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December, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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जयजयराम आनंद का आलेख - हूस्टन के भारतीय प्रवासियों में भारतीयता की झलक

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हूस्टन के भारतीय प्रवासियों में भारतीयता की झलक हूस्टन टेक्सास राज्य का सबसे बड़ा शहर है. अमेरिका के सबसे बड़े शहरों में न्यू़यॉर्क, शिकागो, लॉस एन्जेलेस के बाद हूस्टन का नाम लिया जाता है. सन २०१० की जन गणना के अनुसार जन संख्या के मान से हूस्टन छठे स्थान पर आता है. यहाँ स्पष्ट करना उचित है की अमेरिका के मूल निवासी इंडियन कहलाते हैं. अतः उन्हें इंडियन अमेरिकेन और एशिया महाद्वीप के प्रवासियों को एशियन अमेरिकेन कहा जाता है. कुल हूस्टन की जन संख्या ५९४६८०० (उन्सठ लाख छयालिस हज़ार आठ सो) में अमेरिकेन इंडियन और एशियन अमेरिकेन क्रमशः ९१६३७ और ३८९००७ है. और एशियन अमेरिकेन की जन संख्या बारह शहरों में विशेष उल्लेखनीय है. और टेक्सस में उनकी जन संख्या २४५९८१ है. संपूर्ण अमेरिकेन की जन संख्या मैं केवल भारतियों की जन संख्या २८४३३९१ है. अर्थात .९०% है. हूस्टन में भारतीय अमेरिकेन इंग्लिश, हिंदी, मलयालम, गुजराती आदि भाषाएँ बोलते हैं. हमें हूस्टन के केटी शेत्र में प्रवास का अवसर मिला. जिस क्षेत्र को अनेक कारणों से महत्वपूर्ण माना जाता है. यथा गुणात्मक शिक्षा उच्च रहन सहन , खेल कूद की विशेष सुविधाएँ, स्व…

शंकर लाल कुमावत की नववर्ष कविता -प्रण करें नव नूतन वर्ष के आँगन का हर साज नया हो

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प्रण करें नव नूतन वर्ष के आँगन का हर साज नया हो ना रहे अब धूप दु:खों की खुशियों का आगाज नया हो प्रण करे नव नूतन वर्ष के आँगन का हर साज नया हो | छोड़े बैर का भान पुराना प्यार का एक नाम नया हो नहीं पुराना राग अलापे अब सुरों का संसार नया हो प्रण करे नव नूतन वर्ष के आँगन का हर साज नया हो | छोड़े कुटिल चाल चलाना अब रिश्तों का संवाद नया हो भूल गए थे जो मर्यादा अब उसका सम्मान नया हो प्रण करे नव नूतन वर्ष के आँगन का हर साज नया हो | सूख गया जो, सपनों का सागर उसमें अब बरसातों का, दौर नया हो रो रही जो बंजर भूमि हरयाली से उसका अब श्रृंगार नया हो प्रण करे नव नूतन वर्ष के आँगन का हर साज नया हो | छोड़े भूलों के बाण चलाना अब यादों का ताज नया हो नहीं रहे कोई हीन् भावना इस प्रण में अब प्राण नया हो प्रण करे नव नूतन वर्ष के आँगन का हर साज नया हो | -- नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें शंकर लाल इंदौर-मध्यप्रदेश Email: Shankar_kumawat@rediffmail.com

अनुराग तिवारी की नव-वर्ष कविता - नये साल की नयी सुबह

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नये साल की नयी सुबह नये साल की नयी सुबह उत्‍साह नया ले आयी है, मन में भरी उमंगें हैं, दिल ने ली अँगड़ाई है। बीता वर्ष दे गया हमको यादें कुछ खट्‌टी मीठी, ले गया साथ कुछ हँसते पल चुभती है स्‍मृति फीकी। गुज़र गया जो वक्‍त लौट फिर- कहाँ कभी आता वह ? साथ चला हो जो भी इसके मंज़िल बस पासा वह। हँसते गाते आओ हम सब मिल कर कदम बढायें, न्‍याय शांति औ ' समता का जग में नित दीप जलायें। रवि की नूतन किरणों ने उर में नव आस जगायी है। नये साल की नयी सुबह उत्‍साह नया ले आयी है। -- -सी ए. अनुराग तिवारी5-बी, कस्‍तूरबा नगर,सिगरा, वाराणसी- 221010

