तैयार ।।

सो खर्चे कुछ कई हजार ।

यथाशक्ति अच्छा व्यापार ।।

आया ही ऐसा त्योहार ।

खुशियों की बह चली बयार ।।

(५)

हाथी, घोड़ा घर में आये ।

बच्चे देख-देख सुख पाये ।।

जेब भरे सब दोस्त दिखाये ।

आओ हम सब मिलकर खायें ।।

घर-घर में हम दीप जलायें ।

कही अँधेरा रह न जाये ।।

(६)

बच्चों के मन सुख न समाये ।

कई पटाखे सभी बजाये ।।

मम्मी बार-बार समझायें ।

देखो कोई जल न जाये ।

(७)

मम्मी से रामू बतलाए ।

एक बार ही साल में आए ।।

हम सबको खुशियाँ दे जाए ।

मन कहता हम रोज मनाएं ।।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय

समशापुर (उ.प्र.) ।

URL: https://sites.google.com/site/skpvinyavali/

BLOG: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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दीपावली, दीपों का त्यौहार ,

लाता खुशियाँ ढेर अपार ,

आता साल में एक ही बार ,

लाता सबके लिए प्यार.

 

रोशनी से भरता गगन को ,

बच्चे लड़ी, पटाखे और फुलझड़ी जलाते हुए,

मिठाई, मेवे ,खील बताशे और खाते हुए,

तरह-तरह के व्यंजन बनाती मम्मी,

बच्चे पूरे उत्साह से भरपूर .

 

दीवाली धूमधाम से मनाते हुए ,

दुश्मन भी हाथ मिलाते हुए ,

दोस्त गले मिलते हुए ,

नए-नए कपड़े पहने बच्चे.

 

लक्ष्मी-गणेश पूजा करती मम्मी,

गिफ्ट बांटते पास-पड़ोसी ,

दीपावली खुशियों का  त्यौहार ,

यही तो है मेरा सबसे प्रिय त्यौहार.

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परिचय :

नाम: ज्योति चौहान

जन्म स्थान :-डेल्ही ,मूलत: उत्तर प्रदेश की है

जन्म तिथि :- 12.6.1982.

शिक्षा : दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं, साथ ही रसायन-शास्त्र में स्नातकोतर,शिक्षा में स्नातक , पुस्तक- विज्ञान तथा सूचना तकनिकी में स्नातक,और कंप्यूटर में पी.जी.डी.सी.ए

व्यवसाय :- एक वहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं . नोएडा में अनुसंधान और विकास विभाग में एक वैज्ञानिक के रूप में काम कर रही हैं.

रूचि : सामाजिक सेवा , पड़ना तथा कविता , निवंध इत्यादि लिखना

उपलब्धी : स्कूलिंग में कविता ,निवंध इत्यादि तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम में पुरुस्कार प्राप्ति, कवितायें प्रसिद समाचार- पत्र , मैगज़ीन, वेब-पत्रिका,वेब-पोर्टल पर प्रकाशित

संपर्क :-

ज्योति चौहान

सेक्टर-२२, नॉएडा

jyotipatent@gmail.com

 

दीप-जलाओ शब्दों में

दीप-जलाओ शब्दों में

झूमें-ह्दय-खुशियों में

विचार-छोड़ नीरस से

गीत-लिखूं अपनेपन के ।

 

प्रेम-रस हो जीवन में

दीपों की माला-सुंदर-सी

भूल-गये थे जिन शब्दों को

आज उमड़ आये –खुशियों में

दीप-जलाओ शब्दों में।

 

किरण सुहानी चमकी-एक

नाव पुरानी सरिता-की

जीयें बिना जीवन को

दीप न जलते-खुशियों के

दीप-जलाओ शब्दों में।

 

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झामनानी निवास

डा.फजल के बाजू

क्वेटा कालोनी

नागपुर

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मूलतः दीपोत्‍सव ‘श्री' अथवा लक्ष्‍मी का आव्‍हान-पर्व है। लक्ष्‍मी की चर्चा ऋगवेद में सबसे पहले हुई है। ‘श्री' धन-देवी हैं तथा भगवान विष्‍णु की पत्‍नी हैं। जब हरि ने बावन रूप धारण किया तो लक्ष्‍मी पद्‌म कमल के रूप में अवतरित हुईं।

दीपावली उत्‍साह का पर्व है। अधिकतर ग्रंथों में इस पर्व को दीपावली और कहीं-कहीं दीपमालिका (भविष्‍योत्‍तर, अध्‍याय 14 उपसंहार) की संज्ञा दी है। वात्‍सायन कामसूत्र 1.4.82 के अनुसार ‘यक्षरात्रि' तथा राज मार्तण्‍ड 1346-1348 के आधार पर ‘सुखरात्रि' कहते हैं। निर्णय सिंधु, काल तत्‍व विवेचन (पृ.315) के अनुसार यह पर्व चतुर्दशी, अमावस्या एवं कार्तिक प्रतिपदा इन तीनों दिनों तक मनाया जाने वाला कौमुदी-उत्‍सव के नाम से प्रसिद्ध है।

मूलतः दीपोत्‍सव ‘श्री' अथवा लक्ष्‍मी का आव्‍हान-पर्व है। लक्ष्‍मी की चर्चा ‘श्री' धन-देवी हैं तथा भगवान विष्‍णु की पत्‍नी हैं। जब हरि ने बावन रूप धारण किया तो लक्ष्‍मी पद्‌म कमल के रूप में अवतरित हुई। जब विष्‍णु परशुराम के रूप में आए तो लक्ष्‍मी ‘धरनी' कहलायीं। राम के साथ सीता तथा कृष्‍ण के साथ रूक्‍मिणी बनकर वे सदैव विष्‍णु की पत्‍नी बनती आयी है।

पुरातन संस्‍कृति को जीवित रखने के लिए हम दीपावली का पर्व हर्षएवं उल्‍लास के साथ मनाते हैं। वस्‍तुतः दीपावली का उत्‍सव 5 दिनों तक, पांच कृत्‍यों के साथ मनाया जात है यथा-धनतेरस अर्थात्‌ धन-पूजा, नरक चतुर्दशी अर्थात्‌ नरकासुर पर विष्‍णु विजय का उत्‍सव, लक्ष्‍मी पूजा ‘श्री' का आव्‍हान पर्व, द्यूत दिवस अर्थात्‌ भाई दौज के नाम से बहन-भाई के प्रेम का आदान-प्रदान का उत्‍सव। इसे यम द्वितीया भी कहते हैं। इन पांचों दिनों में दीपदान, गाय-बैंलों की पूजा, गोवर्द्धन, नव वस्‍त्र धारण करना, द्यूत क्रीड़ा, एक माला बांधना आदि कृत्‍य किए जाते हैं।

लक्ष्‍मी पूजन के समय, विश्‍ोषकर व्‍यापारी वर्ग ‘शुभ-लाभ' अवश्‍य लिखता हैं। शुभ-लाभ के माध्‍यम से भारतीय संस्‍कृति का एक महत्‍वपूर्ण पक्ष सामने आता हैं हमारी संस्‍कृति से अक्षर को ब्रहा्रा कहा गया है। साथ ही शब्‍दों के नाद को ईश्‍वरीय ध्‍वनि माना जाता है। ‘शब्‍द' ध्‍वनि में एक शक्‍ति निहित रहती हैं इन शब्‍द-ध्‍वनियों का ठीक-ठीक प्रयोग सांकेतिक गति प्रदान कर लक्ष्‍यगामी बनाता हैं। शब्‍द शक्‍ति के बारे में प्राचीन ग्रन्‍थों में स्‍पष्‍ट किया गया है कि ‘शब्‍द-नाद' ही सृष्‍टि का प्रथम ‘आद्य-नाद' है। यही नाद विश्‍व के निर्माण तथा पदार्थो को उत्‍पन्‍न करने के कार्य में अग्रसर होता है।

प्रत्‍येक शब्‍द में एक गूढ़ार्थ दिया रहता है। शब्‍द में निहित बिम्‍ब एवं भावना उसे नए-नए अर्थ प्रदान करती है। भारतीय संस्‍कृति का प्रतीक चिन्‍ह है ‘स्‍वास्‍तिक'। इसे भी लक्ष्‍मी पूजन के समय अंकित करते हैं। ‘शुभ' एवं ‘लाभ' शब्‍दों में व्‍यापक अर्थ तथा सामाजिक भानवनाएं छिपी हुई है। शुभ से तात्‍पर्य है ‘कल्‍याण्‍कारी'। ऐसे कार्य जिनसे अधिक से अधिक लोगों का कल्‍याण, जो सामान्‍य मानव हित, मानव गरिमा तथा मानवीय प्रतिष्‍ठा के अनुरूप हों- ‘शुभ' के अंतर्गत्‌ आते हैं।

‘शुभ' शब्‍द भावनात्‍मक होने के साथ-साथ निराकार का द्योतक है। इस शब्‍द का विस्‍तार अनन्‍त हैं इस सूक्ष्‍म शब्‍द का अहसास भर किया जा सकता है, शाब्‍दिक अभिव्‍यक्ति एवं शुभकामनाओं का भाव जागृत हो उठाता है। ‘शुभकामना संदेश' ईश्‍वरीय वाणी के समान चमत्‍कार उत्‍पन्‍न करने वाले होते हैं।

‘लाभ' शब्‍द भौतिक उपलब्‍धियों का परिचायक है। यह समृद्धि में निरन्‍त वृद्धि का संदेश देता हैं इस शब्‍द को अंकित कर हर आने वाले की समृद्धि, वृद्धि की कामना के साथ मानो हम अपनी समृद्धि ओर उसकी वृद्धि की भी कामना रखते हैं। परस्‍पर लाभ के प्रयासों से सामाजिक बंधन सुदृढ़ होते हैं एवं उन्‍हें गतिशीलता मिलती हैं जब तक हम एक-दूसरे के लिए उपयोगी और लाभकारी नहीं होगे, तब तक व्‍यवहारिक रूपसे हम एक-दूसरे के संबंधों का निर्वाह करने में भी असमर्थ रहते हैं।

दीपावली के दिन ‘शुभ-लाभ' शब्‍दों का बड़ा ही गूढ़ अर्थ हैं इन शब्‍दों के चंदन, गेरू, रंग या पेंट से लाल-पीले रंगों से पूजा के स्‍थल के अतिरिक्‍त दरवाजों पर भी लिखा जाता है। दाहिनी ओर शुभ तथा बाईं ओर लाभ लिखकर भावनातमक एंव व्‍यापहारिक आदर्श की भावना को अभिव्‍यक्‍ति देते हैं।

दीपावली, साधकों के लिए एक प्रमुख पर्व है। तांत्रिक तो इसे महापर्व के रूप में स्‍वीकारते हैं। इस दिवस पर बड़े-बड़े तांत्रिक अपनी मंत्र साधना को जगारण कर सिद्ध करते हैं वैसे यह पर्व ज्ञान का प्रतीक पर्व हैं अन्‍धकार में भटकते मानव समाज को नवीन प्रकाश-किरण देने में समक्ष यह पर्व स्‍वयं में अनेकानेक परम्‍पराओं को समेटे हुए हैं। दीपावली के दिन दीपदान करने का विश्‍ोष महात्‍म है दीपदान करने से लक्ष्‍मी स्‍थिर होती है। होती हैं वैज्ञानिक दृष्‍टि से वर्षा ऋतु के पश्‍चात, जहरीले जंतुओं से बचाव के लिए लोग तालाब, कुंओं, मंदिरो, चौराहों पर दीप जलाया करते थे। दीप जलने के स्‍थान पर कीड़े इकट्‌ठे होकर मन जाते हैं वर्षा ऋतु में धूप की कमी के कारण वायुमंडल में रोग के कीटकाणुओं का बाहुल्‍य हो जाता हैं। इस स्‍थिति में जलते हुए दीपकों की ओर आकषिर्त होकर कीटाणु स्‍वयं ही अपनी आहुति दे देते हैं।

