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December 2011
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हूस्टन के भारतीय प्रवासियों में भारतीयता की झलक

हूस्टन टेक्सास राज्य का सबसे बड़ा शहर है. अमेरिका के सबसे बड़े शहरों में न्यू़यॉर्क, शिकागो, लॉस एन्जेलेस के बाद हूस्टन का नाम लिया जाता है. सन २०१० की जन गणना के अनुसार जन संख्या के मान से हूस्टन छठे स्थान पर आता है. यहाँ स्पष्ट करना उचित है की अमेरिका के मूल निवासी इंडियन कहलाते हैं. अतः उन्हें इंडियन अमेरिकेन और एशिया महाद्वीप के प्रवासियों को एशियन अमेरिकेन कहा जाता है. कुल हूस्टन की जन संख्या ५९४६८०० (उन्सठ लाख छयालिस हज़ार आठ सो) में अमेरिकेन इंडियन और एशियन अमेरिकेन क्रमशः ९१६३७ और ३८९००७ है. और एशियन अमेरिकेन की जन संख्या बारह शहरों में विशेष उल्लेखनीय है. और टेक्सस में उनकी जन संख्या २४५९८१ है. संपूर्ण अमेरिकेन की जन संख्या मैं केवल भारतियों की जन संख्या २८४३३९१ है. अर्थात .९०% है. हूस्टन में भारतीय अमेरिकेन इंग्लिश, हिंदी, मलयालम, गुजराती आदि भाषाएँ बोलते हैं.

हमें हूस्टन के केटी शेत्र में प्रवास का अवसर मिला. जिस क्षेत्र को अनेक कारणों से महत्वपूर्ण माना जाता है. यथा गुणात्मक शिक्षा उच्च रहन सहन , खेल कूद की विशेष सुविधाएँ, स्वस्थ सेवाओं की गुणवत्ता, धार्मिक संस्थाओं की बहुलता आदि. हमें वहां अपनी बेटी जिज्ञासा आनंद के निवास पर लगभग डेढ़ माह अगस्त ५ से सितम्बर २४ तक का प्रवास का अवसर मिला. इस बीच भारतीय प्रवासियों से इतना सम्मान और आत्मीयता का वातावरण मिला की हमें भारत या भोपाल से दूर रहने का अभाव खटका ही नहीं. और सुखद संतोष हुआ. जिसका अंत में दोहों में विस्तृत वर्णन किया गया है.
जैसे ही हम लोगों की हवाई यात्रा की थकान दूर हुई, की हम लोग दूसरे दिन ७ अगस्त को उस ओर चल पड़े जहाँ विएतनामी बुद्धिष्ट सेण्टर और अष्टलक्ष्मी मंदिर, स्वामीनारायण मठ के अनुयायियों का विशेष पूजा स्थल है. यहाँ अनेक भारतीय दर्शनार्थ आये थे. उनसे मिलकर लगा की भारत में ही हैं. साथ ही अपने वंशज महात्मा बुद्ध के दर्शन कर अति कृतार्थ हुआ. उसके आसपास मंदिर, गुरुद्वारा मस्जिद आदि भी स्थित है.

अभी उक्त मंदिरों और देश वासियों से मिलने का सुख ताजा ही था, कि भूतपूर्व ग्रेटर कैलाश दिल्ली निवासी श्री चोपड़ाजी के यहाँ हम लोगों को जाने का सुखद संदेसा आया. हम सब लोगों के पहुंचने पर हम सबको भव्य स्वागत और स्वादिष्ट जलपान ने सराबोर कर दिया. वे भारत के उच्चायुक्त के साथ सेवारत रहने के बाद सेवा निवृत हो पहले न्यूयॉर्क फिर वहां से हूस्टन आ बसे. उनके दो बेटे एक बेटी अब वहीँ सेवारत हैं. पर उन्हें अब अकेलापन अपने घर देश भाई बंधुओं की यादों में धकेलता है. परन्तु बच्चे सब यहाँ है, सारा जीवन यहाँ बीता इसलिए यहाँ खुश भी हैं और दुःख में भी डूबे रहते हैं. पर गुनगुनाते हैं. मधुमय प्यारा, देश हमारा..

अभी हम लोग हूस्टन के म्यूजियम डिस्ट्रिक्ट में स्थित म्यूजियम ऑफ़ फैन आर्ट्स, होलोकाउस्त म्यूजियम, म्यूजियम ऑफ़ हेल्थ, चिल्ड्रेन्स म्यूजियम और म्यूजियम ऑफ़ नेचरल साइंस आदि दर्शनीय स्थानों में घूमने और दर्शन का सुख लूट रहे थे. जिन्हें श्रम द्वारा हूस्टन को महान व अमर बनाने का सन्देश हमें विमोहित कर रहा था. इसी बीच एक के बाद एक भारतीय परिवारों के स्नेहिल आमंत्रण आये.

सबसे पहले हम लोग श्रीमती राखी और श्री नवनीत माथुर के घर गए. पूरे परिवार पति पत्नी और बेटे ने स्नेहाभिवादन के साथ साथ चरण स्पर्श किये. हम लोगों ने आपस में बातचीत और परिवारों आदि की जानकारी ली. श्रीमती राखी ने रीजनल कालिज, श्यामला हिल्स, भोपाल से बी.एड किया तथा वहां इंजीनियरिंग कॉलेज में नौकरी भी की, उनके ताऊ का परिवार हर्षवर्धन नगर में रह रहा है. हम लोगों ने लगभग चार घंटे उनके साथ बिताये. भारतीय खान पान व्यवहार से लगा कि हम लोग अपने घर भोपाल में ही हैं. उसके बाद श्री सुहास श्रीमती स्मिता, श्री मोहित, श्रीमती श्वेता सिंह, श्री विवेक, श्रीमती सोनिया एवं डॉक्टर रणदीप सुनेजा अवं श्रीमती सीमा के परिवार में उनके आमंत्रण पर उनसे मिलने, बातचीत करने, खाना खाने का सुख मिला. यहाँ यह उल्लेखनीय है की सभी परिवारों में हम लोगों का भारतीय ढंग से जैसा की ऊपर जिक्र किया, स्वागत और बिदाई हुई. सब परिवारों में ठाट बाट तो अमेरिकेन थे मगर फिर भी वातावरण भारतीय था. किसी के यहाँ गणेशजी का मंदिर, किसी के यहाँ अपने माता पिता के फोटो, अपने अपने घरों की यादें संजोये थे. डॉक्टर सुनेजा के यहाँ तो बंगले के एक हिस्से में मंदिर था. जिसमें राम-सीता हनुमान आदि आराद्धय देवों की स्थापना थी. सभी हिंदी में बातचीत करते हैं और अपने देश गाँव की याद करते हैं. और कुछ तो अभी भी दस पंद्रह बरसों बाद भी अपने अपने घर जाने की सोच रहें हैं. हमें हूस्टन में वहां के मंदिरों में गणेश उत्सव, जन्माष्टमी उत्सव पर गरबा एवं सांस्कृतिक कार्यों में भाग लेने का सौभाग्य मिला.

इसी बीच सितम्बर १०, २०११ को इंडिया हाउस में हूस्टन के सीनियर सिटिज़न एसोसिऐशन के वार्षिक कार्यक्रम में भी सम्मिलित होने का अवसर मिला. जहाँ पूरे भारत से आये लोगों के दर्शन हुए. और मुझे कविता सुनाने का भी अवसर मिला, जिसकी विस्तृत रिपोर्ट अन्यत्र सुरक्षित है. इसी बीच हम लोगों ने अपने दो धेवतों प्रिय सिद्धांत एवं प्रिय शौर्य का जन्मदिवस सितम्बर १७, २०११ को, हूस्टन से ८० मील दूर इनक्रेडिबल पिज्जा कोनरो में धूम धाम से मनाया. जिसमें उक्त सभी परिवार शामिल हुए. हमें उन्हें धन्यवाद देने का अवसर मिला जिन्होंने अपनी गौरवमयी उपस्थिति से उत्सव की शोभा बढ़ाई.

संक्षेप में, भारत के प्रवासियों ने अपने श्रम लगन से अमेरिका में अपना तथा अपने देश का नाम ऊंचा किया और अभी भी उनमें देश प्रेम परिवार वाद, भारतीय संकृति धर्म कर्म के प्रति आदर सम्मान एवं श्रध्दा है. भारत से जाने वाले मेहमानों का आत्मीय भाव से स्वागत सत्कार करते हैं. भारत में व्याप्त कुरीतियों एवं संकीर्णताओं से दूर रहते हैं.

इंडिया हाउस हूस्टन में पठित दोहों का आनंद लीजिये.

हूस्टन ने सचमुच दिया , तन मन को आनंद/ कागज़ कलम कह रहे, लिखो अनूठे छंद,
सबके चेहरों पर लिखा, भारत का संवाद/ पढने वाले पद सकें, खरा खरा अनुवाद.

यहाँ वहां की शान को, भारत के सब लोग / खून पसीना बहाकर, करते हैं सहयोग.
सबको पढना आ गया, नदी नव संयोग/ जब जैसा वैसा वहां, योग-भोग संयोग.

जहाँ जरूरत हो वहां, करते हैं अनुदान/ दुनिया भर में बढ रहा, भारत का सम्मान.
मत पूछो कैसा लगा, आ हूस्टन की छाव / जीवन भर भोलूँ नहीं, ऐसा अद्भुत ठांव.

दिया आप सबने मुझे, इतना सारा प्यार/ जीवन के इतिहास में, अजर अमर उपहार
भारत में जाकर कहूं, हूस्टन है वह गाँव/ लहर लहर लहरा रहा, जहाँ तिरंगा नांव .

अमरिका की घोषणा, भारत योग महान/ माह सितम्बर गा रहा, जाने सकल जहान .
श्रध्दा सुमन बिखेर दो, उन वीरों के नाम/ प्राण निछावर कर गए, शत शत उन्हें प्रणाम ||

प्रो. डॉ. जयजयराम आनंद

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Location: सम्पर्क: आनंद प्रकाशन ,प्रेम निकेतन E-7/70 अशोका सोसायटी, अरेरा कालोनी ,भोपाल (म.प्र) 462016 मध्य प्रदेश : India

(उप शिक्षा संचालक/प्रोफेसर-सेवा निवृत). जन्म तिथि: 1 अप्रेल 1934 जन्म स्थान :ग्राम-नगला सेवा (लायकपुर),पो. परोंखा जिला मैनपुरी (यू.पी.).शिक्षा: एम.ए., एम.एड.विशारद, साहित्यरत्न,पी.एचडी.। सम्पृति:लेखन-कविता /दोहा /लेख /कहानी/ समीक्षा /यात्रावृत/आदि. प्रकाशित कृतियाँ:दोहसंग्रह:1.बूँद बूँद आनंद,2अमरीका में आनंद,3.हास्य योग आनंद;4. नई कविता :5.घर घर में वसंत,6घर के अंदर घर ,7.बोला काग मुंडेर पर ,गीत:8.माटी धरे महावर चंदन,9.बालगीत:चाँद सितारों में आनंद नवगीत बालगीत की पांडुलिपियाँ तैयार शीघ्र प्रकाशन की ओर गद्य शिक्षा: बुनियादी शिक्षा मेँ समवायी पद्धती, विश्व के महान शिक्षा शास्त्री, शिक्षा, सामाजिक एवम आर्थिकसंर्चना और भारत की सस्कृति के तत्व आदिकाल से 1958 तक, बाल समस्याएँ आदि। अनुवादित :प्राथमिक शालाओ में प्रयोग एवम् प्र्योजनाएँ ,प्राथमिक शिक्षामें क्रीडात्मक क्रियाकलाप ,गोवा बासियों का अमान्वीकरण ,शिक्षक के विशेष गुण ,कक्षामें उत्तरदायित्व एवम बिना उत्तरदायित्व केसमाज्मितीय स्तर । सम्मान :रा.शै .अ .प्र। परिषद न्यू डेल्ही से राष्ट्रीय पुरस्कार 1971, 1975, न अ इ प नई दिल्ही से पुरस्कार 1984.एवम अनेक साहित्यक एवम सामाजिक स्न्स्थायों से सम्मानित। वर्तमान में: स्वतंत्र लेखन कविता समीक्षा कहानी एवम अनेक साहित्यक गतिविधियों में भागीदारी।

प्रण करें नव नूतन वर्ष के

आँगन का हर साज नया हो

ना रहे अब धूप दु:खों की

खुशियों का आगाज नया हो

प्रण करे नव नूतन वर्ष के

आँगन का हर साज नया हो |

 

छोड़े बैर का भान पुराना

प्यार का एक नाम नया हो

नहीं पुराना राग अलापे

अब सुरों का संसार नया हो

प्रण करे नव नूतन वर्ष के

आँगन का हर साज नया हो |

 

छोड़े कुटिल चाल चलाना

अब रिश्तों का संवाद नया हो

भूल गए थे जो मर्यादा

अब उसका सम्मान नया हो

प्रण करे नव नूतन वर्ष के

आँगन का हर साज नया हो |

 

सूख गया जो, सपनों का सागर

उसमें अब बरसातों का, दौर नया हो

रो रही जो बंजर भूमि

हरयाली से उसका अब श्रृंगार नया हो

प्रण करे नव नूतन वर्ष के

आँगन का हर साज नया हो |

 

छोड़े भूलों के बाण चलाना

अब यादों का ताज नया हो

नहीं रहे कोई हीन् भावना

इस प्रण में अब प्राण नया हो

प्रण करे नव नूतन वर्ष के

आँगन का हर साज नया हो |

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नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें

शंकर लाल

इंदौर-मध्यप्रदेश

Email: Shankar_kumawat@rediffmail.com

नये साल की नयी सुबह

नये साल की नयी सुबह

उत्‍साह नया ले आयी है,

मन में भरी उमंगें हैं,

दिल ने ली अँगड़ाई है।

 

बीता वर्ष दे गया हमको

यादें कुछ खट्‌टी मीठी,

ले गया साथ कुछ हँसते पल

चुभती है स्‍मृति फीकी।

 

गुज़र गया जो वक्‍त लौट फिर-

कहाँ कभी आता वह ?

साथ चला हो जो भी इसके

मंज़िल बस पासा वह।

 

हँसते गाते आओ हम सब

मिल कर कदम बढायें,

न्‍याय शांति औ ' समता का

जग में नित दीप जलायें।

 

रवि की नूतन किरणों ने

उर में नव आस जगायी है।

नये साल की नयी सुबह

उत्‍साह नया ले आयी है।

--

-सी ए. अनुराग तिवारी

5-बी, कस्‍तूरबा नगर,

सिगरा, वाराणसी- 221010

नववर्ष की सार्थकता

नया वर्ष

ले नूतन हर्ष

प्रतिवर्ष आता

जगाता नयी उमंगें

हर्षोंल्‍लास की तरंगें,

बीते क्षणों की स्‍मृति

करवाने को-

त्रुटियों का पश्‍चाताप।

 

शायद-

यह सब सत्‍यनिष्‍ठा से होता

मात्र हैप्‍पी न्‍यू ईयर कहने

ग्रीटिंग भेज देने

कलैण्‍डर बदल देने तक

न सिमटता,

शेष वैसा ही वर्ष भर

हत्‍या, अपहरण, बलात्‍कार का ताण्‍डव

मनुज पर दानवी वृत्तियों का प्रभाव

प्रकृति की त्रासदियां;

 

यदि हम परिवर्तन कर

स्‍व मन मस्‍तिष्‍क को

दानवीवृत्तियों को नष्‍टकर

प्रकृति मानव में सामंजस्‍य स्‍थापित कर

हृदय में स्‍नेह, मधुरता भर

कैलेण्‍डर बदलने के साथ ही स्वयं को

सृजन हेतु लगा सके,

तभी है सार्थकता

इस नव वर्ष की।

--

सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-2424010प्र0 9410985048

ईमेल:-shashank.misra73@rediffmail.com


मदिर मस्ज़िद गुरुद्वारों में क्यों अरदास न करते
कुमकुम पुष्प अगरबत्ती से
क्यों न स्वागत करते
नये वर्ष की नव चौखट पर
क्यों न दीपक धरते?

नया साल आनेवाला है
खुशी खुशी चिल्लाते
हँसते हँसते शाम ढले
मदिरालय में घुस जाते

विहस्की और बियर रम में ही
नया वर्ष दिखता है
कौड़ी दो कौड़ी में कैसे
प्रजा तंत्र बिकता है

मंदिर मस्ज़िद गुरुद्वारों में
क्यों अरदास न करते
नये वर्ष की नव चौखट पर
क्यों न दीपक धरते?

चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा
नया वर्ष अपना है
किंतु अपना नया वर्ष तो
जैसे एक सपना है

नई हवा की चकाचौंध में
हम अपने को भूले
हमको तो अच्छे लगते अब
पश्चिम के घर घूले

क्यों न घंटे शंख बजा
भारत मां की जय कहते
नये वर्ष की नव चौखट पर
क्यों न दीपक धरते?
--

 

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ग़ज़ल

दें परस्‍पर इस तरह नव वर्ष की शुभकामनाएँ ।

कल्‍पतरुरों कतारें मन मरुस्‍थल में लगाएं॥

 

नग्‍न नर्तन हो रहा भय भूख भ्रष्‍टाचार का,

जूझने का इनसे हम,संकल्‍प सामूहिक दोहराएं।

 

हैं चतुर्दिक आज हिंसा दहशतों का बोलबाला,

हैं इन्‍हें जड़ से मिटाना,ये सभी सौगंध खाएं।

 

नित्‍य नूतन नव सृजनरत सूर्य की पहली किरण,

कहती हैं बीते हुए अध्‍याय सारे भूल जाएं ।

 

महजबी,सूबाई नफरत द्वेष को जड़ से मिटाकर।

है तक़ाजा वक्‍त का कि सोच में बदलाव लाएं।

 

एक अदना आदमी जो लड़ रहा है सबके लिए,

उसकी हां में हां मिला कर हौसला उसका बढ़ाएं।

उस दिन एक नये मिल मिलने आये। 'नये' इसलिए कहता हूं कि मेरी वय इतनी हो गयी है कि पुराने मित्र दिनोंदिन कम! होते जा रहे हैं। जो थोड़े-बहुत रह भी गये हैं, वे या तो अशक्त हैं या अन्य प्रकार से आने में असमर्थ हैं-जैसे जो लोग तीन मील पैदल चलकर आ नहीं सकते, उनसे एक ओर का किराया रिक्शावाला तीन रुपया मांगता है। अतएव अब अधिकतर नये मिल ही यदा-कदा आ जाने की कृपा करते हैं।

पुराने मित्र मेरी तरह ही दकियानूसी हैं। वे पत्नी को लेकर 'काल करने नहीं आते। नये युग में 'बेहतर अंग' के बिना व्यक्तित्व अधूरा रह जाता है। मेरे अधिकांश नये मित्र भी, जो मेरी 'सनकों' और दकियानूसीपन को जान गये हैं, वे प्राय: अकेले ही आ जाते हैं, किंतु जिन व्यक्तियों से नया परिचय या मिलता हो जाती है, वे आधु- निक रीति से 'पूर्णांग' होकर आते हैं, विशेषकर यदि पत्नी आधुनिक, सोसायटीप्रिय और साहित्यिक अभिरुचि की हुई।

जैसाकि मैंने कहा, एक नये मित्र मिलने आये। वे पूर्णांग' थे। उनकी सहचरी विदुषी, शिष्ट, आधुनिक अभिजात परिधान से वेष्टित और दर्शनीय थीं। वाणी मधुर और सुसंस्कृत थी। नमस्कार करके मेरे मिल ने कहा, ' 'ये मेरी धर्मपत्नी हैं। इनका नाम...है। सोशियालाजी में एम० ए० हैं। इनके पिता अमुक विभाग में डिप्टी डायरेक्टर और भाई एलाइड सर्विसेज में आ गये हैं। इन्हें हिंदी 'साहित्य में विशेष रुचि है। हिंदी में कविता भी करती हैं।' फिर श्रीमती जी से कहा, ' 'पंडित जी को प्रणाम' करो।'' वे मेरे चरण स्पर्श करने को झुकीं। मैंने मना करते हुए कहा, ''बेटी, मैं पुराने ढंग का आदमी हूं। हम' लोग तो बेटियों के पैर पूजते हैं, उनसे चरण स्पर्श नहीं कराते। भगवान तुम्हारा मंगल करें।''

मेरे नये मित्र की भी हिंदी और साहित्य में रुचि है। आधुनिक हिंदी उपन्यासकारों की तरह मैं 'मनोविज्ञानी' नहीं हूं, इसलिए कह नहीं सकता कि उस समय क्यों पंडित श्री विनोद शर्मा (पं ० श्रीनारायण चतुर्वेदी अपने हास्य-व्यंग्य लेख श्री विनोद शर्मा नाम! से लिखते हैं-सं ० ) मेरे मस्तिष्क पर हावी हो गये। मैंने उनसे बड़े सहज भाव, किंतु बनावटी गांभीर्य से एक बेहूदा बात कह दी, ' 'अच्छा! ये आप की धर्मपत्नी हैं। इनसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई। किंतु आपने अपनी पत्नी के दर्शन कभी नहीं कराये।''

वे मेरी बात सुनकर आश्चर्यचकित रह गये। एकाएक उनकी समझ में नहीं आया कि मैं क्या कह गया। कुछ लोग तो साठ वर्ष के होने पर ही बुढभस के शिकार हो जाते हैं। मैं तो नवां दशक पूरा करने के निकट हूं। उन्होंने समझा कि यह प्रश्न मेरे आसन्न बुढभस का लक्षण है। किन्तु वे इतने शिष्ट हैं कि यह बात कह नहीं सकते थे। कुछ देर चुप रहकर बोले, ' 'धर्मपत्नी से मेरा तात्पर्य 'वाइफ' से ही है।''

मैंने कहा, ' 'भाई, हिंदी में लोग कहते हैं-ये मेरे. धर्मपिता हैं, अर्थात् पिता नहीं हैं, किन्तु मैंने इन्हें धर्मवश पिता मान लिया है। मैंने सुना था कि :

जनिता चोपनीता च यस्तु विद्या प्रयच्छति।

अन्नदाता भयत्राता पंचैते पितर: स्मृता।।

पैदा करनेवाला तो पिता है, शेष 'पितर: स्मृता:' अर्थात् पितातुल्य मान लिये गये हैं। इसी तरह से कुछ लोग किसी शिष्य या बालक को पालते-पोसते हैं, या उससे अत्यंत स्नेह करते हैं। उसे वे अपना 'धर्मपुत्र' कहते हैं। आप अपने पिता को केवल 'पिता' कहते है, 'धर्म- पिता' तो नहीं कहते और न अपने पुत्र को 'धर्मपुत्र' कहेंगे। 'धर्मपिता' या 'धर्मपुत्र' कहने से यह अर्थ निकलता है कि वास्तव में वे मेरे पिता या पुत्र नहीं हैं, मैंने धर्म से इन्हें पिता या पुत्र मान लिया है। वास्तविक पिता या पुत्र के आगे 'धर्म' शब्द लगाते हुए किसी को सुना है?”

