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November, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

शशांक मिश्र भारती की बाल कविता - कर्म का फल

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कर्म का पथ सूरज पूरब में उगकर पश्‍चिम में होता अस्‍त है, सुख-दुख का अटल नियम, इससे ही होता सत्‍य है, सूर्योदय ही भाग्‍योदय है भाग्‍योदय ही सूर्योदय है, जो भाग्‍य के सहारे जीते हैं जीवन में कुछ न पाते हैं, तरह-तरह की इच्‍छायें मन में रखे रह जाते हैं, इसीलिए हे प्‍यारे बच्‍चों मन में दृढ़ विश्‍वास जगाओ, छोड़ सभी निराशाओं को कर्मवीरों सा पथ अपनाओ। सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर 242401 उप्र

अमिता कौंडल की कविता - दादा का बागीचा

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डॉ. अमिता कौंडल

तुम्हारे दादा ने लगाया था कभी
हरा भरा बागीचा
पिता ने दे पानी और खाद
की थी इसकी परवरिश
इसकी डालियों पर झूल कर
तुम सब बड़े हुए
इसके फल खा,
छुपन छुपाई खेल
पले तुम्हारे बच्चे
पर घर का बटवारा क्या हुआ
जमीन जायदाद क्या बंटी
तुमने इसे भी बाँट डाला
इसका हर इक पेड़ काट डाला
और बना ली चारों भाईयों ने
बड़ी बड़ी कोठियाँ
अब निशानी के तोर पर
बचा है यह इक आम का पेड़
जिसे रो रो कर बचा लिया था
तुम्हारे बच्चों ने
और आज इसके लिए भी
तुम सब लड़ते हो
इस पर बराबर का हक
समझते हो
तुम सब तो संग न रह सके और
तन्हा कर दिया यह पेड़
जो आज भी तुम्हें
फल,फूल और छाया दे
सीखा रहा है धैर्य, त्याग
और परमार्थ का सबक
अब भी कुछ सीख सकते हो
तो सीखो इससे..................
Amita Kaundal (Ph.D)

कृष्ण गोपाल सिन्हा का व्यंग्य - रामलीला मैदान के बहाने

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जनार्दन जी एक दिन अपने बाललीला के दिनों को याद करते-करते रामलीला को याद करने लगे. कहने लगे, जब रामलीला के दिन आते तो बड़े उत्साह के साथ छोटे, बड़े और मझले, बड़े, बूढ़े और जवान, बच्चे, बच्चियां और महिलायें, दादी, अम्मा, बुआ, चाची और बहनें सभी को रामलीला अच्छा लगता था, सभी जाते थे. घरों के लडके और बड़े रामायण के अलग-अलग पात्रों के रूप में अभिनय करते थे. लड़कों में से ही राम, लक्ष्मण के अलावा सीता की भूमिका भी कोई लड़का ही करता था, दशरथ, जनक, रावण, हनुमान, अंगद भी लोग बनते थे. बंदरों की सेना में बच्चों को आनंद आता था. एक मंडली रामायण की चौपाइयों का गायन करता था और उसी के अनुसार कथानक और पात्रों के संवाद आगे बढ़ते थे. जनार्दन जी के गाँव के मास्टर साहब रिहर्सल पर पूरा ध्यान देते थे और स्टेज पर परदे के पीछे से पात्रों को संवादों को बोलने के लिए प्रोम्प्टिंग भी करते थे. क्या दिन थे, जनार्दन जी भी औरों की तरह रात को खाने-पीने से निवृत्त होकर रामलीला देखने जाते और भोर होने से पहले घर लौटते थे. जनार्दन जी से ही यह भी जानकारी मिली कि वे जब कभी रामलीला के दिनों में अपने ननिहाल में होते तो रामनगर क…

