संदेश

January, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

कैस जौनपुरी के नगमें

चित्र
तुम अहसास होतुम अहसास हो
मैं जज्बात हूँ
तब तक न मिलें
जिन्दगी अधूरी है....
यही है रिश्ता
हमारा तुम्हाराबिन एक दूजे के
तू भी कुछ नहीं
मैं भी खाक हूँ
तुम अहसास हो
मैं जज्बात हूँ....
मिल जाएँ अगर
तो कुछ बात हो...
तुम अहसास हो
मैं जज्बात हूँ....बिन तुम्हारे
मैं हूँ क्या
इक बिगड़ी हुई
हालात हूँ...
तुम अहसास हो
मैं जज्बात हूँ...कैस जौनपुरी
qaisjaunpuri@gmail.com
www.qaisjaunpuri.com

अनन्त भारद्वाज की दो कविताएँ

चित्र
स्मृतियाँ.....उन प्यार करने वालों के नाम जिन्हें अपनी बीती ग़ज़ल हर रोज याद आती है,
और दिल  भूलना चाहता है उस परी को...
पर आँखें भी.. क्यूँ  हर  दिन अज़ीब  से मंज़र दिखाती है ,
कि उसकी यादों की ओढ़नी रोज़ कुछ घटनाओं  के सहारे उडी चली आती है,,
उन्हीं छोटी - छोटी प्यार भरी घटनाओं को समेटती  एक कविता स्मृतियाँ.....हर आस मिटा दी जाती है, हर सांस सुला दी जाती है...
फिर भी यादों के पन्नों से कुछ स्म्रतियाँ  चली आती है...
उन यादों  में खो जाता हूँ, बस तू ही दिखाई देती है,
ठीक उसी पल दरवाजे पर एक आहट सी सुनाई देती है,
हम बिस्तर  से दरवाजे तक दौड़े - दौड़े फिरते हैं ,
पर वो तो हवा के झोकें थे जो मजाक बनाया करते हैं ,
दिल घर की छत के एक किनारे बैठा आहें भरता है,
दो हंसों का जोड़ा नदिया के पानी में क्रंदन करता है,
जब हंसों के करुण विनय से नदिया तक भर जाती है,
तब यादों के पन्नों से कुछ स्मृतियाँ चली आती है.
उन भूली - भटकी यादों को कैसे मैंने बिसराया है,
तेरे हर ख़त को मैंने उस उपवन में दफनाया है,
उन ख़त के रूठे शब्दों  से पुष्प नहीं खिल पाते हैं,
शायद तेरे भेजे गुलाब मुझे नहीं मिल पाते हैं,
जन्मदिवस की संध्या पर जब…

प्रमोद भार्गव का आलेख - पाठ्‌यक्रम में यौन शिक्षा

चित्र
किशोरावस्‍था में किशोर छात्र-छात्राओं को एड्‌स जागरूकता के बहाने सरकारी पाठशालाओं में यौन शिक्षा परोसने की तैयारी राष्‍ट्रीय महिला आयोग करने जा रहा है। इस तरह की नाकाम कोशिश मध्‍यप्रदेश सरकार चर्चा परिचर्चाओं के माध्‍यम से की थी, लेकिन सेवा-निवृत्ति की उम्र के करीब पहुंचे शिक्षक किशोरावस्‍था की दहलीज पर खड़े चौदह-पन्‍द्रह साल के बालक-बालिकाओं किस मनोवैज्ञानिक तरीके से यौन शिक्षा का पाठ पढाऐंगे इस गंभीर विचारणीय बिन्‍दु पर सात साल से बात अटकी है। क्‍योंकि उम्र में कई दशकों का अंतराल और पारंपरिक मर्यादा साठ साल के शिक्षक को सेक्‍स का पाठ पढ़ाने के लिये मानसिक रूप से किस तरह से और किस स्‍तर पर तैयार करेगी यह शिक्षक के लिये एक बड़ी चुनौती है। इस असहज चुनौती को स्‍वीकार कर भी लिया जाए तो भविष्‍य में इसके क्‍या परिणाम अथवा दुष्‍परिणाम निकलेंगे इन पर भी गंभीर वैचारिक विश्लेषण की जरूरत है। हमारे देश में आजकल विद्यालय स्‍तर पर यौन शिक्षा को लेकर जबरदस्‍त हो-हल्‍ला है। हो-हल्‍ला अथवा हल्‍ला बोल शब्‍दों का इस्‍तेमाल इसलिए किया जा रहा है क्‍योंकि शालाओं में यौन शिक्षा दिए जाने के संदर्भ में न तो…

विजय पाटनी की कविताएँ

चित्र
1जरा समय निकाल कर आ...तेरे मेरे दरमियान कुछ बातें , अधूरी पड़ी हैं जरा समय निकाल कर आ थोड़े मेरे "लफ्ज" ले जा ,थोड़े अपने "गम" दे जा।। बमुश्किल खुशियाँ जोड़ी हैं, तेरे इंतजार में जरा समय निकाल कर आ मुझे आंसू दे जा , अपनी खुशियाँ ले जा।। कुछ त्यौहार अधूरे पड़े हैं , तेरे इंतजार में जरा समय निकाल कर आ अपने पीने की वजह ले जा , मुझे जीने की वजह दे जा।। उन गलियों में , हमारे कुछ पुराने किस्से रखे हैं कुछ इल्जाम तो ले लिए मैंने अपने सर बाकी कुछ तेरे हिस्से रखे हैं। जरा समय निकाल कर आ अपना इनाम ले जा, मुझे और इल्जाम दे जा।। पिछली बात का जख्म , अब भी हरा है आँखों में, आंसुओं का ,समन्दर भरा है उन जख्मों को कुरेदने के बहाने आ अपन हक ले जा , मुझे और जख्म दे जा। तेरे मेरे दरमियान कुछ बातें , अधूरी पड़ी हैं जरा समय निकाल कर आ --- २.तुम हमें क्या रुलाओगे?
आंसू हमारी और आते आते , खुद ही मुस्कराने लगते हैं। हम चाँद को छेड़ देते हैं , सूरज के साये में
तुमको अब भी , हम सयाने लगते हैं ? दर्द की बात मत करना, ना ही जख्म देना हंसी कोई
जब गम होते हैं ज्यादा दिल में , हम लोगों को हं…