शशांक मिश्र भारती की नव-वर्ष कविता

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नववर्ष की सार्थकतानया वर्षले नूतन हर्षप्रतिवर्ष आताजगाता नयी उमंगेंहर्षोंल्‍लास की तरंगें,बीते क्षणों की स्‍मृतिकरवाने को-त्रुटियों का पश्‍चाताप। शायद-यह सब सत्‍यनिष्‍ठा से होतामात्र हैप्‍पी न्‍यू ईयर कहनेग्रीटिंग भेज देनेकलैण्‍डर बदल देने तकन सिमटता,शेष वैसा ही वर्ष भरहत्‍या, अपहरण, बलात्‍कार का ताण्‍डवमनुज पर दानवी वृत्तियों का प्रभावप्रकृति की त्रासदियां;यदि हम परिवर्तन करस्‍व मन मस्‍तिष्‍क कोदानवीवृत्तियों को नष्‍टकरप्रकृति मानव में सामंजस्‍य स्‍थापित करहृदय में स्‍नेह, मधुरता भरकैलेण्‍डर बदलने के साथ ही स्वयं कोसृजन हेतु लगा सके,तभी है सार्थकताइस नव वर्ष की। --सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-2424010प्र0 9410985048ईमेल:-shashank.misra73@rediffmail.com

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की नव-वर्ष शुभकामना कविता

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मदिर मस्ज़िद गुरुद्वारों में क्यों अरदास न करते
कुमकुम पुष्प अगरबत्ती से
क्यों न स्वागत करते
नये वर्ष की नव चौखट पर
क्यों न दीपक धरते?

नया साल आनेवाला है
खुशी खुशी चिल्लाते
हँसते हँसते शाम ढले
मदिरालय में घुस जाते

विहस्की और बियर रम में ही
नया वर्ष दिखता है
कौड़ी दो कौड़ी में कैसे
प्रजा तंत्र बिकता है

मंदिर मस्ज़िद गुरुद्वारों में
क्यों अरदास न करते
नये वर्ष की नव चौखट पर
क्यों न दीपक धरते?

चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा
नया वर्ष अपना है
किंतु अपना नया वर्ष तो
जैसे एक सपना है

नई हवा की चकाचौंध में
हम अपने को भूले
हमको तो अच्छे लगते अब
पश्चिम के घर घूले

क्यों न घंटे शंख बजा
भारत मां की जय कहते
नये वर्ष की नव चौखट पर
क्यों न दीपक धरते?
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दामोदर लाल जांगिड़ की नूतन वर्षाभिनंदन ग़ज़ल

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ग़ज़ल दें परस्‍पर इस तरह नव वर्ष की शुभकामनाएँ । कल्‍पतरुरों कतारें मन मरुस्‍थल में लगाएं॥ नग्‍न नर्तन हो रहा भय भूख भ्रष्‍टाचार का, जूझने का इनसे हम,संकल्‍प सामूहिक दोहराएं। हैं चतुर्दिक आज हिंसा दहशतों का बोलबाला, हैं इन्‍हें जड़ से मिटाना,ये सभी सौगंध खाएं। नित्‍य नूतन नव सृजनरत सूर्य की पहली किरण, कहती हैं बीते हुए अध्‍याय सारे भूल जाएं । महजबी,सूबाई नफरत द्वेष को जड़ से मिटाकर। है तक़ाजा वक्‍त का कि सोच में बदलाव लाएं। एक अदना आदमी जो लड़ रहा है सबके लिए, उसकी हां में हां मिला कर हौसला उसका बढ़ाएं।