सृजन के तत्वावधान में पुस्तक विमोचन और साहि‍त्‍य चर्चा आयोजित

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विशाखापटनम की   हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य, संस्‍कृति‍ एवं रंगमंच को समर्पि‍त संस्‍था “सृजन” ने दि‍नांक 27 नवंबर 2011 को द्वारकानगर स्‍थि‍त ग्रंथालय के प्रथम तल पर श्रीमति पारनंदी निर्मला की तीन अनूदित एवं एक मौलिक पुस्तक का विमोचन तथा हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य चर्चा का आयोजन कि‍या।
कार्यक्रम की अध्‍यक्षता सृजन के अध्‍यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने। डॉ. टी महादेव राव, सचि‍व,  सृजन ने  संचालन कि‍या । स्‍वागत भाषण देते हुए कार्यक्रम एवं सृजन संबंधी वि‍वरण प्रस्‍तुत कि‍या सृजन के संयुक्‍त सचि‍व डॉ. संतोष अलेक्‍स ने।
पुस्तकों का विमोचन करते हुये नीरव कुमार वर्मा ने कहा की क्षेत्र की जानी मानी लेखिका के चार पुस्तकों का एक साथ विमोचन सृजन के लिए और हिन्दी साहित्य के क्षेत्र के लिए एक उपलब्धि है। उन्होंने पुस्तकों के विषय में विवरण देते हुये बताया की एक मौलिक पुसता खुला आकाश में पारनंदी निर्मला जी  की समस्त रचनाएँ हैं, जबकि तीन अन्य पुस्तकों में दो में तेलुगू की चुनी हुयी और चर्चित कहानियों का अनुवाद है और एक पुस्तक में तेलुगू की मानक लघुकथावोन का अनुवाद है।
श्रीमति पारनंदी निर्मला ने सृजन संस्था को धन्यवाद देते …

अनन्‍त आलोक की लघुकथा पत्‍नी की जरुरत

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बाबू राम लाल जी की रिटायरमेंट में अभी एक वर्ष था कि अचानक उनकी पत्‍नी की ह्रदयघात मृत्‍यु हो गई। बाबू को अभी इकलोते पुत्र का विवाह करना था जो पत्‍नी ने अपने जीवन काल में ही निश्‍चित कर दिया था। लगभग एक वर्ष में पुत्र का विवाह तथा बाबू राम लाल की रिटायरमेंट हो गई। जीवन साथी के अचानक यूं चले जाने से एक बार तो उन्‍हें गहरा आघात लगा था लेकिन इन व्‍यस्‍तताओं के चलते यह बात उनके मानस पटल से मानो विस्‍मृत सी हो गई थी। सब ठीक ठाक चल रहा था फिर कुछ समय बाद न जाने क्‍यों बाबू के मन में पुनर्विवाह का भूत सवार हो गया और उपयुक्‍त वधु की तलाश में कभी यहां तो कभी वहां भटकने लगे। बने बनाये घर के टूटने के भय से आशंकित जवान पुत्रियों तथा शादी शुदा पुत्र ने पिता को समझाने के अथक प्रयास किए, बच्‍चों ने लगभग आठ वर्ष तक अपने बूढे़ पिता को पुनर्विवाह से रोके रखा लेकिन नियती के आगे भला किसकी चलती है। आखिर बाबू राम लाल को पुनर्विवाह करने पर ही शान्‍तिं मिली। इस बात से खिन्‍न पुत्र ने पिता को जी भर खरी खोटी तो सुनाई ही साथ ही मां को खोने का गम सीने में दफनाए पुत्र, पिता के खोने के भय से आशंकित, और परेशान हो …

धर्मेन्द्र कुमार सिंह की कविता - फल और डालियाँ

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फल और डालियाँजब से फलों से लदी हुई डालियों नेझुकने से मना कर दियाफलों ने झुकी हुई डालियों पर लगना शुरू कर दियाअब कहावत बदल चुकी हैआजकल जो डाल जितना ज्यादा झुकती हैवो उतना ही ज्यादा फलती है
सादर
--
धर्मेन्द्र कुमार सिंह
वरिष्ठ अभियन्ता (जनपद निर्माण विभाग - मुख्य बाँध)
बरमाना, बिलासपुर
हिमाचल प्रदेश
भारत --(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com फतुहा पटना की कलाकृति)