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - 19 वीं कड़ी - आओ कहें... दिल की बात : कामवाली बाई

चित्र
पिछली कड़ियाँ  - एक , दो , तीन, चार, पांच, छः , सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह , तेरह, चौदह, पंद्रह, 16, 17, 18आओ कहें...दिल की बातकैस जौनपुरी
कामवाली बाईमैं एक कामवाली बाई हूँ. वैसे तो कामवाली बाई का नाम सुनते ही लोगों के दिमाग में एक चालीस-पचास साल की बूढी औरत का खयाल आता है. लेकिन बदलते हुए वक्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है. उसी तरह हम कामवाली बाईयों का भी हिसाब-किताब बदल चुका है. पहले कोई कामवाली बाई मजबूरी में बनती थी लेकिन आज बात कुछ और है. मजबूरी ने पेशे का रूप ले लिया है. पहले कामवाली बाई पैसे कमाकर अपने बच्चों का पेट पालती थी. आज माँ भी काम करती है और बेटी भी. मैं भी एक कामवाली बाई की बेटी और एक कामवाली हूँ. मेरी उमर है सत्रह साल. बदकिस्मती है लेकिन बताना जरुरी है क्यूंकि बात ही ऐसी है. हम कामवाली बाईयां लड़कों को स्कूल भेजती हैं ताकि वो सर उठाके जी सकें. और लड़कियाँ तो काम करने के लिए ही बनी हैं. कामवाली बाई के घर में पैदा होने वाली लड़की एक नई बाई बन जाती है. जिस तरह सबके घर में लड़का होता है तो खुशी होती है कि “चलो लड़का है. बात आगे बढ़ेगी.” उसी तरह हमारे यहाँ जब लड़की होती है तो ल…

शिखा गुप्‍ता की कविताएँ

चित्र
कविता चंचल मनयूं ही बैठे-बैठे मैं खुद से बात करती हूं की क्‍या सोचता रहता है ये मन क्‍या चाहता है पर जवाब नहीं मिलता। वक्‍त वेवक्‍त क्‍यों आंखों में नींद आती है जब आंखें बंद करो तो चंचल मन चलने लगता है दिमाग सोचने लगता है और आंख बंद होकर भी बेबस नजर आती है -------------- अंधेराहम अंधेरे के हो गये और अंधेरे में ही खो गये क्‍या अंधेरे ही जीवन में अब रह गये उजाले थे कभी इस जीवन में उन उजालों की बात कुछ ओर थी अब तो अंधेरे ही अंधेरे रह गये है और हम अंधेरे के हो गये। ------- परिभाषाप्‍यार क्‍या होता है मैंने पढ़ा था प्‍यार में समर्पण होता है त्‍याग होता है मान-सम्‍मान होता है पर नहीं प्‍यार में हकीकत में किताबों में पढ़ी किताबी बातें ही होती है प्‍यार में लोग अपने स्‍वार्थ के बदले अपने सम्‍मान की खातिर दूसरे का अपमान करते है प्‍यार में अपने पराये का एहसास कराया जाता है क्‍या प्‍यार एक परछाई है जो हाथ नहीं आती आती है तो जिल्लत और शर्मिंदगी! हकीकत एक रिश्‍ता जो बेमानी है वो साथी एक छाया है जो रोशनी में खो जाता है अंधेरे में साथ दिखाई तो देता है पर साथ नहीं होता एक सपना जो मेरा भी था और उसका भ…

दीपक कुमार पाठक की कविता - आबे-जमजम और आबे-गंगा

चित्र
लगता है आग बुझ गई है जहन से हमारे, थोड़ी हवा तो दो शायद दबा शोला कोई दहक जाए। आँख नम होती नहीं हैं, क्‍यों हमारी मौत पर, कोशिश तो करो शायद जिन्‍दगी किसी की महक जाए। तुम जो चाहो तो खिला दो फूल रेगिस्‍तान में, और तुम जो चाहो तो नखलिस्‍तान, रेगिस्‍तान में बदल जाए। घोसले तो कई बसे है, पेडों की शाखों पे गर, आहिस्‍ता से थामना, सम्‍हालना, कहीं नीड़ न किसी का उजड़ जाए। बागबाँ बन के तो देखो, इन उजड़े हुए मजारों के, दाबा है, जर्रा-जर्रा, बूटा-बूटा इनका जो न चहक जाए। कब तलक समुन्‍दर के किनारे, हम यूँ ही प्‍यासे रहेगें तमाम उम्र, तबीयत से ठोकर लगा दो, चश्‍मा फूटे और प्‍यास हमारी मिट जाए। ख्‍वाहिशों को मारना अब मुनासिब नहीं, ए-दोस्‍तों, न जाने कब जिन्‍दगी मौत की बाहों में पिघल जाए। आबे-जमजम और गंगा के पानी में फर्क करना मुश्‍किल है मगर, कुछ ऐसा करों कि दोनों आबे-गंगा में बदल जाए। मिटा दो काशी-काबा को कि खण्‍डहर भी न रहे, नामों-निशा भी न रहे, आओं करें जतन ऐसा कि काबा-काशी की जगह इन्‍सानियत की पाठशालाएँ खुल जाए। --- डॉ० दीपक कुमार पाठक सहा० प्राध्‍यापक-संस्‍कृत संस्‍कृत विभागा नेहरू महाविद्यालय, ललि…