उन्हें कहना पड़ा, ''नहीं।''

''तब'',मैंने कहा, ''पत्नी वही है, जिससे आपका विधिवत् विवाह हुआ है। वह विवाह संस्कार द्वारा या अदालत में रजिस्ट्री द्वारा हो सकता है। उसके बाद वह आपकी पत्नी हो गयी। अंग्रेजी में भी 'फादर-इन-ला, ब्रदर-इन-ला, सिस्टर-इन-ला' शब्द चलते हैं, पर 'वाइफ-इन-ला' तो मैंने सुना नहीं। उन लोगों में तलाक के बाद कानून से विवाह संबंध विच्छेद हो जाता है, किन्तु जब तक तलाक नहीं होता तब तक वह केवल 'वाइफ' है न कि 'वाइफ-इन-ला ?''

वे मेरी ऊटपटांग बाते अवाक् हो सुनते रहे। तब मैंने कहा, ''जिस प्रकार धर्मपिता के तात्पर्य हैं कि वह व्यक्ति जिसे हम धर्म- पिता कहते हैं, वास्तव में मेरा पिता नहीं है, मैंने इसे केवल धर्मवश पिता मान लिया है और वह भी मुझे पुत्र की तरह मानता है, उसी प्रकार 'धर्मपत्नी' शब्द से मेरी मोटी अक्ल में यह बात आती है कि वह मेरी वास्तव में पत्नी नहीं है, किंतु मैंने उसे धर्म या कर्मवश या व्यावहारिक रूप से अपनी पत्नी मान लिया है। 'कर्मवश' या 'व्यावहारिक' पत्नी कहना कुछ अच्छा नहीं लगता! प्रतिष्ठित शब्द 'धर्म' का उपयोग अच्छा लगता है। धर्म के अर्थ अनेक हैं। प्रेम' भी तो मनुष्य के मन का नैसर्गिक धर्म है। वह किसीसे भी हो सकता है। आवश्यक नहीं कि वह ब्याहता स्त्री अर्थात् पत्नी से ही हो। अधिक कहने की आवश्यकता नहीं। आप समझ गये होंगे कि मैं 'धर्म- पत्नी' किसे समझता हूं और क्यों पत्नी और धर्मपत्नी में भेद करता हूं। आप मुझे गलत न समझें, आप इन्हें भले ही अपनी 'धर्मपत्नी' कहें, किंतु मैं इन्हें आपकी पत्नी ही मानता हूं। मुझे कोई भ्रम नहीं है।''

मैंने आगे कहा, ''शायद आप भी ऐसे प्रकरण जानते हों और मैं तो ऐसे कई प्रकरण जानता हूं, जिनमें बिना किसी प्रकार के विवाह- बंधन में पड़े स्त्री और पुरुष पति-पत्नी की तरह रहते हैं। मैं एक जोड़े को जानता हूं जो बीस वर्ष से अधिक समय से इसी प्रकार रह रहा है। दोनों आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं, क्योंकि दोनों ही सरकारी नौकरी में हैं। वे इतने स्वतंत्र हैं कि घरवाले चाहते या न चाहते, वे पारंपरिक प्रथा से विवाह कर सकते थे, उन्हें कोई रोक नहीं सकता था। यदि वह उन्हें स्वीकार न होता तो मजिस्ट्रेट के सामने कानूनी विवाह कर सकते थे किंतु उन्होंने इसकी आवश्यकता नहीं समझी। जो लोग असली बात नहीं जानते, वे उन्हें ब्याहता पति-पत्नी ही समझते हैं। मैं यह रहस्य जानता हूं और उनकी श्रीमती जी को सदा उनकी धर्मपत्नी कहता हूं, क्योंकि पत्नी न होते हुए भी वे पत्नी का धर्म निर्वाह कर रही हैं। वे स्वयं उन्हें धर्मपत्नी नहीं कहते। औरों से उनका परिचय 'मेरी वाइफ' या 'मेरी श्रीमती' कहकर कराते हैं।''

मेरे नवीन मित्र ने पूछा, ''क्या 'श्रीमती' में पत्नी का भाव नहीं आता? ''

मैंने कहा, '' 'श्रीमती' वह है जो आपकी 'श्री' की वृद्धि करे, या जिसकी श्रीवृ द्धि आपके कारण होती हो। यह काम! पत्नी और धर्म- पत्नी समान रूप से कर सकती हैं। अतएव यह शब्द दौनों के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।'

मैंने अनुभव किया कि श्री विनोद शर्मा ने 'अति' कर दी है। अब उन्हें विदा कर देना चाहिए। अतएव मैं उस देवी की ओर मुड़ा जो न मालूम क्या आशा लेकर मुझसे मिलने आयी थी और मेरी अप्रत्या- शित ऊलजलूल बातों को सुनकर यदि खीज न रही होगी तो बोर तो अवश्य ही हो रही होगी। मैंने उससे कहा, ' 'तुम्हारे पति ने तुमसे कहा था कि मैं तुम्हें एक साहित्यिक से मिलाने ले चल रहा हूं। तुम स्वयं साहित्य में रुचि लेती हो। मेरे बारे में तुम्हारे पति का विचार कितना गलत है, यह तो तुम्हें मेरी बातों से मालूम हो ही गया होगा। किंतु शायद मेरी ऊलजलूल बातों से तुम्हारा कुछ मनोरंजन हुआ हो। लो, अब मेरे हाथ की बनाई चाय पियो। आशा है कि वह इतनी मीठी न होगी, जितनी मेरी बातें। मुझे कविता सुनने का शौक है और तुम! कविता करती हो। चाय पीने के बाद अपने कुछ गीत सुनाकर एक बूढ़े का मनोरंजन करने का पुण्य लो। आशा है कि तुम मेरी बातों को एक बूढ़े की बकवास समझकर उसपर अधिक ध्यान न दोगी। किंतु इन्हें कह देना कि भविष्य में तुम्हें अपनी पत्नी कहें, धर्मपत्नी नहीं.

--

(श्रीनारायण चतुर्वेदी के व्यंग्य संग्रह से साभार)

जाड़ा

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· शेर सिंह

जाड़े ने बोला धावा

गर्मी की कर दी

बोलती बंद

लो सर्दी आ गई ।

 

ओस से लदी

कांपती डालियां

झड़ते जर्द पत्‍ते

जाड़े की पहचान ।

 

गिरता पारा

कांपता सूरज

धुंध में छिपी सड़कें

कोहरे ने मचाया कोहराम ।

 

पार्कों, बागों में मगर

झांकने लगा गुलाब

हो गए लापता

पलाश, गुलमोहर ।

 

दिल्‍ली बनी

कुल्‍लू - मनाली

एनसीआर लगता श्रीनगर

जाड़ा अपने यौवन पर

लो आ गई सर्दी ।

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0 शेर सिंह

के. के. - 100

कवि नगर, गाजियाबाद-201 010.

E-mail- shersingh52@gmail.com

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डॉ. रघुनंदन प्रसाद दीक्षित 'प्रखर'

उतार चढ़ाव की साहित्‍यिक यात्रा : वर्ष 2011

वर्ष 2011 इसलिए विलक्षण कहा जा सकता है क्‍योंकि इस वर्ष हिन्‍दी साहित्‍य के इतिहास में प्रथम बार एक साथ सात महान विभूतियां की जन्‍म शताब्‍दियों का वर्ष रहा, जिनमें कवि,कथाकार, लेखक, कलाविद और संगीतज्ञ शामिल हैं। इन साहित्‍य पुरोधाओं ने अपने कालखण्‍ड में हिन्‍दी साहित्‍य को अनेकों कालजयी रचनाओं से समृद्ध किया ,साथ ही समाज एवं रचनाधर्मियों को एक नई दिशा दी। इन साहित्‍य पुरोधाओं में राष्‍ट्रीय चेतना के कवि गोपाल सिंह नेपाली,सरस कवि गीतकार शमशेर बहादुर सिंह जनकवि बाबा नागार्जुन,शायर फैज अहमद फैज,उत्‍कष्‍ट चिंतक अज्ञेय, मध्‍यवर्गीय परिवार की मनःस्‍थिति को उकेरने वाली तौलिए जैसी अनेकों कहानियों,विषयों पर गद्य लेखन करने वाले शिल्‍पकार उपेन्‍द्र नाथ अश्‍क,केन नदी के किनारे एकांत साधना में लीन केदार नाथ अग्रवाल शामिल हैं। जन्‍म शताब्‍दियों के कारण इस वर्ष पूरे देश में इनके आयोजनों ,गोष्‍ठियों तथा सम्‍मेलनों की धूम रही। साहित्‍य प्रमियों एवं समर्थकों ने अपने स्‍तर से ही यह आयोजन किए परन्‍तु इस तरफ केन्‍द्र अथवा राज्‍य सरकारों की उदासीनता ही रही। इस उदासीनता का क्‍या कारण रहा यह चिन्‍ता और शोध का विषय हो सकता है।राष्‍ट्र के सामने सवाल यह है कि क्‍या साहित्‍यकारों का वजूद सिर्फ उनके जीवनकाल में पुरुस्‍कारों और सम्‍मानों तक ही सीमित है अथवा इससे आगे भी कुछ.....?

यहां राग दरबारी के शिल्‍पकार स्‍व.श्रीलाल शुक्‍ल एवं कथाकार अमर कांत को मिले ज्ञानपीठ पुरुस्‍कार की चर्चा समीचीन होगी। पुरुस्‍कारदायी संस्‍थान के पास ऐसा कौन सा तराजू या आला था अथवा चयनकर्ताओं ने कौन से सूत्र प्रयोग किया कि पुरुस्‍कार की राशि दोनों विभूतियों में बराबर तक्‍सीम कर दी। जबकि दोनों ही साहित्‍यकार अपने अपने क्षेत्र में स्‍थापित है।वस्‍तुतः दोनों ही विभूतियां अलग अलग सम्‍मान की अधिकारी थे। क्‍या उन काली भेडों को ढूंढने में समर्थ होगा कालखण्‍ड.......?

राष्‍ट्रीय क्षतिः- इस कालखण्‍ड में साहित्‍य, संगीत तथा कला से सम्‍बद्ध आधार स्‍तम्‍भों का अवसान इस वर्ष राष्‍ट्र की आंखें नम कर गया। जिनमें असमिया लेखक,कवि एवं संगीतज्ञ भूपेन हजारिक ,असमिया लेखिका इन्‍दिरा गोस्‍वामी,संगीतज्ञ पं. भीमसेन जोशी, फणीश्‍वर नाथ रेणु की पत्‍नी लतिका रेणु,ख्‍यात आलोचक प्रो. कमला प्रसाद मराठी लेखक विनायक आदिनाथ समाचार वाचक विनोद तिवारी, आचार्य जानकी बल्‍लभ शास्‍त्री, चित्रकार हुसैन, चिली में निर्वासित कवि गोंजालो रोलास तथा वरिष्‍ठ पत्रकार कस्‍तूरी रंजन सम्‍मलित हैं। राष्‍ट्र का इन पुण्‍यात्‍माओं को कोटिशः नमन।

प्रकाशनः- इस वर्ष हालांकि अनेक पुस्‍तकों का का प्रकाशन हुआ । जिनमें से कुछ निम्‍नवत हैं-

बारहखडी-सं. महेश दर्पण एवं विजय श्रीवास्‍तव,अनाशक्‍ति दर्शन-सं. मणिमाला,बेचेहरगी-शायर भारत भूषण,युग तेवर -सं. कमल नयन पाण्‍डेय,चाणक्‍य और चन्‍द्र गुप्‍त-राजेन्‍द्र पाण्‍डेय,फिलस्‍तीन और अरब -इज्रराइल संघर्ष-महेन्‍द्र मिश्र,छब्‍बीस कहानियां-विजयदान देता,इतिहास के सवाल-नन्‍द किशोर आचार्य ,ओसामा का अंत-राज कुमार सिंह,नारकीय-मुद्राराक्षस, नया सवेरा-डा. मीरा रामनिवास के अतिरिक्‍त धरती आब,मदरसा, दादी की मुस्‍कान, खुद बदलें अपनी किस्‍मत, रामचरित मानस संदर्भ समग्र आदि शामिल हैं।

साहित्‍यिक हलचलः- साहित्‍यिक हलचलों में निम्‍न गतिविधियां रहीं

1- पूवोत्‍तर हिन्‍दी अकादमी द्वारा आयोजित वार्षिक समारोह एवं गांधी चर्चा कार्यक्रम।

2- सरिता लोकभारती साहित्‍य सम्‍मान समारोह एवं राष्‍ट्रीय कवि सम्‍मेलन।

3- तुलसी सम्‍मान समारोह(भोपाल)।

4- विक्रमशिला हिन्‍दी विद्यापीठ भागलपुर(बिहार) का उज्‍जयनी में 16वां दीक्षांत समारोह।

इसके साथ ही वर्षांत होते होते फर्रुखाबाद महोत्‍सव में आयोजित सांस्‍कृतिक,साहित्‍यिक,गोष्‍ठी एवं राष्‍ट्रीय कवि सम्‍मेलन मृदुल अनुभूति दे गया।

समग्रतः 2011 पूर्णतः प्राप्‍त करते करते उतार चढाव खटटे मीठे और तक्‍त अनुभूतियां दे गया और दे गया नववर्ष के आगमन की आहट का शुभ संदेश....................

शांतिदाता सदन,

नेकपुर चौरासी

फतेहगढ (उ.प्र.) पिन - 209601

E- Mail- Dixit48.3@rediffmail.com

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।। दोहे।।

भैया ते नर अब नहीं  जो मिलते जब काम।
काम में खोजे न मिलैं ऐसे मनुज तमाम।। 

बचन देत जो फिरत हैं और नहीं भय लाज।
यसकेपी दर-दर मिलैं ये नर भरे समाज।।

हँसत मिलैं बोलैं मधुर बहुत जतावैं प्यार।
यसकेपी तिनमें नहीं सब को साचो यार।।

कुसल छेम बहु पूछते कुसल सुने दुख भार।
यसकेपी नहि झूठ है ऐसे लोग हजार।।

को अपना को गैर है कौन करे कब वार।
यसकेपी नहि जानता सब झूठों व्यवहार।।


राजा रंक मुरख निपुन ऋषि महर्षि सब देव।
यसकेपी मरने चले बचा नहीं जग केव।।

प्रतिपल बदले सरकता सो जानो संसार।
नसोंमुख यहि जगत में प्रेम राम को सार।।   

अहम स्वार्थ अज्ञान बस बन बैठे भगवान।
यसकेपी या जगत में ऐसे बड़े महान।।

साच कहौं नहि झूठ कछु तजौ मान अभिमान।
यसकेपी पहिचानिए जा सेवक हनुमान।।

यसकेपी रघुपति सही बाकी सब है झूठ।
राम न रूठैं होय का जगत जाय जो रूठ।।

ग्रह भूत देवादि जग पूज सरे कछु काम।
अंत समय मुख मोड़ते आते सीताराम।।

जगत विदित सच एक है जगत रहा पर सोय।
यसकेपी देखा-सुना राम नाम सत होय।।

हाय-हाय कर चल बसे शेष रहे बहु काम।
यसकेपी अब का करे भूल गए श्रीराम।।

नाम-दाम लगि पचि मरे हुआ न पर उपकार।
यसकेपी बढ़ता गया जग का यह व्यापार ।।

राम बिना आराम नहि लोग हुये बेराम।
दर-दर सुख खोजत फिरैं खरच रहे बहु दाम।।

राम से चाहैं लोग बहु जग को चाहै राम।
यसकेपी जो चाहता ताहीं को आराम।।

बुरे समय नहि पास को सब मिलते निज काम।
भले-बुरे हर पल मिलैं यसकेपी के राम।।
---------
डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.)।
 
URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/
                *********

(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com , फतुहा, पटना की कलाकृति)

न्दा ने तीसरी बार पानी पीया। वैसे रात में उठकर पानी पीने की उसकी आदत नहीं है। थककर चूर हो जाने के बाद उसे होश ही नहीं रहता कि सुबह कब हुई। पर जाने क्यों आज उसका हलक सूख रहा है। देह पसीने से बार-बार लथपथ हो आती है। जब रात को पार्टी होती है तब तो इतनी थक जाती है कि सुबह आवाज देकर खुद मिसेज माथुर उसे जगाती हैं। यदि मनोज-रश्मि को स्कूल जाने की जल्दी न हो तो शायद गिसेज माथुर कह गई उसे जल्दी न जगाये। मनोज-रश्मि अब. बड़े हो गये हैं, इसलिए उन्हें तैयार करने की परेशानी तो नहीं रही, पर नन्दा को उनके लिए नाश्ता तो तैयार करना ही पड़ता है। रोज-रोज टोस्ट-अण्डा देने के लिए बच्चे मम्मी से उतना नहीं उलझते जितना नन्दा से उलझते हैं। पर वह भी क्या करे! मेम साब का आदेश है कि बच्चों को कम से कम दो अण्डे रोज खिलाया करे-चाहे उबले हुए हों या आमलेट की शक्ल में।

पानी पीकर नन्दा फिर लेट गयी। बहुत कोशिश की कि आँख लग जाये। मगर नींद ने तो जैसे शर्त बद ली थी। एकदम बैरन हो गयी। आने का नाम ही नहीं लिया।.. .बहुत दिनों बाद वह आज घर गयी थी। पहले अक्सर जाती थी। छुट्टी लेकर दोपहर में माँ-बापू और भाई-बहन से मिल आती थी। पर घर जाना अब उसे अच्छा नहीं लगता।. दम घुटता है उसका वहाँ। पहले की तुलना में हालात बेहतर हैं, फिर भी परम्परागत वातावरण में उसका मन काँप जाता है। आज घर जाकर जो आहट उसके कानों तक पहुँची, उसे सुन चेहरे का रंग ही बदल गया। जल्दी ही लौट आयी। लौटने के बाद भी सहज न हो सकी। किसी काम में मन नहीं लगा। शाम सब्जी में नमक तेज हो जाने के कारण उसे माथुर साहब की हल्की-सी डाँट भी खानी पड़ी। पर क्या करती! भरसक कोशिश के बाव- जूद अपने को सम्भाल नहीं पा रही है। रात ठीक से खाना भी नहीं खाया गया। जानती है, नींद न आने का कारण खाली पेट नहीं मस्तिष्क है, जिसमें झंझावात उठा है। मस्तिष्क जिस पर से पिछले नौ-दस वर्षों में काफी कोहरा छँट चुका है।

जो आहट आज सुनकर आयी, उसका आशय यही था कि अपनी ही जाति के बाबू के बेटे बाल्या से उसके ब्याह की बात पक्की कर दी गयी है। नन्दा, बाबू और उसके बेटे बाल्या दोनों को जानती है। बाबू उसके बापू के साथ ही समुद्र में मछली पकड़ने का धंधा करता है। बाल्या साइकिल रिक्शे से बच्चों को स्कूल पहुँचाने का काम करता है। माँ-बाप के साथ बांदरा में समुद्र किनारे की झोपड़-पट्टी में रहता है। बाल्या की माँ, नन्दा की माँ की तरह ही दो-चार घरों में कपड़े-भांडे करती है। नन्दा इसी माहौल में पैदा हुई है, पर पिछले दस वर्षों से यह माहौल उससे क्रमश: छूटता जा रहा है। नौ वर्ष की थी तभी माँ ने उसे माथुर साहब के यहाँ नौकरी पर लगा दिया था। घर का छोटा-मोटा काम करना और मनोज बाबा को सम्भालना। तब. से यहीं है। खाती-सोती भी यहीं है। माथुर और मिसेज माथुर भले लोग हैं। इसलिए नन्दा मजे में है। इस घर की सदस्य-सी हो गयी है। हँसमुख स्वभाव, काम के प्रति लगन और ईमान- दारी ने उसे सबकी लाड़ली बना दिया है। घर भर के लिए वह एक अनिवार्यता हो गयी है। मनोज-रश्मि भी उसके साथ अच्छा बर्ताव करते हैं। रश्मि से तो वह ऐसे बतियाती है, जैसे नौकरानी नहीं सहेली हो। चूँकि खाने-पीने को भी अच्छा मिलता है, इसलिए देह भी अच्छी-खासी निकल आयी है। कुदरत ने चेहरा-मोहरा भी खूब दिया है। रश्मि बेबी के अच्छे-खासे कपड़े उसे पहनने को मिल जाते हैं। रश्मि के पास कपड़ों का कोई टोटा नहीं। कई पोशाकें तो ऐसी हैं जो उसने मुश्किल से दो-चार बार पहनी होती हैं। मन से उतरते ही वे नन्दा के पास पहुँच. जाती हैं! वैसे दीपावली पर मिसेज माथुर नन्दा के लिए दो जोड़े कपड़े अलग से सिलाती हैं। अब नन्दा साड़ी पहनना तो भूल ही गयी है। मिडी-मेक्सी और सलवार-  कुरती ही उसकी पोशाक हो गयी है। साफ-सुथरा और सलीके से रहना उसे अच्छा लगता है। यहाँ आयी थी तब तीसरी पास थी। बाद में माथुर साहब ने उसे पढ़ने की सुविधा भी दे दी। दोपहर के समय पास के सरकारी स्कूल में चली जाती थी। इस वर्ष दसवीं का इम्तहान देने की तैयारी कर रही है। अनजाने में रश्मि उसका आदर्श बन गयी है। उसकी भावी योजनाओं को वह बड़े ध्यानपूर्वक सुनती है।