शशांक मिश्र भारती की रचना - बाल साहित्‍य एवं सामाजिक सरोकार

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बालक के व्‍यक्‍तित्‍व निर्माण में समाज की महत्‍वपूर्ण भूमिका है। बालक की अभिरुचियों, कौशलों, आवश्‍यकताओं को प्रभावित करने वाले बाल साहित्‍य सर्जक को बालक के सामाजिक परिवेश को समझकर ही बाल साहित्‍य सृजन की ओर उन्‍मुख होना चाहिए। वातावरण की सहायता से नेताजी सुभाष, रवीन्‍द्रनाथ टैगोर, वीर शिवाजी को राष्‍ट्रीय चेतना से युक्‍त क्रांतिकारी बनाने में समर्थ हुए। भले ही उनकी अपनी माताओं का भी हाथ रहा हो। समाज से जुड़ा कल्‍पनायुुक्‍त साहित्‍य हो या ऐतिहासिक कथानक। अगर उसमें वातावरण का ध्‍यान रखा गया है तो अवश्‍य ही बालक को अपनी ओर खींचकर उस पर अपना अमिट प्रभाव डालता है। जिससे ही विष्‍णु शर्मा की पंचतंत्र की काल्‍पनिक कथाएं अमर शक्‍ति के तीन मूर्ख पुत्रों को विद्वान नीति निपुण बनाने में समर्थ होती हैं। यही नहीं पिछले वर्षों हैरी पाटर की रातों रात आठ लाख प्रतियां बिक गई। निश्‍चय ही इन सबके पीछे काल्‍पनिकता के बाद भी बच्‍चों के लिए आकर्षण ही रहा है जो उन्‍हें अपनी ओर खींचने में समर्थ हुआ है। इसके विपरीत बाधक वातावरण की बात करें तो कितने ही बालक शक्‍तिमान बनने के चक्‍कर में हाथ-पैर तुड़ा बैठे। कुछ …

कृष्ण गोपाल सिन्हा का व्यंग्य - इंडियन राइटर्स लीग बतर्ज़ आईपीएल

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जनार्दन जी की स्वीकृति और आशीर्वचन मिलने के बाद से मैं अपनी गिनती स्वयंभू लेखकों में करने लगा हूँ . लेखकीय वाइरस से संक्रमित होने के कारन व्यंग्य, गीत, ग़ज़ल, कहानी, लेख में थोड़ा-थोड़ा हाथ पैर मारने के बाद अब उपन्यास में हाथ आज़माना चाहता हूँ . मुझे इस मामले में अपनी औकात का भरपूर अंदाजा है फिर भी स्वयं को मैं झोला-छाप साहित्यकारों की श्रेणी में रखने को कत्तई तैयार नहीं हूँ . जनार्दन जी जीवट और उत्साह से ओतप्रोत हैं ही और उनके संगत में मुझे भी इसे अपने साथ रखने की प्रेरणा मिलती रहती है . सचमुच बड़े भाग्य से किसी को अपने गुणों को पहचानने वाला मिलता है. मेरे गुणों को पहचानने वाला उनके जैसा गुणग्राहक कहाँ मिलेगा, इस बात से मैं शत-प्रतिशत आश्वस्त हो गया हूँ. जनार्दन जी के पास मैं अपने ज़हन में अपने भावी उपन्यास के लिए पल रहे पात्रों के बारे में सलाह-मशविरा करने गया तो देखा कि वे बहुत ही उत्साहित मुद्रा में विराजमान हैं. दरअसल, उनके गंभीर और संजीदे हाव-भाव के मुकाबले उनकी यह मुद्रा मुझे अच्छी लग रही थी परिणामतः मैं भी उत्साहित महसूस करने लगा. कुछ देर हम दोनों इसी हाल में रहते पर वे स्वयं …