श्रीनारायण चतुर्वेदी का व्यंग्य : पत्नी और धर्मपत्नी

उस दिन एक नये मिल मिलने आये। 'नये' इसलिए कहता हूं कि मेरी वय इतनी हो गयी है कि पुराने मित्र दिनोंदिन कम! होते जा रहे हैं। जो थोड़े-बहुत रह भी गये हैं, वे या तो अशक्त हैं या अन्य प्रकार से आने में असमर्थ हैं-जैसे जो लोग तीन मील पैदल चलकर आ नहीं सकते, उनसे एक ओर का किराया रिक्शावाला तीन रुपया मांगता है। अतएव अब अधिकतर नये मिल ही यदा-कदा आ जाने की कृपा करते हैं। पुराने मित्र मेरी तरह ही दकियानूसी हैं। वे पत्नी को लेकर 'काल करने नहीं आते। नये युग में 'बेहतर अंग' के बिना व्यक्तित्व अधूरा रह जाता है। मेरे अधिकांश नये मित्र भी, जो मेरी 'सनकों' और दकियानूसीपन को जान गये हैं, वे प्राय: अकेले ही आ जाते हैं, किंतु जिन व्यक्तियों से नया परिचय या मिलता हो जाती है, वे आधु- निक रीति से 'पूर्णांग' होकर आते हैं, विशेषकर यदि पत्नी आधुनिक, सोसायटीप्रिय और साहित्यिक अभिरुचि की हुई। जैसाकि मैंने कहा, एक नये मित्र मिलने आये। वे पूर्णांग' थे। उनकी सहचरी विदुषी, शिष्ट, आधुनिक अभिजात परिधान से वेष्टित और दर्शनीय थीं। वाणी मधुर और सुसंस्कृत थी। नमस्कार करके मेरे मिल ने कह…

शेर सिंह की कविता - जाड़ा

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जाड़ा· शेर सिंह जाड़े ने बोला धावा गर्मी की कर दी बोलती बंद लो सर्दी आ गई । ओस से लदी कांपती डालियां झड़ते जर्द पत्‍ते जाड़े की पहचान । गिरता पारा कांपता सूरज धुंध में छिपी सड़कें कोहरे ने मचाया कोहराम । पार्कों, बागों में मगर झांकने लगा गुलाब हो गए लापता पलाश, गुलमोहर । दिल्‍ली बनी कुल्‍लू - मनाली एनसीआर लगता श्रीनगर जाड़ा अपने यौवन पर लो आ गई सर्दी । ----------------------------------------------------------------- 0 शेर सिंह के. के. - 100 कवि नगर, गाजियाबाद-201 010. E-mail- shersingh52@gmail.com

रघुनंदन प्रसाद दीक्षित 'प्रखर' का आलेख - उतार चढ़ाव की साहित्‍यिक यात्रा : वर्ष 2011

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डॉ. रघुनंदन प्रसाद दीक्षित 'प्रखर'उतार चढ़ाव की साहित्‍यिक यात्रा : वर्ष 2011वर्ष 2011 इसलिए विलक्षण कहा जा सकता है क्‍योंकि इस वर्ष हिन्‍दी साहित्‍य के इतिहास में प्रथम बार एक साथ सात महान विभूतियां की जन्‍म शताब्‍दियों का वर्ष रहा, जिनमें कवि,कथाकार, लेखक, कलाविद और संगीतज्ञ शामिल हैं। इन साहित्‍य पुरोधाओं ने अपने कालखण्‍ड में हिन्‍दी साहित्‍य को अनेकों कालजयी रचनाओं से समृद्ध किया ,साथ ही समाज एवं रचनाधर्मियों को एक नई दिशा दी। इन साहित्‍य पुरोधाओं में राष्‍ट्रीय चेतना के कवि गोपाल सिंह नेपाली,सरस कवि गीतकार शमशेर बहादुर सिंह जनकवि बाबा नागार्जुन,शायर फैज अहमद फैज,उत्‍कष्‍ट चिंतक अज्ञेय, मध्‍यवर्गीय परिवार की मनःस्‍थिति को उकेरने वाली तौलिए जैसी अनेकों कहानियों,विषयों पर गद्य लेखन करने वाले शिल्‍पकार उपेन्‍द्र नाथ अश्‍क,केन नदी के किनारे एकांत साधना में लीन केदार नाथ अग्रवाल शामिल हैं। जन्‍म शताब्‍दियों के कारण इस वर्ष पूरे देश में इनके आयोजनों ,गोष्‍ठियों तथा सम्‍मेलनों की धूम रही। साहित्‍य प्रमियों एवं समर्थकों ने अपने स्‍तर से ही यह आयोजन किए परन्‍तु इस तरफ केन्‍द्र अथवा…