नन्दा ने करवट बदली। उसे सहसा समझ नहीं आ रहा कि इस उम्र में जब ब्याह की बात सुनकर गुदगुदी होनी चाहिए, मन में फुलझडियाँ छूटनी चाहिए, पैर जमीन पर नहीं टिकने चाहिए तब मन में अजीब-सी उदासी क्यों उतर आयी है। जैसे सब कुछ उससे छूट रहा है। उसके रहते मिसेज माथुर हर तरह से निश्चिन्त हैं। पहली तारीख को श्रीमती माथुर अच्छी-खासी रकम नन्दा के हाथ पर रख देती हैं। स्वीपर, चौकीदार, धोबी तथा दूध और अखबार वाले को भुगतान करने का काम नन्दा का है। इनमें से जो भी आता है, नन्दा को ही पूछता है। अपने छोटे से कमरे में नन्दा पैसे, हिसाब और रसीदें इतने व्यवस्थित ढंग से रखती है कि मिसेज माथुर को कभी पलटकर पूछना नहीं पड़ता। नन्दा दूध वाले और धोबी से हिसाब को लेकर जिरह भी कर लेती है। मिसेज माथुर के पास इतना समय ही नहीं है कि वह इन झंझटों में पड़े। रश्मि-मनोज के साथ वी० सी० आर० पर फिल्में देखना नन्दा का खास शौक है। जब कुमार दम्पत्ति काम पर गये होते हैं और बच्चे स्कूल, तब ट्रांजिस्टर आँन कर या कैसेट लगाकर किचन में काम करना उसकी आदत बन चुकी है। फुरसत होने पर अकेली कई बार वह देशी-विदेशी संगीत पर थिरकी भी है, जैसे रश्मि बेबी देर रात तक थिरकती रहती है। नन्दा माँ-बापू के घर को भी अपने वेतन से बदलने में लगी रहती है। पहले उसने फर्श पक्का करवाया और फिर घर को सजाया-सँवारा। प्रेशर-कुकर और गैस भी लाकर रुख दी। माँ को मजबूर करती रहती है कि वह इन चीजों को उपयोग मैं लाया करे। कहीं से किस्तों पर पुराना स्याह-सफेद टी० वी० भी ले आयी है। ऐसे में पान की पीक फैलाये और काजल आँजे वह बाल्या! फिर उसकी वह झुग्गी जिसके आसपास दिन-रात मच्छर भिनभिनाते रहते हैं। उसे  घिन आ गयी। आँखें सिकुड़ गयीं। हृदय की धड़कन तेज हो गयी।

लगा, कोई सपना टूट गया है। वह तो हवा में उड़ रही थी। किसी ने उसके. अदृश्य स्वप्न-महल पर पत्थर फेंक दिया है और उसकी किरचें उड़कर उसे अन्दर तक आहत कर गयी हैं। देह ही नहीं, मन भी लहूलुहान हो आया है। इससे पहले न तो उसने कभी शादी के बारे में सोचा था, न पुराने माहौल में लौटने का उसे ध्यान आया था। मन के किसी कोने में कहीं कुछ था तो आधुनिक सेज थी, चीकट हो आयी गोदडी नहीं। पर आज बात सामने आयी तो लगा जैसे किसी ने उसे सोते से जगा दिया है। ठहरे जल में कंकड़ी फेंक दी है। वह तो भूल ही गयी थी कि उसका मूल क्या है, कहाँ है? अचेतन में शायद कोई और ही विचार जन्म ले रहा था। पलकों कौ बन्द कर नींद को कैद करने की कोशिश आखिर सफल हुई। कुछ देर के लिए झपकी लग गयी। रह-रहकर भयावने दृश्य दिखायी देने लगे। कभी लगता, वह एक अंधी खोह में गिर गयी है और सहायता 'के लिए की गयी उसकी चीख-ढ़ुकार कोई सुन नहीं रहा है। कभी लगता मकड़जाल में मक्खी की भाँति फँस गयी है और भन्-भन् कर मुक्ति के लिए फड़फड़ा रही है। कभी लगता, काले-कलूटे मछुआरे ने जाल फेंककर उसे पानी के बाहर खींच लिया है और प्राण-वायु के लिए वह बुरी तरह तड़प रही है। सहसा हल्की-सी चीख उसके मुख से निकली। तभी घड़ी ने छ: बजाये। घबराकर वह उठ बैठी। महसूस किया कि सारा शरीर टूट रहा है। सिर और आँखें भारी हो गयी हैं। देह शिथिल पड़ गयी है, मानो किसी ने पूरा रक्त निचोड़ त्रिया हो। पर उठना तो था ही। मनोज-रश्मि के लिए नाश्ता और साहब के लिए बेड-टी तैयार करनी थी। वह जुट गयी। दिन भर जुटी रही। हूर दिन जुटी रही। मिसेज माथुर ने अनुभव किया कि अब नन्दा में काम के प्रति वैसा उत्साह नहीं रह गया है। प्राय: गुमसुम-सी रहती है। खोई-खोई। कई बार उन्होंने कुरेदना भी चाहा, मगर नन्दा हाँ-हूँ करके रह गयी। रश्मि से भी अब वह अधिक बातें नहीं करती। प्राय: एकटक उसकी आँखों में झाँकती रहती। अन्दर ही अन्दर रिसती बेबसी पर कई बार उसे खीझ हो आती। कभी-कभी विद्रोह का भाव मन मैं आता, पर साहस जवाब दे जाता। मन मसोसकर रह जाती।

इस बीच नन्दा घर नहीं आयी। दो-एक अवसर आये भी, पर वह टाल गयी। माँ-बापू आये थे पिछले दिनों, मिसेज माथुर को यह बताने कि उन्होंने नन्दा की शादी तय कर दी है। देव उठते ही उसकी शादी है। आप लोग आना। उन्होंने नन्दा को छुट्टी देने के लिए भी आग्रह किया। 'कल आकर हम लोग नन्दा को ले जायेंगे।' नन्दा के बापू ने कहा। मिसेज माथुर को लगा, आकर ले जाने का तो बहाना है, शायद इशारा तो हिसाब कर देने की ओर है। अन्यथा नन्दा तो अकेली भी घर जा सकती है। मगर मिसेज माथुर ने बुरा नहीं माना। जानती हैं, घर में शादी है। पैसों की जरूरत तो पड़ेगी ही।

'शादी के बाद भी नन्दा काम करेगी ?' मिसेज माथुर ने पूछा। 'एक तो बांदरा काफी दूर है। फिर बाल्या भी अपनी होने वाली बहूसे नौकरी कराना नहीं चाहता।' नन्दा की माँ ने जवाब दिया। मिसेज माथुर क्या कहतीं। एक ठंडी साँस भरकर रह गयीं।

माता-पिता के जाने के बाद नन्दा और भी उदास हो गयी। दिन यूं ही निकल गया। शाम को लौटते में मिसेज माथुर एक सुन्दर-सी साड़ी लेती आयीं। सोचा, बहुत सेवा की है लड़की ने। कल नयी साड़ी ओढाकर विदा करूँगी।

अगली शाम माँ-बापू लिवाने आ गये। मिसेज माथुर ने हिसाब के अलावा सौ रुपये नन्दा के हाथ पर धर दिये। फिर टीका निकालकर साड़ी ओढा दी। ऐसा करते समय उनके हाथ और नाक दोनों काँप रहे थे। डबडबाई आँखों से नन्दा ने उनके पैर छुए। फिर वह रश्मि की ओर मुड़ी। वहाँ भी एक सागर उमड़ने' को तैयार था। नन्दा बिलख पड़ी। रश्मि से लिपट गयी। अब तो आँसुओं पर काबू पाना उसके बस में नहीं रहा। लिपटकर फूट-फूटकर रोती रही। बड़ी मुश्किल से उसे अलग किया जा सका। माँ-बापू फटी-फटी आँखों से यह सब देखते रहे थे।. उन्हें क्या पता था कि वे नन्दा को रश्मि से नहीं उसके सपने से दूर करने की कोशिश कर रहे थे।

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साभार - कहानी संग्रह बिना चेहरे का पेट - कहानीकार - सूर्यकांत नागर , प्रकाशक दिशा प्रकाशन, दिल्ली -35.

आलेख

युवा कथाकारों की कहानियों का पोस्‍टमार्टम

अरविन्‍द कुमार

एक साल से विभिन्‍न हिंदी पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों को पढ़ा। वरिष्‍ठ कथाकारों, आलोचकों के साक्षात्‍कार, उन पर उनकी ‘आलोचना दृष्‍टि' का भी सूक्ष्‍मता से अध्‍ययन किया। युवा कथाकारों की ‘कथादृष्‍टि' पर कई ‘आरोप' लगाए जा रहे हैं। पहला आरोप यही लगाया जाता है उनके पास कोई ‘कथादृष्‍टि' ही नहीं है।' दूसरा यह है कि वे ‘कथा' के स्‍थान पर ‘शिल्‍प' को अधिक महत्त्व दे रहे हैं। तब तो ‘कथा' गौण हो जाती है ‘शिल्‍प' उसका स्‍थान ले लगा और आगे यह भी कहा जा रहा कि उनका ‘विजन' कैसा है ? या जो कहानी लिखी जाए उसमें ‘सामाजिक सापेक्षता' है कि नहीं है अर्थात्‌ कथाकार किस प्रकार के ‘समाज का निर्माण' करना चाहता है ? वह परंपराओं को मानना चाहता है कि नहीं और तो और यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि युवा कथाकार ‘क्‍लासिकल लिटरेचर' या ‘पुराने कथाकारों को नहीं पढ़ना चाहते हैं। उपर्युक्‍त तमाम आरोप पर ‘बयान' बाजी करने के बजाय मैं यह उपयुक्‍त समझूंगा कि ‘युवा रचनाशीलता' या युवा कथाकारों की कहानियों का ‘पोस्‍टमार्टम' किया जाए। सही क्‍या है ? गलत क्‍या है ? इस पर आलोचक के स्‍थान पर ‘पाठक' निर्णय करें। आलोचक का कार्य तो ‘रचना' या ‘कहानी' का ‘तटस्‍थ होकर आलोचना' करना है।

इधर जिन कथाकारों ने ‘सृजन' की ‘नई भावभूमि' को जन्‍म दिया है वे कथाकार हैं- ‘राजू शर्मा', ‘अभिज्ञात', गौरव सोलंकी, ‘सोनाली सिंह', ‘विभाशु दिव्‍याल', ‘राकेश कुमार सिंह', ‘पंकज मित्र', ‘सत्‍यम श्रीवास्‍तव', वंदनाराग', ‘मनीषा कुल श्रेष्‍ठ' ‘सीमा शफ़क', ‘एस आर0 हारनोट', ‘रूपनारायण सोनकर', ‘हरिओम', ‘मो0 आरिफ', ‘स्‍नोवावानोंर्', ‘महुआ माझी', ‘राजेद्र राव', ‘संतोष गौतम', ‘प्रत्‍यक्षा', ‘मधुकाकरिया', ‘रंजना जायसवाल', ‘राजेश मलिक', ‘दयाहीत', सुशांत सुप्रिय', अशोक गुप्‍ता', ‘परितोष चक्रवर्ती', ‘लोकबाबू', ‘परदेशीराम वर्मा', ‘सुभाष शर्मा', ‘कविता', ‘अरूण कुमार सिंह', ‘रामचंद्र', ‘दिलीप कुमार', ‘डॉ0 दीर्ध नारायण', श्‍याम कुमार पोकरा, ‘गीत चतुर्वेदी', शशांक, ‘रामकुमार तिवारी', ‘गिरिराज किराडू' इत्‍यादि। इनके समदर्शी वरिष्‍ठ कथाकारों ने भी अपनी ‘सृजन' को ‘नये आलोक' में देखने का प्रयास किया है वे हैं-‘उदय प्रकाश', ‘रमणिका गुप्‍ता', ‘अरूण कुमार असफल', ‘मुर्सफआलम जौकी', ‘असगर, वजाहत', ‘जया जादवानी', ‘सुभाषचंद्र कुशवह' इत्‍यादि।

इन कथाकारों ने ‘विस्‍तृत कलक' पर ‘डेड' पड़ी मानसिकताओं में थोड़ा ‘परिवर्तन' कर दिया है। यह ‘परिवर्तन' किसी ‘परंपरा' को समूल नष्‍ट नहीं करना चाहता, अपितु उसी परंपरा में कुछ ‘नया जोड़ना' चाहता है। ‘संस्‍कृति' को ‘अपसंस्‍कृति' में नहीं बदलना चाहते, वरन्‌ कुंद संस्‍कृति, ‘कुंद मानसिकताओं' ‘नया बीज रोपड़ करना' अपना कर्त्तव्‍य समझते हैं। किसी ‘विचारधारा या आइडियोलाजी' को किसी पर ‘जबरदस्‍ती थोपना' नहीं चाहते। वे कुछ बेहतर करना चाहते हैं और स्‍वयं आगे की ओर बढ़ना चाहते हैं। वे आगे बढ़ने की तीव्र ललक लिए हुए हैं। उनकी उर्वर कल्‍पना शक्‍ति के विषय में यह कहा जा सकता है कि ‘‘कल्‍पना, स्‍वप्‍नों तथा आदशोंर् का महत्त्व भी यथार्थ से संबंध रहने में ही है। कल्‍पना कवि की शक्‍ति तभी बन सकती है जब उसकी जडे़ यथार्थ में हो अन्‍यथा वह रंग-विरंगे, परन्‍तु जलहीन बादलों की तरह हवा में उड़ती रहती है और मानव-जीवन के संबन्‍ध स्‍थापित नहीं कर पाती है प्रभावहीन हो जाती है। यथार्थ दृष्‍टि के संदर्भ में ‘विजन' (Vision) का अर्थ भावी जीवन के किसी कल्‍पना लोक से न होकर इस वास्‍तविकता से है, जो भले ही आज का सत्‍य न हो, कल का सत्‍य अवश्‍य है, जिसे इतिहास तथा यथार्थ की गतिशील भूमिका समर्थन प्राप्‍त है।''[i] ये कथाकार मात्र कल्‍पना में तीर नहीं छोड़ रहे हैं वे ‘सत्‍य' को जीते हुए अनुभव को परिपक्‍व करते हुए ‘बदबदाते यथार्थ' में ‘गहरी डुबकी' लगाकर निकाल लाने की कोशिश कर रहे हैं। ये कथाकार ‘बनावटी यूरोपिया' को नहीं प्रस्‍तुत कर रहे हैं तब उनके लेखन के विषय में यह कहा जा सकता है, ‘वस्‍तुतः सामाजिक जीवन का यथार्थ कच्‍चे माल की भॉँति है। लोगों की दृष्‍टि उसके पूरे सैलाब को समेट नहीं पाती किन्‍तु साहित्‍यकार की पैनी दृष्‍टि चारों ओर के यथार्थ को समेटती हुई बने बनाए माल की भॉँति गहरी, सम्‍वेदनाओं से युक्‍त करके अत्‍य व्‍यवस्‍थित रूप में किसी कृति में प्रस्‍तुत करती है। इसलिए कलाकार से यह अपेक्षा की जाती है कि वह ईमानदारी से सामाजिक जीवन को परखे और अपनी कृति सजीव रूप में प्रस्‍तुत करें।,[ii] आज का युवा कथाकार ‘सब कुछ' समेट लेना चाहता है वह कुछ भी ‘शेष' नहीं छोड़ना चाहता। सामाजिकता के ‘कुरूप यथार्थ' को वह अपनी ‘नंगी आंखों से ओझल नहीं होने देना चाहता। फिर तो आरोप ही निराधार साबित हो जाते हैं। संजीव लिखते हैं, ‘‘हमारे पास प्रेम से लेकर सेक्‍स और समलैंगिकता तक की कहानियाँ हैं, युवा से लेकर प्रौढ़ सभी की करपोरेट जगत की कहानियाँ हैं, (राकेश बिहारी, कैलाशचन्‍द्र, विभारानी आदि की) महानगरीय समस्‍याओं और चरित्रों पर कहानियाँ हैं, नारी विमर्श, दलित विमर्श हैं, एन0 आर0 आई हैं, कॉल सेंटर से की कहानियां हैं, आतंकवाद पर कहानियां हैं, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्‍कृतिक भ्रष्‍टाचार तक के एक्‍सपोजर लिटरेचर हैं किंचित आदि इसी और दलित लेखन के क्षितिज भी कुछ और खुलने लगे हैं लेकिन गाँव, किसान, कृषक मजदूर, खेती, बेरोजगारी और ‘सेज' तथा ‘बूट' से उत्‍पन्‍न विस्थापन और किसानों की आत्‍मकथाएं नहीं हैं, शोषण के बदलते आयाम नहीं हैं।''[iii]

मैं यहां पर स्‍पष्‍ट करना चाहूँगा कि युवा कथाकारों का इतना अभी ‘मोहभंग' नहीं हुआ है कि वे संवेदना शून्‍य हो जाये पर एक बात तय है कि वे गाँव को अपनी आंखों से देखना चाह रहे। इसी आलेख में यह स्‍पष्‍ट हो जायेगा। प्रियम अंकित ने युवा सृजन (कथा साहित्‍य ः नए समय की आहट) के संदर्भ में लिखा है, ‘‘समकालीन कथा परिदृश्‍य में युवा पीढ़ी के सार्थक हस्‍तक्षेप ने आलोचानात्‍मक तर्कबुद्धि के परंपरागत शिष्‍टाचार को ध्‍वस्‍त कर दिया है। आज युवा लेखन आलोचना के समक्ष यह चुनौती पेश कर रहा है कि वह पुरातनपंथ और निहायत अकादमिक किस्‍म की शास्‍त्रीयता का परित्‍याग कर नए मानदण्‍डों और नए प्रतिमानों की खोज में प्रवृत्त हो। जटिल से जटिलतर बनते यथार्थ ने हमारी संवेदना में जैसा उलझाव पैदा किया है, वह अपनी अभिव्‍यक्‍ति के लिए साहस और प्रयोगधर्मिता की दरकार रखता है। इसीलिए आज कहानी अपने स्‍थापत्‍य को नए सिरे से गढ़ने के लिए कृत संकल्‍प है।''[iv] युवा रचनाकार ‘परंपरागत शिष्‍टाचार' को तोड़ता नहीं है वह उनमें परिवर्तन या पुर्नपरिवर्तन की माँग करता है। वह पुराने मानदण्‍डों से सीखता है तभी वह ‘नए मानदण्‍डों' को अपने प्रयोगों के आधार पर बनाना चाहता है वह कुछ ‘नया' चाहता है, इससे डरने की आवश्‍यकता नहीं। रूसी उपन्‍यासकार ईवान तुर्गनेव ने अपने प्रसिद्ध उपन्‍यास ‘पिता और पुत्र' (फादर एण्‍ड सन्‍स) में पुत्र अपने पिता से कहता है, ‘मैं अब बड़ा हो गया हूँ। आपको मुझे अब समझना चाहिए।'' कहने का अर्थ है ‘सार्थक संवाद' सार्थक बहस से आगे के भविष्‍य की ‘बातचीत' की जा सकती है दोनों को (वरिष्‍ठ व युवा) दोनों के लेखन को समझना होगा। जब युवाओं का ‘नया अनुभव' है तब यह आवश्‍यक हो जाता है कि उनका लेखन भी परंपरा से हटकर होगा। यही कारण रहा कि डॉ0 राम विलास शर्मा ने ‘प्रगतिशील साहित्‍य की समस्‍याएं' और ‘परंपरा का मूल्‍यांकन' की बात को पुरजो से उठाई। ‘आलोचना कर्म' में नई आलोचना' का जन्‍म दिया, जिसे मार्क्‍सवादी आलोचना' कहा गया। वहां भी विवाद की स्‍थितियों ने ‘जन्‍म लिया' मुझे लगता है जिसको जितना विवादस्‍पद बना दो वह उतना ही ‘पापुलर' हो जाता है या यूँ कहा जा सकता है कि स्‍थापित हो जाता है।

अतः यह आवश्‍यक हो गया है कि आज की कहानी को समझने के लिए युग की परिकल्‍पना समझनी होगी।

कुछ प्रसिद्ध कहानियों का पोस्‍टमार्टम

समय और सभ्‍यता और इतिहास की परिधि को अपने आगोश में समेटे हुए हैं। इन चुन्‍निदा कहानियों में समय की परिधि ‘उत्तर' अस्‍मितावादी विमर्शों की समस्‍त श्रृंखलाएं आपको स्‍पष्‍ट रूप से परिलक्षित होगी। ये प्रमुख कहानियां हैं- बाकी इतिहास (राजेंद्र राव) ‘नंदीग्राम के चूहे' (मधु कांकरिया), नाटे कद का आदमी (संतोष गौतम) कागज का जहाज, चोर सिपाही (मो0 आरिफ), सपने कभी मरते नहीं, जंगल जमींन और तारे (महुआ माझी), वारदों, हमन हैं इश्‍क मस्‍ताना, लो आ गई मैं तुम्‍हारे पास (स्‍नोवा बानोंर्), हाँ मैं अपराधी हूँ कामरेड, (रंजना जायसवाल) ‘जो सदियों से चुप है (जया जादबानी), शारूख शारूख ! कैसे हो शारूख' (प्रत्‍यक्षा), ‘पेड़ लगाकर फल खाने का वक्‍त नहीं (सुभाष चंद्र कुशवाहा), लल्‍लू लाल को रूपैया (विभांशु दिव्‍याल), कामरेड और चूहे (अभिज्ञात), चीखे (एस0 आर0 हरनोट), अमरीकी चूहे, गिद्धों का प्रीत भोज (प्रदीप पंत), एम0 एल0 सी0 (उर्मिला शिरीष), ये धुआँ धुआँ, अंधेरा, रास्‍ता किधर है, (हरिओम) ‘कहानीकार' (राजूर्श्‍मा), मठाधीश (उदय प्रकाश), ब्‍लू फिल्‍म (गौरव सोलंकी), कंडम (अरूण कुमार असफल), पुरूष-विमर्श (कुसुमभट्‌ट), मर्डर ऑफ मार्क्‍स (गिरिराज किराडू), बल्‍ली धुआँ (मेराज अहमद), विलौती बाबू की उधार फिकिर, एक चुप्‍पे की चुपकथा (पंकज मित्र), धर्मातरण (सत्‍यम श्रीवासतव), ख्‍यालनामा (बंदनाराग), केयर ऑफ स्‍वातघाटी (मनीषा कुलश्रेष्‍ठ) सूकर मछव (अरूण कुमार सिंह), बयार (रामचंद्र), बैक पेपर बाउंसर (संजय कुंदन), वो आखिरी बार सैन फ्रांसिस्‍को में देखी गई थी (सोहन शर्मा) इन्‍हीं कहानियों से निकल रहा है ‘कच्‍चा पक्‍का' अनुभव जो ‘वैश्‍वीकृत होती ‘संस्‍कृति' के लिए आवश्‍यक है।