मीनाक्षी भालेराव के गीत व कविताएँ

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गीतशृंगारबलम तुम कहाँ थे सारी रात मैन सोलह किया श्रृंगार बलम तुम कहाँ थे सारी रात कजरारे नैनों में काजल लगाया घुंघराले बालों पे गजरा लगाया महक उठा था संसार बलम तुम कहाँ थे सारी रात बलम तुम कहाँ थे सारी रात कानों में मैंने पहनी थी बाली नाक में मैंने नथनी सजाई झूम उठा था संसार बलम तुम कहाँ थे सारी रात बलम तुम कहाँ थे सारी रात सौतन के घर थे तुम या सहेली के घर थे जिया जलाया सारी रात बलम तुम कहाँ थे सारी रात बलम तुम कहाँ थे सारी रात दिलसवा लाख का दिल था मेरा खो गया बीच बाजार सैंया कारण तोरे बीच सड़क पर नैन मिले तो मैं हो गयी बदनाम सैंया कारण तोरे लाज से मोरी झुक गयी अँखियाँ होंट थरथर कांपे मुझ को सब निहारे जैसे मैं कोई अजूबा सैंया कारण तोरे दिल में मेरे हलचल हो गयी मन मोरा घबराए बात करूं तो छूटे पसीना बोल ना मैं कुछ पाऊं सैंया कारण तोरे बलमा कारण तोरे प्यासीढोला मैं तो प्यासी रह गयी प्यासी रह गयी रे तेरे प्रीत की प्यास मनमा आधी रह गयी रे एक बार तू आकर मिलजा सीने में बस एक धडकन बाकी रह गयी रे सांसें मेरी मद्धम हो गयी अब ना मैं जी पाऊँगी दिल में एक फाँस अटकी रे मुझ को तू छोड़ गया सौतन संग तू…

पुनीत बिसारिया का आलेख - इक्‍कीसवीं सदी में प्रेमचंद की ज़रूरत

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प्रेमचंद की पचहत्‍तरवीं पुण्‍यतिथि (8 अक्तूबर 1936) पर विशेष आलेख
इक्‍कीसवीं सदी में प्रेमचंद की ज़रूरत

प्रेमचंद को पढ़ना उन चुनौतियों को प्रत्‍यक्ष अनुभूत करना है, जिन्‍हें भारतीय समाज बीते काफी समय से झेलता आया है और आज भी उन चूनौतियों का हल नहीं ढूँढ पाया है। दलित, स्‍त्री, मजदूर, किसान, ऋणग्रस्‍तता, रिश्‍वतखोरी, विधवाएँ, बेमेल विवाह, धार्मिक पाखण्‍ड, मानव मूल्‍यों की दरकन, जेनरेशन गैप, ग्रामीण जीवन की सहजता के मुकाबले नगरीय जीवन की स्‍वार्थ लोलुपता आदि ऐसे ही यक्षप्रश्‍न हैं। आज प्रेमचंद को गए पूरे पचहत्‍तर वर्ष बीत गए हैं, लेकिन उनके द्वारा साहित्‍य में वर्णित चुनौतियाँ इक्‍कीसवीं सदी में अपना चोला बदलकर और अधिक गम्‍भीर चुनौतियों के साथ हमसे रूबरू हैं। उदाहरण के लिए - गोदान के गोबर और पण्‍डित मातादीन आज भी आपको गाँवों में घूमते मिल जाएंगे। यदि हम उनकी अमर कहानी कफन को ध्‍यानपूर्वक देखें तो पाए्रगे कि यह कथा मात्र घीसू-माधव की काहिलता को ही बयान नहीं करती, अपितु इसमें स्‍त्री शोषण, पेट की आग शान्‍त करने के लिए आदमी का रिश्‍तों को तार-तार कर देना तथा गरीब का दुख में भी सुख की खोज…