गोवर्धन यादव की लघुकथा - भूख

चित्र
भूख ."क्यों भाई...अच्छे खासे हट्टे- कट्टे नौजवान हो, कोई काम- धंधा क्यों नही करते.,भीख माँगते हुये तुम्हें शर्म आनी चाहिये""शर्म तो बहुत आती है साहब ,मगर कोई काम देता ही नहीं. चलिये आप ही मुझे कोई छोटा- मोटा काम दिला दीजिये. मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं उसे पूरी इमानदारी असुर पूरी निष्ठा के साथ पूरा करुँगा.":" अच्छा ये तो बतलाओ कि घर और कौन कौन हैं ?""एक बूढी अपाहिज मां है,जो काफ़ी लंबे समय से बीमार पडी है. अभी वह तवे सी तप रही है," "तो उसका इलाज क्यों नहीं कराते. उसे अस्पताल- वस्पताल ले जाओ ,मुफ़्त में इलाज हो जायेगा. और उसे दवा भी मिल जायेगी."" साहबजी, ठीक कहा आपने कि उसे अस्पताल ले जाऊँ तो वह ठीक हो जायेगी, लेकिन उसका इलाज कराने से भी कोई फ़ायदा नहीं है. अगर वह ठीक हो भी गई तो भूख में नाहक ही तडपेगी . जब मैं स्वयं का पेट नहीं भर पाता तो उसे क्या खिलाउंगा. उसका मर जाना ती ठीक रहेगा."बडी ही बेबाकी एवं निष्ठुरता के साथ उसने अपने मन की बात कह दी थी, ऐसा कहते हुये न तो उसे कोई ग्लानि हो रही थी और न ही कोई शिकन उसके चेहरे …

प्राण शर्मा की कविता : मेरे वतन के लोगों मुखातिब मैं तुमसे हूँ

चित्र
मेरे वतन के लोगों मुखातिब मैं तुमसे हूँ

क्यों कर रहे हो आज तुम उलटे तमाम काम
अपने दिलों की तख्तियों पे लिख लो ये कलाम
तुम बोओगे बबूल तो होंगे कहाँ से आम
कहलाओगे जहान में तब तक फ़कीर तुम
बन पाओगे कभी नहीं जग में  अमीर तुम
जब तक करोगे साफ़ न अपना ज़मीर तुम
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ

ये प्रण करो कि खाओगे रिश्वत कभी नहीं
गिरवी  रखोगे  देश की किस्मत कभी नहीं
बेचोगे  अपने  देश  की  इज़्ज़त  कभी नहीं
देखो , तुम्हारे जीने का कुछ ऐसा ढंग  हो
अपने  वतन  के  वास्ते  सच्ची  उमंग  हो
मक़सद  तुम्हारा  सिर्फ़  बुराई  से जंग हो
मेरे वतन के लोगों मुखातिब मैं तुमसे  हूँ

जग में गँवार कौन बना सकता है तुम्हें
बन्दर का नाच कौन नचा सकता है तुम्हें
तुम एक हो तो कौन मिटा सकता है तुम्हें
जो कौमें एक देश की आपस में लड़ती हैं
कुछ स्वार्थों के वास्ते नित ही झगड़ती हैं
वे कौमें घास - फूस के जैसे ही  सड़ती  हैं
मेरे वतन के लोगों मुखातिब मैं तुमसे हूँ

उनसे बचो सदा कि जो भटकाते हैं तुम्हें
जो उल्टी - सीधी चाल से फुसलाते हैं तुम्हें
नागिन की तरह चुपके से डस जाते हैं तुम्हें
चलने न पायें देश में नफ़रत की गोलियाँ
फि…

कवि मनोहरलाल हर्ष की पुस्‍तक ‘मूषक पुराण‘ का विमोचन

चित्र
मनोहर लाल हर्ष पौराणिक संस्‍कृति से जुड़े प्रसंगों का श्रद्धा से चित्रणः संवित सोमगिरी जीबीकानेर/जयपुर। हास्‍य व्‍यंग्‍य रचनाकार एवं चित्रकार श्री मनोहरलाल हर्ष ‘कविहृदय की पुस्‍तक ‘मूषक पुराण‘ का विमोचन यहां मरूधर हैरिटेज होटल में आयोजित कार्यक्रम में हुआ। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता करते हुए लालेश्‍वर महादेव मंदिर शिवबाड़ी के अधिष्‍ठाता संवित सोमगिरी जी महाराज ने कहा कि पुराणों में हमारा धर्म और संस्‍कृति समाहित है, कृति ‘मूषक पुराण‘ में हर्ष ने पुराण शब्‍द और पुराणों के प्रति श्रद्धा भाव का प्रदर्शन करते हुए पौराणिक प्रसंगों का बारीकी से चित्रण किया है, जो एक बेजोड़ मिसाल है। उन्‍होंने कहा कि हर्ष की कविताओं में गहराई और सौम्‍यता है, इनके माध्‍यम से उनके चित को टटोले तो ऐसा लगता है कि कि मानो वे सागर में कुछ ढूंढ रहे है, कविताएं मोती के समान पिरोई हुई लगती है। महराज श्री ने कहा कि कवि ने पौराणिक और समसामयिक घटनाओं को मूषक पुराण में वर्णित करते हुए समाज का ध्‍यान आकर्षित किया है। उन्‍होंने कहा कि मूषक भगवान श्री गणेश का वाहन है और यह अध्‍यात्‍म और बुद्धि का प्रतीक है, कवि ने नूतन तरीके …