इतिहास की पुनर्व्‍याख्‍या करते हुए ‘शरद सिंह' ने अपनी कहानी ‘हुस्‍न बानू का आठवाँ सवाल' में ‘स्‍त्री' को पुनर्परिभाषित करती है। यह कहानी फारसी में ‘हातिमताई' नामक से प्रसिद्ध है जो लोक प्रचलित ‘लोककथा' है। जिसका पुनर्लेखन शरदसिंह ने किया है। जिसमें ‘स्‍त्री के दृष्‍टि कोण' से पुनः देखने की कोशिश की गयी है। ‘स्‍त्री विमर्श' के मुद्दे को उठाया गया, जिसमें पुरूषों का परंपरा से चले आ रहे ‘वर्चस्‍व' का खण्‍डन करना है। कई सवाल वह आम पाठकों के समक्ष रखती है ‘‘इससे क्‍या अंतर पड़ता है कि वह फारस की है या भारत की, चीन की है या योरोप की, सचमुच इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है, मुख्‍य बात यह है कि वह स्‍त्री है। ‘किस्‍सा-ए-हातिमताई' में हुस्‍नबाबू का एक स्‍त्री होना पर्याप्‍त है। बस्‍स ! देश, काल अथवा समाज कोई भी हो सकता था। समूची दुनिया की स्‍त्रियाँ लगभग एक- सी त्रासदी सहती हैं- पुरूषों द्वारा अपने से दोयम समझे जाने का।''[v] यह अतीत और वर्तमान की व्‍याख्‍या ‘मुनीरसामी' और ‘हुस्‍नबानू' के माध्‍यम द्वारा की गई है। ‘स्‍त्री' की परिधि को सीमित न करके वृहद कर दिया है। तब यह कहानी ‘रेडिकल' हो जाती है, और सबाल्‍टर्न स्‍टोरी- कहा जा सकता है। गिरिराज किराडू की कहानी ‘मर्डर ऑफ मार्क्‍स' कला के अंत की ओर ले जाती ह। साहित्‍य-कलाकारों के सूचनाओं प्रेमचंद और मुक्‍तिबोध' की प्रगतिशीलता को रेखांकित करते हुए रघुवीर सहाय की राजनीतिक चेतना की ओर ध्‍यान ले जाती है। कहानी परंपरागत लेखन का विरोध करते हुए साहित्‍य में मार्क्‍सवादी विचार धारा का मूल्‍यांकन करती है। कथाकार धीरज बेजामिन को एक ‘उदास कलाकार' (पेंटिग्‍स बनाने वाले के) के रूप में प्रस्‍तुत करता है। ‘उदास' माना जा सकता है क्‍योंकि धीरज बेंजामिन समाज की उन गहराइओं में जाना चाहता है और अपनी ‘पेंटिंग्‍स' में नग्‍न यथार्थ, लाना चाहता है जिसे सुन्‍दर किसी मायने में नहीं कहा जा सकता है धीरज बेंजामिन के लिए ‘असुन्‍दर' ही ‘उदासी' है जो अपनी तूलिका से निकालकर लाना चाहता है। ‘‘मैं इन्‍फेस करता हूँ कि मुझे मॉडर्न आर्ट कभी समझ में नहीं आई। मैं उसे सिर्फ थियरी में, कला-इतिहास की माँग कर पढ़ी गई किताबों के जरिये जानता।''[vi]

साहित्‍य कला का उत्‍कर्ष राजू शर्मा की लम्‍बी कहानी ‘कहानीकार (तद्‌भव, जन0 2009) मैं देखा जा सकता है। कथाकार ने बुर्जुआ लेखन को स्‍पष्‍ट करता है। यह प्रेम की मनोविश्‍लेषणात्‍मक महाकथात्‍मक गाथा है, जो प्रेम के ‘आवसेशन डिसार्डर' को प्रकट करता है और एक फैंटेसी की तरह कथानक ‘ब्‍यूटी' से जीता है। प्रेमी के मानस पटल पर अपनी प्रेयसी के लिए जितनी परिकल्‍पनाएं होती हैं, इस कहानी का कथानायक उन अवस्‍थाओं से गुजरता जाता है प्रेम के सारे नियमों कानूनों और बंधनों को तोड़ना चाहता है जिसे एक साधारण प्रेमी तोड़ना चाहता है कहानी फ्‍लैश शैली में घटित होती दिखाई गई है। यही इस कथा की आधार शिला भी। वह प्रेम के साहित्‍योतिहास दर्शन से हिंदी एवं अंग्रेजी के समस्‍त कथाओं का अध्‍ययन करता है। ‘प्रेम' नामक तत्त्व को जानना चाहता है। किन्‍तु वह इसमें असफल सा हो जाता है।

‘‘इन हफ्‍तों में मैंने कई एक महान प्रेम कहानियां पढ़ी, उनका चिंतन किया और उनसे सीखा कि इश्‍क के सरोवर के उत्तेजक तजुर्बे में विडम्‍बनाओं को कैसे पहचानते हैं और उनका रस लेते हैं। जैसे इस नतीजे पर पहुंचा कि और प्रणय गीत की अलौकि आभा को कायम रखने के लिए जरूरी था कि अपना मलिन, उनीदा रूटीन एक आत्‍मग्रस्‍त कठोरता से जारी रखूँ। यह पृष्‍ठभूमि कि सब कुछ पूर्ववत्‌ है एक उजले रोमांस की शुद्धता बरकरार रखने के लिए जरूरी था। यह समीकरण अनेक सामान्‍य और सही उक्‍तियों के अनुकूल था जैसेः एक प्रतिशत अंतप्रेरणा के पीछे निन्‍यानबे प्रतिशत पसीने की चट्‌टान होती है; महान नेतृत्‍व असंख्‍य चेहराविहीन जनमानस के हाथों पर ऊँचाई पाता है वगैरह।''[vii] एक बार फिर प्रेम के पाठ को पुनपीठ द्वाराे परिभाषित करते हैं, ‘‘शायद इस सबमें एक पाठ है, सीख है, एेसा होता है जब तुम कला को जिंदगी के ऊपर आंकते हो। जिंदगी कला को जन्‍म देती है, कला जीवन का सृजन नहीं करती...................।''[viii] यहां कहानीकार ‘प्रेम' को कला से विलग मानता रहा है और यह सिद्ध करना चाहता है प्रेम कला नहीं है। प्रेम शाश्‍वत और चिरंतन है जिसका स्‍वरूप तो बदल सकता है पर ‘प्रेम' नहीं बदल सकता।

वैश्‍विक होती दुनिया ने समाज की संरचना को बदलने में अहम भूमिका निभायी है रफी जी का गाया हुआ एक मशहूर गीत लाइन है- ‘इस रंग बदलती दुनिया में इंसान की नियत ठीक नहीं।' जब ‘नियत' का दुश्‍चक्र चल रहा है तो ‘लव केमेस्‍ट्री' बदलेगी ही। जो प्रांजल प्रेम पहले था वह आज नहीं रहा, वह कच्‍चे धागे में बंधा रहने वाला भी नहीं रहा।, वह इसको तोड़ कर दूर निकल गया, फिर भी हिंदी की प्रसिद्ध पत्रिकाओं ने अपने अपने स्‍तर पर ‘प्रेम कथाओं', को स्‍थान दिया ही है। इधर हिंदी साहित्‍य जगत की मशहूर पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय' ने प्रेम महाविशषांक की कड़ी में पाँच अंक निकाले। पहला प्रेम विशेषांक क्‍लासिकल कथाकारों की अमर कहानियां हैं। जिनमें उसने कहा था। (चंद्रधर वर्मा मुलेरी), आकाशदीप (जयशंकर प्रसाद), तीसरी कसम इत्‍यादि। प्रेम महाविशेषांक-3 युवा कथा की कहानियों पर आधारित है जिनमें है पापू कांट लव-सा..........(पंकज मित्र), लव यू हमेशा (अनुज), चन्‍द्रबिन्‍दु बच्‍चों का खेल (महुआ माझी), सुधा कहाँ है ? गौरव सोलंकी इत्‍यादि। उत्तर आधुनिक जगत की कहानियों में युवाओं में प्रेम का जो स्‍वरूप आया है वह अकादमिक जगत का है युवाओं का प्रथम प्रेम सबसे पहले महसूस कालेज या विश्‍वविद्यालय (अकादमिक संस्‍थाओं से) में होता है। अनुज की कहानी ‘लव यू हमेशा' अकादमिक जगत में होने अंतर्द्धन्‍द का खुला चित्रण करती है। सोनल और तिमिर का ‘प्‍लेटोनिक लव' नहीं ‘रीयल लव' है, ‘‘हाँ मिलते हैं। चल फिर, लव यू है.................। लव यू है............।''[ix] इसी तरह की कहानियों में है गौरव सोलंकी ‘सुधा कहा है ?' राजीव कुमार ‘तेजाब' नहीं इतिहास को स्रोत मानकर प्रेम का ‘नया रूप' चित्रित किया है महुआ माझी की कहानी चंद्रबिन्‍दु में, प्रेम को अनावृत्त करने के बजाय आवृत्त किया है। अनुकृति पुनः अपने न्‍यूडमॉडल्‍स के स्‍थान पर ‘स्‍त्री रूप' में आ जाती है, यही इस कहानी की सफलता है।

इधर प्रेम के युवापक्ष को चित्रित करने में युवा कथाकार लेखिका स्‍नोवा बानों की ‘वारदों' लो फिर मैं लौट आई' नये सम्‍बन्‍धों का रेखांकन किया गया है। सुधीश पचौरी ने लिखा है, ‘‘माध्‍यमों ने यथार्थ के साथ हमारे संबन्‍ध को बदल दिया है। हम सीधे ऐंदि्रक बोध से पुष्‍ट यथार्थ को ग्रहण नहीं करते, तनिक उसके माध्‍यमीकृत (दृश्‍य अथवा श्रव्‍य अथव पाठ्‌य) रूप को ग्रहण करते हैं। तकनीक ने सूचना का अतिबोध बढ़ा दिया है, हम स्‍थानीय हो उठे हैं या भूमण्‍डलीय ‘एक दूसरी प्रकृति' (संस्‍कृति) पहली प्रकृति को ढके जा रही है। हमारी भाषा बदल रही है। हमारे प्रतीक बदल रहे हैं। हमारे ढंग बदल रहे हैं।''[x] युवा कथाकारों को प्रेम की भाषा एवं मानकीकरण बदल गये हैं।

‘राजनीतिक ध्रुवीयकरण ने सामाजिक संरचना को बदल ही डाला है। राजनीति के विषय में एक कहावत कही जाती है कि ‘राजनीति में जो कहा जाता है वह किया नहीं जाता है।' राज्‍य की अवधारणा के विषय में प्‍लेटो का विचार है कि ‘राज्‍य का जो स्‍वरूप होना चाहिए वह ‘आदर्शवादी' होना चाहिए।' राजनीति के बदलते तेवर ने ‘आम जनता' को हिलाकर रख दिया है जिसका महत्त्वपूर्ण कारण ‘अवसरवादी राजनीति होना है। ‘सत्ता' प्राप्‍त करने के होड़ में अवसरवादी नेता' किसी भी हद तक गुजर सकते हैं। सलिल सुधाकर ने अपनी कहानी ‘बिरादर' में जातिगत समीकरण' का स्‍पष्‍ट उल्‍लेखकर राजनीति में एक बार फिर ‘जातिगत गोट' बिठाने में ‘राम लगन बाबू' की चतुर राजनीतिक की खिलाड़ी के रूप में सामने आये हैं।‘ सर्वजन समाज' की राजनीति करने का आह्‍्‌वान करते हैं। भारतीय राजनीति में ‘आरक्षण' को फिर से तूल दे दिया गया। ‘आरक्षण' न होकर इसे एक ‘हथियार' के रूप में प्रयोग किया गया है जो भारत की राजनीति का ‘तीखा' और ‘कड़ुवा' सच है जिससे जाति व्‍यवस्‍था मजबूत होती दिखाई देती है, ‘रामलगन बाबू ने समझा कि वातावरण में उलझन व्‍याप्‍त रही है, तो उन्‍होंने सस्‍पेंस खोलने की जल्‍दबाजी दिखाई, ‘‘इसीलिए आप लोगों अर्थात्‌ अपने लोगों की अपेक्षाओं और उम्‍मींदों को पूरा करने के लिए और सर्वजन का समाज बनाने के लिए हमने अब अगड़ों अर्थात्‌ कथित ऊँची जातियों को भी साथ-साथ लेकर चलने का फैसला किया है। आज इस मंच से मैं घोषणा करता हूँ कि हमारी पार्टी अब सवणोंर् के अरकछन के लिए भी संघर्ष करेगी और सत्ता में आने पर इसके लिए कानून भी बनायेगी।''[xi]

‘अस्‍मितावादी साहित्‍य' की बढ़ती मांग ने साहित्‍य की ‘चूले' हिला हिलाकर रख दी हैं अरविन्‍द अडिगा का उपन्‍यास ‘दि ह्‌वाइट टाइगर' में हांशिये पर पड़े पश्‍चिम बंगाल की राजधानी में ‘कोलकाता के रिक्‍शा चालकों की दयनीय दशा को ‘जीते-जागते यथार्थ रूप में उद्‌घाटित किया है। ‘बिजुअल मीडिया' ने हमारे समाज पर सीधा अटैक किया है जिसका प्रभाव हमारी जनरेशन पर पड़ रहा है आगे और भी पड़ता रहेगा। यांत्रिक होती दुनिया, बढ़ती ‘सूचना प्रौद्योगिकी' ने तेजी से हमारे ‘रिश्‍तों' में बदलाव लायी है। ओमा शर्मा की कहानी ‘ग्‍लोबलाइजेशन' सुभाष शर्मा की ‘बर्बादी काम' संजय कुंदन की ‘बाउंसर'। ‘बाउंसर' का गोपी अथक प्रयास के बावजूद भी मशीन जैसा महज आक्रामक शरीर बनकर नहीं रह पाता, जो उसके कार्य की पहली बुनियाद है। उसे परिवार, प्‍यार और अपनापन चाहिए। संजय कुंदन ने अपनी कहानी में एक कला बिकसित कर एक ‘अद्‌भुत' चरित्र गोपी का निर्माण किया है। महामंदी की वापसी ने गोपी सिंहानिया के लिए बाउंसर का कार्य करते हुए भी अपने को निष्‍कृष्‍ट नहीं बना पाता, और न अपने सम्‍बन्‍धों में दरार उत्‍पन्‍न कर पाता है। घर में बने शकरपारे की तरफ उसका मन दौड़ जाता है। उसके सामने सबकुछ व्‍यर्थ लगता है उसे अपनी ‘देशी संस्‍कृति' ही अच्‍छी लगती है ‘फास्‍ट फूड संस्‍कृति' नहीं। गोपी में जीवन जीने की अदम्‍य लालसा है, इसलिए वह अपनी तरह के स्‍वयं के संसार में जीना चाहता है।

भारत की ‘अर्थनीति' ने ‘आम जनमानस' की कमर लचका दी है जिस पर ‘अर्थशास्‍त्रियों' का यह ‘तुर्रा' है कि हम अर्थनीति' के ग्‍लोबल बादशाह बन रहे हैं। अर्थ शास्‍त्रियों ने आँकड़ों पर आँकड़े पर प्रस्‍तुत कर यह सिद्ध भी कर दिया है कि हम कितने भी ‘नालायक हो हमारी ‘अर्थनीति' ‘सबके लिए' सुखदायी है यानी कि अमीर-गरीब या धनी-निर्धन होने के लिए। उनकी कृषि नीति लम्‍बे चौड़े व्‍याख्‍यान दिये जाते हैं हाँ कृषि को वैज्ञानिक विधि से खेती करने पर उत्‍पादन क्षमता का तो विकास हुआ नहीं पर खेती पर लागत दूना हो गयी है। जिसका मुख्‍य कारण रहा है कृषि रसायनों, उर्वरकों, डीजल इत्‍यादि पर मूल्‍यवृद्धि। दूसरी तरफ नहरों में समय पर पानी नहीं छोड़ा जाता है जिससे पैदावार, व उत्‍पादन क्षमता में कम आती है। पंकज मित्र की कहानी ‘बिलौती महतो की उधार फिकिर', ‘शाहूकार' बनते बैंकों की कथा है। जहाँ सब कुछ ‘हाइब्रिड' हो गया है। किसानों को मल्‍टीनेशनल कम्‍पनियों द्वारा ‘खाद-बीज' ऊँचे मूल्‍य में बेचना, अधिक पैदावार का प्रलोभन देना है। यह प्रलोभन किसानों को ऋणग्रस्‍तता की ओर ले जाता है, जिससे उनकी ‘नयी पीढ़ी' भी ‘ऋण' अदायगी में अपना जीवन समाप्‍त कर दें। विलौती महतो को केन्‍द्र में रखकर ‘पंकज मित्र' ने मात्र बिहार के किसानों की ‘दीन-हीन' स्‍थिति का जिक्र नहीं है अपितु किसानों पर बढ़ता ‘प्रकोप' है जिससे किसान को असामान्‍य बनाने या किसान को मृत्‍यु की ओर ले जाने की ओर प्रवृत्त करता है। ‘‘फिकिर तो थी ही। फसल का यही हाल रहा तो क्‍या हाल होगा। उधार लेना पड़ जाएगा क्‍या ? पानी वाला का पैसा तो बैंक में बचे रूपया से चुका देंगे लेकिन उतने पैसा से साल भी खेंपेंगे कैसे। हदरू कब तक देगा आखिर।''[xii] उसे अपनी नहीं अपने परिवार के भविष्‍य की चिंता सता रही है।

‘ग्‍लोबल ‘होता' ‘मनुष्‍य' आन्‍तरिक पीड़ा के अवसाद से ग्रसित हो जाता है उसकी सम्‍वेदनाएं क्षीण होना आरम्‍भ हो जाती हैं वह ‘सत्‍यम ब्रूरता' से असत्‍यम्‌ ब्रूयात की ओर अग्रसर होने लगता है, अपने को वह ‘टाप क्‍लास' का हीरो समझने लगता है और उसके आगे अन्‍य सारे चीजे ‘फ्‍लाप' हो जाती है। खुद को ‘उपभोक्‍ता' समझने लगता है यहीं पर ‘मनुष्‍य का अंत' हो जाता है अर्थात्‌ उसका मनुष्‍यत्‍व समाप्‍त हो गया। सुभाषा शर्मा ने उपभोक्‍तावाद के दो रूप माने हैं पहला, हम मनुष्‍य नहीं रह गये हैं बल्‍कि ‘विभाजित व्‍यक्‍तित्‍व', और ‘देह-विमर्श के रूप में।''[xiii] गाँवों को संवेदनाओं का गढ़ माना जाता है पर आज परिस्‍थितियां बदल गयी हैं वो सारे ‘कुरूप चेहरे' गाँव की भोली भाली जनता को ‘डसने' लगे हैं। इसीलिए शायद अशोक मिश्र ने अपनी कलम से ‘गाँव की मौत' का उद्‌घोष कर दिया। यह उद्‌घोष उनका जायज है। गाँव के युवा जो पढ़ लिखकर सर्विस पा जाते हैं तो वे गाँव की तरफ मुड़कर नहीं देखते हैं उसे दूर से ही नमस्‍कार करना प्रारम्‍भ कर देते हैं। रतन का गाँव अब वह गाँव नहीं रहा, जहाँ आपसी भाईचारा, प्रेम व्‍यवहार, सौहाद्र, मानवीय पीड़ा, सबके दुख-सुख में सामिल होना, ये जैसे ‘भूत' की तरह गायब हो गये। गाँव की चौपाल जहाँ न्‍याय होता था सब समाप्‍त हो गया। रतन अपने गाँव ‘बाबा' की मौत खबर पाकर जा रहा है। उसके गाँव का अन्‍त उसे बार-बार झकझोर रहा है। वह स्‍मृतियों में ‘गोता' लगाता रहता वर्तमान गाँव के हालात से तुलना करता चलता है। ‘‘उसने एक बात गाँव की नई पीढ़ी के संबन्‍ध में काफी गहरे अहसास के साथ नोट की कि वे एक तीसरी दुनियां के व्‍यक्‍ति हैं। ज्‍यादातर युवक किसी से नमस्‍कार तक नहीं करते और मान-सम्‍मान व बड़े-छोटे का लिहाज तो क्‍या। गाँव वाले हर कष्‍ट को एक होकर मिल-जुल कर बाँट लेते थे। शहर में पढ़ी लिखी, पीढ़ी उस सभ्‍य संस्‍कृति से कोसों दूर है। गाँव का जीवन स्‍तर ऊँचा उठाने के लिए सरकार ने जो भी आभास किया उससे अधिकारियों-दलालों का भला हुआ और उसका विकृत रूप सामने आया है।''[xiv]

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‘‘उसके गाँव का दर्द यही है कि शहर की भौतिकवादी संस्‍कृति ने गाँव का धर्म बिगाड़ दिया है। गाँव की शक्‍ल थके हारे बूढ़े जैसे हो गई है जो हर रोज क्षण-क्षण मर रहा है। फिलहाल रतन के गाँव के गाँव का दर्द यही है।''[xv]

कारण यह है कि गाँव, कंकरीट में तब्‍दील हो रहे हैं यह सुखद भविष्‍य है उन्‍हें भी एक पक्‍की छत की आवश्‍यकता है नैतिक मूल्‍य धराशायी हो गये हैं यह दुखद पक्ष है। ‘विकास' की तीव्रगति में भाग लेना चाहता था। विकास की अंधी चकाचौंध ने मानव की गरिमा का महिमा मंडन किया है। ‘एक चुटकी' (डॉ0 दीर्घ नारायाण) भारतीय ‘पंचायती राज ‘व्‍यवस्‍था की कलाई खोलती है। बिहार' (सम्‍पूर्ण भारत) के गाँवों की उस स्‍थिति का चित्रांकन करती हैं जहाँ ‘पंचायती राज' व्‍यवस्‍था पूरा पैसा (रूपया) व्‍यूरोंक्रेट्‌स, और पंचायत का मुखिया मिल बाँटकर हजम कर जाते हैं। मुखिया अपनी स्‍थिति तो सुधार लेता है किन्‍तु गाँव की समस्‍याएं जस की तस बनी रहती हैं, उन्‍हीं समस्‍याओं को केन्‍द्र में रखकर फिर चुनाव लड़ा जाता है। गुंजी और दीनानाथ उसी संस्‍कृति में रम गए।