अमर शहीद लाला लाजपतराय की याद में त्रिभाषी कवि सम्‍मेलन

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चण्‍डीगढ़ ः भारतीय साहित्‍य परिषद (रजि0), मोहाली द्वारा तथा साहित्‍यिक संस्‍था मंथन', चण्‍डीगढ़ के सहयोग से सर्वेंट पीपल्‍स सोसाइटी', सैक्‍टर 15, चण्‍डीगढ़ के तत्‍वाधान में अमर शहीद लाला लाजपत राय जी की याद में आज 20/11/11को एक त्रिभाषी कवि सम्‍मेलन का आयोजन लाला लाजपत राय भवन, सैक्‍टर 15, चण्‍डीगढ़ में किया गया, जिसमें मुख्‍यातिथि के रूप में सुप्रसिद्ध उर्दू शायर जनाब शम्‍स तबरेज़ी विराजमान रहे और कार्यक्रम की अध्‍यक्षता वरिष्‍ठ साहित्‍यकार जय गोपाल अश्‍क' ने की। मंच संचालन श्रीमती अर्चना देवी ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत में महान्‌ शहीद लाला लाजपत जी को पुष्‍प भेंट कर श्रदांजलि अर्पित की गई। तत्‍पश्‍चात जयगोपाल अश्‍क'अमृतसरी ने महान शहीद लाला लाजपत राय के जीवन व उनकी शहादत पर प्रकाश डालते हुए कहा ‘‘लाला जी ने साइर्मन कमीशन' के विरोध में आंदोलन खड़ा कर आज़ादी की जंग में एक अहम्‌ भूमिका अदा व उनकी शहादत की बदौलत ही हम आज आज़ादी में साँस ले रहे हैं।'' शहीदों के प्रति समर्पित नज़्‍म में उन्‍होंने कहा, ‘लाजपत आए लाज पत खातिर, जान हिन्‍द तों कर कुर्बान गए

अनुराग तिवारी की सात बाल कविताएँ

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इन्‍द्र धनुष (बच्‍चों की 7कविताएँ)प्रार्थनाजो है एक और नाम हज़ार, जिसकी महिमा अपरम्‍पार, जिसको कहते हैं ईश्‍वर, जिसको कहते हैं करतार। जिसने बनाये ये सागर, जिसने बनाये ये पर्वत शिखर, जिसने बनायी ये धरती, जिसने बनाया ये अम्‍बर। सृष्‍टि कर्ता जो है जग का, जो है पालन कर्ता, करता है जो जग का संहार, उस ईश्‍वर को नमस्‍कार। फूलबगिया को महकाते फूल, रंग बिरंगे प्‍यारे फूल। तनिक हवा का मिले इशारा, इधर उधर लहराते फूल। कॉँटों में भी रह मुसकाना, हमको हैं सिखलाते फूल। सबके मन को रिझा रिझा कर, हमको हैं सिखलाते फूल। सबके प्‍यारे तुम बन जाना मुख से मीठी बोली बोल। तितलीना जाने किस देश से आती, ना जाने किस देश को जाती। रंग बिरंगी प्‍यारी तितली, तू है सबके मन को भाती। इक छोटी सी परी तू लगती, करती रहती है मनमानी। तुझे बुलाते देख कर बच्‍चे, आ जा, आ जा तितली रानी। हरकारे' पंछीदूर देश से आते पंछी, सबका मन बहलाते पंछी। अपनी मीठी आवाज़ों में, ना जाने क्‍या गाते पंछी। देश देश का हाल बताते, दिन भर इधर उधर मँंडराते, आसमान में उड़ने वाले, लगते हैं ‘हरकारे' पंछी। प्रातः कालकितने सुन्‍दर फूल खिले हैं, देखो …

गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' के दो व्यंग्य

किस्सा दुग्ध चोर उर्फ कल्कि अवतार कासुबह-सुबह ‘गिरगिट’ मेरे पास दौड़ा-दौड़ा आया और बोला, अमायार! अब तो हद ही हो गई। लोग दूध चुराने लगे। अगर इस पर जल्द रोक नहीं लगी तो कल को कोई मेरी बकरी भी दुह ले जा सकता है। द्वापर में भगवान कृष्ण माखन चुराया करते थे। हमारे समाजवादी मित्र कहते हैं कि वे समाज में बराबरी लाने के उद्देश्य से ऐसा करते थे। हो न हो कलियुग में भी कृष्णावतार का यह नया रूप हो, जिसमें वे दूध चोर की भूमिका निभा रहे हैं। सुना है कि मुंबई की झोपड़पट्टियों के तमाम बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। लगता है उन्हीं के पोषण के लिए यह कलियुगी कृष्णावतार है। अगर महँगाई की सुरसा इसी तरह मुँह बाए रही तो मनमोहन को लौकी, गोभी, आलू, हरी मिर्च और धनिया को भी चुरा-चुराकर गरीबों में बाँटना पड़ेगा। आगे चलकर आलू-टमाटर कोल्ड स्टोरों में नहीं बैंक के लॉकरों में रखे जाएँगे। लोग सोने के बजाय आलू, प्याज, टमाटर और लहसुन में निवेश करेंगे। शेयर मार्केट सोने-चाँदी या तेल से नहीं आलू-प्याज, टमाटर और गोभी से निर्देशित होंगे। सीएनबीसी या ऐसे ही अन्य व्यावसायिक चैनलों पर विशेषज्ञ लहसुन शेयर, टमाटर शेयर या आलू शेयर ख…

रामदीन की हास्य-व्यंग्य कविता - कमीना कुत्ता

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‘‘अर्ध-सत्‍य''कहा कमीना कुत्‍ता'पिछले दिवस निकट दिल्‍ली के मजमा थे अलबेला। अलबेली मोटर कारों का हुआ था रेलमपेला। हाहाकार मचा एकदम से छिन गई जैसे सत्‍ता। खाली सड़क देखकर उस दिन घुसा वहाँ पर कुत्‍ता। गरियाकर कुछ मतवालों ने कहा कमीना कुत्‍ता। त्रेता युग में भरत मित्र थे, तभी तो उनको राज मिला। राम को नफरत थी कुत्‍तों से, बरसों का बनवास मिला। द्वापर युग में धर्मराज को पड़ी मुसीबत रस्‍ते में। ज्ञानी, गुरू, बंधुवर, प्रियजन, सभी निपट गये सस्‍ते में। तभी पुराना साथी आया बनकर तारक रास्‍ता में। विद फैमली ले गया स्‍वर्ग को, शक्‍ति अजब थी कुत्‍ता में। सतयुग में एक बार इन्‍द्र की गायें हो गयी चोरी, पता नहीं जब चला चोर का, इन्‍द्र करें बरजोरी। फेल हुई थी सी0बी0आई0 मची खलबली चारों ओर। ' सरमा नाम की एक कुतिया ने गायें उनकी ला दीं ठौर। इन्‍द्र कृतज्ञ हुए उस पशु के, दे दी आधी सत्‍ता। लेकिन अब हम हैं पगलाये, कहें कमीना कुत्‍ता। कलयुग का इंसान खुदा से खुद को बड़ा समझता है। पर, खुद की जगह '' लाइका को राकेट में प्रथम भेजता है। कौन साथ राज इन्‍हें दे डाला, क्‍या सौंपी इनको सत्‍ता। स…