सामयिक परिप्रेक्ष्‍य में बदलते युग संदर्भो के साथ आज दीपावली की मान्‍यताओं में भी अन्‍तर आ चुका हैं। दीपावली की रात्रि में अब मिट्‌टी के दीयां के स्‍थान पर मोमबत्‍तियां और बिजली की झालर लगाकर में दीपावली का मूल उद्‌देश्‍य कहीं भी दृष्‍टिगत नहीं होता है।

जीवन में अनेक प्रकार के अंधकार घिरे रहते हैं। जो व्‍यक्‍ति समाज और राष्‍ट्रीय खुशी में कड़वाहट का जहर घोल देते हैं। दीपावली पर तेल से भरा जलता हुआ छोटा सा दीपक यह संदेश देता है कि तिल-तिल कर जलना और प्रकाश बिखेरना जिस प्रकार दीपक का धर्म है, उसी प्रकार उत्‍सर्ग मानव धर्म हैं उत्‍सव-पार्वो का उद्‌देश्‍य होता है आपस में खुशियां बांटना। अगर कोई अकेला है और दुखी भी तो उसे साथ लेकर उल्‍लासित हो। जहां निराशा का अंधेरा नजर आए वहां दीपक जलाकर उत्‍साह का प्रकाश बिखेरा जाए। प्रेम सद्‌भाव के बिना काई भी पर्व अधूरा हैं। वैसे भी यह एक ऐसा पर्व है जिसके साथ पौराणिक, ऐतिहासिक, राष्‍ट्रीय और सामाजिक सभी भावनाएं एवं मान्‍यताएं जुड़ी हुई है।

दीपावली प्रकाश पर्व के नाम से जाना जाता हैं। दीप ज्‍योति ज्ञान की प्रतीक है। ‘तमासो मां ज्‍योतिर्गमय' ही इस पर्व का उद्‌देश्‍य है। इस अवसर पर हमें ऐसा संकल्‍प लेना होगा जो देश की वर्तमान स्‍थितियों में राष्‍ट्रीय एकता, अखंडता के लिए सेतु बन सके। आज लक्ष्‍मी प्रसन्‍न कराने के लिए ठेके पर कराए जाने वाले सस्‍ते-मंहगे अनुष्‍ठानों के स्‍थान पर आत्‍मिक निष्‍ठा एवं सदाचार की भी आवश्‍यकता है। मानव मात्र के कल्‍याण एवं मंगल के लिए सामंजस्यपूर्ण जीवन प्रणाली और प्रगतिशील सामाजिक संस्‍कृति को स्‍वीकारना होगा। अपनी संस्‍कृति की रक्षा एवं सांस्‍कृति गौरव को बनाए रखने के लिए समाज एवं राष्‍ट्र में व्‍याप्‍त असंगतियों को दूर करने की आवश्‍यकता का अनुभव करना होगा। तत्‍पश्‍चात निरन्‍तर सहयोगी बनकर अपने दायित्‍व का निर्वाह करने के लिए ‘प्रकाश पर्व पर लिया हुआ सत्‌ संकल्‍प सफल हो सकता है' यह अवधारणा करनी होगी।

लक्ष्‍मी पूजा की सार्थकता, राष्‍ट्रहित एवं विश्‍व शांति सभी कुछ हमारे इन ठोस अनेकता में एकता के साथ हमारी पहचान है एवं राष्‍ट्रीय एकता का आधार है। उत्‍सवों की परम्‍परा में दीपोत्‍सव एक ऐसी परम्‍परा है जो सामाजिक जीवन को संस्‍कारी बनाती है। दीपावली का दिन भारत की अनेक विभूतियों के जीवन-प्रसंगों से संबंधित है। यह दिवस धार्मिक समन्‍वय का प्रतीक है। किसी भी राष्‍ट्र के विकास में उसका आधार केवल आर्थिक नहीं होता, अपितु उसमें महापुरुषों की तपस्‍या, उत्‍सर्ग, साधना, परोपकार के संदेश भी रहते हैं। लक्ष्‍मीपूजन और ज्‍योति पर्व पर सत्‍य-असत्‍य, अंधेरा-प्रकाश में अंतर समझने की आवश्‍यकता है। रात भर जागे दीपक का प्रभासित रखने से कल्‍पना लोक में लक्ष्‍मी के कठोर धरातल पर नहीं। अच्‍छा यही होगा कि हम अपने वैभव और सुख का भागीदार निरीह और विवशता से जी रहे लोगों को बनाएं और दूसरों का भला सोचने के लिए हमें एक ऐसे दृष्‍टि चाहिए जो उस ज्‍योति के दर्शन करा सके।

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सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन-120/132 बेलदारी लेन

लालबाग, लखनऊ

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समसामयिक विचार पोर्टल प्रवक्‍ता डॉट कॉम के तीन साल पूरे होने पर द्वितीय ऑनलाइन लेख प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। इससे पूर्व ‘प्रवक्‍ता’ के दो साल पूरे होने पर भी लेख प्रतियोगिता (http://www.pravakta.com/archives/18521) का आयोजन किया गया था।

इस बार प्रतियोगिता का विषय है ‘मीडिया में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार’। प्रथम पुरस्‍कार: रु. 2500/, द्वितीय पुरस्‍कार: रु. 1500/- एवं तृतीय पुरस्‍कार 1100/- तय किया गया है।

आयोजक के अनुसार लेख केवल हिन्दी भाषा में और 2000 से 3000 शब्दों के बीच होना चाहिए जो 16 नवम्बर, 2011 तक मिल जाना चाहिए। परिणाम 25, नवम्बर 2011 को प्रवक्‍ता डॉट कॉम पर घोषणा की जाएगी। लेख अप्रकाशित एवं मौलिक होना चाहिए। लेख प्रवक्‍ता डॉट कॉम पर प्रकाशित किया जायेगा एवं बाद में इसे पुस्‍तक का स्वरूप भी रूप दिया जा सकता है। लेख के साथ जीवन परिचय (नाम/मोबाइल नंबर/ई-मेल/पता/पद आदि का जिक्र) संस्थान/ एवं फोटोग्राफ भी भेजें।। पुरस्कार की राशि चेक द्वारा भेजी जाएगी। पुरस्‍कार के संबंध में निर्णायक मंडल का निर्णय सर्वोपरि होगा। अपना लेख ईमेल के ज़रिये prawakta@gmail.com पर भेज सकते हैं। कृपया अपना लेख हिन्दी के युनिकोड फ़ोंट जैसे मंगल (Mangal) में अथवा क्रुतिदेव (Krutidev) में ही भेजें।

विस्‍तृत विवरण के लिए यहां क्लिक (http://www.pravakta.com/archives/31304) करें या फिर सम्‍पर्क करें: संजीव कुमार सिन्‍हा, संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम, मो. 09868964804

 

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शुभ दीवाली

धन , वैभव , सम्‍मान मिले , भण्‍डार रहे ना खाली ।

सद्‌भाव , प्रेम , आनंद बढ़े , सौ बरस रहे खुशहाली ॥

 

स्‍वस्‍थ रहें , दीर्घायु बनें , परिवार सुखी ,सम्‍पन्न रहे ।

सुन्‍दर सब के विचार बनें , ऐसी हो शुभ दीवाली ॥

 

देश प्रेम का अलख जगायें , स्‍वाभिमान भारत का जगे ।

तन-मन के सब रोग मिटे , जब योग करें रखवाली ॥

 

घर-घर योग की ज्‍योति जले , हर घर को मेरी बधाई ।

हर दिन होली की खुशियाँ , हर रात लगे दीवाली ॥

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हे कृष्‍ण

जब महाभारत युद्ध हुआ था, धर्म का तुमने साथ दिया।

अब भारतमाता रोती है, टुकड़ों में हमने बांट दिया॥

 

गीता के श्‍लोक तुम्‍हारे, बार-बार हम दुहराते हैं।

पर अपने मतलब के खातिर, हम अनर्थ कर जाते हैं॥

 

माता पिता दोनों कातिल हैं, गर्भ में कन्‍या मारी जाती।

घर की वधू जल जाती हैं, और गौमाता काटी जाती॥

 

अत्‍याचार ऊँचाई पर है, धर्म रो रहा धरती पर।

भ्रष्‍टाचार सिंहासन पर है, सदाचार हुआ देश बदर॥

 

गंगा यमुना हर नदियाँ, हर साँस हमारी दूषित है।

अर्द्ध नग्‍न रहती हैं नारियां, वातावरण प्रदूषित है॥

 

पहले ही अंधेर कर दिए, बोलो क्‍या मजबूरी है।

अब न लगाओ देर कन्‍हाई, आना बहुत जरूरी है॥

 

त्रेता में भक्‍तों को तारे, और द्वापर में अधर्मी मारे।

जितने भ्रष्‍ट दिखें कलियुग में, मार देना सारे के सारे॥

 

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चवन्‍नी बदनाम हुई - महंगाई तेरे कारण

सिक्‍के में सरकार का ठेंगा , देख लो एक रुपैया में ।

ठेंगा माने कुछ न मिले , महंगाई में एक रुपैया में॥

 

एक रुपये की इतनी गिरावट, कद्र कोई अब करता नहीं ।

एक किलो घी मिलता था, अब एक प्‍याज भी मिलता नहीं॥

 

महंगाई कम करती नहीं , सरकार हमारी रुलाती है ।

उस पर ठेंगा दिखलाती , जीवन को मज़ाक ब़़नाती है॥

 

चवन्‍नी अठन्‍नी कौड़ी हुईं , बाज़ार में कोई चलाता नहीं ।

रस्‍ते में कहीं दिख जाये , मुंह फेर ले कोई उठाता नहीं॥

 

एक अठन्‍नी भीख में दी तो, दूर ही रहना भिखारी से ।

तुम पर ही कहीं फेंक न दे, और स्‍वागत कर दे गाली से॥

 

अगर चवन्‍नी भीख में दे दी, बच के रहना भिखारी से।

मार - मार अधमरा न कर दे , घूंसा , लात , बैसाखी से॥

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निंदा, घोर निंदा और घनघोर निंदा

आतंकवादी घटनाएं भारत में होती रहती हैं।

छोटे मंत्री, बड़े मंत्री, और महामंत्री के उद्‌गार कुछ इस प्रकार होते हैं :-

आतंकवादियों की कायराना हरकतें बर्दाश्‍त नहीं करेंगे, हम इसकी निंदा करते हैं,

दूसरा :- हम तीव्र निंदा करते हैं,

तीसरा :- हम घोर निंदा करते हैं,

चौथा :- हम दिल से निंदा करते हैं।

अंत में महामंत्री :- पक्ष विपक्ष और जनता को एकजुट होकर मुकाबला करना चाहिए।

किसी ने पूछा एकजुट होकर कब और कहाँ जायें, किससे मुकाबला करें ? और कहीं वहीं पर धमाका हो गया तो ?

बड़े मंत्री :- आतंकी बख्‍श्‍ो नहीं जायेंगे, (भैया पहले पकड़ो तो)। और जिसे पकड़े हैं उसे रोज बिरियानी खिलाते हैं, उसकी सुरक्षा में करोड़ों खर्च होता है।

कभी मंत्रीगण एक स्‍वर में बोलते हैं :- इस घटना पर जब सामूहिक बैठक होगी तो आतंकवादियों की इतनी घनघोर निंदा करेंगे की उनकी रूह कांप जाएगी।''

यही सब सुनते जनता के कान पक गए, मोबाइल से ज़्‍यादा खतरनाक रेडिएशन देश के कर्णधारों की बातों में होता है।

कुछ महीनों बाद फिर एक धमाका और फिर वही बातें।

अंत में स्‍कैच बनाने वाले को धन्‍यवाद, बेचारा कुछ घंटों के प्रयास में दो-चार दाढ़ी और बगैर दाढ़ी वाले स्‍कैच तो बना ही देता है।

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भारत में आर्ट ऑफ लिविंग

कुत्ते तुम दर-दर जाते हो।

तब जाकर रोटी पाते हो।

हाय तुम्‍हारा क्‍या जीवन।

जीवन भर पूंछ हिलाते हो।

हे मानव हम पर हँसते हो।

पर कला हमारी सीखते हो।

मन ही मन पूंछ हिलाते हो।

और चापलूसी जब करते हो।

तब ऊँची कुर्सी पाते हो।

दौलत वाले बन जाते हो।

ये कुत्तागिरी क्‍यों करते हो।

क्‍यों हमें ही कुत्ता कहते हो ?