एस. के. पाण्डेय के हास्य-व्यंग्य दोहे

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।। दोहे।।भैया ते नर अब नहीं  जो मिलते जब काम।
काम में खोजे न मिलैं ऐसे मनुज तमाम।।  बचन देत जो फिरत हैं और नहीं भय लाज।
यसकेपी दर-दर मिलैं ये नर भरे समाज।। हँसत मिलैं बोलैं मधुर बहुत जतावैं प्यार।
यसकेपी तिनमें नहीं सब को साचो यार।।कुसल छेम बहु पूछते कुसल सुने दुख भार।
यसकेपी नहि झूठ है ऐसे लोग हजार।।को अपना को गैर है कौन करे कब वार।
यसकेपी नहि जानता सब झूठों व्यवहार।।
राजा रंक मुरख निपुन ऋषि महर्षि सब देव।
यसकेपी मरने चले बचा नहीं जग केव।।प्रतिपल बदले सरकता सो जानो संसार।
नसोंमुख यहि जगत में प्रेम राम को सार।।    अहम स्वार्थ अज्ञान बस बन बैठे भगवान।
यसकेपी या जगत में ऐसे बड़े महान।।साच कहौं नहि झूठ कछु तजौ मान अभिमान।
यसकेपी पहिचानिए जा सेवक हनुमान।।यसकेपी रघुपति सही बाकी सब है झूठ।
राम न रूठैं होय का जगत जाय जो रूठ।।ग्रह भूत देवादि जग पूज सरे कछु काम।
अंत समय मुख मोड़ते आते सीताराम।।जगत विदित सच एक है जगत रहा पर सोय।
यसकेपी देखा-सुना राम नाम सत होय।।हाय-हाय कर चल बसे शेष रहे बहु काम।
यसकेपी अब का करे भूल गए श्रीराम।।नाम-दाम लगि पचि मरे हुआ न पर उपकार।
यसकेपी बढ़ता गया जग का यह व्यापार ।।राम बिना आराम…

सूर्यकांत नागर की कहानी - सपने

न्दा ने तीसरी बार पानी पीया। वैसे रात में उठकर पानी पीने की उसकी आदत नहीं है। थककर चूर हो जाने के बाद उसे होश ही नहीं रहता कि सुबह कब हुई। पर जाने क्यों आज उसका हलक सूख रहा है। देह पसीने से बार-बार लथपथ हो आती है। जब रात को पार्टी होती है तब तो इतनी थक जाती है कि सुबह आवाज देकर खुद मिसेज माथुर उसे जगाती हैं। यदि मनोज-रश्मि को स्कूल जाने की जल्दी न हो तो शायद गिसेज माथुर कह गई उसे जल्दी न जगाये। मनोज-रश्मि अब. बड़े हो गये हैं, इसलिए उन्हें तैयार करने की परेशानी तो नहीं रही, पर नन्दा को उनके लिए नाश्ता तो तैयार करना ही पड़ता है। रोज-रोज टोस्ट-अण्डा देने के लिए बच्चे मम्मी से उतना नहीं उलझते जितना नन्दा से उलझते हैं। पर वह भी क्या करे! मेम साब का आदेश है कि बच्चों को कम से कम दो अण्डे रोज खिलाया करे-चाहे उबले हुए हों या आमलेट की शक्ल में।पानी पीकर नन्दा फिर लेट गयी। बहुत कोशिश की कि आँख लग जाये। मगर नींद ने तो जैसे शर्त बद ली थी। एकदम बैरन हो गयी। आने का नाम ही नहीं लिया।.. .बहुत दिनों बाद वह आज घर गयी थी। पहले अक्सर जाती थी। छुट्टी लेकर दोपहर में माँ-बापू और भाई-बहन से मिल आती थी। पर घर …