नरेन्द्र कुमार तोमर की कविताएँ

चित्र
1 पड़ चुके थे वोट पड़ चुके थे वोट हो चुके थे चुनाव चल रही थी कांउटिग आ रहे थे नतीजे- सजे हुए एक आलीशान ड्राइगंरूम में अंग्रेजी शराब के पेग चढ़ाते बड़ी सी टीवी के सामने बैठे सफेद पोष लोग कोस रहे थे प्रजातंत्र को/नेताओं को/जाहिल गंवारों को किन लोगों को जिता दिया किसे सौंप दिया राज रसातल में जा रहा है मुल्‍क, आंखों में लाल डोरे डाले लड़खडा़ती जुबान से कभी गुस्‍से ,तो कभी दुख के साथ देश के लिए अपने लाल ,मोटे ,चिकने मुंह से कोरस में निकाल रहे थे उवाच/एक स्‍वर से / सब थे एकमत- कुछ नहीं हो सकता इस देश का- सब के चिकने हाथ एक से थे किसी के बाएं हाथ की तर्जनी के नाखून पर काला निशान नहीं था ़ -------------------- 2अरसे से...अरसे से इधर कुछ नहीं हुआ यही क्‍या कम हुआ एक गेंद के पीछे भागते-दौड़ते लड़ते-झगड़ते रहे बच्‍चे काले बुरकों के पीछे से झांकती आलू और प्‍याज पर चिकचिक करती रही औरतें हाथ में मटमैला कलावा बांधे सब्‍जी वाली से माथे तक सिर ढंके अपनी किशोरी चुलबुली ननदों के साथ नई-नवेली बहुएं मनिहार से चूड़ियां चढ़वाती रहीं अरसे से कुछ नहीं हुआ यही क्‍या कम हुआ अलस्‍सुबह से मंदिर की घंटियों और…

धर्मेन्द्र कुमार सिंह की कविता - पैसे का प्रवाह

चित्र
गर्मी ठंढक की तरफ बहती है विद्युत धारा कम विभव की ओर बहती है पानी नीचे की तरफ बहता है ऊर्जा का हर स्वरूप हमेशा बहता है ज्यादा से कम की तरफ ये प्रकृति का नियम है मगर पैसा उसी ओर बह रहा है जहाँ ज्यादा पैसा है ये तभी संभव है जब पैसे का नीचे की ओर बहाव रोक दिया गया हो आसमान तक ऊँचे एक बाँध से और इस बाँध की दीवारों से टकराकर मजबूरन पैसा बह रहा हो प्रकृति के खिलाफ़ बाँध के नीचे की तरफ बसने वाले खुश हैं कभी कभी छोड़े गए कुछ लीटर पैसों से और माँगते हैं ईश्वर से कि बना रहे बाँध ताकि बनी रहें हमारी झोपड़ियाँ कयामत तक चलता रहेगा ये क्रम अगर छोड़ा न गया झोपड़ियों का मोह और खत्म न हुआ बाँध टूटने का डर बाँध टूटेगा तो लेगा ही कई झोपड़ियों और लोगों की बलि पर जो कुछ बचा रहेगा वह देखेगा एक बार फिर पैसे को बहते हुए प्रकृति के नियमानुसार
--
धर्मेन्द्र कुमार सिंह
वरिष्ठ अभियन्ता (जनपद निर्माण विभाग - मुख्य बाँध)
बरमाना, बिलासपुर
हिमाचल प्रदेश
भारत

अनुराग तिवारी की कविता - शहर पसारे पाँव

चित्र
शहर पसारे पाँव,
सिकुड़ते गाँव।
हाकिम पहुँचे चौपालों पर,
एक नया फ़रमान लिए,
ले लो यह नोटों की गड्डी,
अब ग्राम भूमि सरकारी है।
यहाँ बनेगी फ़ैक्टरी,
अस्पताल, स्कूल,
सबको काम मिलेगा भइया,
दुर्दिन जाओगे भूल।
खेती, खलिहानी सब छूटी,
फूले हाथ, पाँव।
शहर पसारे पाँव,
सिकुड़ते गाँव।
भूपतियों से इतर गाँव में
ऐसे भी थे,
सरकारी खसरों में जिनके
नाम नहीं थे।
कहलाते मज़दूर,
गाँव में ही रहते थे,
खेतों में मज़दूरी करके
जीवन यापन करते थे।
कौन सुने अब उनकी पीड़ा,
कहाँ मिलेगी ठाँव।
शहर पसारे पाँव,
सिकुड़ते गाँव।
उद्घाटन को मंत्री आये,
साथ में मेला ठेला था,
सरकारी वादे थे लेकिन,
गाँव का एक न धेला था।
उस पर, यह क्या, बनते दिखते,
फ्लैट, इमारत आलीशान,
मंहगे होटल, शॉपिंग मॉल,
जहाँ बसें शहरी धनवान।
जाने कब तक छला करेगा,
गाँवों को सरकारी दाँव।
शहर पसारे पाँव,
सिकुड़ते गाँव।
सी ए. अनुराग तिवारी