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अब काले धन की बारी है

जनलोकपाल बिल आएगा, अब काले धन की बारी है।

सरकार कदम क्‍यों उठाती नहीं, जाने कैसी लाचारी है॥

दुनिया में कुछ देश हैं ऐसे , काले धन का बैंक जहाँ ।

भारत के कुछ बेइर्मानों का , काला धन है जमा वहाँ ॥

भारत सरकार बनायें सूची , कौन वहाँ आता जाता ।

पिछले पचास बरस में देखे , कितनों ने खोला खाता ॥

जहाँ न माता पिता न पूर्वज , देव, गुरू, तीरथ न धाम ।

कुछ काले धन वालों का है , वही देश अब चारों धाम ॥

भ्रष्‍टाचार के बीसों तरीके , ‘ऊँचे लोग' इर्ज़ाद किये ।

घोटाले पर किया घोटाला , भारत को बर्बाद किये ॥

भ्रष्‍टाचार के ओलम्‍पिक में , सभी पदक हम लायेंगे ।

एक से दस तक हम ही रहेंगे , सीना तान के आयेंगे ॥

नीयत खोटी , मन है काला , तो धन भी होगा काला ।

बेशर्म कहो , गद्‌दार कहो , इन्‍हें फर्क नहीं पड़ने वाला ॥

ये बात नहीं है करोड़ों की , ये बात है अरबों खरबों की ।

ये बात नहीं है शरीफों की , ये बात है भ्रष्‍ट लुटेरों की ॥

बहुत दिनों तक छुपते रहे , अब सामने लाना जरुरी है ।

काले धन के मतवालों का , नकाब उठाना जरुरी है ॥

जिस दिन धन भारत आयेगा,चारों ओर खुशहाली होगी ।

होगा विकास हर गांव नगर का , हर दिन दीवाली होगी ॥

दोहे ---

 

( 1 )

 भारत में लाखों असली रावण, पर मरता है नकली रावण।

लाखों रावण मुस्‍काते हैं, जब जलता है नकली रावण॥

( 2 )

दो अक्‍टूबर को न मिले, उस चीज का नाम बतायें।

जुगाड़ कहीं से हो जाए , तो गाँधी जयंती मनायें॥

( 3 )

संसद के रक्षक मारे गए, अपराध बड़ा नहीं कहलाता।

एक भी सांसद मर जाता, तो अफजल फाँसी चढ़़ जाता।

( 4 )

पश्‍चिमी सभ्‍यता संस्‍कृति के प्रेमी , कलंकित न करो त्‍योहारों को।

गरबा को पब, डिस्‍को न समझो , बख्‍श दो पावन त्‍योहारों को॥

( 5 )

तारीख पे तारीख मिलती है, महंगाई, भ्रष्‍टाचार मिटाने की।

अंतिम तारीख अब जनता देगी, सत्ता से हट जाने की।

( 6 )

खूनी बलत्‍कारी आतंकवादी, बड़े जेलों से हटाए जाएंगे।

लाखों भ्रष्‍ट अफसर नेता, सब यहीं तो डाले जाएंगे॥

( 7 )

अन्‍ना हजारे ने विरोध किया, कांग्रेस की किस्‍मत फूट गई।

हिसार में जमानत जब्‍त हुआ, महाराष्‍ट्र में लुटिया डूब गई॥

 

नकल न करो-अकल लगाओ

हेलो का कोई अर्थ नहीं, फिर भी कहते हो हेलो-हेलो।

फोन मोबाइल में बातें हो, सब राधे - राधे बोलो॥

अगर नहीं कह सकते राधे, नाम किसी भगवान का लो। हे

लो आज से नहीं कहेंगे, हर कोई संकल्‍प करो॥

उत्तर भारत में कहते हैं, राधे-राधे श्‍याम मिला दे।

कृष्‍ण को पाना बहुत सरल है,कहते रहो हर दिन राधे॥

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हर पल को जियें भरपूर

कितने अपने छोड़ चले हैं , कितने छोड़ के जायेंगे।

जीवन का कटु सत्‍य यही है , आये हैं सो जायेंगे॥

 

जन्‍म-मरन तो बस में नहीं,हर पल को जियें संदेश यही।

जिस पल को जिया नहीं हमने, वो लौट कभी न आयेंगे॥

 

सुबह सुहानी , शाम सुरमई , रात चांदनी बिखरी हुई।

प्रकृति की ऐसी सुन्‍दरता को , नैनों में अपने बसायेंगे॥

 

बिखरा दें हम बीज खुशी के , अपने घर के आंगन में।

जितना बांटो , बढ़ती जाये , ऐसी फसल उगायेंगे॥

 

औरों के दुख दर्द से जब , दो नैन हमारें भर आयें।

जीवन तब सार्थक होगा , आँसू मोती बन जायेंगे॥

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विवेकानंद मार्ग-3 धमतरी (छत्‍तीसगढ़)

सम्‍पर्क-07722-232233 / 9406016503

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चलो जरा हट कर दीवाली मनायें इसबार

चलो जरा हट कर दीवाली मनायें इसबार

अपनी मुंडेर पर तो दिया जलाते है हर बार

मगर जिन्होंने कभी नहीं देखी है रोशनी

क्यों ना उनके घरों में चिराग जलायें इसबार

चलो जरा हट कर दीवाली मनायें इसबार |

 

अपने घरों में तो रोज बनती है मिठाई

मगर जो भूखे ही सो रहे हैं कई दिनों से

क्यों ना उनको भी एक निवाला खिलाएं इसबार

चलो जरा हट कर दीवाली मनायें इसबार |

 

बड़े-बड़े लोगों से तो मिलते हैं हर रोज

मगर जिनको वर्षों से छुआ नहीं किसी ने

क्यों ना उस सबरी से

राम बनकर हम ही मिल आये इसबार

चलो जरा हट कर दीवाली मनायें इसबार |

 

फुलझड़ी फटाके तो हम जलाते हैं हरबार

मगर जो दिलों में बैठा है अहंकार का रावण

क्यों ना उसे भी जलायें इसबार

चलो जरा हट कर दीवाली मनायें इसबार |

 

दीप तो जलाते ही हैं हर बार

मगर उसका खुद को जलाकर भी

दूसरों को रौशन करने का हुनर

क्यों ना हम भी सीख जायें इसबार

चलो जरा हट कर दीवाली मनायें इसबार |

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शंकर लाल, इंदौर ,मध्यप्रदेश

ईमेल :Shankar_kumawat@rediffmail.com

दिल पे मुश्किल है दिल की कहानी लिखना,
जैसे बहते हुए पानी में पानी लिखना।


बहुत आसाँ है किसी के दिल पे दस्तकें देना,
जैसे अपने आईने में अक्स को पाना.
ऐ आसमाँ समझाओ इन चाँद तारों को,
तुम रोक लो वापस इन बेलगाम हवाओं को,
ये दुनिया ये लोग एक गहरा समंदर है,
जितना ये बाहर, उतना ही अन्दर है।


बहुत मुश्किल है तूफाँ से किश्ती बचा पाना,
जैसे सीप के मोती को अपनी नज़र में छुपाना.
दिल पे मुश्किल है दिल की कहानी लिखना,
जैसे बहते हुए पानी में पानी लिखना।


दिल का कारवां भी किसी झरने की तरह है,
न कोई मंजिल जिसका न कोई सफ़र है,
छूट जाने को तो राहें भी छूट जाया करती है,
तमाम उम्र चले फिर खो जाया करती है,
बहुत मुश्किल है जज़्बातों की कैद से निकलना,
जैसे छिन जाये जिंदगी और जिंदा रहने को कहना.
दिल पे मुश्किल है दिल की कहानी लिखना,
जैसे बहते हुए पानी में पानी लिखना।


कि मुश्किलों में मुश्किल बड़ी है अपनी बात को कहना,
जैसे शीशे कि दीवारों से ख़ुद को आवाज देना।

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एक साधू को लगभग नंगे ही नहाते हुए देखकर राधा अपने सहेलियों के साथ दूसरे तरफ मुँह करके बैठ गई और बोली “महात्मा जी निकल आएँ तब हम लोग नहाएंगे”। साधू बाहर निकलकर बोला “तुम लोग भी कजरी तीज के अवसर पर सरयू स्नान करने आई हो”।

राधा बोली “हाँ। आप कहाँ से आये हैं” ?

साधू बोला “लगभग सौ किलोमीटर दूर से आया हूँ। लेकिन औरतें तो अपने पति को बेलन से मारती हैं और सरयू व गंगा में नहाने आती हैं”।

राधा बोली “आप तो महात्मा हैं, इतनी दूरी तय करके नहाने आये हैं। सरयू में स्नान करके भगवान का ध्यान करना चाहिए। राम नाम लेना चाहिए। लेकिन आपका ध्यान कहीं और है। आप को अपना काम करना चाहिए। आप सन्यास ले चुके हैं। औरतें अपने पति को मारती हैं तो आपका क्या जाता है ? क्या हर औरतें एक तरह ही होती हैं” ?

यह सुनकर आस-पास के लोग हँसने लगे और महात्मा जी सरयू तट पर बैठ कर ध्यान करने लग गए।

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डॉ एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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चित्र - अमरेन्द्र, aryanartist@gmail.com  फतुहा, पटना की कलाकृति

पिछली कड़ियाँ  - एक , दो , तीनचार

आओ कहें...दिल की बात

कैस जौनपुरी

सूरज

पिताजी,

मैं आपका पुत्र सूरज, आपसे यह कहना चाहता हूँ कि, “काश...! आप हमें अगर गम्भीरता से लेते तो शायद मैं आज किसी अच्छी जगह जॉब पर होता. शायद मैं भी अपने जीवन में एक सफल इन्सान होता. शायद मैं भी एक अच्छी कम्पनी का एम्प्लोई होता या शायद एक अच्छा व्यापारी होता. अगर आपने हमारा सही मार्गदर्शन किया होता... अगर आपने हमें सीरियसली लिया होता... अगर आपने हम पर थोड़ा सा ध्यान दिया होता... अगर आपने हमारी थोड़ी सी फिकर की होती... तो शायद मैं भी आज आपने नाम की तरह चमकता...”

पिताजी, “आपने हमें अपना पुत्र तो समझा परन्तु खुद को पिता नहीं समझा...” आप सदैव अपनी जिम्मेदारियों से भागते रहे...

हम बिन माँ के बच्चे थे... इसलिए हमें थोड़े से स्नेह, प्यार और ममता की जरुरत थी जिसकी उम्मीद हम आपसे करते थे... करते हैं... और करते रहेंगे... और क्यूँ न करें...? और किससे करें...? क्यूंकि आप ही हमारे पालनहार हैं. परन्तु आपने हमें कभी गम्भीरता से लिया ही नहीं.... ना तो आप स्वयं कभी गम्भीर हुए... सदैव आपने दूसरों के ही कहने पर और दूसरों के ही मार्गदर्शन से काम किया... न तो आपने कभी हमारी सुनी और न तो कभी मानी...

मुझे मेरे जीवन भर सदैव यह मलाल रह जाएगा कि मैं आपने जीवन में एक सफल इन्सान, एक सफल व्यापारी न बन सका.