अरविन्‍द कुमार का आलेख : युवा कथाकारों की कहानियों का पोस्‍टमार्टम

आलेख युवा कथाकारों की कहानियों का पोस्‍टमार्टम अरविन्‍द कुमार एक साल से विभिन्‍न हिंदी पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों को पढ़ा। वरिष्‍ठ कथाकारों, आलोचकों के साक्षात्‍कार, उन पर उनकी ‘आलोचना दृष्‍टि' का भी सूक्ष्‍मता से अध्‍ययन किया। युवा कथाकारों की ‘कथादृष्‍टि' पर कई ‘आरोप' लगाए जा रहे हैं। पहला आरोप यही लगाया जाता है उनके पास कोई ‘कथादृष्‍टि' ही नहीं है।' दूसरा यह है कि वे ‘कथा' के स्‍थान पर ‘शिल्‍प' को अधिक महत्त्व दे रहे हैं। तब तो ‘कथा' गौण हो जाती है ‘शिल्‍प' उसका स्‍थान ले लगा और आगे यह भी कहा जा रहा कि उनका ‘विजन' कैसा है ? या जो कहानी लिखी जाए उसमें ‘सामाजिक सापेक्षता' है कि नहीं है अर्थात्‌ कथाकार किस प्रकार के ‘समाज का निर्माण' करना चाहता है ? वह परंपराओं को मानना चाहता है कि नहीं और तो और यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि युवा कथाकार ‘क्‍लासिकल लिटरेचर' या ‘पुराने कथाकारों को नहीं पढ़ना चाहते हैं। उपर्युक्‍त तमाम आरोप पर ‘बयान' बाजी करने के बजाय मैं यह उपयुक्‍त समझूंगा कि ‘युवा रचनाशीलता' या युवा कथाकारों की कहानियों …

रघुनन्‍दन प्रसाद दीक्षित प्रखर की कविता व पुस्तक समीक्षा

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(कुंडलियां)नथनथ की अकथ कहानियां ,रच डाले इतिहास। कभी रही चित चोरनी, कभी हास परिहास॥ कभी हास परिहास बहुमुखी किलोलें करे चिबंक पर।मूंगा मोती मकर आकृति अंगना ज्‍यों खग लागे पर॥'प्रखर' हिलोरें उर अर्न्‍त में जैसे काम चढा हो रथ।इतिहास बन गयी मंहगाई में हाय फैशन मारी नथ॥ जीवन का रणआखिर सब्र का इम्‍तिहान लेंगे कब तक अर्न्‍त व्रण, तल्‍ख तकरीर का सबब बन गये आज वही क्षण,। सुकून की जिन्‍दगी दुश्‍वार लगती या फिर यूँ कह लें जिन्‍दगी के फलक पर अमर्ष में बिंधा कण कण,॥ क्‍या पैसे का कद मानवता से बडा हो गया, दौलत की चमक में कहीं अपने होने का अस्तित्व खो गया, नहीं चाहिए, ढेरों सुख सुविधा खुशियां ढलती शाम में चाहिए मात्र सुकून का क्षण॥ जैसा पहले था आज भी वैसा ही पहले भी खाली आज भी जब कुछ नहीं तो डर कैसा......? डर यही मीत ! परास्‍त न कर दे जीवन रण॥ सूर्य का तेज निशीथ की चांदनी कहां शास्‍वत विभव होता निश्‍चित करता वह आश्‍वस्‍त 'प्रखर' शक्‍तियों में रह जायेगी केवल हड बड॥ बिना शुल्‍कबिना शुल्‍क के कुछ नहीं मिलता पेट काटकर मुफ्‍त खा रहे, पकड़े पीछे जेल जा रहे, वक्‍त किसी का हुआ कभी क्‍या…