एस के पाण्डेय का व्यंग्य : अखिल भारतीय नास्तिक सम्मेलन

चित्र
एक बार नास्तिकों ने ‘अखिल भारतीय नास्तिक सम्मेलन’ आयोजित करने की योजना बनाई। सभी नास्तिकों को बुलावा भेजा गया। नियत दिन, समय और जगह पर बड़े-बड़े नास्तिक आने लगे। बड़े-बड़े का मतलब यह नहीं है कि उनका शरीर भारी-भरकम था। अर्थात वे देखने में कुम्भकर्ण जैसे नहीं थे। वे सामान्य आदमी की तरह ही दिखते थे। लेकिन कुम्भकर्ण बहुत ज्यादा बुद्धि शून्य नहीं था। क्योंकि कुम्भकर्ण कुछ भी रहा हो पर नास्तिक नहीं था। उसे परासत्ता में भरोसा था। उसने तपस्या करके व्रह्मा जी से वरदान लिया था। और रावण को श्रीराम जी के परमात्म स्वरूप का उपदेश दिया था। खैर नास्तिकों के अग्रज डैश पर बिराजमान हो गए। और बारी-बारी से ईश्वर विरोधी भाषण देने लगे। जैसे भारतीय नेताओं के भाषण बहुधा घिसे-पिटे ही होते हैं। हम जीतेंगे तो बेरोजगारी खत्म कर देंगे। रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था पर जोर देंगे। बिजली, सड़क और पानी की समस्या नहीं रहेगी। लेकिन कितनी बार जीतने पर ऐसा करेंगे। यह नेता भी नहीं जानते। इसके अलावा अपने विरोधियों को भला-बुरा कहना कोई भी नेता नहीं भूलता। यही नेता का भाषण है। बीस साल पहले भी यही था। आज भी यही है। और बीस साल बाद…

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की कविता : कह रही थी चीखकर मैं सत्य की परछाईं हूं

चित्र
स्वस्थ थी अच्छी भली थी डाक्टरों ने मार डाला
डाक्टरों की ही चली थी डाक्टरों ने मार डाला।

लाख कोशिश की बचा लें हम किसी लाचार को
दाल उनकी ही गली थी डाक्टरों ने मार डाला।

रोज‌ स‌म‌झाया ह‌ज़ारों बार‌ त‌क‌ ताकीद‌ की
आज‌ रोटी फिर‌ ज‌ली थी डाक्टरों ने मार डाला।

आज‌ जिस‌को रौंदक‌र‌ हंस‌ते हुये स‌ब‌ आ ग‌ये हैं
अध‌खिली ही व‌ह‌ क‌ली थी डाक्टरों ने मार डाला।

एक‌ डाली पेड़‌ की जो आज‌ सूखी दिख‌ र‌ही है
व‌ह‌ क‌भी फूली फ‌ली थी डाक्टरों ने मार डाला।

ये पसीना और बदबू और हम कितना चलें अब‌
धूप में भी खलबली थी डाक्टरों ने मार डाला।

कह रही थी चीखकर " मैं सत्य की परछाईं हूं "
राह में रोती डली थी डाक्टरों ने मार डाला।

धर्मेन्द्र कुमार सिंह का कविता / गीत / नवगीत व ग़ज़ल संग्रह - ईबुक : अम्ल क्षार और गीत

धर्मेन्द्र कुमार सिंह का कविता / गीत / नवगीत व ग़ज़ल संग्रह - ईबुक : अम्ल क्षार और गीत-- ईबुक यहीं पढ़ें या पीडीएफ रूप में निशुल्क डाउनलोड कर पढ़ें. डाउनलोड कड़ी नीचे दिया गया है. यहीँ पढ़ने के लिए नीचे प्रकट हो रहे एक्सपांड कड़ी पर क्लिक करें -- Open publication - Free publishing

प्रमोद भार्गव का व्यंग्य : चुनावी काले धन के जनकल्‍याण

चित्र
अब चुनावी धन काला हो या सफेद अपने राम को क्‍या ? धन पर थोड़े ही काला-सफेद लिखा होता है। उसकी महिमा तो राष्‍ट्रपिता की छपी तस्‍वीर से है। राष्‍ट्रपिता को तो अफ्रीका में काले होने के कारण ही गोरों का अपमान झेलना पड़ा। लेकिन वहां बात नस्‍ल की थी। नस्‍लीय सोच की थी। धन में नस्‍लीय भेद कैसा ? डॉलर-पौंड की तूती पूरी दुनिया मे बोलती है। फन्‍ने खां कॉमरेड भी अपनी संतानों को अमेरिका, ब्रिटेन में नौकरी कराकर गौरवा (गौरवान्‍वित) रहे हैं। विदेशी मुद्रा की आमद पर इतरा रहे हैं। अब अपने राम (मतदाता) को पांच साल में तो महज एक बार काले धन की महिमा पर इतराने का मौका मिलता है। उस पर भी इस मुएं चुनाव आयोग ने इस्‍तेमाल पर रोक लगा दी। तुगलकी फरमान जारी कर दिया। एक लाख से ज्‍यादा का लेन-देन बही खातों में दर्ज किए बिना किया तो जब्‍ती होगी। लो जब्‍ती का सिलसिला भी शुरु भी हो गया। करोड़ों का धन ! अभी तक सेठों, नेताओं और माफियाओं की तहखानों में पड़ी जंग खाई तिजोरियों से सीधा निकलकर बेचारे लाचार मतदाताओं की जेबें गर्म करने चल पड़ा था। अपने राम जैसों की आर्थिक मंदी में तड़का लगाने वाला था। धत्‌ तेरी की बीच रास्‍त…