परन्तु मेरी यह कोशिश रहेगी कि मैं अपने बच्चों को यह कभी आभास भी न होने दूँ कि मैं अपने जीवन में किस कारण से असफल हूँ...? मेरी यह पूरी कोशिश रहेगी कि आने वाले समय में मैं अपने आप को पूरी तरह एक सफल इन्सान बना सकूँ.

मैं व्यर्थ का किसी को क्यों दोष दूँ...? क्योंकि होना वही है जो राम जी की मरजी है...!

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कैस जौनपुरी

 

qaisjaunpuri@gmail.com

www.qaisjaunpuri.com

फूल हंसे पत्ते मुस्काये
भटा गकड़ियों के दिन आये।

आंगन बीचों बीच शुष्क‌
कंडे मां ने सुलगाये
बड़े बड़े बैंगन फिर
अंगारों के बीच दबाये
एक पटे पर बैठी चाची
बाटी गोल बनाती
उसका क्या भूगोल और‌
क्या है इतिहास बताती
बाल मंडली फिल्मी गाने
ताक धिना धिन गाये।

धूप हल्दिया सिर पर ओढ़े
बैठे जेठे स्याने
झूम झूम कर नाच दिखाया
काकी और कक्का ने
अपने अपने हुनर और‌
हथ कंडे सभी बताते
और बन गये पात्र अचानक‌
जैसे परी कथा के
न जाने क्यों छोटी भौजी
झुका नज़र शरमाये।

घी से भरे कटोरों में जब
गोल बाटियां नाचीं
हृदय हुआ फुटबाल उछलकर‌
बात सौ टका सांची
लड्डू बने चूरमा वाले
कितने मीठे मीठे
सबने दो दो चार उतारे
मधुर कंठ के नीचे
खाने वाले पता नहीं
क्यों फिर भी नहीं अघाये।

भटा गकड़ियां दाल चूरमा
कितना भला भला था
इनके कण कण रग रग में
बस मां का प्यार मिला था
दादा दादी चाची चाचा नॆ
स्नेह मिलाया
मौसम जैसे फूल बन गया
ताजा खिला खिलाया
सूरज छुपा छुपौअल खेले
बदली स्वांग रचाये।

जब हवायें चलतीं तेरी याद आती,
बारिशें जब होतीं तेरी याद आती।

इक तसव्वुर ही सहारा है मेरा अब,
यादें जब जब थकतीं तेरी याद आती।

दिन तो जैसे तैसे कट जाता है हमदम,
रातें पर ना कटतीं तेरी याद आती।

कब से बैठा हूं तेरे वादों की छत पे,
गर्दिशें जब उड़तीं तेरी याद आती।

पैरों के छालों का मुझे ग़म नहीं,
धड़कनें जब बढ्तीं तेरी याद आती।

बेवफ़ाओं की ज़ुबां का क्या भरोसा,
दुनिया जब ये कहतीं तेरी याद आती।

कब से तेरी दीद की करता प्रतीक्षा,
भीड़ जब जब बढती तेरी याद आती।

बदलों से चांद को डर लगता है पर,
चांदनी जब हंसती तेरी याद आती।

ओढे बैठे हो लबादा झूठ का तुम,
जब सचाई मरतीं तेरी याद आती।
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वह अभागन !

सरकारी अस्पताल के
बाहरी फुटपाथ पर
अजब था नजारा
चल रहा हो जैसे
किसी मदारी का
खेल-तमाशा
अर्धनग्न हालात में
तड़प रही थी
वह अभागन माँ
जन्मा था नवजात
वहां फुटपाथ पर
भिनभिना रही थीं
चारों ओर मक्खियाँ
तमाम मर्यादाओं की
उड़ रहीं थीं धज्जियाँ
मंडरा रहे थे आस-पास
लावारिश कुत्ते और
पत्थर दिल इंसान

मेला वहां जुट गया
कुछ पीछे छूट गया
खून से लथपथ
बेबस और स्तब्घ
वह अभागन माँ
भूल प्रसव की पीड़ा
जार-जार आंखों से
कोसती हालात को
निहारती नवजात को
कभी आँचल से छिपाती
aअपने तन-बदन को
कभी कांपते हथेलियों से
ढांपती नन्हीं जान को

सामने था भीड़ का
अमानवीय चेहरा
कोई अपलक घूरता
कोई मुंह फेर लेता 
सब कर चुके थे पार
शर्म-हया की दहलीज
गर्म हुआ चर्चा का बाजार
मानवता हुई शर्मसार
कैद हो रही थी कैमरे में
बेबसी की तस्वीर
हाय रे तकदीर
जिन्दगी का तमाशा
चलता रहता बार-बार
शहर के फुटपाथ पर
बनते हैं सैकड़ों लोग
तमाशे का मूकगवाह
शहर की चकाचौंध में
कहीं खो गए हमारे
सामाजिक सरोकार
मीडिया, एनजीओ, सरकार
कोई सुनता नहीं गुहार।

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हिमकर श्याम
द्वारा : एन. पी. श्रीवास्तव
५, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,
रांची, ८ झारखंड।

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(चित्र- अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  फतुहा, पटना  की कलाकृति)

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दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत अरमान है माँ,

खुदा का सबसे बड़ा वरदान है माँ,

जिसके आँचल में छुप कर कर रो लेते है,

जिसकी गोद में सर रख कर सो लेते है ,

रहते ख़ामोश है पर सबकुछ जान लेती है माँ ,

एक अनकहे शब्दों कि पहेली है माँ .

दूर रह कर भी ममत्व का एहसास देती है ,

दिलो में पल रही हरकतों को पल में जान लेती है ,

एक ऐसे ही अटूट विश्वास की पहेली है माँ .

अमित, अजन्मे रिश्तों की तहरीर है माँ .

पल में बिगड़ती है तो पल में हँसा देती है,

हर पल माँ की ममता एक रूप नया लेती है,

निश्छल मन और सादगी की पहचान है माँ.

ख़ुदा का सबसे अनमोल वरदान है माँ.

हाँ यही तो है मेरी माँ, तुम्हारी माँ, हम सबकी माँ.

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SHWETA DUBEY,

RESEARCH SCHOLAR,

BANASTHALI VIDYAPITH,

RAJASTHAN.

शहर के एकांत वीराने में

बैठी हूँ तुम्हारे इंतज़ार में

पतझड़ की सुबह सी मैं

इंतज़ार है हरियाली का

फूलों का फलों का

एकांत में कर रही इंतज़ार मैं

पिया तुम भूल कैसे गए मुझे

फूलों की खुशबू सी थी मैं

मैं शीलता, कोमलता थी

एकांत छोड़ चले गए मुझे?

कमरों की खाली दीवारें

पुकार रही है तुम्हें

चोरी से ही सही

तोड़ जाते एकांत की जंजीरें

शहर के इस भीड़ में

ढूंढ़ती फिरूं तुम्हें मैं

शहर के एकांत वीराने में

बैठी हूँ तुम्हारे इंतज़ार में

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अदिति मजूमदार

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चूहे की सीख

(१)

बिल्ली मौसी वापस जाओ ।

कभी दुबारा फिर मत आओ ।।

हमको अब न और सताओ ।

आज से मत तुम चूहा खाओ ।।

(२)

शाकाहारी अब बन जाओ ।

धर्म-कर्म में ध्यान लगाओ ।।

लोक गया परलोक बनाओ ।

समय और न ब्यर्थ गवाँओं ।।

(३)

जो हो रूखा-सूखा खाओ ।

चोरी से भी ध्यान हटाओ ।।

घूम-टहल के स्वास्थ्य बनाओ ।

बूढ़ी हो गई जरा लजाओ ।।

छोटा हूँ पर तुम्हें सिखाओं ।

सच-सच कहता मत गुस्साओ ।।

(४)

चूहा होकर हमें सिखाए ।

सुन-सुन बिल्ली अति खिसियाये ।।

भाग गई न वापस आई ।

रहता चूहा अति हर्षाई ।।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.) ।

URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/

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पिछली कड़ियाँ  - एक , दो , तीन

आओ कहें...दिल की बात

कैस जौनपुरी

काला रंग

कैस,

जब मैं छोटी बच्ची थी...तभी मैं बड़ी बन गई थी... और अभी कुछ महीनों पहले ही मुझे इस बात का अहसास हुआ कि मैं अपने बचपन को फिर से पाने की कोशिश कर रही हूँ...और जब तक ये खत पूरा होगा मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं फिर से एक बच्ची बन जाऊँगी. ये मेरा वादा है खुद से....

मेरे पिताजी को गुस्सा बहुत आता था. और वो अपना गुस्सा हमें दिखाते भी खूब थे. उनको बहुत छोटी-छोटी बातों पे गुस्सा आ जाता था...जैसे कि, काला रंग नहीं पसन्द था उनको. कभी समझ नहीं पाए हम इसका राज...क्यूँ उन्हें काले रंग से दिक्कत है...? और अगर गलती से भी किसी ने काली शर्ट पहन ली, तो उस दिन मम्मी की बर्तनों की अलमारी में खाली जगह बन जाती थी. खिड़कियों के शीशे, काँच के गिलास, शोपीस...यहाँ तक कि टीवी, फ्रिज भी टूटे मिलते थे अगले दिन...जंग के बाद के मैदान की तरह. बीच में तो क्या हुआ, समझ ही गए होंगे आप. ऐसा शायद तीन महीने में एक बार होता था, लेकिन मैं उसको हर पल जीती थी...क्यूंकि एक भूकम्प कभी भी आ सकता है...और मुझे उसके लिए सावधान रहने की जरुरत थी...

कहीं किसी उम्र पे पहुँच के मुझे अहसास हुआ कि इससे बचने का एक आसान तरीका है...नियमों पे चलने का...जैसा-जैसा पापा ने कहा, वैसा-वैसा करते रहो और आप परेशानी को टाल सकते हो...एक-एक करके ऐसे मैंने ना जाने कितनी कुर्बानियाँ दीं...मेरी कत्थक क्लास बन्द हो गई, जब मम्मी मेरे लिए लड़ने से थक गई...लेकिन पापा का घर की चाभी ले जाना शुरू नहीं हुआ. उनके लिए दरवाजा खोलने के लिए घर पे हमेशा किसी न को होना चाहिए था, क्यूंकि चाभी उनके ले जाने के लिए बहुत बड़ी थी. इसलिए मुझे मेरी कत्थक क्लास लाने और ले जाने वाला कोई नहीं था...

म्युजिक क्लास भी बन्द हो गई...आज समझ में आता है कि ‘अपनी बात कहना’ भी वहीं छूट गया था. वैसे काफी सालों से मालूम है, लेकिन मैंने अपनी कत्थक क्लास दुबारा शुरू नहीं की. वो बच्ची जिसने कई सारे डांस कम्पटीशन जीते थे, अब एक कदम भी आगे बढ़ाने में अपाहिज महसूस करती है.

इसी तरह काफी छोटे-छोटे हिस्से टूट कर गिर गए. आज उनको इकठ्ठा कर रही हूँ.

धीरे-धीरे पत्ते पूरी तरह मुरझा गए थे... मैंने एक खामोश कोना ढूँढ़ लिया था. अपने मुँह से एक भी शब्द निकलने की इजाजत नहीं देती थी जो एक दूसरा भूकम्प लाता...मैं लाश बन चुकी थी. आप मुझे कमरे में महसूस भी नहीं कर सकते...इस तरह. बस एक उम्मीद थी कि एक दिन उड़ जाऊँगी. और ऐसा ही हुआ.