अनुराग तिवारी की कविता - मैं निडर हूँ

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मैं निडर हूँमैं निडर हूँ, अब किसी भी बात से डरता नहीं हूँ। ज़िन्‍दगानी के सफ़र में, लाख रोड़े हों डगर में, अब न कोई फ़र्क पड़ता, सामने तू दीख पड़ता। हों अंधेरे लाख बाहर, फिक्र मैं करता नहीं हूँ। मैं निडर हूँ, अब किसी भी बात से डरता नहीं हूँ। फूल की है चाह ना, अब शूल की परवाह ना, नाम तेरा, आस तेरी, नाव औ‘ पतवार मेरी। तू ही माझी, अब भंवर की चाल से डरता नहीं हूँ। मैं निडर हूँ, अब किसी भी बात से डरता नहीं हूँ। जब से तूने बाँह थामी, बदली मेरी ज़िन्‍दगानी, तेरी करुणा का भिखारी, मौन का मैं हूँ पुजारी। अब भ्रमर की भाँति मै हर डाल पर फिरता नहीं हूँ। मैं निडर हूँ, अब किसी भी बात से डरता नहीं हूँ। भाव अर्पित, कर्म अर्पित, कर रहा सब कुछ समर्पित, अब संभालो नाथ मुझको, बस तुम्‍हारी आस मुझको। अब तुम्‍हारी राह से मैं चाहता डिगना नहीं हूँ। मैं निडर हूँ, अब किसी भी बात से डरता नहीं हूँ। -- -सी ए. अनुराग तिवारी5-बी, कस्‍तूरबा नगर,सिगरा, वाराणसी- 221010

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की कविता - वे ही पल पल तोड़ा करते

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-- वे ही पल पल तोड़ा करते सुबह शाम और जब जी चाहा
मंदिर मस्जिद जाते लोग
ईश्वर को देते हैं धोखा
अल्लाह को भरमाते लोग। दिन तो छल छंदों में बीता
रातें काटीं मस्ती में
फिर भी सड़कों पर मिल जाते
भजन कीर्तन गाते लोग। पहले तो अंतरमन से
आंखों का परदा होता था
अब तो खुलकर खाने में भी
कहीं नहीं शरमाते लोग। दिन दिन बढ़ती जातीं
अरमानों की भूखी लाशें
चारों ओर मिला करते हैं
अपने को गरमाते लोग। मतलब की भूखी मंडी में
ईमानों की कहां कदर
पता नहीं क्यों घूमा करते
दिल लाते ले जाते लोग। हाथ मिला कर गला काटना
ये तो सबने सीखा है
पता नहीं क्यों खुश होते हैं
अपनी नाक कटाते लोग। बेशरमी और बेरहमी
के नंगे तांडव होते हैं
लाज भले ही शरमा जाये
किंतु नहीं लजाते लोग। कुछ‌ छ लोगों ने प्रजातंत्र की
बागडोर है थाम रखी
जब भी चाहा जैसे चाहा
सबको यही नचाते लोग। असली चेहरे तो कहने के
सब पर लगे मुखौटे हैं
कहते कुछ हैं करते कुछ हैं
बस गिरगिट बन जाते लोग। झूठ बोलना धरम‌ हो गया
वेद पुराण हुये पाखंड
खुदको सच्चा और गेरों को
झूठा ही बतलाते लोग। नियम कायदे तो कहने को
ढेरों लिखे किताबों में
वे ही पल पल तोड़ा करते
जो कानून बनाते लोग।

शशांक मिश्र भारती की दो कविताएँ - नारी

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नारी और प्रगतिनारी नर से बढ़कर कर रही है दायित्‍वों, कर्त्तव्‍य का निर्वहन एक ही नहीं तीन-तीन स्‍वरूपों में कभी पुत्री, कभी पत्‍नी तो कभी मां के रूप में; किन्‍तु- अधिकार, विचार स्‍वातंत्र्य अति संकुचित। योग देखे तो- बालकों की पालिता होने से पुरुषों से दो गुनी, पर- चतुर्दिक हो रही हत्‍या, बलात्‍कार, दहेज, हिंसा का शिकार, शोषण पर दृष्‍टि डालें सर्वाधिक हो रहा नारी के ही किसी न किसी रूप से स्‍वतंत्रता के बीते अनेक दशकों के बाद भी, घोषणाओं- असंख्‍य कानूनों, स्‍वंयसेवी संस्‍थाओं के बाद भी परिणाम ढाक के तीन पात ; वह चहुँ ओर आतंक ग्रस्‍त नस दुर्बल होते अपराध कर भयमुक्‍त, उठ रहे हैं प्रश्‍न उत्तर के लिए सन्‍नाटा रात सा दिशायें भी मौन देश-इक्‍कीसवीं सदी में, मेरी समझ में नहीं आता; जब तक- भारतीय नारी के अस्‍तित्‍व पर प्रश्‍न चिन्‍ह उस पर चतुर्दिक से क्षुभित आक्रमण पलायन भी स्‍वतंत्रता की ओर न हो यदा-कदा स्‍वच्‍छन्‍दता की ओर। शक्‍ति स्‍वरूपा को जाग्रत कर पुनः स्‍थापित करना पड़ेगा उस स्‍थान पर जहां से निर्भय हो चल सके रमन्‍ते तत्रदेवता की उक्‍ति सार्थक हो टूटे सदियों का दुष्‍चक्र समयानुसार पकड़े …

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - 14 वीं कड़ी - आओ कहें... दिल की बात : बेटा जिग्नेश...तुम कहाँ हो...?