रघुनंदन प्रसाद दीक्षित प्रखर की रिपोर्ट, समीक्षा व कविताएँ

साहित्‍यिक रिपोर्टसरिता लोक सेवा संस्‍थान का दशम्‌ सारस्‍वत सम्‍मान समारोह एवं राष्‍ट्रीय कवि सम्‍मेलन सम्‍पन्‍न । अवध क्षेत्रांर्तगत जनपद सुल्‍तानपुर(उ.प्र.)की साहित्‍यिक,सामाजिक संस्‍था सरिता लोक सेवा संस्‍थान ,सहिनवाँ का दशम्‌ सारस्‍वत सम्‍मान समारोह एवं राष्‍ट्रीय कवि सम्‍मेलन संस्‍थान के अध्‍यक्ष डॉ. कृष्‍ण मणि चतुर्वेदी मैत्रेय के संयोजकत्‍व में आयोजित किया गया। मुख्‍य अतिथि डॉ. मोहन तिवारी(भोपाल),विशिष्‍ट अतिथि डॉ.देवेन्‍द्र साह (बिहार) एवं प्रमुख समाजसुवी रामार्य पाठक (दिल्‍ली)के द्वारा मां शारदे के चित्र समक्ष दीप प्रज्‍वलन तथा माल्‍यार्पण किया गया ,तत्‌पश्‍चात स्‍व. रामकृपाल पाण्‍डेय ,पं. बृज बहादुर पाण्‍डेय और श्री बाबूराम शर्मा जी के चित्रों पर माल्‍यार्पण उनकी संतति के साथ ही कार्यक्रम का आगाज हुआ। सारस्‍वत सम्‍मान के क्रम में सर्वोच्‍च सम्‍मान कीर्ति भारती (रु.21.. सहित)डॉ. देवेन्‍द्र साह(भागलपुर बिहार),पं. बृज बहादुर पाण्‍डेय सम्‍मान(रु.11..सहित),डॉ. सन्‍त शरण त्रिपाठी सन्‍त (गोण्‍डा)को ,ज्ञान चन्‍द्र मर्मज्ञ सम्‍मान(रु.11..सहित)डॉ. मोहन तिवारी आनंद (भोपाल)को, दर्द(झा…

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - 10 वीं कड़ी - आओ कहें... दिल की बात : मेरी बेटी

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पिछली कड़ियाँ  - एक , दो , तीनचार, पांच, छः , सात, आठ, नौआओ कहें...दिल की बातकैस जौनपुरी
मेरी बेटी मेरी बेटी, मैं तुझसे क्या कहूँ...? किस तरह तुझे समझाऊं...? तू तो मेरी कोई भी बात मानने को तैयार ही नहीं होती है. मेरी हर बात का तो जवाब होता है तेरे पास. तू अभी छोटी है मेरी बच्ची. तुझे कैसे बताऊँ कि मैं क्यों तेरे लिए इतनी चिन्ता करती हूँ. तुझे कैसे बताऊँ कि अब तू बड़ी हो रही है. मुझे डर लगता है. तू जिस तरह लड़कों से बिन्दास बात करती है किसी दिन कुछ हो गया तो मैं तो मर ही जाऊँगी रे...! तुझे पता है तू जब नहीं थी तब हम बच्चे के लिए कितना तरसते थे. ऊपरवाले से बहुत मनाया तब जाके तू पैदा हुई थी. बड़े अरमानों से तुझे पाला है. ये बात अलग है कि तेरे बाद तेरा एक भाई भी हुआ लेकिन हमारे लिए तो तू ही हमारा पहला बच्चा है. हमने तुझे कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी. फिर भी न जाने क्या कमी रह गई मेरी परवरिश में कि तू मुझसे ही इतनी चिढ़ी रहती है. क्या करूँ रे...? मैं माँ हूँ ना...! एक औरत हूँ इसलिए डरती हूँ. तेरे लिए फ़िक्र करती हूँ ताकि तेरी जिन्दगी में कोई ऊँच-नीच न हो जाए. इसीलिए तेरे साथ तुझे ट्यू…

पंकज शुक्ल की तीन ग़ज़लें - मैं बच्चा बन के फिर से रोना चाहता हूँ...