जब स्कूल खत्म हुआ, तो मुझे घर से बाहर निकलने का मौका मिला. बल्कि मैंने अपनी जिन्दगी को इस तरह बनाया कि मुझे बाहर जाने का मौका मिले. और जो मैं चाहती थी वो मिला भी. मुझे पूरी आजादी मिली वो करने की जो मैं चाहती थी. आप मुझे लगातार काले रंग के पकड़े पहने हुए देख सकते हैं जो बेशक मेरा मनपसन्द रंग हुआ करता है...मैं कुछ खुश लोगों के साथ वक्त बिताती हूँ जो मेरे लिए थोड़ी खुशी लाए. धीरे-धीरे मैंने खुद को फिर से जिन्दा किया. जबकि हमेशा एक “गुड गर्ल” बनी रही जो आपको कभी भी उसे डांटने का मौका नहीं देती. वो “गुड गर्ल” का लेबल नहीं छोड़ पाई. लेकिन ठीक भी है. सिर्फ जिन्दगी से विद्रोह करने के लिए मुझे बैड गर्ल बनने की जरूरत नहीं है...! ये कोई मुद्दा भी नहीं है. मुद्दा है...अपने उन छोटे-छोटे टुकड़ों को वापस पाना जो गिर चुके थे.

अब मैं ये देखती हूँ कि मेरे पिताजी अपनी जिन्दगी से जूझ रहे थे...... और वो बहुत था. मैं अपने आप में इतना डूबी हुई थी कि कभी उनकी दुनिया में कदम न रख सकी. मैंने कभी ये नहीं देखा कि वो अपनी गाढ़ी मेहनत से कमाई हुई दौलत खर्च करते थे... मुझे शहर में सबसे महँगे स्कूल में भेजने के लिए...मेरे लिए मेरी जिन्दगी में हर वो ऐशो-आराम था जिसके लिए कुछ लोग सिर्फ तमन्ना करते हैं. अतीत में मैं कभी उनकी बेटी नहीं रही...

तब जिन्दगी मुझे एक दूसरे चौराहे पे ले आई...अब मैं अपने पिताजी की बेटी हूँ...एक बिल्कुल नया व्यक्तित्व हूँ...एक चमकता हुआ चेहरा...जो अपने आसपास के लोगों में ढेर सारा प्यार फैलाता है...मुझे पता है लोग मेरे पास जिन्दगी पाते हैं तो मैं कौन होती हूँ ये फैसला करने वाली कि मुझे मर जाना चाहिए. मुझे खुशी है कि मेरे बदले की भावनाओं ने कुछ उदंड हरकत नहीं करने दिया. आज मेरी जिन्दगी में जो कुछ भी है उन सब चीजों के लिए मैं भगवान का शुक्रिया अदा करती हूँ.

अब वो आखिरी टुकड़ा जो मेरे होने में वापस पाना रह गया था वो था अपनी बातों को खुल के कहना...बिना किसी झिझक के...और वही मैंने इस खत में किया है...खुद को खुश महसूस कर रही हूँ...आपसे कहके...और आपके माध्यम से दूसरों से कहके...

मुझे ऐसा करने देने के लिए शुक्रिया...!

महंगाई

सिलेन्डर की दुकान पर लगा है यारों मेला
गेहूँ शक्कर तेल का देखो आज झमेला
गेहूँ कहे मैं हर घर का पाया
शक्कर कहे मैं लम्बी माया
दादा कैरोसीन हाथ ना आये
आम जनता जिस के पीछे भागे
तेल खाने का खा ना पायें
घी भला हम कहाँ से लायें


मूगँ—दाल और तूर दाल के
भाव है जो हमें चिढायें
पत्ती चाय की अँगूठा दिखाये
जिस के बिना हम से रहा ना जाये
दूध कहाँ हम उस में डालें
४० रूपए लिटर से जो आये
काँग्रेस हो या जनता पार्टी
यहाँ ना कोई टिक पायेगा
मँहगाई जो कम करेगा
वही जनता पर राज करेगा

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वक्त भाग रहा है


एक समय था जब सतयुग था
राम राज कहलाया जाता था
तब वक्त की रफ्तार सामान्य थी
वक्त को वहाँ से निकलने की
कदापि जल्दी नहीं थी, वक्त
राम राज्य मैं शान्ति से रह रहा था
क्योंकि तब वक्त की कद्र थी
तब वक्त ठहरा हुआ रहता था


फिर आया कलियुग और
वक्त ने करवट बदली देखा
तो सब उससे तेज चल रहे हैं
वक्त से पहले सभी को कही
ना कहीं पहुँच ने की जल्दी थी
तब वक्त को लगा के ऐसे तो
मैं सब से पीछे रह जाउँगा
सब उस से आगे निकल जायेंगे
और कलयुग मुझे पीछे छोड़ देगा
तब से वक्त तेज—तेज चलने लगा


फिर आया महा कलियुग
वक्त ने बिना मुड़े ही देख लिया
महा-कलियुग दौड़ कर उस से
आगे निकल जाना चाहता है
पर वक्त भी ये कैसे होने देता
क्योंकि वक्त भी अब दौड़ का
प्रतियोगी बन गया था
इस लिए वक्त को भी भागना पड़ा
अब तो इतनी तेज रफ्तार हो गयी
बस वक्त भाग रहा बस भाग रहा है

कुछ भी घट जाता है


————————————————
कभी भी कहीं भी कुछ भी घट जाता है
आतंक वाद का शोला भडकता है
लाखों बेगुनाह लोगों की जाने जाती है
अकाल पड़ता है किसान लोग
अपने हाथों से अपना गला घोंट लेते हैं
बाढ आती है ना जाने कितने लोग
घर से बेघर हो जाते हैं
भूकंम्प आता है ना जाने देश का
कितना नुकसान होता है


रेल पटरी से उतर जाती है
इन्सान बमौत मारा जाता है
कभी बेगुनाहों पर लाठी चार्ज कर
प्रशासन गुनाहगारों के करतूतों
पर पर्दा डाल कर खानापूर्ति कर देती है
बडे अपराधी बच जाते है आम
इनसान फँस जाता है


प्रशासन क्या करता है
कुछ भी कारण बता कर बस
कागजी खानापूर्ती करता है
बस बैठा बैठा अपनी जेबें भरता है
ईन्सानी शवों पर खडा होकर
अपनी तिजोरीयाँ और,और भरता है
कुछ भी घटना को अन्जाम देकर
प्रकृति पर इल्जाम लगाता है
कभी भी कहीं भी कुछ भी घट जाता है

ईश्वर और इनसान


————————————————
ईश्वर ने जब इनसान बनाया
बहुत गर्वित हुआ होगा
सोचा होग अपने अस्तित्व का
ई निकाल कर इन्सानों की
एक दुनिया बनाऊँगा
नाम उसका इनसान रखूंगा
पृथ्वी पर एक स्वर्ग और बनाऊँगा
जिस का कर्ता—धर्ता इनसान होगा


इन्सानियत को ईश्वर मान कर
मानवता का धर्म निभायेगा
भाईचारे और प्रेम का विस्तार करेगा
पर मानव ने तो हिंसा का विस्तार की
अणु,प्रमाण, आतंकवाद को ईश्वर का
वरदान समझ कर मानवता का हास किया
स्वर्ग जैसी इस धरा को नर्क का आकार दिया


धरती—आकाश—पाताल सभी पर
असुरों जैसे विनाश किया
किसी ने नेता बन कर वतन बेचा
किसी ने संन्यासी बन कर
शैतानियत का खेल रचा
किसी ने देश का हितैषी बनकर
दुश्मनों जैसा काम किया
आज जब ईश्वर देखता होगा
अपनी रची दुनिया तो
अफसोस से हाथ मलता होगा

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कवीयत्री मिनाक्षी भालेराव सचिव (प्रशासन )
हिन्दी आंदोलन पूणे

nandlal bharati new

मगनलाल मिठाई मंगाओ,तुम्‍हारा प्रमोशन आर्डर रहा है। विभागाध्‍यक्ष की खुशी को देखकर मगनलाल की खुशी का ठिकाना न रहा। वह परिचर को पांच सौ का नोट देते हुए परिचर सोहन से बोला साहब की पसन्‍द की मिठाई ला दो भाई। सोहन आर्डर तो आ जाने दो। अरे सोहन क्‍यों डरता है,साहब की बात का मान रखना है,साहब कभी व्‍यक्‍तिगत्‌ तौर पर मिठाई खाने का जिक्र नहीं किये। मेरे प्रमोशन से साहब की खुशी का ठिकाना नहीं है। लो दो भाई डर क्‍यों रहे हो साहब कह रहे है तो आ जायेगा। इतने में काल-बेल बजी सोहन बोला ठीक है मगन साहब साहब की सुन लेता हूं तो मिठाई नाशता सब लेकर आता हूं। मगनलाल जो तुम्‍हारी मर्जी करें लाना भाई पैसे की चिन्‍ता ना करना। जाओ साहब की पहले सुन लो। सोहन साहब के सामने हाजिर हुआ। साहब बोले कहां जा रहे हो। सोहन बोला-मगन साहब मिठाई नाश्‍ता बुलवा रहे है। साहब मगन बाबू को बुलाओ। मगनलाल-जी सर।

सहब बोले-मगनजी मैं महीने भर ऐसी चीजे नहीं खा सकता मेरा परहेज चल रहा है। कल ही तो योगा शिविर से आया हूं। बाद में खायेंगे। आपकी खुशी में हमारी खुशी है। आपका प्रमोशन तो पन्‍द्रह साल पहले होना था। ख्‍ौर,देर आये दुरूस्‍त आये अब से भी आपकी नसीब बदल जाये हमें तो बहुत खुशी होगी। हां सर विभाग के सौतेले व्‍यवहार से मेरे कैरियर का जनाजा निकल गया है। उम्‍मीद पर जिन्‍दा हूं, आपकी दुआओं से मेरी नसीब जरूर बदलेगी। बाइस साल की नौकरी आप जैसा कोई बांस नहीं मिला। अधिकतर अफसरों ने रिसते जख्‍म पर खार डालकर अपना काम करवाया फिर कीक मार दिया।

साहब-मगनजी बिते को भूला दो। जितना यााद करो उससे अधिक दुःख होगा। आप जैसे प्रसिद्ध आदमी के साथ मुझे काम करना का मौंका मिला,अच्‍छा लगा।

मगनलाल-सर जो आपको मेरी अच्‍छाई लग रही है वही लोगो के लिये बुराई है। इसी वजह से हारता रहा हूं देश की इतनी बड़ी संस्‍था में।

साहब-हार नहीं जीत कहो मगनलाल।

मगनलाल-बार-बार की हार के बाद भी जीत की उम्‍मीद पर तो जिन्‍दा हूं। आपने मेरी उम्‍मीदों को उम्र दे दिया थैंक यू सर।

साहब-चिन्‍ता ना करो मगनजी आप आसमान जरूर छुओगे। आपकी दुआयें जरूर काम आयेगी कहते हुए घनघना रहे फोन को उठाने के लिये मगनलाल दूसरे कक्ष की ओर दौड़ पड़ा।

दिन बित गया,कुछ अधिकारियों के प्रमोशन आर्डर आ गया। दफतर बन्‍द होते -होते पता चला की स्‍टेट आफिस की फैक्‍स मशीन खराब हो गयी। कल मगनलाल का प्रमोशन आर्डर आ जायेगा। साहब और अन्‍य कर्मचरियों के साथ हंसी-खुशी मगनलाल भी दफतर से खर की ओर प्रस्‍थान किया। दूसरा दिन बित गया ममगनलाल साहब के सामने हाजिर हुआ। साहब देखते ही समझ गये। मगनलाल से मुखातिब होते हुए बोले मगनजी आपका आर्डर अभी तक नहीं आया। कल हेडआफिस आपके सामने बात हुई प्रमोशन हो गया है। प्रमोशन की सूची में आपका नाम है। बैठिये स्‍टेटआफिस से पूछता हूं फैक्‍स ठीक हुआ की नहीं। कहते हुए साहब ने फोन लगा दिया। स्‍टेट आफिस से पता चला कि मगनलाल फिर प्रमोशन से वंचित कर दिया गया है। यह सुनकर साहब को 440 बोल्‍ट का झटका लग गया। वे बोले सांरी मगनजी आपका प्रमोशन रूक गया।

मगनलाल-सर पन्‍द्रह साल से रूक रहा है।

साहब-क्‍या कह रहे हो ?आप इतना पढा-लिखा दो दर्जन से अधिक सम्‍मान प्राप्‍त व्‍यक्‍ति का मामूली सा विभाग में प्रमोशन क्‍या नहीं हो रहा है। मुझे तो आये साल भर भी नहीं हुए हैं इस बीच मैंने तो संस्‍थाहित में आपकी सेवाओं का एक्‍सलेण्‍ट पाया है। आपकी सी.आर भी बहुत अच्‍छी मैंने लिखी है,पहले की आपकी सी.आर.कैसी थी।

मगनलाल-सर बाइस साल से अपने कर्तव्‍यनिष्‍ठा और समय की पाबन्‍दी पर अडिग हूं। काम की अधिकता तो आप देख ही रहे है। काम के बारे में मैं क्‍या कहूं आपसे।

साहब-मगनलाल सब कुछ आपका एक्‍सलेण्‍ट है फिर आपके साथ अत्‍याचार क्‍यों.................?