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पिछली कड़ियाँ  - एक , दो , तीनचार, पांच, छः , सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह , तेरहआओ कहें...दिल की बातकैस जौनपुरीबेटा जिग्नेश...तुम कहाँ हो...? बेटा जिग्नेश...! तुम कहाँ हो...? मैं, तुम्हारी माँ चन्दन, आज बीस साल से तुम्हारा इन्तजार कर रही हूँ. काश...! मेरी बात तुम तक पहुँच सके. बेटा, लौट आओ. तुम एक छोटी सी बात पर इतना नाराज हुए कि घर ही छोड़ दिया...? मैंने तो तुम्हारी भलाई के लिए कहा था, जो भी कहा था. हर माँ अपने बच्चे को डाँटती है लेकिन हर बच्चा तुम्हारी तरह घर तो नहीं छोड़ देता ना...? बेटा, अगर मुझे पता होता कि मेरी एक डाँट तुम्हें इतनी बुरी लगेगी तो मैं तुम्हें कभी नहीं डाँटती. और मैंने तो तुम्हें कितने अरमानों से पाला था. तुम बारह साल के थे उस वक्त जब तुमने घर छोड़ा था. आज इस बात को बीते लगभग बीस साल हो गए हैं. अब तो तुम तीस-बत्तीस साल के हो गए होगे. सात बहनों के तुम अकेले भाई थे. सबके लाडले थे तुम. बेटा, हम अब भी अम्बोली में ही रहते हैं. तुम एक बार वापस आ जाओ. साल भर हुआ तुम्हारे पिताजी भगवान दास भी नहीं रहे. जाते-जाते उनकी तुम्हें देखने की इच्छा भी पूरी नहीं हुई. बेटा, हमन…

ज्योति सिन्हा का आलेख - युगद्रष्टा गुरूदेव रवीन्द्र नाथ एवं उनकी साहित्य यात्रा

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रवीन्द्र नाथ टैगोर को आज सम्पूर्ण विश्व उनकी 150वीं जन्मशती पर शत्-शत् नमन करता है एवं अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि युगद्रष्टा गुरूदेव रवीन्द्र नाथ एवं उनकी साहित्य यात्रा (विशेष रूप से काव्य के संदर्भ में)

विश्व वांगमय में कवीन्द्र रवीन्द्र को मूर्धन्य स्थान प्राप्त है। उनकी साहित्यिक कृतियों व रचनाओं में उनमें छिपी दैवीय सर्जनात्मक शक्ति का प्रतिफलन है जिसके प्रभाव से देश ही नहीं अपितु विश्व के जन प्रभावित हुये। उनकी ख्याति देश काल की परिधि से बाहर है। अनेक भाषाओं में इनकी कृतियों का अनुवाद हुआ है। रवीन्द्र साहित्य के एक-एक विधा पर शोधरत शोधार्थियों ने शोध किया है। बंग्ला में भी नई-नई दृष्टियों से बहुत काम हुआ है। अब भी हो रहा है।
रवीन्द्र नाथ जी ने बहुत लिखा है इसमें कविता है, उपन्यास है, कहानियाँ हैं, नाटक हैं, निबन्ध है, आलोचना है तथा साहित्य अपने व्यापक अर्थ में जो कुछ भी सूचित करता है उन सब पर उनका अबाध अधिकार था। अपनी साहित्यिक रचनाओं में सर्वत्र उन्होने सत्य पर विचार किया है - ‘‘क्या जगत, क्या भौतिक जगत और क्या स्वदेश और क्या विदेश, सर्वत्र सत्याचरण को ही उन्नति और अभ्यूदय का मूल मंत…

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रवि रतलामी

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