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1. मैं बच्चा बनके फिर से रोना चाहता हूं... के अपनी बदगुमानियों से उकता गया हूं, मैं बच्चा बनके फिर से रोना चाहता हूं।
न हमराह न हमराज़ इन गलियों में लेकिन,
मैं इस शहर में अपना एक कोना चाहता हूं।
सुकूं आराम की मोहलत के कैसी ये क़ज़ा* है,
मैं अपनी मां के आंचल सा बिछौना चाहता हूं।
के यूं ख्वाहिश जगी दाग़ औ कीचड़ के फाहों की,
मैं बच्चा बनके राह गलियारों में सोना चाहता हूं।
सिसकना सब्र से ईमां का अब होता नहीं रक़ीब*,
ना बन दस्त ए गिरह रफ़ीक*, मैं खोना चाहता हूं।
मुसल्लम ए ईमां हूं क़ाफिर की सज़ा पाई है,
अब बोसा* ए संग ए असवद* भी धोना चाहता हूं.. (पंशु.)
क़ज़ा- मौत। रक़ीब - दुश्मन। रफ़ीक - दोस्त।
बोसा - चुंबन। संग ए असवद - मक्का का पवित्र पत्थर।2. तेरी लाडो मुन्नी मेरी..
दर ओ दीवार कभी बनते हैं घरों से सजते हैं,
रहा करे सुपुर्द ए खाक़ मेरी बसुली*, कन्नी मेरी।
दरिया ए दौलत में उसे सूकूं के पानी की तलाश,
तर बतर करती बूंद ए ओस सी चवन्नी मेरी।
तू सही है गलत मैं भी नहीं ना कोई झगड़ा है,
वो आसमां उक़ूबत* का ये घर की धन्नी मेरी।
मेरी गुलाटियों औ मसखरी को मजबूरी न समझ,
उछाल रुपये सा न मार ग़म की अठन्नी मेरी।
रगों …

रविकान्त का आलेख - हिन्दी फ़िल्म अध्ययन: माधुरी का राष्ट्रीय राजमार्ग

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रविकान्त, एसोसिएट फ़ेलो, सीएसडीएसबहुतेरे लोगों को याद होगा कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह की फ़िल्म पत्रिका माधुरी हिन्दी में निकलने वाली अपने क़िस्म की अनूठी लोकप्रिय पत्रिका थी, जिसने इतना लंबा और स्वस्थ जीवन जिया। पिछली सदी के सातवें दशक के मध्य में अरविंद कुमार के संपादन में सुचित्रा नाम से बंबई से शुरू हुई इस पत्रिका के कई नामकरण हुए, वक़्त के साथ संपादक भी बदले, तेवर-कलेवर, रूप-रंग, साज-सज्जा, मियाद व सामग्री बदली तो लेखक-पाठक भी बदले, और जब नवें दशक में इसका छपना बंद हुआ तो एक पूरा युग बदल चुका था।[1] इसका मुकम्मल सफ़रनामा लिखने के लिए तो एक भरी-पूरी किताब की दरकार होगी, लिहाजा इस लेख में मैं सिर्फ़ अरविंद कुमार जी के संपादन में निकली माधुरी तक महदूद रहकर चंद मोटी-मोटी बातें ही कह पाऊँगा। यूँ भी उसके अपने इतिहास में यही दौर सबसे रचनात्मक और संपन्न साबित होता है। माधुरी से तीसेक साल पहले से ही हिन्दी में कई फ़िल्मी पत्रिकाएँ निकल कर बंद हो चुकी थीं, कुछ की आधी-अधूरी फ़ाइलें अब भी पुस्तकालयों में मिल जाती हैं, जैसे, रंगभूमि, चित्रपट, मनोरंजन आदि। ये जानना भी दिलचस्प है कि हिन्दी की स…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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