मगनलाल-सच कहूं.....................

साहब-वही पूछ रहा हूं।

मगनलाल-सर अदरवाइज ना लीजियेगा।

साहब -कैसी बात कर रहे हो मगनजी..............?

मगन-मैं अनुसूचित जाति का अधिक पढा लिखा व्‍यक्‍ति हूं। इस स्‍वायतशासी विभाग में। कई बड़े अधिकारी तो यहां तक बोल चुके है कि तुम जो कर रहे हो उससे आगे का सपना मत देखो अपनी जाति वालों को देखो भर पेट खाने को भी नहीं मिल रहा है। तुम तो कई गुना बेहतर हो पंखे के नीचे बैठे हो तुम्‍हारे बच्‍चे अच्‍छे स्‍कूलों में पढ रहे है। इतनी ही बड़े पद की भूख है तो गले में पट्‌टी पहन लो बड़े पद की। एक साहब ने तो नौकरी से निकलवाने तक का प्रयास किया। एक साहब जो विभाग के बड़े पद से पैसठ साल के बाद रिटायर हुए है उन्‍होने तो प्रमोशन न होने देने की कसम तक खा लिया था। एल.एल.बी.कर लिया है तो वकालत कर रहा है,मुझसे देख लूंगा तेरी वकालत। एक बड़े अधिकारी ने व्‍यंगबाण छोड़ते हुए बोले कि तुम तो नेता हो गये,नेताओं की तरह कपड़ा पहनने लगे हो। उन्‍ही सब का नतीजा मेरा प्रमोशन न होने देना कैडर न बदलने देना मेरी अर्जियों को कूड़ेदान में डालना इसके अतिरिक्‍त कई दूसरे अत्‍याचार।

साहब-मगनजी आपके साथ अन्‍याय संविधान के खिलाफ है।

मगनलाल-सर आपसे एक राय लेना चाहता हूं।

साहब-पूछिये।

मगनलाल-कमीशन में अर्जी लगा दूं क्‍या ?

साहब-प्रबन्‍धन अधिक खिलाफ हो जायेगा। आप एम.डी.और डायरेक्‍टर साहब को एक औत पत्र्र लिखो।

मगनलाल-पहले भी लिख चुका हूं पर वहां तक पहुंच ही नहीं पाया बाइस साल में।

साहब-पहुंचेगा। मैं पहुंचाता हूं। पत्र लिखो उचित माध्‍यम से मैं फारवर्ड करूंगा। ये अत्‍याचार है,योग्‍य व्‍यक्‍ति के साथ अन्‍याय है।

मगनलाल-ठीक है सर लिखदेता हूं। हो सकता है आपका प्रयास से मृत श्‍ौय्‌या पर पड़े मेरे कैरियर को जीवन मिल जाये।

साहब-मगनजी आशावादी बने रहिये। आप कर्तव्‍यनिष्‍ठ,ध्‍ौर्यवान है। जानते है जिसका कोई नहीं उसका भगवान है। निराश मत होइये। एम.डी.और डायरेक्‍टर साहब के नाम पत्र लिख लाइये।

मगनलाल-कार्यालय के कामों को प्राथमिकता देते हुए लंच के समय में पत्र लिखने में जुट गया। सबसे पहले 1- श्रीमान्‌ प्रबन्‍ध निदेशक महोदय, 2- विपणन निदेशक महोदय को संबोधित करते हुए उचित माध्‍यम से पदोन्‍नत के सम्‍बन्‍ध में -अनुरोध पत्र का इस प्रकार लिखा। महोदय प्रणाम,सर्वप्रथम क्षमा का अनुरोध स्‍वीकारें। महोदय्‌ विगत्‌ 21 वर्षो से संस्‍था की सेवा,इर्मानदारी,कर्तव्‍यनिष्‍ठा एवं सम्‍पूर्ण समर्पण भाव के साथ कर रहा हूँ। संस्‍था की सेवा करते हुए उच्‍च श्‍ौक्षणिक एवं व्‍यावसायिक शिक्षा प्राप्‍ति के साथ कई कीर्तिमान भी स्‍थापित किया हूँ जिसके लिये मैं संस्‍था का ऋणी हूं। महोदय, विगत्‌ कई वर्षो से उल्‍लेखित श्‍ौक्षणिक एवं व्‍यावसायिक शिक्षा के आधार पर कैडर में बदलाव के लिए अनुरोध कर रहा हूँ। एम.ए.एल.एल.बी.,पोस्‍ट ग्रेजुएट डिप्‍लोमा इन ह्‌यूमन रिर्सोस डेवलपमेण्ट , इन श्‍ौक्षणिक एवं व्‍यावसायिक योग्‍यताओं केे अतिरिक्‍त मेरे श्‍ौक्षणिक एवं साहित्‍य योगदान के लिये निम्‍नानुसार 25 से अधिक पुरस्‍कार एवं सम्‍मान भी प्राप्‍त हो चुका है। महोदय, उपरोक्त श्‍ौक्षणिक,व्‍यावसायिक योग्‍यताओं एवं अन्‍य योग्‍यताओं के अतिरिक्‍त दूसरी बार आहूत डी.पी.सी. के बाद भी मेरी पदोन्‍नति नहीं हुई है। महोदय, ध्‍यानाकर्षण का विषय है कि विगत्‌ कई वर्षो के अनुरोध के बाद भी मेरे कैडर में बदलाव नहीं हु आ है और अब तो पदोन्‍नत से भी वंचित किया जा रहा हूँ। महोदय, विनम्रता एवं अदब के साथ अनुरोध करना चाहूंगा कि मेरे कैडर में बदलाव का न होना और अब तो पदोन्‍नत से वंचित किया जाना मेरे भविष्‍य की मौत है।

महोदय पुनः क्षमा चाहूंगा,कृपया अन्‍यथा न लें। महोदय, मैं दलित परिवार से हूं। स्‍कालरशिप के सहारे बी.ए.तक की शिक्षा प्राप्‍त कर रोजगार की तलाश में पहली बार शहर आया था। पांच वर्ष की लम्‍बी बेरोजगारी के बाद संस्‍था में टाइपिस्‍ट के पद पर सेवा का सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ। संस्‍था की सेवा में रहकर मैंने उज्‍जवल भविष्‍य की उम्‍मीद में कई दिक्‍कतों का मुकाबला करते हुए एम.ए.। समाजशास्‍त्र। एल.एल.बी.। आनर्स। पोस्‍ट ग्रेजुएट डिप्‍लोमा इन ह्‌यूमन रिर्सोस डेवलपमेण्ट तक की उच्‍च शिक्षा प्राप्‍ति के साथ दर्जन से अधिक किताबों का सृजन कर चुका हूं। आकाशवाणी से रचनाओं के प्रसारणों,देश-दुनिया की पत्र-पत्रिकाओं,ई -पत्र-पत्रिकाओं में स्‍थान मिलने के साथ, उपन्‍यास के प्रकाशनार्थ अनुदान प्राप्‍त हुआ। यह उपन्‍यास विगत्‌ वर्षो से धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हो रहा है,जिसके एवज्‌ में एक पैसा नहीं ले रहा हूं। मेरे साहित्‍य पर श्‍ौक्षणिक एवं भाषा की दृष्‍टि से शोध किया जा रहा है। महोदय,मेरी उपरोक्‍त योग्‍यताओं एवं उपलब्‍धियों से यकीनन संस्‍था के स्‍वाभिमान में अभिवृद्धि हुई है। महोदय,दुर्भाग्‍य का विषय है कि उच्‍च योग्‍यताओं एवं उपलब्‍धियों के बाद भी संस्‍था में पदोन्‍नत नहीं हो रही है। अन्‍तोगत्‍वा करबद्ध निवेदन है कि मेरी योग्‍यताओं को देखते हुए मेरे अनुरोध पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर मेरे कैडर में योग्‍यतानुसार बदलाव के साथ पदोन्‍नत प्रदान कर मेरी श्‍ौक्षणिक, व्‍यावसायिक योग्‍यताओं को जीवनदान प्रदान करने का कष्‍ट करें। महोदय आपश्री से निवेदन है कि अपने सम्‍मुख उपस्‍थित होकर मुझे अपनी स्‍थिति को स्‍पष्‍ट करने का अमूल्य समय प्रदान कर हमें अनुग्रहीत करें, मैं आपद्वय का सदा आभारी रहूंगा।

मगन लाल अपने लिखे पत्र को कई बार-पढा। खुद सन्‍तुष्‍ट होकर साहब के पास पहुंचा साहब पत्र के एक-एक शब्‍द को तौले फिर बोले मगनजी आप तो बहुत अच्‍छा लिखते है। लो मैं सिग्‍नेचर कर दिया। अब स्‍कैन कर पहले स्‍टेट आफिस,डायरेक्‍टर इसके एम.डी.साहब को मेल करो। मगनलाल वैसा ही किया। कुछ ही देर में साहब का फोन घनघनाने लगा। स्‍टेट आफिस के सीनियर अफसरों सहित दूसरे अफसर भी नेक और संस्‍थाहित में कार्य करने वाले साहब को आड़े हाथों लेने लगे यह कहकर कि आपने मगनलाल की अर्जी आगे क्‍यों बढाये।

साहब ने फोन पर जबाब दिया-मगनलाल एक प्रतिष्‍ठित व्‍यक्‍ति है,इस व्‍यक्‍ति ने संस्‍था का प्रचार प्रसार कर सम्‍मान दिया है। वह भी विभाग के बिना किसी खर्च किये। ऐसे व्‍यक्‍ति को तो उच्‍च पद पर सुशोभित होना चाहिये। विभाग के अहंकारी अधिकारियों ने सर्वश्रेष्‍ठ योग्‍य कर्मचारी के आगे बढने के रास्‍ते रोक दिये। विभाग में मात्र स्‍नातक बड़े से बड़े पदों पर विराजमान है।

कुछ दिनों में साहब का ट्रान्‍स्‍फर हो गया। मगनलाल का न तो प्रमोशन हुआ न कैडर बदला उपर से उसे काले पानी के सजा की धमकियां मिलने लगी। उपर सेे अनुशासनहीनता के अपराध का जुर्म कायम होने लगा। मगनलाल घबराया नहीं कर्तव्‍यनिष्‍ठा के साथ मौन जंग जारी रखा। मगनलाल के कर्तव्‍यनिष्‍ठा और सद्‌भावना के भाव ने देश-दुनिया के लाखों व्‍यक्‍तिों के साथ विभाग व्‍यक्‍तियों के दिलों पर दस्तख्‍त दे दिया परन्‍तु सामन्‍तवादी प्रशासकों के कान पर जू नहीं रेंगा और पक्‍की हो गयी मगनलाल के कैरियर मौत की सजा। इसके बाद भी मगनलाल की कलम थमीं नहीं। एक दिन मगनलाल की श्रेष्‍ठता सर्वमान्‍य तो हुई पर श्रम की मण्‍डी में उसके लम्‍बे अनुभवों बड़ी-बड़ी डिग्रियों को खामोश कर दिया गया सिर्फ जातीय आयोग्‍यत के नाम पर। इसके बाद प्रमोशन और कैडर में बदलाव के लिये मगनलाल एक और अनुरोध पत्र कभी नहीं लिखा और नहीं संस्‍थाहित में अपने कर्तव्‍यनिष्‍ठा से विमुख हुआ सेवाकाल के अन्‍तिम दिन तक भी। इसी दृढप्रतिज्ञ भाव ने मगनलाल को मिशाल बना दिया। वह इतना श्रेष्‍ठ बन गया कि उसके लिये सामन्‍तवादी श्रम की मण्‍डी का बड़ा पद भी बौना था देश-दुनिया के मानवतावादी लोगों की नजरों में।