‘‘मोटर साइकिल में बैठते ही िसर ऊपर आसमान की ओर उठाए, लाख-लाख शुक्रिया' बुदबुदाते हुए वह पंचायत भवन की ओर रूख किया है। स्‍पष्‍टतः कुलानंन्‍द ने पंचायत राज देवी को नई शैली में ‘सस्‍ते' ने वशीभूत कर लिया है, वैसे पंचायती-राज के लगभग सभी देवता और कई देवियों को पंचायती राज-व्‍यवस्‍था के ‘कुलानंदों' ने पहले से ही अपने मन्‍दिर में स्‍थापित कर रखा है, विभिन्‍न प्रकार के स्‍वादिष्‍ट और रंग-विरंगा ‘प्रसाद' देकर मोटा चढ़ावा के साथ। यह बात दीगर है कि कुछ पंचायतें में ‘सबल' दीनानाथ ने पंचायत सचिवों को ‘बेचारा कुलानंन्‍द बनाकर पाल रखा है, कलम की स्‍याही की भाँति इस्‍तेमाल करते हुए।''[xvi] वही हाल है तुम भी खाओ मुझे भी खाने दो।

बर्बर होते समाज ने कुछ ऐसे शरारती तत्त्व पैदा कर दिये हैं जिनका मुख्‍य मकसद समाज में अशांति का वातावरण उत्‍पन्‍न करना होता है। धार्मिक कठमुल्‍लापन, धार्मिक संकीर्णता, कट्‌टरता समाज के लिए हितकारी नहीं होती है। यही कारण रहा है कि जब-जब धार्मिक उन्‍माद की स्‍थितियाँ उत्‍पन्‍न हुई हैं। तब-तब राजनीतिक अस्‍थिरता सामाजिक अस्‍थिरता अवश्‍य बड़ी है। हिंदी कथा लेखकों ने अपने ढंग से उसे चित्रित कर सामाजिक सौहाद्र को बनाये रखने की अपील की है। युवा कथाकारों की इधर कई साम्‍प्रदायिकता कहानियाँ आई हैं। सुशांत सुप्रिम ‘कबीरदास', विजय शर्मा, ‘आतंक' आदि। ‘कबीरदास' अब तक लिखी गयीं साम्‍प्रदायिक कहानियों पर भारी पड़ती हैं यह साम्‍प्रदायिकता का ‘पोस्‍ट मार्टम' करती हैं। जिसमें हिन्‍दू-मुसलमान दोनों ही ‘लावारिस' लाश को देखने के लिए आते हैं, किन्‍तु वह लाश न हिन्‍दू की होती है न मुसलमान की। उस लाश पर दोनों समुदाय के लोगों ने अपनी-अपनी दलीली पेश की। तभी वहां पर उपस्‍थिति ‘कबीरदास' को किसी शरारती तत्त्व ने गोली मार दी स्‍थिति बेकाबू हो गयी-

‘‘अचानक ‘धांय' की आवाज के साथ कहीं से गोली चली। पता नहीं, गोली इधर वालों ने चलाई या उधर वालों ने। पर दूसरे ही पल कबीरदास उस सिरकटी लाश के पास जमीन पर पड़ा, तड़पता नजर आया। लगा जैसे भयंकर आंधी-तूफान में किसी छायादार पेड़ पर बिजली गिर गई हो। देखते ही देखते दोनों ओर की भीड़ में मौजूद दरिंदों के हाथों में बम, देशी कट्‌टे और तलवारें निकल आई। ‘जय श्री राम' और ‘अल्‍लाह-ओ-अकबर' के नारों के बीच दंगे-फसाद शुरू हो गए। चारों ओर चीख-पुकार मच गई। जमीन पर लाशों के ढेर लगने लगे।''[xvii] शासन और प्रशासन दोनों मौन थे इसी तरह स्‍वयं प्रकाश की ‘पार्टिशन' कहानी की रचना करते हैं कबीरदास के विषय में लोग इतना बताते हैं कि वह भाषण देता रहता था-

‘‘भाइयों, हवा किस धर्म की होती है ? धूप का संप्रदाय क्‍या है ? नदी के पानी की क्‍या नस्‍ल है ? आकाश की जात क्‍या है ? परिदें किस कौम के हैं ? बादलों का मुल्‍क क्‍या है ? इंद्रधनुष की बिरादरी तो बताओ, लोगों। सूरज, चांद और सितारों का मजहब क्‍या है ?''[xviii]

हिन्‍दी साहित्‍य में ‘अस्‍मिता-विमर्श' को लेकर ‘दहशतगर्दी-सी' सी व्‍याप्‍त हो गयी। कवि, लेखक, आलोचक, समाजशास्‍त्री, अर्थशास्‍त्री, दर्शनशास्‍त्री, मनोविश्‍लेषक इत्‍यादि नित नये तरीकों से इसकी ‘छान-बीन' कर रहे हैं। ऐसा लग रहा है कोई तेज बवंडर आ जायेगा जिसमें सब ध्‍वस्‍त हो जायेगा, शेष कुछ नहीं रहेगा। दलित-स्‍त्री लेखन न हो गया मानो कोई ‘कोबरा' आ गया है जो डस लेगा हैरानी किस बात की ‘अभिव्‍यक्‍ति' तो है अभिव्‍यक्‍त होने दो कुछ ‘नया' निकल कर आयेगा। दलित लेखन, स्‍त्री-लेखन की होड़ में हर कोई सामिल होना चाहता, किन्‍तु ‘जेंडर' बदलकर। ये ‘डर' कब समाप्‍त होगा। ‘पापुलर' भी होना चाहते हें और डर भी रहे हैं यह खटकता है। उत्तर आधुनिकता ने जो घोषणा कर रखी है कि ‘साहित्‍य मर' चुका है तो मैं कहना चाहता हूँ दलित-साहित्‍य स्‍त्री साहित्‍य पर जो आज गरमा -गर्म बहसें, सेमिनार, डिबेटस आयोजित किये जा रहे हैं यह उनकी भागीदारी को सुनिश्‍चित करता है। समय के साथ बदलाव की मांग है हम आपको बदलना होगा।

दलित कथाकार ने ‘दलित जीवन' की उस त्रासदी का चित्रण कर रहे है जो अब तक हाशिये पर पढ़ा था। इधर ‘ताजा तरीन' कथाकारों में अजय नावरिया, सूरज पाल चौहान, दलपत चौहान, रत्‍नकुमार सांभरिया, अरूण कुमार सिंह, रूपनारायण सोनकर, कर्मशील भारती, सुशील कुमार इत्‍यादि। सूरजपाल चौहान की ‘दो चित्र' दलपत चौहान की ‘नया ब्राह्मण' अपने स्‍तर की नई कथा परिकल्‍पना है जो अब तक छूटी हुई थी। अरूण कुमार सिंह ने ‘सूकर मछव' में संजीवना को ‘दलित पुरोहित' बनाने का प्रयास किया है और सफल भी है, लेकिन दलित चेतना से संजीवना का मोहभंग हो गया है और वह बन गया ‘दलित-पुरोहित-ब्राह्मण' उस पर सामाजिक जातिदंश हावी है। ‘दलित राजनीति' के क्षेत्र में संजीवना को ऊपर उठते दिखाया गया है।

‘‘नौकरी की उमर जाने पर भी संजीवना दिन भर कुछ न कुछ पढ़ता लिखता रहता। वह आते - जाते जिसे भी पकड़ लेता उससे घण्‍टों ज्ञान बघारता। दलित चेतना की आवश्‍यकता, दलित के उत्‍थान के लिए जरूरी बातें, सरकार की छद्‌म दलित नीतियों, वोट की राजनीति और दलित वोट बैंक, गाँधी द्वारा चलाये गये हरिजन आन्‍दोलन की सच्‍चाइयों, राजनीति पार्टियों का दलित प्रेम बाबा साहब अम्‍बेडकर के क्रिया-कलापों, उनके विचार दर्शन और जीवन के बारे में जब वह बोलने लगता तो देखते ही घण्‍टों निकल जाते। संजीवना अक्‍सर चाय की दुकान पर किसी न किसी से बहस लड़ाता बतियाता मिल जाता। वह अक्‍सर बौद्धिक जमाने के लिए रटे-रटाये जुमने बोलता-राजनीति दुष्‍टों की अंतिम शरण स्‍थल है' फिर उसमें संसोधन करते हुए बोलता- ‘मैं इस विद्धान की बात से पूर्णता सहमत नहीं हूँ।' धीरे-धीरे इलाके के लोग उसे बुद्धिजीवी के रूप में देखने लगे। अब वह जनवादी गतिविधियों में भी बढ़ चढ़कर हिस्‍सा लेने लगा। सामाजिक परिवर्तन की बड़ी-बड़ी बाते करते उसे अक्‍सर छोटी-मोटी सभाओं में देखा जाता। स्‍थानीय निकाय के चुनाव में वह महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा। उसके चलते दलितों का वोट बैंक बन चुका था। दलितों का ध्रुवीकरण होता जा रहा था। दलितों की राजनीतिक शक्‍ति भी बढ़ती जा रही थी।''[xix] रामचंद्र की ‘बयार' जाति को तोड़ती है जो ‘अन्‍तर्जातीय विवाह' को ‘प्रकट दर्शन' के रूप में व्‍याख्‍यायित करती है।

स्‍त्री लेखिकाओं ने ‘नारी मन' के उस चित्र को उबार की कोशिश की है जो पुरूष लेखक अब तक नहीं कर पाये। इधर कुछ नई कथा संरचना का जन्‍म हुआ है। कुसुम भट्‌ट की कहानी ‘पुरूष-विमर्श' रंजना जायसवाल की ‘हाँ, मैं अपराधी हूँ कामरेड।', जया जादवानी की ‘जो ‘सदियों से चुप हैं', सीमा शफ़क की ‘हम बेकैद मन बेकैद', वदनाराग की ‘ख्‍यालनामा' इत्‍यादि। ये लेखिकाएं परंपरा से चले आ रहे उस लेखन का विरोध कर रही सहधर्मिणी जहां स्‍त्री को ‘मात्र भोग विलास' की समझा जाता रहा है वह पुरूष वर्चस्‍व को तोड़ना चाहती है। ‘एस्‍थेटिक' की बंधी-बधाई' कड़ियों को तोड़ती हुई दिखती हैं। यह ‘एस्‍थेटिक' ही उन्‍हें बार-बार उनके दिमांग को ‘क्‍लिक' करता है। वह ‘घर' और ‘बाहर' अर्थात्‌ वे ‘कदम ताल' मिलाकर चलना चाहती है। किसी भी क्षेत्र में। कुसुम भट्‌ट ने ‘पुरूष-विमर्श' में पुरूषिया डाह को अभिव्‍यक्‍त किया है। पुरूष के नैतिक पतन पर सीधा-सा आक्षेप करती है। नारायण तिवारी सच्‍चचरित्र है। नीलम दुबे व अन्‍य लोग ‘नारायण तिवारी' को सच्‍चचरित्र होने का सर्टीफिकेट देते हैं और अपने ही आफिस में चपरासी ‘बंडू' के कहने पर सभी लोग उसे ‘दुश्‍चरित्र' साबित करते हें। दूसरी तरफ यह कहानी ‘देह विमर्श' और पारिवारिक मूल्‍यों का विघटन दिखाती हैं और ईश्‍वर के अस्‍तित्‍व को नकारती है।

‘‘इतनी छोटी-सी बात के लिए उसे कष्‍ट देना उचित होगा............? उन्‍होंने खुद से कहा और चलते......................मंदिर की चौखट पर पाया खुद को............मूर्तियों को निहारने लगे नारायण.....................पुजारी ने शंख बजाया तो उन्‍हें बोध हुआ खालिस पत्‍थरों की मूर्ति................।''[xx] छूसरी तरफ सेक्‍स की भूख को प्रथम प्राथमिकता देती है।

हिन्‍दी सिनेमा पर फोकस करती अशोक गुप्‍ता की ‘कोई तो सुनेगा' फैशन टैक्‍नोलाजी पर या विज्ञापन माडलिंग की दुनिया का पाठ करती सोहन शर्मा की ‘वो आखिरी बार सैन फ्रांसिस्‍को में देखी गयी थी', विस्‍थापन जमीन के मुद्दों पर मधुकांकरिया की ‘नंदीग्राम के चूहे' अभिज्ञात की ‘कामरेड और चूहे' गौरव सोलंकी की ‘ब्‍लू फिल्‍म' साइबर क्राइम की अंधड़ प्रेम कथा है।

निष्‍कर्षतः कहा जा सकता है कि युवा कथाकार उन समस्‍त बिन्‍दुओं पर फोकस कर रहे हैं जो ‘क्‍लासिकल कथाकारों की दृष्‍टि से दूर रहा। उन पर न ‘बाजार' हावी है न ‘बाजारीकरण' की प्रविधि। वे ‘इतिहास' और ‘सभ्‍यता' को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं। नयी सांस्‍कृतिक अवधारणा को स्‍थापित कर ‘विश्‍व' को ‘स्‍थानीय' बना देना चाहते हैं जहां समानता की अवधारणा कायम की जा सके। तभी तो उनकी सृजनात्‍मक, कहानियों में परंपरा, रूढ़ियाँ, रीति-रिवाज, जड़ता, विखण्‍डन, धर्म, संस्‍कृति, राजनीति, विचारधारा, मानव-मूल्‍य, नैतिकता, श्‍लील-अश्‍लील, सेक्‍स, यांत्रिकता, प्रोद्यौगिकी, सूचनाक्रांति, साइबर क्राइम, कार्पोरेट कल्‍चर, कार्पोरेट सोसाइटी, उपभोक्‍तावादी संस्‍कृति, माल संस्‍कृति, फैशन टेक्‍नालाजी, विज्ञापन की दुनिया, लिव-इन-रिलेशनशिप, समलैंगिक चित्रण, सेक्‍स का उन्‍मुक्‍त चित्रण, देह की संस्‍कृति, बाजारवाद, मीडिया-विमर्श, प्रेम का बदलता स्‍वरूप मास कल्‍चर, मास लिटरेचर, नक्‍सलवाद, आतंकवाद, साम्‍प्रादायिकता, वैयक्‍तिक पीड़ा, पानी की समस्‍या, किसान, आदिवासी विस्‍थापन की समस्‍या, प्रवासी-अप्रवासी बदलने की क्रियाएं, सम्‍वेदनाओं का होता क्षरण, बढ़ती महंगाई, नवसाम्राज्‍यवाद, नव उपनिवेशवाद इत्‍यादि मूलभूत समस्‍याओं पर पाठकों का ध्‍यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। जीवन के विविध पक्षों को लेकर वह आगे की ओर बढ़ रहे हैं एक नये विकल्‍प के साथ।

संदर्भ -


[i] समीक्ष के नये प्रतिमान ः डॉ0 रघुवीर सिंह, पृ0 20 (तक्षशिला प्रकाशन, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्‍ली प्रथम सं0 1977)

[ii] वही, पृ0 20-21

[iii] हंस, जनवरी 2010, पृ0 96 (संजीव ः हिंदी कहानी आज के सरोकार और भविष्‍यकी चिंता)

[iv] समयान्‍तर, फरवरी 2009, पृ0 32 (प्रियम अंकित ः नए समय की आहट)

[v] हंस, अक्‍टूबर 2009, पृ0 14

[vi] बया, दिसम्‍बर 2008 - मई 2009, पृ0 82

[vii] तद्‌भव, जनवरी 2009, पृ0 242

[viii] वही, पृ0 272

[ix] नया ज्ञानोदय, सितम्‍बर 2009, पृ0 33

[x] उत्तर आधुनिकता ः कुछ विचार, सं0 देवशंकर नवीन, सुशान्‍त कुमार मिश्र, पृ0 18

[xi] हंस, फरवरी 2009, पृ0 20

[xii] प्रगतिशील उद्‌भव, अक्‍टूबर-दिसम्‍बर 2009, पृ0 48

[xiii] नया ज्ञानोदय, जनवरी 2009, पृ0 60 (सुभाष शर्मा ः उपभोक्‍तावाद की त्रासदी)

[xiv] लमही, अक्‍टूबर-दिसम्‍बर 2009, पृ0 92

[xv] वही, पृ0 93

[xvi] वाक्‌, अंक-6, जून-अक्‍टूबर 2009, पृ0 156-157

[xvii] वही, पृ0 145

[xviii] वही, पृ0 146

[xix] पक्षधर, अंक-8, पृ0 118

[xx] हंस, नवम्‍बर 2009, पृ0 64

संपर्क

असिस्‍टेण्‍ट प्रोफेसर हिंदी विभाग कौषल्‍या भारत सिंह ‘गाँधी' राजकीय महिला महाविद्यालय, ढिंढुई पट्टी प्रतापगढ़

ई-मेल - drdivyanshu.kumar6@gmail.com

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(कुंडलियां)

नथ

नथ की अकथ कहानियां ,रच डाले इतिहास।

कभी रही चित चोरनी, कभी हास परिहास॥

कभी हास परिहास बहुमुखी किलोलें करे चिबंक पर।

मूंगा मोती मकर आकृति अंगना ज्‍यों खग लागे पर॥

'प्रखर' हिलोरें उर अर्न्‍त में जैसे काम चढा हो रथ।

इतिहास बन गयी मंहगाई में हाय फैशन मारी नथ॥

 

जीवन का रण

आखिर

सब्र का इम्‍तिहान

लेंगे कब तक

अर्न्‍त व्रण,

तल्‍ख तकरीर

का सबब

बन गये आज वही क्षण,।

सुकून की

जिन्‍दगी दुश्‍वार

लगती

या फिर यूँ कह लें

जिन्‍दगी के फलक पर

अमर्ष में बिंधा कण कण,॥

क्‍या पैसे का कद

मानवता से बडा हो गया,

दौलत की चमक में

कहीं अपने होने का

अस्तित्व खो गया,

नहीं चाहिए,

ढेरों सुख सुविधा खुशियां

ढलती शाम में

चाहिए मात्र सुकून का क्षण॥

जैसा पहले था

आज भी वैसा ही

पहले भी खाली आज भी

जब कुछ नहीं तो डर कैसा......?

डर यही मीत !

परास्‍त न कर दे

जीवन रण॥

सूर्य का तेज

निशीथ की चांदनी

कहां शास्‍वत

विभव होता निश्‍चित

करता वह आश्‍वस्‍त

'प्रखर' शक्‍तियों में

रह जायेगी केवल हड बड॥

 

बिना शुल्‍क

बिना शुल्‍क के

कुछ नहीं मिलता

पेट काटकर

मुफ्‍त खा रहे,

पकड़े पीछे

जेल जा रहे,

वक्‍त किसी का

हुआ कभी क्‍या

दांव लगा तो निश्‍चित छलता॥

 

पैरों में स्‍वर्ग

जिसके कारण

संज्ञा चहके

स्‍वर्ग उसी के पैरों में।

करती नित्‍य

परास्‍त दुःखों को,

चादर नहीं

बनाए सुखों को ,

फटे हाल बेहाल

वही अब

गैरत कंह उन बेगैरों में॥

(पुस्‍तक समीक्षा)

काव्‍य रश्‍मि की आभा : काव्‍यकांति

गद्य का सृजन तो चिंतन ,पठन,विमर्श अर्थात मस्तिष्क की उपज है,जबकि पद्य हृदय में तिरोहित होती संवेदनाओं व्‍यथा,पीडा के दंश से आहत की खनक ,अल्‍हाद अनुभूति से अभ्‍युदित हुआ उद्‌गार का लावा है जो शब्‍दों में ढलकर कागद पर सरकार होता है। वस्‍तुतः सच्ची कविता वही है जो हृदय से सम्‍वेत उद्धृत हो । इसी की सार्थक परिणीत श्री कांत अकेला कृत काव्‍यकांति है जिसे रश्‍मि प्रकाशन नाहन (हि0प्र0) ने प्रकाशित किया है। यद्यपि कवि का प्रथम प्रयास है परन्‍तु युवा उमंगों की हिलोरें कुछ कर गुजरने का भाव पृष्‍ठ दर पृष्‍ठ कविता को चरम तक ले जाने का प्रयास करता है। जिसमें आशान्वित सोच,प्रणति निवेदन ,प्रेम का अंकुरण, तो वहीं कवि के विद्रोही स्‍वरुप्‍ के भी पाठक का सामना होता है।

यथा ः-

कब तक माँ भूखे बिलखते बच्‍चों को

दिलासा देने के लिए

कच्‍चा पानी उबालती रहेगी ?