लाल्टू की कहानी - बेवकूफ

चित्र
आज सुबह से उसे उदासी का दौरा पड़ा हुआ था। मायूस एक चेहरा लादे वह दफ्तर में कागजों को इधर-उधर करता रहा। कुछ भी करने में मन नहीं लग रहा था। एक तो इतनी गर्मी, बदन पसीने से तर मालूम होता, पर चमड़े पर हाथ रखता तो देखता कि केवल एक फिसलन सी है, पानी तो उड़ता जा रहा था। अजीब सा अकेलापन उसे देर से घेरे हुए था। यह एक ऐसी उदासी थी, जिसमें न तो किसी के साथ बैठने को मन कर रहा था, न ही अकेले पड़े रहने का। किसी तरह समय काटते हुए जब उसे लगा कि शायद खाने का वक्त हो ही गया होगा, वह कमरे से निकल आया और हाल में लटकी दीवाल-घड़ी पर उसने देखा , कि अभी केवल बारह बजे थे। कायदे से उनका लंच- आवर साढे बारह से शुरू होता है, पर वह निकल ही पडा। सड़क पर चलते हुए वह पूरी कोशिश करता रहा कि वह मकानों के बिलकुल करीब से चले, ताकि धूप कम से कम लगे। सूरज सिर के ऊपर था और वह धूप से बच नहीं पा रहा था। गली के मोड से निकल पार करते हुए वह शांति ढाबा की ओर बढ़ा। दूर से ही वंदना वाजपेयी की आवाज उसके कानों तक पहुंच रही थी। उसने कोशिश की कि गीत की कोई कड़ी वह भी गुनगुनाये, पर उसका दिमाग जैसे सुन्न सा था। ढाबे में आकर एक टेबल पर वह बैठा ह…

अरूणिका भटनागर की दो कविताएँ

चित्र
अजन्मी माँजब भी
किसी माँ के पेट में
बेटी आती है,
माँ-बाप की मुस्कान
क्यों चली जाती है?
बेटी ही तो एक दिन
बनती है बहन,
बाँधती है रक्षा-सूत्र।
बेटी ही बनती है - माँ।
बेटा और बेटी
देन है विधाता की।
मत कीजिए खिलाफत,
वरन् समाज में
आ जाएगी आफत।
बेटियाँ अजन्मी रह जाएँगी,
नव वधुएँ कहाँ से आएँगी?
किसे कहोगे - माँ ...!
जो इन्सान की जन्मदात्री है।और वह लोग
जो बेटियों की करते हैं भ्रूण हत्या
वह जानवरों से भी गए बीते हैं,
राक्षसी-संस्कृति में जीते हैं!
' बेटी ' रूपी की अस्थिरता के
भक्षक और तक्षक हैं।
शायद,
ऐसे हैवानों की
' माँ ' नहीं होती,
उनकी कोई
बहन, बेटी नहीं होती!
वे पैदा हुए होंगे क्या
बिना ' माँ ' के? '
अरे, भारत तो
देवियों का देश है।
यहाँ देवियों को
कहते हैं ' माँ '।
बनाए जाते हैं
' माँ ' के मंदिर।
' माँ ' भारत की संस्कृति है,
संस्कारों की पहचान है,
अस्थिरता है।
' माँ ' भारत में युग-युगों से
गौरव-गर्विता है।---- नियति उस नारी देह कीएक साँवली लड़की,
एक बावली लड़की,
थोड़ा शरमाती -सी,
थोड़ा सकुचाती -सी।
प्यारी -सी, भोली-सी,
लगता कुछ बोली -सी,
माँगती थी काम क भी
हाँ, वह मुँहबोली -स…

चन्द्रकान्त देवताले की कविता - आकाश की जात बता भइया?

चित्र
धूं- धूं कर धधकती फैलती आग
भाइयों यहाँ तो पीने के पानी का अकाल है ।मारकाट-चीख-पुकार- भगदड़
बहनों यह तो दूल्हाचार और बने गाने का मौसम है ।दूध और गेहूँ के ईश्वर कौन है भइया?
आम और तरबूज का कौन-सा मजहब है?
पानी
आग
हवा की जात कौन-सी है भाई?कोई जवाब नहीं देता
सिर्फ ठहरे आँसू
और होंठों पर कांटेदार कँपकँपी है ।अंधेरे से निकल कर आते हैं वे
और घरों को सडकों पर
चकनाचूर कर देते हैं
मजहब की किताबों के पन्ने
फाडकर चबाकर आते हैं वे
और धड़कनों की फसलों को
आग चाकू फरसों की पाशविक हिंसा के
हवाले कर देते हैं ।धुएँ के पहाड़ में
घबराए बच्चे माओं को
और बदहवास माएँ बच्चों को पुकारती हैं ।इस पुकार को जो रौंदते हैं जूतों से
वे सिर्फ बिके हुए मजहब के दलाल हैं
कुर्सी-तिजोरी के सामने मस्तक नवाते शैतान
मुट्ठी दो मुट्ठी नोटों को जेबों में ठूंस
बोतल दो बोतल शराब के सहारे
कुर्सी-तिजोरी और शोषण-पाखंड के
गढ़ों की नीवों को पुख्ता करने के खातिर
फायदे का वक्त और मौका ढूंढकर
जीवन संघर्ष के सरोवर में ऐसा खतरनाक जहर
मिलाते हैं
कि अन्न और पानी और अक्षर के लिए
जूझते लोगों की दुनिया में
बेहोशी छा जाती है ।मौत की बस्ती के अंधेरे में इतिहास फिर से लँगड़ाने
लगता…

अनुराग तिवारी की देशभक्ति कविता

चित्र
ऐ देश के युवाओंऐ देश के युवाओं,
आगे कदम बढ़ाओ।
अपने को एक करके,
स्‍वदेश को बचाओ।कर्णधार हो तुम्‍हीं देश के,
तुम्‍हीं देश के माझी।
मझधार में है कश्‍ती,
कहीं आ न जाये आँधी।
डूबे कहीं न जाकर,
नेकी की ये नैया।
साहिल पे खींच लाना,
तुम ही रहे खिवैया।
मेरे वतन के प्‍यारों,
जागो तुम औ' जगाओ।
ऐ देश के युवाओं,
आगे कदम बढ़ाओ।माना बहुत कठिन हैं,
जीवन की ये राहें।
लेकिन कदम तुम्‍हारे,
हर्गिज़ न डगमगायें।
धैर्य को चुनौती,
ये कौन दे रहा है।
रोड़ा तुम्‍हारी राह में,
यह कैसा आ अड़ा है।
दुनियाँ की सारी बंदिश,
तुम तोड़ कर दिखाओ।
ऐ देश के युवाओं,
आगे कदम बढ़ाओ।गोद में जिसकी खेल-खेल कर,
इतने बड़े हुए हो।
खाते हो अन्‍न तुम जिसका,
जल जिसका पीते हो।
उठो, सुनो, उस मातृभूमि की
करुणा भरी पुकार।
शीश दान कर दो तुम रण में,
यही वक्‍त की माँग।
गौरवमय इतिवृत्‍तों पर,
धब्‍बे न तुम लगाओ।
ऐ देश के युवाओं,
आगे कदम बढ़ाओ।