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नन्‍दलाल भारती 20.09.2011

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जनप्रवाह। साप्‍ताहिक। ग्‍वालियर द्वारा उपन्‍यास-चांदी की हंसुली का धारावाहिक प्रकाशन

उपन्‍यास-चांदी की हंसुली,सुलभ साहित्‍य इंटरनेशल द्वारा अनुदान प्राप्त

लंग्‍वेज रिसर्च टेक्‍नालोजी सेन्‍टर,आई.आई.आई.टी.हैदराबाद द्वारा रचनायें श्‍ौक्षणिक एवं शोध कार्य।

 

लखनदादा अम्‍बेडकर चबूतरे से उठकर कुछ कदम चले ही थे कि गश खाकर गिर पड़े। कुछ ही देर पहले उन्‍हे लडखड़ाते हुए चलता देखकर बच्‍चे ही नहीं बूढे भी हंस रहे थे परन्‍तु लखनदादा को गिरते ही पूरी बस्‍ती दौड़ पडी। सोखाराम उनके मुंह पर नाक रखते हुए बोला भइया पीये तो है नहीं फिर लड़ाखड़ाकर गिरे क्‍यों ? चल तो रहे थे बिल्‍कुल शराबियों जैसे, भईया पीते है सबको मालूम है इसीलिये सबके सब हंस रहे थे। इतने में हंसवन्‍ती बोली अरे तुम सब दूर हटो,हवा आने दो। जेठजी पीये नहीं है। कोई तकलीफ है कल बहुत चिन्‍तित थे बेटवा के नौकरी को लेकर। सोखाराम करिया से बोले बाबू जल्‍दी से हंसवन्‍ती की खटिया उठा ला। लखनदादा को लेटाकर खटिया टांग कर हंसवन्‍ती के घर के सामने नीम के पेड़ के नीचे खटिया रख दिये। लाली बेना से दनादन हवा करने लगी। सोखाराम तनिक भर में हैण्‍डपाइप से लोटा भर पानी लाकर गमछा भीगों कर लखनदादा का मुंह धोकर शरीर पोंछने लगे। कुछ देर के बाद लखनदादा बोले मैं कहां हूं। लखनदादा की छोटी बहू,बेटा हरेन्‍द्र नाती सब घेर लिये थे। पोती पुष्‍पा तो पांव पकड़कर रोये जा रही थी।

हंसवन्‍ती-जेठजी हमारी नीम की छांव में हो जंगल में नहीं हो। जंगली जानवर नहीं बस्‍ती के लोग घेरे हुए है।

सोखाराम-क्‍या हंसवन्‍ती तूझे मजाक सूझ रहा है। देख रही है भईया के गले से आवाज निकल नहीं रही है,तू मजाक कर रही है। इतने में करिया बोला-कक्‍का गांजा है बना लूं क्‍या ? सोखाराम चुप तेरी मां को भौजाई कहूं। देख रहा है जान की पड़ी हैं तूझे गांजा की पड़ी है।

हंसवन्‍ती-करिया ठीक कह रहे है हो सकता है खाली पेट गांजा का धुआं मन भर-भर कर उड़ाये हो। गांजा लग गया है।

करिया-मेरे सामने तो कक्‍का गांजा पीये नहीं है। मेरे साथ तो कक्‍का गांजा पीये नहीं बाकी और किसी के साथ पीये हो तो मैं नहीं जानता।

सोखाराम-देखो भईया ना गांजा पीये है ना दारू यह तो कनफरम है। होश में आने दो दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा। इतने में लखनदादा कराहते हुए उठने लगे। सोखाराम हाथ पकड़कर बोले भईया लेटे रहो जीव ठौरीक हो जाने दो फिर हम घर छोड़ देगे। लखनदादा पानी का इशारा किये। हंसवन्‍ती दौड़कर हैण्‍डपाइप से लोटे में पानी भर लायी और उनके मुंह में लोटा लगा दी। लखनदादा आंख बन्‍द किये ही पानी डकार खटिया पर लेट गये।

करिया-काका तूने कक्‍का को छू दी। कक्‍का तो तेरे भसूर है और तेरे खानदान के है,पाप लगेगा।

हंसवन्‍ती-करियाबाबू ढकोसला में अब मेरा विश्‍वास नहीं रहा। किसी के जान की पड़ी तुम ना छूने की बात कर रहे हो। पानी पी लाना जरूर था वही हमने किया, रूढिवाद जहर है,ढकोसलाबाजी आज के जमाने में उचित नहीं है।

सोखाराम-तुम लोग तनिक चुप रहो। करिया भईया को सहारा देकर बैठाओ,बैठने का इशारा कर रहे है। मैं डां.नरेन्‍द्र को आवाज देता हूं।

करियाराम- ठीक है कौन सा बड़ा डाक्‍टर है नीमहकीम खतरे ही जान।

हंसवन्‍ती-भले ही डांक्‍टर नहीं है मुसीबत के समय में तो डां.नरेन्‍द्र ही काम आते है। राहत तो उनकी दवा से मिल जाती है,बुखार आ जाये तो पांच कोस पैदल चलकर कोई दवाई लेने जायेगा। पता चले कि रास्‍ते में दम तोड़ दिया। मौंके पर तो नरेन्‍द्र बाबू काम आते है, कितने बरसों से डाक्‍टरी कर रहे है,अच्‍छी जानकारी हो गया है। इतने में डांक्‍टर नरेन्‍द्र भी आ गये। डाक्‍टर के आते ही लखनदादा तनकर बैठ गये। लखनदादा को तनकर बैठते हुए देखकर करिया बोला क्‍या नरेन्‍द्र थोड़ी देर पहले आ जाते तो काका गिरते भी नहीं।

डां.नरेन्‍द्र लखन दादा का हाथ पकड़कर कुछ देर मुआयना करने के बाद बोले दादा कैसा लग रहा है। धड़कन तो ठीक चल रही है। कुछ याद है कैसे गिरे थे।

लखनदादा-कुछ भी नहीं। चबूतरे से उठा हूं घर जाने के लिये चला था बस इतना याद है।

डां-कोई बात सोच रहे थे क्‍या ?

लखनदादा-शोषित आदमी की दौलत क्‍या है सपना कहों या सोच। सपने में जीने वाले को सपने देखने लायक ना छोड़ा जाये तो दुख तो होगा। कह कर लम्‍बी-लम्‍बी सांसे भरने लगे।

डां-दिल को ठेस लगी है किसी बात से। बहू ना कुछ अनुचित कह दिया हो तो मैं उसकी तरफ से क्षमा मांग लेता हूं।

हंसवन्‍ती-जेठ जी की बहूये जैसे पूरे गांव में कोई बहू नहीं होगी। कितनी सेवा करती है। वे तो गाय है,मुंह नहीं खोल सकती कितनों भी तकलीफ उठा लें।

करिया-नरेन्‍द्र तू डाक्‍टर है या नेता। अरे भाई दवाई दे ना।

डां.नरेन्‍द्र करिया भईया ना जर है ना बुखार मेरी जानकारी के अनुसार कोई दिल की बीमारी भी नहीं है। कभी -कभी ऐसा होता है सोचते-सोचते चक्‍कर आ जाता है आदमी गिर पड़ता है घबराने की कोई बात नहीं हो सके तो कांफी पा ला दो। घबराने की कोई बात नहीं है,काका घबराहट हो तो एक गोली खा लेना बस। चिन्‍ता नहीं करना सब ठीक हो जायेगा।

लखननदादा-कलयुगी आदमी की दोगली मानसिकता कुछ नहीं ठीक होने देगी डाक्‍टर बाबू।

डांक्‍टर-चक्‍कर आने का कारण कुछ और है।

लखनदादा-दो महीने से भरपूर नींद नहीं आ रही है।

सोखाराम-ऐसा क्‍या हुआ भईया रोज साथ बैठते हैं कभी जिक्र भी नहीं किये। अरे बात कहने से दिल हल्‍का हो जाता तुम खुद दूसरों को उपदेश देते रहते हो।

लखनदादा-समाधान अपने हाथ में नहीं है ना। कह कर भी क्‍या करता नमूसी होती लोग हंसते भी।

करियाबाबू-कौन ऐसी गुस्‍ताखी कर सकता है इस बस्‍ती में जो किसी के दुख पर हंसे। मजदूरों की बस्‍ती में तो ऐसी हंसी नहीं होती। हां मालिकों के बारे में पक्‍का कहा नहीं जा सकता क्‍योंकि उनके मन में राम तो बगल धारदार खंजर होती है।

लखनादादा-कुछ ऐसा ही हुआ मेरे साथ।

सोखाराम-तुम्‍हारे साथ भईया किसने किया बताओ उसकी जीभ हलक से खींच लेते हैं।

डांक्‍टर-काका मन पर बोझ ना रखा करो। चिन्‍ता चिता होता है।

लखनदादा-जानता हूं डांक्‍टर बेटवा पर जिस आसरे में जी रहा था उसकी उम्‍मीद ही खत्‍म हो गयी।

हंसवन्‍ती-किस आसरे की उम्‍मीद टूट गयी जेठ जी। लड़के दोनों कमा रहे है,खाने पीने पहनने की कोई कमी नहीं है फिर कौन उम्‍मीद टूट गयी।

लखनदादा-हंसवन्‍ती तुमको पता है हम कितनी तकल्‍ीफ उठाकर बेटवा को पढाये है। बेटवा भी हिम्‍मत वाला है कभी-कभी तो खाली पेट भी स्‍कूल गया है। खाने पहनने की बहुत तंगी थी। सेर भर कमाई में परिवार पालना बहुत कठिन काम था इसके बाद भी हमने पाला-पोसा ख्‍ौर सरकारी वजीफे की सहायता को भी भूला नहीं सकता। बड़ी मदद मिली वजीफे से बेटवा शहर में बहतु तकलीफ उठाया भूखे राते काटी,सगे रिश्‍तेदारों ने कन्‍नी काट ली। मेरा बेटा भी अपना स्‍वाभिमान नहीं मरने दिया,मेहनत मजदूरी करके खाया और हमें भी देता रहा।

हंसवन्‍ती-तुम्‍हारे लायक बेटे का किस्‍सा तो बस्‍ती वाले अपने बच्‍चों को सुनाते है। इसमें कोई नयी बात तो नहीं है।

लखनदादा-है। करिया बताओ तब तो कुुछ सूझे। इतने में रविन्‍द्र गिलासय थमाते हुए बोला लो बड़े पापा काफी पी लो। डाक्‍टर भईया बोले थे ना। मैं उनकी बात सुनकर भागकर बाजार गया वहीं से लाया।

हंसवन्‍ती-चार कोस से काफी लाया।

रविन्‍द्र-काफी की पुड़िया दुकान से खरीदा फिर चायवाले के पास गया उसको बनाने नहीं आ रहा था। वही से दूध लिया घर में खुद बनाकर लाया हूं।

लखनदादा-युग-युग जी मेरे लाल इतनी मेहनत किया है तो पीना ही पड़ेगा वैसे कुछ खाने पीने की इच्‍छा नहीं है। सब इच्‍छा जैसे मर गयी है।