शासन ,सियासत और प्रशासन में भ्रष्‍टाचार के साथ मानो चोली दामन का साथ है। इस मुद्‌दे को कृतिकार ने बखूबी उठाया है। चूंकि कवि अकेला जन्‍मभूमि और कर्मभूमि की मनोहारी प्रकृति से निकट का संबंध है। उसका मन र्प्‍यावरणीय चिन्‍ता से त्रस्‍त है। उसे टिहरी बांध में जल समाधि बने टिहरी नगर के साथ उसकी लोक संस्‍कृति ,इतिहास,सभ्‍यता भी जल में विलीन हो गये। आधुनिकता एवं विकास का प्रलयंकारी रुप वीभत्‍स और भयानक भी है।

समग्रतः कवि का प्रयास सार्थक है। यदि कवि अकेला मात्रिक व्‍याकरण की त्रुटियों का विशेष ध्‍यान रखते कृति का रुप और निखरता ।आशा है कृतिकार भविष्‍य में दन बिन्‍दुओं पर गौर करेंगे। पुस्‍तक पठनीय एवं संग्रहणीय है।

--

कृति ः काव्‍यकांति

मूल्‍य ः 120 रुपए

प्रकाशक ः रश्‍मि प्रकाशन नाहन (हि0प्र0)

समीक्षक

रघुनन्‍दन प्रसाद दीक्षित प्रखर

शांतिदाता सदन,

नेकपुर चौरासी

फतेहगढ (उ0प्र0) पिन209601

ईमेल:

Dixit4803@rediffmail.com

मैं निडर हूँ

मैं निडर हूँ, अब किसी भी बात से डरता नहीं हूँ।

 

ज़िन्‍दगानी के सफ़र में,

लाख रोड़े हों डगर में,

अब न कोई फ़र्क पड़ता,

सामने तू दीख पड़ता।

हों अंधेरे लाख बाहर, फिक्र मैं करता नहीं हूँ।

मैं निडर हूँ, अब किसी भी बात से डरता नहीं हूँ।

 

फूल की है चाह ना,

अब शूल की परवाह ना,

नाम तेरा, आस तेरी,

नाव औ‘ पतवार मेरी।

तू ही माझी, अब भंवर की चाल से डरता नहीं हूँ।

मैं निडर हूँ, अब किसी भी बात से डरता नहीं हूँ।

 

जब से तूने बाँह थामी,

बदली मेरी ज़िन्‍दगानी,

तेरी करुणा का भिखारी,

मौन का मैं हूँ पुजारी।

अब भ्रमर की भाँति मै हर डाल पर फिरता नहीं हूँ।

मैं निडर हूँ, अब किसी भी बात से डरता नहीं हूँ।

 

भाव अर्पित, कर्म अर्पित,

कर रहा सब कुछ समर्पित,

अब संभालो नाथ मुझको,

बस तुम्‍हारी आस मुझको।

अब तुम्‍हारी राह से मैं चाहता डिगना नहीं हूँ।

मैं निडर हूँ, अब किसी भी बात से डरता नहीं हूँ।

--

-सी ए. अनुराग तिवारी

5-बी, कस्‍तूरबा नगर,

सिगरा, वाराणसी- 221010

--

वे ही पल पल तोड़ा करते

सुबह शाम और जब जी चाहा
मंदिर मस्जिद जाते लोग
ईश्वर को देते हैं धोखा
अल्लाह को भरमाते लोग।

दिन तो छल छंदों में बीता
रातें काटीं मस्ती में
फिर भी सड़कों पर मिल जाते
भजन कीर्तन गाते लोग।

पहले तो अंतरमन से
आंखों का परदा होता था
अब तो खुलकर खाने में भी
कहीं नहीं शरमाते लोग।

दिन दिन बढ़ती जातीं
अरमानों की भूखी लाशें
चारों ओर मिला करते हैं
अपने को गरमाते लोग।

मतलब की भूखी मंडी में
ईमानों की कहां कदर
पता नहीं क्यों घूमा करते
दिल लाते ले जाते लोग।

हाथ मिला कर गला काटना
ये तो सबने सीखा है
पता नहीं क्यों खुश होते हैं
अपनी नाक कटाते लोग।

बेशरमी और बेरहमी
के नंगे तांडव होते हैं
लाज भले ही शरमा जाये
किंतु नहीं लजाते लोग।

कुछ‌ छ लोगों ने प्रजातंत्र की
बागडोर है थाम रखी
जब भी चाहा जैसे चाहा
सबको यही नचाते लोग।

असली चेहरे तो कहने के
सब पर लगे मुखौटे हैं
कहते कुछ हैं करते कुछ हैं
बस गिरगिट बन जाते लोग।

झूठ बोलना धरम‌ हो गया
वेद पुराण हुये पाखंड
खुदको सच्चा और गेरों को
झूठा ही बतलाते लोग।

नियम कायदे तो कहने को
ढेरों लिखे किताबों में
वे ही पल पल तोड़ा करते
जो कानून बनाते लोग।

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नारी और प्रगति

नारी

नर से बढ़कर

कर रही है दायित्‍वों, कर्त्तव्‍य का निर्वहन

एक ही नहीं

तीन-तीन स्‍वरूपों में

कभी पुत्री, कभी पत्‍नी

तो कभी मां के रूप में;

किन्‍तु-

अधिकार, विचार स्‍वातंत्र्य अति संकुचित।

योग देखे तो-

बालकों की पालिता होने से

पुरुषों से दो गुनी,

पर-

चतुर्दिक हो रही

हत्‍या, बलात्‍कार, दहेज, हिंसा का शिकार,

शोषण पर दृष्‍टि डालें

सर्वाधिक हो रहा

नारी के ही किसी न किसी रूप से

स्‍वतंत्रता के

बीते अनेक दशकों के बाद भी,

घोषणाओं-

असंख्‍य कानूनों, स्‍वंयसेवी संस्‍थाओं के

बाद भी

परिणाम ढाक के तीन पात ;

वह चहुँ ओर आतंक ग्रस्‍त

नस दुर्बल

होते अपराध कर भयमुक्‍त,

उठ रहे हैं प्रश्‍न

उत्तर के लिए सन्‍नाटा रात सा

दिशायें भी मौन

देश-इक्‍कीसवीं सदी में,

मेरी समझ में नहीं आता;

जब तक-

भारतीय नारी के अस्‍तित्‍व पर प्रश्‍न चिन्‍ह

उस पर चतुर्दिक से क्षुभित आक्रमण

पलायन भी स्‍वतंत्रता की ओर न हो

यदा-कदा स्‍वच्‍छन्‍दता की ओर।

शक्‍ति स्‍वरूपा को

जाग्रत कर पुनः

स्‍थापित करना पड़ेगा उस स्‍थान पर

जहां से निर्भय हो चल सके

रमन्‍ते तत्रदेवता की उक्‍ति

सार्थक हो

टूटे सदियों का दुष्‍चक्र

समयानुसार पकड़े वह प्रगति के पथ

तभी-

हम, हमारा समाज व राष्‍ट्र

कर सकेंगे सच्‍ची प्रगति

सार्थक दो मानवता के पहियों द्वारा

हां नर और नारी।

--

 

नारी पूजनीय है

मैंने कल पड़ते देखा था

छीटों को एक नारी पर,

कीचड़ के काले धब्‍बों को

श्रेष्ठ पुरुष से परनारी पर।

नारी क्‍या केवल माता है

अबला बनी यह त्राता है,

आश्रिता, दमिता बनी कल से

समाज उंगली उसपे उठाता है।

इक्‍कीसवीं सदी की बातें हम

गौरवान्‍ति हो सबसे करते हैं,

नारी पर अत्‍याचारों के बादल

रह-रह के आंसू बन झरते हैं,

हत्‍या, बलात्‍कार,शोषण के रूप

सर्वस्‍व नारी ही रहती सहती है,

वहशीपन है दानवता हंसती

मानवता खड़ी सिसकती है।

असंख्‍य कानून जागृति संस्‍थायें

भाषण-घोषणायें भी होती हैं,

समान अधिकार की भी बातें

पर बन न सकी यह ज्‍योति है।

यदि दीपक की बाती यह समाज की

नर को काम तेल का करना होगा,

समाज देश, वैभवपूर्ण हो जाये

नारी पूजनीय है कहना होगा॥

--

सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-2424010प्र0

ईमेल- shashank.misra73@rediffmail.com

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आओ कहें...दिल की बात
कैस जौनपुरी

बेटा जिग्नेश...तुम कहाँ हो...?

बेटा जिग्नेश...! तुम कहाँ हो...? मैं, तुम्हारी माँ चन्दन, आज बीस साल से तुम्हारा इन्तजार कर रही हूँ. काश...! मेरी बात तुम तक पहुँच सके.

बेटा, लौट आओ. तुम एक छोटी सी बात पर इतना नाराज हुए कि घर ही छोड़ दिया...? मैंने तो तुम्हारी भलाई के लिए कहा था, जो भी कहा था. हर माँ अपने बच्चे को डाँटती है लेकिन हर बच्चा तुम्हारी तरह घर तो नहीं छोड़ देता ना...?

बेटा, अगर मुझे पता होता कि मेरी एक डाँट तुम्हें इतनी बुरी लगेगी तो मैं तुम्हें कभी नहीं डाँटती. और मैंने तो तुम्हें कितने अरमानों से पाला था. तुम बारह साल के थे उस वक्त जब तुमने घर छोड़ा था. आज इस बात को बीते लगभग बीस साल हो गए हैं. अब तो तुम तीस-बत्तीस साल के हो गए होगे. सात बहनों के तुम अकेले भाई थे. सबके लाडले थे तुम.

बेटा, हम अब भी अम्बोली में ही रहते हैं. तुम एक बार वापस आ जाओ. साल भर हुआ तुम्हारे पिताजी भगवान दास भी नहीं रहे. जाते-जाते उनकी तुम्हें देखने की इच्छा भी पूरी नहीं हुई.

बेटा, हमने तुम्हें बहुत ढूंढा. टीवी, अखबार, पुलिस हर जगह तुम्हारी खबर दी. मगर तुम्हारा कहीं पता नहीं चला. हम हारकर एक ज्योतिषी के पास भी गए. उसने बताया कि तुम जिन्दा हो. ठीक हो. किसी बेऔलाद माँ-बाप के पास हो.

बेटा, तुम जहाँ भी रहो. खुश रहो. बस एक बार आकर हमसे मिल लो. तुम्हारे पिताजी तो आस लगाए-लगाए ही चल बसे. वो तो अच्छा है तुम्हारे सामने ही तुम्हारी सातों बहनों की शादी हो गई थी. सबसे छोटी बहन की शादी के बाद ही तुमने घर छोड़ा फिर पलट कर नहीं आए. तुम उस वक्त छठी क्लास में पढ़ते थे.

अब मैं बची हूँ जिसे तुम्हारा इन्तजार है. बेटा, मुझे माफ कर दो. मुझसे गलती हो गई. बेटे के अरमान में मैंने सात बेटियों को जन्म दिया. उसके बाद तुम हुए. लेकिन मुझे क्या पता था कि इतने लाड-प्यार से जिसको पाल रही हूँ वो मेरी एक डाँट सुनकर घर छोड़ देगा.

बेटा, अपनी माँ से भला कोई इतना नाराज होता है...? बेटा, वैसे तो माँ अपने बेटे की हर गलती माफ कर देती है. ये मजबूर माँ तुझसे माफ़ी माँगती है. मुझे माफ कर दे बेटा. बस एक बार तू अपनी सूरत दिखा जा. फिर तू चले जाना जहाँ भी तू चाहे.

भगवान करे तू सदा सुखी रहे बेटा. अगर तू मुझसे अब भी नाराज है तो बस एक बार आजा...मैं तेरे आगे हाथ जोड़कर तुझसे माफ़ी मांगूंगी. तू बस लौट आ मेरे बच्चे. तू नहीं जानता एक माँ के कलेजे पर क्या बीतती है जब उसका बेटा उसकी आँखों के सामने न हो. और फिर तू तो अपनी माँ से नाराज होकर चला गया. मैं भी अब कुछ दिनों की मेहमान हूँ बेटा.

हो सके तो लौट आओ जिग्नेश...!

कैस जौनपुरी

 

qaisjaunpuri@gmail.com

www.qaisjaunpuri.com



रवीन्द्र नाथ टैगोर को आज सम्पूर्ण विश्व उनकी 150वीं जन्मशती पर शत्-शत् नमन करता है एवं अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि
युगद्रष्टा गुरूदेव रवीन्द्र नाथ एवं उनकी साहित्य यात्रा
(विशेष रूप से काव्य के संदर्भ में)


विश्व वांगमय में कवीन्द्र रवीन्द्र को मूर्धन्य स्थान प्राप्त है। उनकी साहित्यिक कृतियों व रचनाओं में उनमें छिपी दैवीय सर्जनात्मक शक्ति का प्रतिफलन है जिसके प्रभाव से देश ही नहीं अपितु विश्व के जन प्रभावित हुये। उनकी ख्याति देश काल की परिधि से बाहर है। अनेक भाषाओं में इनकी कृतियों का अनुवाद हुआ है। रवीन्द्र साहित्य के एक-एक विधा पर शोधरत शोधार्थियों ने शोध किया है। बंग्ला में भी नई-नई दृष्टियों से बहुत काम हुआ है। अब भी हो रहा है।

रवीन्द्र नाथ जी ने बहुत लिखा है इसमें कविता है, उपन्यास है, कहानियाँ हैं, नाटक हैं, निबन्ध है, आलोचना है तथा साहित्य अपने व्यापक अर्थ में जो कुछ भी सूचित करता है उन सब पर उनका अबाध अधिकार था। अपनी साहित्यिक रचनाओं में सर्वत्र उन्होने सत्य पर विचार किया है - ‘‘क्या जगत, क्या भौतिक जगत और क्या स्वदेश और क्या विदेश, सर्वत्र सत्याचरण को ही उन्नति और अभ्यूदय का मूल मंत्र समझना चाहिए।1 कवि ने अपने जीवन में भी और अपने ग्रंथों में भी इसी सत्य का जय-जयगान किया हैं ।

रवीन्द्र नाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता के जोड़ासाकी मुहल्ले में हुआ था। उनके पिता का नाम महर्षि देवेन्द्र नाथ टैगोर था जो कलकत्ता के सम्पन्न एवं सम्मानित व्यक्ति थे। पारिवारिक पृष्ठभूमि के सम्बन्ध में कहा जाता है कि 17वीं शताब्दी के अन्तिम दिनों में पंचानन खुशारी नाम का एक ब्राह्मण व्यक्ति कलकत्ता के गोविन्दपुर गांव में आकर बस गया जो बंगाल के खुलना जिले का रहने  वाला था। गांव के लोग उन्हें आदर से ठाकुर कहने लगे। अंग्रेजों के साथ वह व्यापार करने लगा। ठाकुर शब्द ही कालांतर में अंग्रेजी उच्चारण के कारन ‘ टैगोर’ बन गया।2 पंचानन के बेटे का नाम था द्वारिका नाथ टैगोर। पिता के व्यापार में द्वारिका नाथ ने पूरा सहयोग देते हुए व्यापार को ऊँचाई पर स्थापित किया। द्वारिका नाथ ठाकुर बड़े शान-शौकत से रहते थे तथा उन्हें प्रिंस कहा जाता था। वे एक व्यापारी के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता भी थे तथा कलकत्ता के शैक्षिक स्तर को ऊँचा उठाने में उन्होंने अपूर्व योगदान दिया। राजा राममोहन राय के साथ रहते हुए समाज सेवा में अपना योगदान दिया। द्वारिकानाथ ठाकुर के बड़े बेटे थे- देवेन्द्र नाथ टैगोर। इन्होंने भी पिता के व्यापार को आगे बढ़ाया परन्तु इनका जीवन सरल एवं गम्भीर था। इन्होंने आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों को अपनाया। 1946 में द्वारिका नाथ ठाकुर की मृत्यु के पश्चात् ये ब्रह्म समाज में शामिल हो गये तथा धार्मिक आध्यात्मिक रूचि से लोग उन्हें महर्षि कहने लगे। देवेन्द्र नाथ ने शारदा देवी से विवाह किया तथा उनसे इन्हें चौदह सन्तान हुए। रवीन्द्रनाथ देवेन्द्र नाथ के सबसे छोटे पुत्र थे।

यद्यपि कुल परिवार सम्पन्न एवं समृद्ध था परन्तु पारिवारिक माहौल अत्यंत अनुशासित एवं मर्यादित था जिसका प्रभाव रवीन्द्र नाथ पर भी पड़ा। घर के सभी सदस्य अध्ययनप्रिय एवं साहित्य व कला में अभिरूचि रखने वाले थे। पारिवारिक माहौल सदैव शिक्षा के प्रति प्रेरित करने वाला था।

बचपन से ही रवीन्द्र नाथ अत्यन्त जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे। यदि किसी बात को जानने की जिज्ञासा उनमें होती तो वे उसे जान कर ही दम लेते थे। प्रकृति के रहस्यों को जानने की उनकी तीव्र ललक थी। अपनी आत्मकथा में अपनी उत्सुकता का वर्णन अनेक प्रसंगों पर किया है। पृथ्वी व आसमान के रहस्यों को जानने की बड़ी तीव्र इच्छा थी। आसमान नीला क्यों होता है? इसका किनारा कहां तक है? इत्यादि बातें इनके मन में कौंधती रहती थी। इन्हीं रहस्यों को जानने तथा सत्य तक पहुंचने की तीव्र उत्कंठा ने रवीन्द्र नाथ को रहस्यवादी कवि बना दिया।
रवीन्द्र नाथ की आत्मकथा को पढ़ने से एक बात सामने आती है कि वे शिक्षा के प्रति विशेष गम्भीर नहीं थे। प्राकृतिक सौन्दर्य उनका मन लुभाता था, चित्र उन्हें बहुत अच्छे लगते थे। संगीत की ध्वनि पर उनके पांव थिरकने लगते थे परन्तु पढ़ाई लिखाई उन्हें नीरस लगती थी। वे पढ़ाई से बचते थे और अलग जाकर बैठ जाया करते थे। अपनी इस आदत के बारे में उन्होंने  अपनी आत्मकथा में लिखा है --‘‘मौका मिलते ही मैं दूसरी मंजिल पर जाकर खिड़की में बैठ जाता था। और अपना वक्त बिताया करता था। मैं यह गिना करता था कि एक साल बीत गया, दो साल बीत गये। तीन साल बीत गये। इस तरह गिनते-गिनते  मैं सोचने लगता था- पता नहीं कितने साल अभी और बिताने पडेंगे इस नीरस पाठशाला में यहाँ,ं पता नहीं कब मुझे मुक्ति मिलेगी।’’3 
तेज दिमाग, जिज्ञासु प्रवृत्ति तथा दैवीय प्रतिभा ने आगे चलकर रवीन्द्र नाथ को गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर तथा कविन्द्र रवीन्द्र जैसे नामों से सुशोभित किया।

मात्र 7 वर्ष की उम्र में रवीन्द्र नाथ ने अंग्रेजी कवि हेमलेट की तर्ज दर बंग्ला में छंद कविता लिखा जो ‘नेशनल पेपर‘ (सम्पादक-नवगोपाल मिश्र) के बाल कविताओं के अन्तर्गत प्रकाशित हुआ। इस विलक्षण प्रतिभा से इनके पिता अत्यन्त प्रसन्न हुए। रवीन्द्र नाथ की लेखन प्रतिभा का विकास शनैः शनैः होने लगा। 16 वर्ष की आयु तक अनेक कवितायें लिख डाली। 1877 में जब बड़े भाई ज्योतिरिन्द्र नाथ ने ‘भारती’ नामक पत्रिका का प्रकाशन किया तो रवीन्द्र नाथ को सम्पादक मंडल में रखा तथा रवीन्द्र नाथ ने इसमें ‘मेघनाथ वध‘ की समीक्षा लिखी जो लोगों में अत्यन्त सराहनीय रहा। यह इनका पहला गद्य लेख था। साथ ही इतने कम उम्र में पत्रिका का सम्पादन हैरान करने वाला था। हिन्दी, अंग्रेजी, बंगला तथा संस्कृत इत्यादि अनेक भाषाओं का ज्ञान इन्हें था।

पिता ने रवीन्द्र की बहुमुखी प्रतिभा को देखते-परखते हुए विलायत भेजकर पढ़ाने का निश्चय किया। बड़े बेटे सतेन्द्र नाथ जो कि अहमदाबाद में सिवील जज थे, उनके साथ रवीन्द्र को इग्लैण्ड भेजा तथा वहाँ ब्राईटननगर में एक स्कूल में नाम लिखा दिया। कुछ दिनों पश्चात लन्दन के स्कूल में दाखिला कराया। पढ़ाई के दौरान अंग्रेजी साहित्य ने  रवीन्द्रनाथ को विशेष रूप से प्रेरित किया।

पश्चिमी संस्कृति, खुला व्यवहार एवं पाश्चात्य संगीत ने रवीन्द्र नाथ के युवा मन को प्रभावित करने के साथ ही उनकी सृजन प्रतिमा को भी मुखरित एवं उत्सर्जित किया। उन्होंने प्राकृतिक सौन्दर्य से प्रेरित होकर अत्यंत सुन्दर कविता की रचना की जिसका शीर्षक था- महनतरी। इसके पश्चात् कविता के रूप में एक नाटक लिखा जिसका नाम था- ‘भग्न हृदय‘। चार हजार पक्तियों वाला यह नाटक शुद्धतः प्रेमकथा पर आधारित था। इसके पश्चात् बाल्मीकी प्रतिभा नाटक लिखा तथा मंचन भी किया जिसे साहित्य प्रेमियों ने सराहा। कविता से रवीन्द्र को विशेष लगाव था। इनकी लिखी कवितायें सोहय गीत, प्रभात गीत तथा हृदय व्रत इत्यादि शीर्षकों से प्रकाशित हुई। इनकी कविताओं में प्राकृतिक सौन्दर्य जैसे नदी, सागर, चाँदनी रात, गंगा तथा प्रकृति की गोद में बिखरे सौन्दर्य का हृदयस्पर्शी वर्णन मिलता है। बाद में रवीन्द्र नाथ ने अनेक गीतों एवं रागों की रचना की। दिसम्बर 1884 में 22 वर्ष की उम्र में रवीन्द्र नाथ का विवाह मृणालिनी देवी से हुआ।
साहित्य के अन्तर्गत काव्य की ओर देखें तो हम पाते हैं कि रवीन्द्रनाथ ने अपने साहित्य यात्रा के प्रथम पर्व अर्थात् काव्य का आरम्भ ‘संध्या संगीत‘ (ई0 सं0 1882 जुलाई) से माना है क्योंकि विश्व भारती से जब रवीन्द्र रचनावली’ प्रकाशित होने लगी तब सन्ध्या संगीत से पूर्व के ग्रंथों को इसमें नहीं रखा जबकि इससे पूर्व भी उन्होंने काफी कुछ लिखा जिसे विश्वभारती ने ‘रवीन्द्र रचनावली‘ अचलित  संग्रह‘ नाम से छापा है।4 1890 ई0 सं0 में उन्होंने ‘मानसी‘ लिखा जिसने उन्हें कवि के रूप में प्रतिष्ठित किया। परन्तु इसके बाद लिखे गये ‘सोनार तरी‘ ने इनके पाठकों व प्रशंसकों को आकर्षिक किया तथा साहित्य जगत में उच्च स्थान पर प्रतिष्ठित किया।

जिन कविताओं को रवीन्द्र रचनावली संग्रह में रखा गया उनमें - कवि काहिनी, बनफूल, भग्न-हृदय, रूद्रचंड, शैशव संगीत, इत्यादि प्रमुख है। बनफूल में आठ सर्ग है। कवि काहिनी में चार सर्ग हैं। भग्न हृदय और शैशव संगीत भी (इसवी संवत 1884) में लिखी गई। ये सभी कविताएँ कम उम्र में लिखी गयी छोटी-छोटी प्रेमगाथायें, रीति कवितायें तथा गान है। भग्न हृदय चौबीस सर्गों में लिखा रवीन्द्र काव्य का सबसे बड़ा गाथा काव्य है। ‘रूद्र चण्ड‘ (ई0 सं0 1881) भी गाथा या कथा काव्य है। यह रवीन्द्र नाथ का आखिरी कथा काव्य है।

संध्या संगीत के पश्चात् ‘‘भानू सिंह ठाकुरेर पदावली’’ ई0 सं0 1884 के प्रकाशित हुआ। यह ग्रंथ कृष्ण भक्त कवियों की पदावली के आधार पर लिखा गया है।