है कार्य कौन ऐसा,
जिसको न साध लो तुम।
मंज़िल है कौन ऐसी,
जिसको न पा सको तुम।
स्‍वदेश सेवा ही हो,
सच्‍चा धर्म तुम्‍हारा।
दीन रक्षा ही हो,
पुनीत कर्म प्‍यारा।
अपने हों या पराये,
सबको गले लगाओ।
ऐ देश के युवाओं,
आगे कदम बढ़ाओ।                         …

मीनाक्षी भालेराव की दो कविताएँ

चित्र
गणतंत्र दिवस पर राष्ट्र वन्दनाबाकी है संभल जाओ ऐ दुश्मने जहाँ अभी वीरों को जगाना बाकी है किसी को सुभाष किसी को भगत सिंह बनाना बाकी है मेरी सर जमीन का एक-एक वीर तेरे हजारों सैनिकों पर भारी है क्या है हस्ती तेरी के तू मेरा चमन उजाडेगा हिंद की मिटटी से सामना होना तेरा अभी बाकी है धरती के कण-कण से तूफ़ान देश भक्ति का भरा है उस तूफान को बवंडर बनाना बाकी है संभल----------------------------------बसंत पंचमी के अवसर परसरस्वती वन्दना तुम हो शारदे,------ पावन पवित्र हंस वाहिनी श्वेत वस्त्र धारणी वीणा वादनी शाश्वत हो साकार हो तुम जीवन आधार हो तुम हो शारदे---------- बुद्धि दो बल दो दे दो हमको ज्ञान तुम हम नादान संतान तुम्हारी तुम माँ संसार की खड़े हैं चरणों मैं शीश झुकाए दो विद्या दान हमें तुम हो शारदे----- २६ जनवरी के लिए

शशांक मिश्र भारती की गणतंत्र-दिवस विशेष कविता

चित्र
फहराये चहुं ओर तिरंगाआज देखूं यदि देश की हालततो आता है रोना,पर सत्‍ता स्‍वार्थ की जोंकों कादेख रहा हूं सोना,एक नहीं असंख्‍य ही देखोविसंगतियां पड़ी हैं,भ्रष्‍टाचार, महंगाई कीनित श्रृंखलाएं नयी खड़ी हैं,चाहता हूं समय की धारा कोस्‍वपौरुष से जोड़ दूं,उत्‍साहित कर सत्‍साहस कोशैय्‍यायें स्‍वार्थ की तोड़ दूं,मैं रहूं या न रहूं इस जग मेंपर बहे स्‍वतंत्रता की गंगाउन्‍नत हो शिखर हिमालय का,फहराये चहुंओर तिरंगा। --सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-2424010प्र0 9410985048ईमेल:-shashank.misra73@rediffmail.com

देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम' का गणतंत्र दिवस विशेष गीत

गणतंत्र दिवस                          ~~~~~~  गणतंत्र दिवस,                         गणतंत्र दिवस;                   यूँ दर्द छुपाकर,                   तू न विहँस ।    सच क्या है ?                   तुझे पता है सब,               पाबन्दी है सच कहने पर;  हालात बिगड़ते ही जाते,                 यूँ जनगण के                    चुप रहने पर;   चुप रहते बीते                                बरस- बरस ।   मौसेरे भाई चोर-चोर,            इक थैली के चट्टे-बट्टे ;  मेहनतकश हैँ दूबर लेकिन        ओहदेवाले हट्टे-कट्टे ;     हम लोकतंत्र को                                रहे तरस ।    अब तेरी छाया के नीचे,           छल -छद्म घोटाले  हैँ होते ;        सच्चे-सीधे भूखोँ मरते,     ईमानखोर पूजित होते ;  अब है शायद  तू भी बेबस ।              **=**               AATMPARICHAY DEVENDRA KUMAR PATHAK [ TAKHLLUS 'MAHROOM' ] DATE OF BIRTH -02.03.1955 / VILLEGE- 'BHUDSA' , (BADWARA) DIST-KATNI (M.P.) EDUC.-M.A.B.T.C.(HINDI /TEACHING )HINDI TEACHER IN A MIDDLE SCHOOL / EDU.M.P. GOVT. /P…