रविन्‍द्र-दादा ये बतौर दवाई पीना है।

लखनदादा-हां बेटा पी रहा हूं। लखनदादा फंूक-फंूक कर कांफी पीये। कुछ देर बाद उनका मनठौरिक हुआ। वे घर जाने के लिये उठने लगे। इतने में सोखाराम कंध्‍ो पर हाथ रखते हुए बोला भईया और आराम हो जाने दो फिर घर जाना कौन सा दूर घर है। हरेन्‍द्र थोड़ी देर और रूक जाओ बाबूजी फिर ले चलता हूं।

लखनदादा-मैं आ जाउंगा तुम लोग घर चलो। गाय चिल्‍ला रहा है।

हंसवन्‍ती-हरेन्‍द्रबाबू देखो बछ़डा छुडा तो नहीं लिया है। हरेन्‍द्र घर की ओर देखकर बोला हां कतवारू के खेत में बछडा़ चला गया। जा बेटा पुष्‍पा पकड़कर बांध दे। वैसे अभी तो घास भी नहीं खाने लायक है पर कतवारू की गाली हमें खानी पड़ेगी।

सोखाराम-भईया आपको किस बात की चिन्‍ता है वो तो बता ही नहीं रहे हो।

लखनदादा-सोखा बात मेरे जीवन स जुड़ी है तू क्‍या पूरा गांव जानता है,मेरी आख भी नहीं खुली थी कि बाबूसाहब की चाकरी में लगना पड़ा था क्‍योंकि मेरे पिताजी आजादी से पहले कलकत्‍ता में नौकरी करते थे। घर अच्‍छे से चल रहा था सालों बाद ना जाने कहां गायब हो गये। मजबूरी में मुझे हलवाई करनी पड़ी थी। उस समय सेर भर मजदूरी दोपहर तक की मिलती थी चार बजे जाना पड़ता काम पर जब बाबू साहब की नींद खुद गयी हांक लगवा देते थे उस समय जाना ही पड़ता था। छोटा भाई और बहन के पालन का बोझ सिर पर आ गया था। मां भी कुछ महीनों बाद अंधी हो गयी थी वह अलग मुसीबत थी छुआछूत का जहर आदमी होकर भी जानवरों से बदत्‍तर बना रखा था। अब तो हालात में काफी सुधार है ख्‍ौर लाख मुसीबतों को झेलकर बड़ा बेटा लिख पढ गया। सोचा कि अपने भी दिन आयेगे बड़ी उम्‍मीद थी कि बेटा बड़ा साहब बन जायेगा पर सपने मार दिये गये।

करियाबाबू-कक्‍का किसने मारा तुम्‍हारे सपने,किसने कमलेन्‍द्र की योग्‍यता का चीरहरण किया है,चलों हम पूरी बस्‍ती के लोग उसकी आंखें खोल देते है।

लखनदादा-किस-किस की आंखों खोलोगे,दुर्योधन तो हर विभाग में पालथी मारे बैठे है,जातिवाद का जहर छोड़कर राज कर रहे है।

सोखाराम-भईया तुम्‍हारा सपना कैसे मरा समझ में नहीं आ रहा है।

लखनदादा- कमलेन्‍द्र अब बड़ा साहब नहीं बन पायेगा।

करियाबाबू-क्‍यों नहीं काका वह तो बहुत पढालिखा है। वह तो कम्‍पनी का ब्राण्‍डअम्‍बेसडर बन सकता है।

लखनदादा-जो बनने का हक था वह तो मिल ही नहीं रहा है,बा्रण्‍डअमबेसडर की बात कर रहे हो।

हेरन्‍द्र-अधिक योग्‍यता और अधिक वफादारी उपर से नीचले तबके का,कहावत है ना एक तो करैला दूसरे नीम के पेड़ पर चढ जाये। खूबियों की वजह से भईया की तरक्‍की के रास्‍ते बन्द कर दिये भईया सेमीगर्वमेण्‍ट कम्‍पनी में काम करते है। सरकारी नियम शायद लागू नहीं होते है इसीलिये मनमर्जी चल रही है,कम्‍पनी की चाभी वर्णिकश्रेष्‍ठ और समानता विरोधी हाथों में है इसीलिये भईया के साथ अत्‍याचार हो रहा है ज्‍वाइन करने के कुछ महीने बाद से ही जब लोगों को पता चला कि भईया नीचले तबके के है। सुनने में आ रहा है कि भईया की सी.आर.खराब कर दी गयी है।

सोखाराम-ये क्‍या होता है।

करियाबाबू-दफतरों में कम्‍पनियों गोपनीय रिर्पोट बनता है। इसी के आधार पर प्रमोशन होता है। अगर कमलेन्‍द्र की सी.आर खराब की गयी है तो ये तो भ्रष्‍टाचार अत्‍याचार और नीचले तबके के योग्‍य वफादारी कर्मचारी के भविष्‍य का ही नहीं उसके परिवार,पूरे गांव की उम्‍मीदों का बलात्‍कार कर दिया गया है घटिया मानसिकता के अफसरो ने,सरकारी आरक्षण के बाद भी ऐसा घिनौना कृत्‍य है जातिवाद से उत्‍प्रेरित।

छिन लिया खुशी का इक कतरा तूने

क्‍या कहूं तुम्‍हे तो हमने

खुदा समझा था पर ये मेरी भूल थी

प्रच्‍छेदन कर दिया तुमने

रोम-रोम रो उठे है

पलकों के बांध

मजबूत हो गये है इतने

अब तो टूटते ही नहीं

हमें तो उम्‍मीद में जीना है

जिन्‍दगी जहर है तो पीना है

निक नहीं किया तुमने

उम्‍मीद का कतरा था इक

वो भी लूट लिया तुमने........

हंसवन्‍ती-ये तो सरासर अन्‍याय है,बताओ बड़े-बड़े पढे-लिखे अफसरों की इतनी गिरी हुई सोच है तो गांव के रूढिवादी गंवारों के बारे मे देखो।

हरेन्‍द्र-बाबूजी अब घर चलो। खाना खाकर आराम करो। भईया की नसीब में होगा बड़ा अफसर बनना तो कोई रोक नहीं पायेगा। भईया के पास ज्ञान का भण्‍डार है दुनिया उनको मानती है,मत दे कम्‍पनी वालो प्रमोशन। प्रमोशन देने से तो कम्‍पनी का मान बढता लोग कहते देखो फला कम्‍पनी में कमलेन्‍द्र बड़ा साहब है पर कम्‍पनी प्रबन्‍धन ने तो अपनी साख गिरा ली है,जबकि भईया से बहुत कम पढे लिखे बड़े-बड़े पदो पर है,दुर्भाग्‍यवश वही नसीब लिख रहे है। देखना भईया के सामने यही नसीब लिखने वाले एक दिल सिर झुकायेगे।

लखनदादा-बाद की बात है बेटा अरे प्रमोशन दो साल के बाद होता या ना होता,बेटवा की नौकरी चलती या ना चलती पर एक कर्मशील,वफादार,इर्मानदार व्‍यक्‍ति के चरित्र पर लांछन आरोप ये कैसे भ्रष्‍ट लोग है।

हंसवन्‍ती-ये तो सीता का त्‍याग या शंबुक ऋषि का वध हो गया। बुद्ध,महात्‍मा गंाधी और अम्‍बेडकर बाबा के देश में ऐसा भ्रष्‍टाचार।

लखनदादा-हां हंसवन्‍ती कर्म को पूजा,उच्‍च शिक्षित,प्रतिष्‍ठित निरापद बेटवा को चरित्रहीनता का आरोप तो चैन छिन लिया है। ना जाने कब भ्‍ोदभाव जैसे अमानीय दर्द से छुटकारा मिलेगा ?

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नन्‍दलाल भारती.... 12.10.2011

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जनप्रवाह। साप्‍ताहिक। ग्‍वालियर द्वारा उपन्‍यास-चांदी की हंसुली का धारावाहिक प्रकाशन

उपन्‍यास-चांदी की हंसुली,सुलभ साहित्‍य इंटरनेशल द्वारा अनुदान प्राप्त

लैंग्‍वेज रिसर्च टेक्‍नालोजी सेन्‍टर,आई.आई.आई.टी. हैदराबाद द्वारा रचनायें शैक्षणिक एवं शोध कार्य।

जंगल के कानून

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राजनीति में शुचिता की मत बात करो,

जंगल के कानून तुम्हें मालूम नहीं

नैतिकता मर्यादा और उसूलों के,

बदल गये मज़मून तुम्हें मालूम नहीं

शासन का सिद्धान्‍त सदा से है यह ही,

मांसाहारी ही राजा हो पाता है

घास फूस खाने वाला हाथी गैंडा,

है विशाल पर कब वनराज कहाता है

इसमें सत्‍ता उसको ही मिलती जिसके

तेज दांत नाखून तुम्हें मालूम नहीं॥1॥

 

नैसर्गिक अधिकार प्रजा पर राजा का,

जिसको भी जैसे चाहे मारे खाये

पानी पीते हुए निरीह मेमने के

तर्क भेड़िये के आगे कब चल पाये

स्‍वाभिमान को छोड़ हिलाते दुम अपनी

पाते वही सुकून तुम्हें मालूम नहीं ॥2॥

 

सदियों से निर्बल शोषित होते आये,

चिडियों के बच्‍चे अजगर खा जाता है

मधुमक्‍खी का श्रम से जोडा़ हुआ शहद

कोई भालू आकर चट कर जाता है

ख़रगोशों भेंड़ो़ के बालों खालों से

बनता चमड़ा उन तुम्हें मालूम नहीं॥3॥

 

सबके अपने झुण्‍ड, झुण्‍ड के नेता हैं

जो ताकतवर वह नेता बन पाता है

फिर वह जो भी करे उसे है क्षम्‍य सभी

जो करता विरोध वह मारा जाता है

सत्‍ता पर अपना अधिकार जमाने को

बहता कितना खून तुम्हें मालूम नहीं॥4॥

 

लगती भी है आग दरख्‍़त नहीं जलते

जलता खरपतवार झाड़ियां जलती हैं

कुछ दिन रहती तपिस बाद वर्षा ऋतु के

यही वनस्‍पति दूनी गति से फलती है

डूब गया वह उलटी धार तैरने का

जिस पर चढ़ा जुनून तुम्‍हें मालूम नहीं॥5॥

 

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ब्रजेश मिश्र

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(चित्र - अमरेन्द्र, फतुहा, पटना की कलाकृति)

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घटना क्षितिज

समय

हम दोनों को बहा ले गया है

एक दूसरे के घटना क्षितिज (event horizon) के पार

अब हमारे साथ घटने वाली घटनाएँ

एक दूसरे को प्रभावित नहीं कर सकतीं

यह जानने का अब हमारे तुम्हारे पास कोई जरिया नहीं बचा

कि कैसी हो मेरे बिना तुम

और तुम्हारे बिना मैं

 

अब अगर हम महसूस कर सकें

एक दूसरे का दर्द

बिना सूचनाओं के आदान प्रदान के

तब समझना

कि जो संबंध हममें और तुममें था

वह कोई आकर्षण बल नहीं

वह एक क्वांटम जुड़ाव (quantum entanglement) था

जो जुड़ गया था

ब्रह्मांड में हमारी उत्पत्ति के साथ ही

और जिसे समय भी खत्म नहीं कर सकता

यदि ऐसा हुआ

तब समझना

कि हमें फिर मिलने से कोई नहीं रोक सकता

 

हमारा मिलना

केवल समय की बात है

और समय बीतने के साथ

बढ़ती जा रही है

हमारे मिलन की संभावना

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धर्मेन्द्र कुमार सिंह
वरिष्ठ अभियन्ता (जनपद निर्माण विभाग - मुख्य बाँध)
बरमाना, बिलासपुर
हिमाचल प्रदेश
भारत

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(चित्र - अमरेन्द्र, फतुहा, पटना की कलाकृति aryanartist@gmail.com )

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