‘प्रभात संगीत‘ की रचना रवीन्द्र नाथ ने ई0 सं0 1883 के करीब की। प्रभात संगीत की रचनाओं में रवीन्द्र नाथ की जीवन के प्रति दृष्टिकोण दिखाई देता है। अनुभव व परिपक्वता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। इस समय वे चिन्तनमनन करना आरम्भ कर दिये थे। जीवन-मरण की अनन्तता को स्वीकार करते थे।  अनन्त जीवन, अनन्त मरण, प्रतिध्वनि इत्यादि के बारे में रवीन्द्र नाथ ने लिखा। प्रभात संगीत में प्रतिध्वनि नाम की एक कविता भी है। इसके अतिरिक्त ‘निर्झरेर स्वप्नभंग‘ तथा ‘सृष्टि स्थिति प्रलय‘ लम्बी कवितायें हैं। संसार में सब कुछ प्रतिध्वनिमय है। 
प्रतिध्वनिमय की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं- 
‘संगीत सौरभ, शोभा, जगते
या किछू आछे
कवि हेथा प्रतिध्वनीमय‘
(प्रभात संगीत -प्रतिध्वनि)5
प्रतिध्वनि के संदर्भ में रवीन्द्र नाथ की यह भावना कि-
‘‘जो सुर असीम से बाहर हो सीमा की ओर आ रहा है वही सत्य, वही मंगल है। .......... उसी की जो प्रति ध्वनि सीमा से असीम की ओर पुनः लौट जा रही है, वही सौन्दर्य है, वही आनन्द है‘‘6

प्रभात संगीत को समग्र रवीन्द्र काव्य दर्शन की आधारभूमि माना जा सकता है। प्रथमतः कवि व्यक्तित्व की झलक इसमें देखी जा सकती है। इसके पश्चात् ‘‘छवि ओ गान‘‘ की रचना सम्भवतः ई0 सं0 1884 में की। इस रचना में ऐन्द्रिकता है, स्वप्न है, कल्पना है। सामान्य जनजीवन के प्रति आकर्षण इस काव्य रचना में प्रवेश पाया दिखता है। भाषा व छन्द का मेल छवि ओ गान में दिखाई देता है।

रवीन्द्र नाथ जी को वर्षा ऋतु अत्यन्त प्रिय था और अपनी इस ऋतुप्रियता का वर्णन अपने काव्यों में भी किया है। ‘छवि ओ गान‘ में भी ‘बादल‘ नाम की एक कविता है जिसमें नानाविध वर्णन है। इसके पश्चात् ‘कड़ि ओं कोमल‘  (ई0 सं0 1886) की रचना की। ‘कड़ि ओं कोमल‘ की रचनाकाल को शरत् काल माना गया है। रवीन्द्र काव्य में भाषा, भाव, छंद  की स्वच्छता, प्रसन्नता इसी समय आरम्भ होती है। इन रचनाओं के काल में रवीन्द्र नाथ ने पहली बार अपने भीतर के, अपने अन्तस्तल के भावों-विचारों के आवेश को अपनी भाषा में, अपने छंद में, अपनी अभिव्यक्ति भंगिमा में निःसंकोच स्वच्छन्दतापूर्वक प्रगट किया। 

रवीन्द्र काव्य धारा की एक तरंग राष्ट्रीयता भी है। ‘कड़ि ओ कोमल‘ में इस भाव की रचनाओं का भी सुस्पष्ट आरम्भ हुआ। देश की पराधीन स्थिति, देशवासियों की दीन-हीन दशा से वे व्यथित थे। वेदना से पीड़ित थे और यही अभिव्यक्ति उनकी ‘बंगभूमिर प्रति‘ ‘बंगवासीर प्रति’ तथा ‘आह्वान गीत‘ इत्यादि के माध्यम से हुई।

रवीन्द्रनाथ की महत्वपूर्ण रचना रही ‘मानसी‘ जो ई0 सं0 1890 में लिखी गई और जिसने बंगला काव्य क्षेत्र में रवीन्द्रनाथ को व्यापक मान्यता दिलाई। ‘‘जगत के सुख-दुख का नाना तरह का कोलाहल व्याकुल कर डालता है, वाणी नहीं दे पाते, इसलिए नाना दुश्चिंता घेरती है। जीवन भर यही चल रहा है जैसे और कोई काम ही न हो ‘’। इसी तरह का भाव रवीन्द्र जी के मन में चल रहा था उस समय, जिसकी अभिव्यक्ति उन्होंने मानसी में की है। ‘मानसी‘ के ‘उपहार‘ के आरम्भ में रवीन्द्र नाथ ने यह सब अभिव्यक्त किया है यथा-
‘‘एचिर जीवन ताई, आर किछु काज नाई,
रचि शुधु असीमे सीमा।
आशा दिये, भाषा दिये, ताहे भालोवासा दिये,
गड़ेलि मानसी प्रतिमा।‘‘
(मानसी-उपहार7)

  मानसी की कुछ कविताओं में प्रेम व प्रेमगत विरह की वेदना का भी वर्णन है तथा ‘निष्फल कामना‘ व ‘दुरंत आशा‘ कवितायें इस श्रेणी में आती हैं। साथ ही देश, जाति, राष्ट्रीयता की भावना की अभिव्यक्ति भी कुछ कविताओं में हुई है जिनमें ‘बंगवीर‘, ‘देशेर उन्नति‘, ‘धर्म-प्रचार‘  इत्यादि कवितायें इसी देशगत्, समाजगत भावना से पूरित है।

रवीन्द्र काव्य में ‘मानसी‘ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानसी में रवीन्द्र नाथ की छवि, कवि के साथ ही एक शिल्पी व कलाकार के रूप में भी अंकित हुई है। कवि के रूप में प्रतिष्ठा व प्रशंसा दिलाने में ‘मानसी‘ की भूमिका वर्णनीय है।

मानसी के पश्चात् रवीन्द्र नाथ जी की महत्वपूर्ण रचना प्रकाशित हुई जिसका नाम था- ‘सोनार तरी‘। यह ग्रंथ ई0 सं0 1893 में प्रकाशित हुआ।

‘सोनार तरी‘ की रचना रवीन्द्रनाथ ने उस समय की जब वे बंग प्रदेश की पद्या नदी के तट पर निवास कर रहे थे। अपने निवास काल के दौरान उन्होंने प्रकृति व मानव के नाना रूपों को पास से जाना-पहचाना एवं समझा। ‘‘सोनार तरी‘ ग्रंथ में प्रथम कविता ‘सोनार तरी‘  नाम से ही है। बंग प्रदेश में किसान के लिए धान सोने के समान होता है। इस कविता में सोने वाले धान की अर्थात् मूल्यवान धान से भरी नौका का वर्णन है। रवीन्द्रनाथ मांझी को पुकार कर कहते हैं कि किनारे आकर मेरे सोने के धानो को ले जाओ। इसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार है-
‘‘शुधु तुमी निये याओ
क्षणिक हेसे
आभार सोनार धान कूलेते ऐसे।‘‘
                                   (सोनार तरी-सोनार तरी)

‘सोनार तरी‘  की अन्य कविताओं में - अनादृत, नदी पथे, झूलन देउल, मानस सुन्दरी, हृदय यमुना, व्यर्थ-यौवन, भरा बादरे, अचल स्मृति, प्रतीक्षा, निरूद्देश्य यात्रा, शैशव संध्या, आकाशेर चाँद, ऐते नाहि दिब, समुदे्रर प्रति तथा वसुन्धरा। आत्म बोध व विश्वबोध की भावना से भरी ये कवितायें हैं। इस ग्रंथ से ही रवीन्द्र नाथ के काव्य में रूपक और प्रतीकवाद के व्यवहार ने व्यापकता व बाहुल्य ग्रहण किया है।

‘सोनार तरी‘ की रचना काल में रवीन्द्रनाथ का रूप भावनापुरुष व कर्म पुरुष के रूप में उभर कर आया है। वे जो भी कविता लिखते थे, विचार व भावना जो भी रहती थी, परिवेश व काल जो भी रहता, पर समाज के प्रति मानवता के प्रति, उनकी सजगता उनके काव्य में अवश्य रहती थी। कुछ कविताओं में रवीन्द्र नाथ जी ने अपने को, अपनी धारणाओं, भावनाओं व आकांक्षाओं को खुले तौर से व्यक्त किया है। इन विशेष प्रकार की कविताओं में वर्षायापन, विश्व नृत्य, पुरस्कार व आठ चर्तुदशपदिया- मायावाद, खेला, बंधन, गति, मुक्ति, अक्ष्मा, द्ररिद्रा, आत्म समर्पण प्रमुख है।

कुछ कवितायें प्रेमभावनामयी है जिसमें तोमरा ओ आमरा, सोनार कांकणा, व्यर्थ यौवन, लज्जा आदि महत्वपूर्ण है। 

इसके पश्चात् ‘चित्र‘ ग्रंथ का प्रकाशन ई0 सं0 1896 में हुआ। रवीन्द्र नाथ को अपने जीवन में प्रकृति व अलौकिक सत्ता को लेकर जो आध्यात्मिक आत्म बोध हुआ। उसकी अभिव्यक्ति उनकी कविताओं में हुई है। उनका यह व्यक्तित्व किसी अलौकिक सत्ता से ही संचालित है। इस ग्रंथ में ऐसे ही बोधों को काव्यात्मक रूप में उकेरा है। ‘‘जीवन‘ देवता‘  व ‘अर्न्तयामी‘ कविताओं में भी इसी बोध की झलक मिलती है। ‘जीवन-देवता‘ में दार्शनिक आधार की नाना व्याख्यायें की गयी है। जीवन-देवता में वैष्णव दर्शन का द्वैतवाद भी है और वेदांत का अद्वैतवाद भी हैं। ‘चित्र ग्रंथ‘ के इन दोनों कविताओं में अध्यात्म की झलक मिलती है। इसके अतिरिक्त- आवेदन, शेष उपहार, नीरव तंत्री, सिंधु पारे इत्यादि कवितायें भी इसी श्रेणी की हैं। जगत् जीवन को आकर्षित करने वाली कविताओं में - ए बार फिराओं मोरे, मृत्यूर परे, साधना, शीते ओ बसंते, 1400 साल, नगर संगीत, मरीचिका, दुरांकाक्षा इत्यादि प्रमुख है।
कुछ कवितायें रवीन्द्र नाथ के अन्तर के प्रेम और सौदर्य की कल्पना उदात्त रूप लेकर अभिव्यक्त हुई है। इस भाव से भरी कविताओं में प्रमुख रूप से - सुख, ज्योत्सना रात्रे, संध्या, पूर्णिमा, दिन शेषे, विजयिनी, प्रस्तरमूर्ति, नारेर दान, इत्यादि विशेष उल्लेखनीय है। ‘उर्वशी‘ कविता रवीन्द्रनाथ की महत्वपूर्ण है। ‘उर्वशी‘ केवल रुपसी सुन्दरी (नारी) है, न माँ है, न कन्या है, न बधू है। सम्पूर्ण सौन्दर्य की अभिव्यक्ति नारी में है और नारी में सौन्दर्य का जो प्रकाश है, ‘उर्वशी‘ उसी का प्रतीक है।

चित्र के वाद प्रकाशन हुआ ‘चैतालि‘ का (ई0 सं0 1896 में) चैत महीने में लिखे जाने के कारण मूल रूप से इस ग्रंथ का नाम ‘चैतालि‘ रखा गया। कुछ गीतिकाव्य की रचनायें इसमें है। ग्राम जीवन की झांकी इन कविताओं में देखने को मिलती है। दुःखी दरिद्र जीवन की जो वेदना है उसकी अभिव्यक्ति चैतालि में हुई है।

चैतालि के बाद ई0 सं0 1899 में ‘कणिका‘ प्रकाशित हुआ, 1900 में ‘काहिनी और कथा‘ तथा रवीन्द्र रचनावली खण्ड़ 6 भी प्रकाशित हुई। इसके अतिरिक्त ई0 सं0 1900 में रवीन्द्रनाथ के दो अन्य काव्य ग्रंथ प्रकाशित हुए - कल्पना व क्षणिका। इस प्रकार चार काव्यग्रंथ प्रकाशित हुए। कल्पना में कुछ गान भी है। ये प्रसिद्धगान है और रवीन्द्रनाथ द्वारा दिये गये सुरों में ‘रवीन्द्र संगीत‘ के नाम से अब भी गाये जाते है। अपने जन्म दिन को दृष्टिगत रखते हुए ‘जन्मदिनेरगान‘ नाम से प्रार्थना गान की रचना की। इसके अतिरिक्त ‘अशेष‘, ‘वर्षशेष‘ ‘वैसाख’, उद्बोधन, ‘उत्सर्ग‘ आदि कवितायें उल्लेखनीय रही है।

गीति काव्यात्मक गति में लिखी क्षणिका, रवीन्द्रनाथ की प्रिय काव्य थी। इसमें सरल भाषा, सरल छंद में अपने सहज भावों को निरंलकृत रुप में अभिव्यक्त किया है।

‘क्षणिका‘ के बाद का काव्यग्रंथ ‘नैवेद्य‘ है जो ई0 सं0 1901 में लिखा गया है और रवीन्द्र काव्य के प्रसिद्ध काव्य-ग्रंथों में से एक है। यह भक्तिपरक काव्य हैं, कुछ गान भी है। इसमें कर्म-भक्ति व मुक्ति इन तीन तत्वों के सुर विद्यमान है। ‘नैवेद्य‘ अपने आराध्य, इष्टदेव के लिए है।

ई0 सं0 1903 में रवीन्द्र ने ‘शिशु‘ काव्य ग्रंथ की रचना की। ‘शिशु‘ की कविताओं को बाल साहित्य के अर्न्तगत रखा गया है। यद्यपि पूर्व की अन्य अनेक काव्य-ग्रंथों में भी बाल कवितायें है, परन्तु दोनों कविताओं में फर्क है। इसमें शिशु की अपनी मानसिकता, सरलता-सहजता, स्वभाव, लीला, कल्पना, इत्यादि रूप मुखरित है।

‘शिशु‘ के पश्चात् ‘उत्सर्ग‘ की रचना मानी जाती है। यह भी नैवेद्य की तरह भक्तिमय है। भक्ति और आध्यात्म का रूप इसमें दिखता है। 1906 में प्रकाशित हुआ काव्य ग्रंथ ‘खेया‘ जिसे रवीन्द्र जी ने प्रतीक रूप में लिया है- भवसागर से पार कराने का। इसमें रवीन्द्र जीवन का दार्शनिक तत्व छुपा हुआ है। रवीन्द्र नाथ के लिए अध्यात्म, दर्शन, जीवन दर्शन उनके काव्य अथवा कवि रूप का ही अंग है। सुख-दुःख, आशा-निराशा, जीवन-मृत्यु का भाव ही खेया, की कविताओं का आधार है। ‘खेया के अर्न्तगत‘ ‘‘आगमन‘ ‘दान‘, ‘घाटेर पथ‘, ‘विदाय‘, ‘शुभक्षण’  ‘दिधि‘ जैसी कविताओं में रहस्यात्मक स्पर्श भी दिखता है।

‘‘खेया रवीन्द्रनाथ के विशिष्ट काव्य ग्रंथों में से एक है। खेया के बाद ई0 सं0 1910 में रवीन्द्र जी के जीवन का तथा संपूर्ण विश्व के साहित्य जगत् का लोकप्रिय ग्रंथ ‘गीताजलि‘ प्रकाशित हुआ। ‘गीतांजलि’ में 157 रचनायें हैं। दो रचनायें 106 तथा 108 बड़ी है बाकी अन्य छोटी रचनायें हैं। गीतांजलि की रचनाओं में काव्य गुण भी है और गीति गुण भी। रवीन्द्र नाथ जी ने अवसरानुसार इस ग्रंथ की छोटी-बड़ी सभी रचनाओं को सुर दिया है तथा रवीन्द्र संगीत के अन्तर्गत इसकी सभी रचनायें गाई जाती है।8 

रवीन्द्र काव्य रचना की दो धाराओं कविता और गान में, गान को सुर देकर उसे संगीतमय कर दिया है। गानों के माध्यम से उन्होंने स्वयं को अधिक मुखर रूप में प्रस्तुत किया है, व्यक्त किया है। ‘गीतांजलि‘ की कुछ पंक्तियाँ ये हैं-
‘‘गान दिये ये तोमाय खुँजी
बाहर मने
चिरदिवस मोर जीवने‘‘
                        (गीतांजलि-132)
अर्थात ‘‘अपने जीवन में मैं तो गान के माध्यम से चिर दिन तुम्हें अपने भीतर और बाहर ही ढूंढ़ता हूँ।’’9

रवीन्द्र संगीत उनके जीवन काल में ही चारों ओर व्याप्ति और प्रसिद्धि पा चुका था। यह गान स्वदेशी आन्दोलन के समय राष्ट्रीय चेतना जागृत करने में अत्यधिक प्रभावी हुई थी तथा उस समय यह बहुत प्रचलित हुआ। ‘गीतिमाल्य‘ रचना में भी यही भाव रहा जो गीताजंलि के बाद प्रकाशित हुयी। गीताजंलि गीतों की अंजली हैं और गान रवीन्द्र नाथ के आत्म प्रकाश का सरल सहज साधन है। ‘नैवेद्य‘ के समान गीताजंलि में भी भक्ति की प्रधानता है परन्तु गीताजंलि की भक्ति का स्वरूप भिन्न है। इसकी भक्ति आनन्दमय आराध्य के प्रति है जो नानारूपों व कर्मों में इस जगत् में परिव्याप्त है। ‘गीतिमाल्य’ के साथ ही ‘गीतांजलि‘ भी प्रकाशित हुआ। ई0 सं0 1914 जुलाई में प्रकाशित गीति काव्य ‘गीतिमाल्य’ भी आराध्य  के लिए ही है। 1914 में ‘गीतांजलि‘ ग्रंथ प्रकाशित हुआ। ‘गीतिमाल्य’ की ही भाँति ’गीतांजलि’ में भी अपने आराध्य से आवेदन निवदेन का भाव निहित है। इसमें 108 रचनायें हैं। मध्ययुगीन रहस्यवादी कवियों का प्रभाव रवीन्द्र नाथ पर पड़ा जिसकी छाया इन तीनों ग्रंथों पर दिखाई देती है। रवीन्द्र नाथ की गान कविताओं में गान यानि संगीत और काव्य का अनुपम समन्वय देखने को मिलता है।

ई0 सं0 1916 में ‘बलाका‘ रचना भी प्रकाशित हुई। ‘बलाका’ में रवीन्द्रनाथ की बाह्यनिष्ठा उद्घृत हुई है। 1913 में नोबल पुरस्कार मिलने के बाद रवीन्द्र नाथ की छवि देश की परिधि से बाहर विदेश तक जा पहुँची है। उनके चिंतन का क्षेत्र भी व्यापक हो गया। ‘बलाका‘ की रचना प्रथम विश्वयुद्ध के समय हुई। अतः बलाका में रवीन्द्रनाथ की मानव के प्रति जो वेदना, चिन्ता है, वह व्यक्त हुई है। बलाका में 22 संख्यक कविता है। यह पहले ‘मुक्ति‘ नाम से छपी थी। ‘बलाका’ में ही ‘शा-जाहान‘ (7) और ‘ताजमहल’ (9) नाम की रवीन्द्रनाथ की ख्यातिलब्ध कवितायें हैं। बलाका में कुल 45 कवितायें हैं। भाव की गहनता गम्भीरता, भाषा और अभिव्यक्ति का वैचित्र्यगत वैभव बलाका की प्रत्येक कविता में उपलब्ध है। इसके बाद ई0 सं0 1918 में ‘पलातका‘ प्रकाशित हुई जिसका प्रधान आलम्बन अथवा आधार ‘आवागमन‘ का है। इसकी दो रचनायें ‘शेषगान’ व ‘शेष प्रतिष्ठा’ विशेष उल्लेखनीय हैं।

ई0 सं0 1922 में ‘शिशु भोलानाथ’ प्रकाशित हुआ। ई0 सं0 1925 में महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘पुरबी‘ का प्रकाशन हुआ। इस ग्रंथ की आधी से अधिक रचनायें यूरोप, अमेरिका के भ्रमण में दौर में लिखी गई। इस ग्रंथ के दो अंग है - पूरबी और पथिक। पूरबी में ई0 सं0 1917 से 1923 तक की रचित कवितायें हैं तथा ‘पथिक’ में 1924 की रची कवितायें हैं। ‘पूरबी’ में नाना विषयों को लेकर लिखी कवितायें हैं। ‘पथिक’ की कवितायें मार्मिक हैं। अन्य कविताओं में  ‘सावित्री‘ आशंका, विपाशा शेष बसंत, लिपी इत्यादि महत्वपूर्ण हैं।

ई0 सं0 1927 में ‘लेखन’ का प्रकाशन हुआ जो बंगला एवं रोमन लिपि में लिखा, छोटी-छोटी कविताओं का संकलन है। लेखन के पश्चात ई0सं0 1929 में प्रकाशित हुआ ‘महुया‘। इस ग्रंथ की अधिकांश कविताओं का विषय प्रेम है। ग्रंथ का ‘महुया’ नाम भी प्रेमभावविष्ट कविताओं के कारण है। कुछ कवितायें ऋतु उत्सव की भी है। महुया में ‘नाम्नी’ शीर्षक के अर्न्तगत 17 कवितायें हैं। इन 17 कविताओं में 17 तरह की नारी प्रकृति का विवरण है तथा प्रकृति के अनुरूप ही नाम दिया गया है यथा- काकली, नागरी, मूरति, करूणी, उषसि इत्यादि। महुया के पश्चात् 1931 में ‘वनवाणी‘ प्रकाशित हुआ जिसकी प्रथम कविता ‘वृक्षवंदना’ है। वृक्ष से सम्बन्धित कवितायें इस ग्रंथ में हैं। शान्ति निकेतन के कुछ वृक्षों पर भी कवितायें हैं। इं0 सं0 1932 में ‘परिशेष‘ प्रकाशित हुआ।

‘परिशेष’ की प्रणाम, अबुझमन, लक्ष्यशून्य, नूतनकाल इत्यादि कवितायें महत्वपूर्ण है। ई0 सं0 1932 में ही ‘पुनश्च’ प्रकाशित हुआ। ‘पुनश्च’ में रवीन्द्र नाथ ने एक नव प्रयोग किया, गद्य कविता के रूप में। भाषा सरल है तथा यदा-कदा अंग्रेजी के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। ‘छेलेटा’ शेषचिठि, मानव पुत्र ‘शिशुपुत्र‘, ‘शाप मोचन‘ इत्यादि पुनश्च की विशिष्ट कवितायें हैं।

ई0 सं0 1933 में ‘विचित्रता‘ प्रकाशित हुयी। इस ग्रंथ में इकतीस कवितायें हैं जो विभिन्न चित्रकारों के इकतीस चित्रों पर आधारित हैं। इनमें सात चित्र स्वयं रवीन्द्र नाथ जी के हैं। ‘‘पुनश्च  की तरह गद्य कविताओं का अगला ग्रंथ ‘शेष सप्तक‘ ई0 सं0 1935 में प्रकाशित हुआ। इस ग्रंथ की कवितायें मुख्य रूप से प्रकृति, अतीत स्मृति और निर्लिप्त आत्मसत्ता बोध से सम्बन्धित है। कुछ कवितायें पत्र शैली में भी हैं। इसी समय एक अन्य ग्रंथ ‘वीथिका‘ का प्रकाशन हुआ। यह पद्ध बद्ध कविता हैं। कविताओं के अतिरिक्त चार गान भी है। प्रतीक्षा, बादल संध्या, बादल रात्रि, अभ्यागत।

ई0 सं0 1936 में ‘पत्रपुट‘ प्रकाशित हुआ। इसमें गद्यकवितायें संगृहीत है। इसी समय ‘श्यामली‘ ग्रंथ का प्रकाशन हुआ तथा इसकी संभाषण, अमृत, दुर्बोध, वंचित इत्यादि कवितायें महत्वपूर्ण हैं। 1937 में ही ‘छापछाड़ा‘ और ‘छड़ार छवि‘ प्रकाशित हुयी। विशेष रूप से बच्चों के लिये हास्य-व्यंग्य से पूरित कवितायें इस ग्रंथ में हैं। ‘छड़ार छवि‘ की ज्यादातर कविताओं में कथा सूत्र का स्पर्श है। अल्मोड़ा में लिखे गये इन कविताओं में रवीन्द्र जी ने अतीत स्मृति का संचरण किया है। ई0 सं0 1938 में ‘प्रांतिक‘ काव्य ग्रंथ प्रकाशित हुआ जिसमें 18 कवितायें हैं। इस वर्ष में रवीन्द्रनाथ जी कठिन रोग से पीड़ित हुए थे और रूग्णावस्था में उन्हें मृत्यु की अनुभूति हुयी थी, इसी अनुभूति की अभिव्यक्ति इन कविताओं में हैं।

इसके पश्चात् 1938 में ही ‘संजुति‘ ग्रंथ प्रकाशित हुआ। इसमें ‘पत्रोत्तर‘, ‘जन्मदिन‘, चलति छवि, इत्यादि कवितायें विशेष है।

ई0 सं0 1939 में दो काव्य ग्रंथ प्रकाशित हुये-  प्रहासिनी एवं आकाश प्रदीप
इन रचनाओं का मूल विषय भी अतीत स्मृति का संचरण है। आकाश प्रदीप की दो रचनायें ‘मयूर दृष्टि’ व ‘कांचा‘ आम गद्य कवितायें हैं। इसके अलावा जाना-अजाना, समयहारा, छेले बेला कवितायें भी महत्वपूर्ण है। 

ई0सं0 1940 में अगला ग्रंथ ‘नवजातक‘ प्रकाशित हुआ। इस ग्रंथ की अनेक कविताओं में रवीन्द्रनाथ ने आधुनिक अथवा वर्तमान युग में मानव के नानाविध कष्टों, दुःखों और इनके कारणों को लेकर अपनी व्यथा को व्यक्त किया है। कुछ कविताओं में इस संसार से आने जाने अर्थात् ‘आवागमन‘ का भाव अंकित किया है। उद्बोधन, शेषकथा, शेषदृष्टि, संध्या, शेषबेला, जन्मदिन इत्यादि कवितायें महत्वपूर्ण हैं। इसी सन् में ‘सानाई‘ ग्रंथ प्रकाशित हुआ। इस ग्रंथ की कविताओं को रवीन्द्र नाथ जी ने सुर दिया है। रवीन्द्र संगीत के रूप में ये आज भी गाई जाती है। ‘रोगशय्याय‘ भी इसी समय में प्रकाशित हुआ। इस ग्रंथ की रचना के दौरान रवीन्द्र नाथ अत्यन्त बीमार थे। अतः शान्ति निकेतन से इन्हें कलकत्ते ले जाया गया। इस दौरान उन्होंने जितनी कवितायें लिखी वे ही रोगशय्या के नाम से प्रकाशित की गई। स्वास्थ्य लाभ के बाद एवं शान्ति निकेतन में आने के बाद उन्होंने ‘आरोग्य‘ की कवितायें लिखी। यह ग्रंथ प्रकाशित हुआ ई0 सं0 1941 में। इसमें संग्रहित कविताओं का विषय अनेक हैं। कुछ कविताओं में रवीन्द्र नाथ जी की शारीरिक-मानसिक अवस्था का चित्रण है। प्रकृति से प्रेम, धरती से प्रेम का वर्णन भी है। साथ ही धरती व प्रकृति के बीच रहने वाले मानव की चिन्ता भी गुरुदेव ने की है। जीवन के इन दिनों रवीन्द्र जी ने उस परम सत्ता में विलीन होने की बात भी की है। यह बोध उनको हुआ है कि उस आनन्दमय, अमृतमय, ज्योर्तिमय परम सत्ता और उनमें कोई भेद नहीं। आरोग्य की 32 संख्यक कविता में इसी भाव का उल्लेख इस प्रकार हुआ है-
‘‘परम आमिर साथे युक्त हते पारि
विचित्र जगते
प्रवेश लभिते पारि आनंदेर पथे‘‘ 
                           (आरोग्य- 32)10
रवीन्द्र नाथ जी के जीवन काल में प्रकाशित अन्तिम काव्य रचना थी ‘जन्मदिने‘ जो ‘आरोग्य‘ के पश्चात् ई0 सं0 1941 मई में प्रकाशित हुई। इस ग्रंथ की अनेक कविताओं में इस संसार से विदा लेने की बात अभिव्यक्त है। ‘जन्मदिन’ की ‘मृत्युदिन’ में परिणीत हो जाने की अनुभूति रवीन्द्र नाथ ने की है। ‘अब मैं चला‘ इस भाव की व्याप्ति है। रवीन्द्र नाथ जी के निधन के पश्चात् कुछ काव्य रचनायें प्रकाशित हुई जिनमें - ‘छड़ा‘, ‘शेष लेखा‘, ‘बैकाली‘ और ‘चित्रविचित्र‘ प्रमुख है। शेषलेखा में उनके द्वारा लिखी गई समस्त अंतिम कवितायें हैं। ग्रंथ का नामकरण भी संकलनकर्ता द्वारा की गई है। इस ग्रंथ में 15 कवितायें हैं। कुछ कवितायें गान रूप में भी प्रसिद्ध हैं। शेषलेखा में उन्होंने जो कहा है उसका मर्म यही है कि यह अनेक रूपात्मक जगत स्वप्न माया नहीं है। रवीन्द्र नाथ जी कहते हैं कि सत्य तो कठिन है मगर इस कठिन को ही मैंने प्रेम किया है क्योंकि सत्य कभी वंचना नहीं करता। शेषलेखा की इस संदर्भ में कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-
‘‘सत्य ये कठिन
कठिनेरे भालोबासिलाम
से करवनो करे ना वंचना।‘‘
(शेष लेखा 11)11
‘बैकाली‘ का प्रकाशन ई0 सं0 1951 में किया गया। इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि यह रवीन्द्रनाथ की हस्तलिपि में छपा है।

इसी प्रकार ‘चित्र-विचित्र’ का प्रकाशन ई0 सं0 1954 में हुआ। यह काव्य संग्रह बालोपयोगी है। साथ ही सरल, मनोरंजक एवं बालकों के लिये आनन्दप्रद हैं।

गुरू रवीन्द्र नाथ जी के पूरे जीवन की इस साहित्य यात्रा ने उन्हें ‘विश्व कवि रवीन्द्रनाथ‘ बनाया। उनके काव्यों में उनका जीवनदर्शन, विश्व दर्शन, समाज दर्शन, मानव दर्शन व प्रकृति दर्शन स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। उनके सम्पूर्ण काव्य में मुख्य रूप से प्रकृति, मानव व अध्यात्म सत्ता, विषय रूप में ग्रहण किये गये हैं।
‘शेषलेखा‘ की कुछ पक्तियाँ जो यहाँ दी जा रही है उनसे रवीन्द्र नाथ जी के अन्तिम जीवन की अभिव्यक्ति अनुभूत होती है-
‘‘प्रतिदानें यदि किछु पाई
किछु स्नेह किछु क्षमा
तबे ताहा संगे निये याई
पारेर खेयाय याब यबे
भाषाहीन शेषेर उत्सवे।’’
                   (शेष लेखा -10)12
सम्पूर्ण जीवन में लिखी काव्य रचनाओं में रविन्दनाथ टैगोर जी की सबसे लोकप्रिय रचना ‘गीतांजलि’ है। इस काव्य रचना ने रवीन्द्र नाथ को विश्व के श्रेष्ठ कवियों, एक रचनाकारों में स्थापित किया। जीवन की अनुभूतियों, प्राकृतिक सौन्दर्य  इत्यादि का वर्णन साहित्य प्रेमी को भावों से भर देता है। नवम्बर 1912 में ‘इण्डिया सोसाइटी ऑफ लन्दन’ ने गीताजंलि का प्रथम अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित किया। इसका अंग्रेजी अनुवाद रवीन्द्र नाथ टैगोर के मित्र रोथेस्टोन ने लिखी तथा अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध कवि यीट्स ने इसकी प्रस्तावना लिखी। अंग्रेजी कवियों, रचनाकारों ने भी गीताजंली को विश्व की सर्वश्रेष्ठ कृति बताया। देश-विदेश में इसकी समीक्षा प्रकाशित हुई। अतंतः गीताजंली को नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया। रवीन्द्र नाथ टैगोर सबसे पहले भारतीय तथा एशियाई थे जिन्हें नोबल पुरस्कार (1913) के लिए चुना गया। इसी समय स्वाधीनता आन्दोलन की लड़ाई भी चल रही थी। रवीन्द्र नाथ टैगोर ने साहित्य के माध्यम से स्वाधीनता आन्दोलन को प्रेरित किया। उन्होंने अपनी कविताओं एवं कहानियों के माध्यम से जन-जन को राष्ट्रीयता का संदेश दिया। वास्तव में वे सच्चे राष्ट्र कवि थे। शिक्षा केे क्षेत्र में भी उन्होंने अभूतपूर्व कार्य किया। उन्होंने शान्ति निकेतन विश्वविद्यालय तथा विश्वभारती नामक अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के शिक्षण संस्थानों की स्थापना की। इन विद्यालयों के निर्माण में उन्होंने अपनी सारी पूंजी लगा दी। शिक्षा व संस्कृति को जोड़कर चलने का उनका आग्रह था। व्यक्तित्व निर्माण का बेहतर विकल्प वे शिक्षा को समझते थे। उन्हें भारत की प्राचीन शिक्षा प्रणाली (गुरू-शिष्य परम्परा) से लगाव था और इसी उद्देश्य से शान्ति निकेतन का निर्माण किया था। आधुनिक छात्रों में वे प्राचीन शिक्षा के मूल्यों को उतारना चाहते थे।
श्री बी0एस0 नरवाने ने अपनी पुस्तक- An introduction to Rabindra Nath Tagore में लिखा है कि "Ravindra Nath built Shantiniketan into a unique institution which while fully attained to the imposition spirit of the moderns age, retained the fundamental values of ancient education."13 

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अपना बाकी जीवन शिक्षा देने के लिए व्यतीत किया। विश्व भारती विश्वविद्यालय विश्व भर में अपनी विशिष्ट शिक्षण पद्धति के लिए विख्यात थी। देश-विदेश के विद्यार्थी यहाँ अध्ययन के लिए आते थे। ऐसे विश्वविद्यालय को प्रचुर धन की भी आवश्यकता रहती थी। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उन्होंने सोचा कि देश का भ्रमण कर धन इकट्ठा किया जावें। अतः उन्होंने भ्रमण करना आरम्भ किया। जब वे उत्तर भारत में थे तो इस बात की जानकारी महात्मा गाँधी जी को हुई। उन्होंने नेहरू जी से कहा कि गुरूदेव के लिए इतना धन इकट्ठा कर दो कि उन्हें देश-देश भटकना ना पड़े और नेहरू जी ने यह काम किया, उन्होंने एक बड़ी धनराशि रवीन्द्र नाथ को भेंट की।

रवीन्द्र नाथ मनुष्य की जीवनधारा में पूर्ण आस्था रखते थे। वे विशुद्ध मानवता के गीत गाते रहे। यद्यपि विदेशी तत्वों को भी उन्होंने अपनाया है परन्तु ऐसा करते समय भी वे मूल रूप से भारतीय पृष्ठभूमि, उसकी आत्मा से जुड़े रहे। उनके पाँव हमेशा भारत भूमि पर ही रहे। रवीन्द्र नाथ में कर्म पुरूष और भाव पुरूष का अद्भूत मेल था। वे भारतीय संस्कृति के प्रबल समर्थक व वाहक थे एवं भारतीय संस्कृति के अर्न्तपक्ष के संरक्षक थे। इसी भावना का प्रतिफल था- शान्ति निकेतन। इसके बारे में रवीन्द्र नाथ ने कहा- ‘‘भारत वर्ष की प्राचीन संस्कृति के लिए मेरा जो अनुराग है, उसकी अभिव्यक्ति हैं यह शान्ति निकेतन और मेरे देशवासी जो कोटि-कोटि नर-नारी हैं जो साल में एक दिन भी भरपेट खा नहीं पाते- उनके लिए मेरे हृदय में जो वेदना है, उसकी अभिव्यक्ति होगी यह श्री निकेतन14।

श्री रवीन्द्र नाथ ने अपने को गायक भी कहा है- ‘‘मैं एक गायक हूँ और उस गीत भंडार से जो संगीत प्रवाहित होता है, उसकी ओर मैं सदैव आकृष्ट रहता हूँ।‘‘15

रवीन्द्र नाथ गायक भी हैं, इसकी सार्थकता ‘रवीन्द्र संगीत‘ में देखी गई जो शायद उनके उसी गीत  भंडार से निकला है। 

रवीन्द्र नाथ के लिए भारत की एकता एक सामाजिक सच्चाई थी। उनके लिए भारत की संकल्पना भू-भागीय नहीं थी, विचारात्मक थी। उनका वैचारिक आदर्श सामाजिक स्तर पर प्रतिष्ठित था, जिसको भारत के भक्त कवियों नानक, कबीर, चैतन्य इत्यादि ने अपने आदर्शों से संजोया था। वे मानवतावाद के पक्षधर थे। मानवीय एकता उनके जीवन का मूलस्वर था। सम्पूर्ण विश्व के साथ एकमेक होना, सबकी सुख शान्ति के बारें में सोचना, भारत की सभ्यता का एक महत्वपूर्ण मूल्य तत्व है। सन् 1909-10 में प्रकाशित गोरा उपन्यास के नायक के स्वर में उनके मन में संजोया हुआ स्वाधीनता व मानवीय एकता का स्वर प्रकट हुआ है-
‘‘मेरे लिये मेरे देश से बड़ा कुछ नहीं
समग्र भारत का दुःख-सुख
ज्ञान-अज्ञान से मैं परे नहीं हूँ
मैं आज भारत वर्षीय हूँ
मेरे भीतर हिन्दू मुसलमान बसे
हुये हैं- भारत की सारी जाति मेरी जाति है।’‘ 16
शान्ति निकेतन की स्थापना उनके उच्च विचारों व आदर्शों के अनुरुप की गई थी। वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जिससे लोगों के बीच का मतभेद, अंतराल मिट जाये। उनका यह कहना था कि मात्र राजनैतिक स्वाधीनता से काम नहीं चलेगा जबकि आपस में भाषा, जाति, क्षेत्र व धर्म को लेकर इतनी असमानता, इतना अलगावपन है। 

रवीन्द्र नाथ टैगोर एक विशिष्ट काव्य, कला व संस्कृति के उपासक थे। अपनी रचनात्मक भावनाओं से उन्होंने समाज में व्याप्त असमानताओं को दूर करने का प्रयास किया। वे समस्त धर्मों, जातियों, भाषाओं व संस्कृतियों को एक मानकर चलते थे। ताकि इससे सम्पूर्ण राष्ट्र एक सूत्र में बंधा रहें। बंगला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में प्राण डालने वाले युग दृष्टा थे। वे ऐसे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनायें दो देशों का राष्ट्रगान बनी। भारत का राष्ट्रगान ‘‘जन-गण-मन‘‘ और बंगलादेश का राष्ट्रीयगान ‘आमार सोनार बंगला’ गुरूदेव की ही रचनायें हैं। रवीन्द्र जी ने करीब 2230 गीतों की रचना की। रवीन्द्र संगीत बंग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग है। टैगोर के संगीत को उनके साहित्य से अलग नहीं किया जा सकता। ये गीत मानवीय भावनाओं के विभिन्न रंगों को प्रस्तुत करते हैं। 

अन्तिम दिनों में वे शान्ति निकेतन में रहकर साहित्य साधना व आध्यात्मिक साधना करते रहे। जीवन के आखिरी कुछ वर्षों 1933-1940 तक का समय साहित्य रचना, शिक्षण कार्य तथा समाज सेवा में व्यतीत किया। करीब 80 वर्ष की आयु के पश्चात् सन् 1941 में इस युगदृष्टा, युगस्रष्टा महानायक का देहान्त हो गया।

रवीन्द्र नाथ टैगोर जी ने अपनी साहित्यिक रचनाओं से इस समाज को जितना समृद्ध किया अपने व्यक्तिगत जीवन में उन्होंने उतना ही खाली अपने आप को पाया। अल्पायु में ही उनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी थी। तीन बेटियोँ व दो बेटे रवीन्द्र नाथ को थे। परन्तु नियति ने रवीन्द्र नाथ का साथ नहीं दिया। दोनों बेटे एक-एक कर मौत के मुँह में चले गये। छोटी बेटी रेणुका टी0वी0 की बीमारी से चल बसी। कुछ दिनों बाद उनकी बड़ी बेटी माधुरी लता भी टी0वी0 से ग्रसित हो गई और चल बसी।

जीवन ने रवीन्द्र नाथ टैगोर को अनेक दंश दिये। इन दुःखों, पीड़ाओं की अनुभूति रवीन्द्र नाथ के साहित्य में भी मिलती है। रवीन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु 7 अगस्त 1941 को हुई। इससे 11 दिन पहले यानी 27 जुलाई को एक कविता लिखी जिसका कुछ अंश इस प्रकार है-
‘‘पहले दिन के सूर्य ने
प्रश्न किया था सत्ता के नये आर्विभाव को
कौन हो तुम
उत्तर नहीं मिला
साल दर साल दिन बीत गये
दिवस के अन्तिम सूर्य ने
अन्तिम दफा पूछा
पश्चिम सागर के किनारे से 
साँझ की निश्तब्धता में 
कौन हो तुम
उत्तर नहीं मिला।‘‘17
रवीन्द्र नाथ टैगोर को आज सम्पूर्ण विश्व उनकी 150वीं जन्मशती पर शत्-शत् नमन करता है एवं अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
संदर्भ-ग्रंथ
1. रवीन्द्र साहित्य की समीक्षा- लेखक शिवनाथ, पृ0 सं0 9-10।
2. अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भारतीय साहित्यकार -लेखक ए0पी0 कमल, पृ0 सं0 13।
3. वही पृ0 सं0 16।
4. रवीन्द्र साहित्य की समीक्षा-लेखक शिवनाथ पृ.सं.1।
5. वही, पृ0 10।
6. वही ,पृ0 से 11।
7. वही, पृ0 सं0 -16-17।
8. वहीं , पृ0सं0-56।
9. वहीं , पृ0 सं0 57।
10. वहीं, पृ0 सं0 125।
11. वही, पृ0 सं0 134।
12. वही, पृ0 सं0 135।
13. अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार-लेखक एम0पी0 कमल, पृ0सं0 36।
14. रवीन्द्र साहित्य की समीक्षा-लेखक श्री शिवनाथ ,पृ0सं0 332।
15. रवीन्द्र साहित्य की समीक्षा- शिवनाथ, लेख- आनन्द की आस्था, पृ0सं0 278, (मुख्य स्रोत-  I am a singer myself and I am ever attrected by the strains that come forth from the house of songs. - The riligion of man. page- 88, george Allen and unwin, london 1949).
16. हिन्दुस्तानी जबान, अंक-जुलाई-सितम्बर 2011 लेख प्रो0 इन्दूनाथ चौधरी, पृ0 10।
17. वही, पृ0 सं0 8 महात्मा गांधी मेमोरियल, रिसर्च सेन्टर, मुम्बई की शोध पत्रिका, हिन्दुस्तानी प्रचार सभा द्वारा संचालित।


 डॉ0 ज्योति सिन्हा लेखन के क्षेत्र में एक जाना पहचाना नाम है। सांस्कृतिक एवं सामाजिक सरोकारों की प्रगतिवादी लेखिका साहित्यिक क्षेत्र में भी अपने निरन्तर लेखन के माध्यम से राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाती रही हैं। संगीत विषयक आपने पॉच पुस्तकों का सृजन किया है। आपके लेखन में मौलिकता, वैज्ञानिकता के साथ-साथ मानव मूल्य तथा मनुष्यता की बात देखने को मिलती है। अपने वैयक्तिक जीवन में एक सफल समाज सेवी होने के साथ महाविद्यालय में संगीत की प्राघ्यापिका भी हैं ! आपको जौनपुर के भजन सम्राट कायस्थ कल्याण समिति की ओर से संगीत सम्मान, जौनपुर महोत्सव में जौनपुर के कला और संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया। संस्कार भारती, सद्भावना क्लब, राष्ट्रीय सेवा योजना एवं अन्य साहित्यिक, राजनीतिक एवं इन अनेक संस्थाओं से सम्मानित हो चुकी डॉ0 ज्योति सिन्हा के कार्यक्रम आकाशवाणी पर देखें एवं सुने जा सकते हैं। आप वर्तमान में अनेक सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाओं से सम्बद्व होने के साथ अनेक पत्रिकाओं के सम्पादक मण्डल में शोभायमान है। वर्तमान में आप भारतीय उच्च शिक्षा अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में संगीत चिकित्सा (2010-12) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।


डॉ0 ज्योति सिनहा
प्रवक्ता-संगीत
भारती महिला पी0जी0 कालेज, जौनपुर एवं रिसर्च एसोसियेट
भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान
राष्ट्रपति निवास शिमला, हिमांचल प्रदेश



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