अरविंद कुमार की दो कविताएँ

चित्र
मैं गुलाब हूँ
मैं गुलाब हूँ
मुझमें है बहुत खुशबू
यह किसको नहीं पता,
खुद दुख दर्द सहकर
दूसरों को खुशबू देता हूँ।
तोड़ लेते हैं मुझे
बड़ी बेदर्दी से
नहीं तरस आता है
मुझ पर उन्‍हें
जरा पूछो मेरे दिल से
क्‍या मेरे दिल पे
गुजरती है
आँसुओं के घूँट पीकर
खुद को सँभलता हूँ।
आँसुओं को पीकर
शूलों का साथ निभाता हूँ
हर घड़ी में सुख-दुख में
साथ देता हूँ
मैं गुलाब हूँ।
कोई तोड़ने आता है मुझे
मैं चिल्‍ला कर कहता हूँ
मुझे मत तोड़ो
मुझे दर्द होता है,
पर क्‍या करूँ।
इस दर्द को
कोई सुनता नहीं।
बनमाली आकर
मुझे तोड़ लेता है
सदन ले जाता
सदन ले जा करके
वहीं माला पिरोता,
वहीं मुझे
देवी-देवताओं पर चढा़ता
मुझे कहीं
बेदर्द होकर
बेंच देता !
मुझ पर उसे करूणा का
भाव ही नहीं आतावह भी बिचारा क्‍या करे
उसकी भी लाचारी
और मजबूरी है
मुझसे मित्रता करेगा
तो पेट कैसे भरेगा
प्रेमी तोड़ लेते
प्रेमिका केशों में गूँधती है।
आखिर मैं तरह-तरह के
दुख सहकर
दुनिया को खुशबू
प्रदान करता हूँ,
आखिर मैं गुलाब हूँ।
नहीं छोड़ूँगा
साथ दुनिया का
जब तक साँसों में सांस है।
नहीं कष्‍ट है मुझे अपनी जिन्‍दगी के लिये।
मैं गुलाब हूँ
अर्पित कर दूँगा
तन मन से
जिन्‍दगी अपनी दूसरों के लिए
यही है मेर…

एस. के. पाण्डेय की बच्चों के लिए कविता : महान भारत

बच्चों के लिए:  महान भारत  अपना भारत देश महान ।
दुनिया में इसकी पहचान ।।धर्म अध्यात्म ज्ञान विज्ञान ।
अन-जन-धन की, है यह खान ।।कर्मठ हर मजदूर किसान ।
रक्षा में सब निपुण जवान  ।।सभी क्षेत्र में क्षमतावान ।
दुनिया जानें शक्ति महान ।।बड़ी निराली इसकी शान ।
दुनिया देती इसको मान ।।हुए यहाँ नाना गुणवान ।
जन्मे राम-कृष्ण भगवान ।।गूँजे यहाँ गीता का ज्ञान ।
कण-कण में मुनियों का ध्यान ।।आगम-निगम स्मृति, पुरान ।
सबपे है हमको अभिमान ।।भारत माता कह सम्मान ।
देते हम समझें जिमि प्रान ।।हम सब भारत की सन्तान ।
बढ़ायेंगे नित इसकी शान ।।हर भारतवासी की जान  ।
अपना भारत देश महान ।।
------------
                            डॉ एस के पाण्डेय,
                                                         समशापुर (उ.प्र.) ।
            URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/
                          ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/                               *********

कैस जौनपुरी के नगमें - क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाये, बिन तेरे अब जिया नहीं जाये

चित्र
क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जायेक्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाये
बिन तेरे अब रहा नहीं जाये
मिल जाये तू इक कतरा सही
बिन तेरे अब जिया नहीं जायेदिल हुआ बेचैन है तेरे लिए
रस्ता देखे नैन हैं तेरे लिए
आ जाये कहीं अब छन से तू
बिन तेरे अब रहा नहीं जायेयाद आती है तेरी हर बात
वो छोटी ही सही इक मुलाकात
हुआ दिल मेरा बेक़रार तेरे लिए
बिन तेरे अब रहा नहीं जायेवो तेरे आसपास की खुश्बू
तेरे मेरे अहसास की खुश्बू
दिल में मेरे बस गयी है तू
बिन तेरे अब जिया नहीं जाये
क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाये
बिन तेरे अब रहा नहीं जाये
मिल जाये तू इक कतरा सही
बिन तेरे अब जिया नहीं जायेकैस जौनपुरी
qaisjaunpuri@gmail.com
www.qaisjaunpuri.com
Qais Jaunpuri A factory of creative ideas... Films I Ads I Literature

शशांक मिश्र भारती की कविता - चादर

चित्र
सरदी के कठोर मौसम में झूम रहा है एक झाड़ी के मध्‍य मग्‍न हुआ मेरा मन, देख रहा हूं हिम से ढके उस मैदान को। मैं अकेला दुःखियों का प्रिय शोक-सन्‍ताप से दूर इस मैदान में बहाता नहीं आंसू व्‍यर्थ के, न सोचता हूं आगे की और- न बीते अतीत की, देख रहा हूं- हिमावरण से निर्मित- उस श्‍वेत चादर को। --सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-2424010प्र0 ईमेल:-shashank.misra73@rediffmail.com

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की चार रचनाएं : नया साल

चित्र
नया साल आ चुका है चुनौतियां देता हुआ | प्रस्तुत हैं चार छोटी रचनायें [1] कूद कूद कर आ जाता है साल और दर साल आता है तो आने भी दो इसका नहीं मलाल सोच समझ कर इसी बात का मंथन करना है आकर हमें दिया क्या करता नया साल हर साल [2] लूट डकैती मारामारी होते हैं हर साल दंगे होते डंडे चलते होता रोज बवाल नये साल में रोक लगेगी कौन सोचता है इस पर किसने किसी तरह के कभी उठाये सवाल? [ 3] उनको कौन पकड़ सकता है कौन माई का लाल जिसको चाहे गेंद बना दें जिसे चाहे फुटबाल अफसर नेता धनवालों की यह तिकड़ी ऐसी ऊपर से नीचे तक इनका फैला रहता जाल [4] स्वच्छ धुले कपड़ों में होता इनका ऊंचा भाल इसी आड़ में करते रहते नित नित नये कमाल इन्हें पकड़ना आसमान के तारे जैसा है इनके तार जुड़े रहते हैं दिल्ली और भोपाल

कैस जौनपुरी की कविता - मैं रेल की पटरी हूँ...

चित्र
मैं रेल की पटरी हूँ...
मैं रेल की पटरी हूँ...
कुछ कहना चाहती हूँ...
मैं रेल की पटरी हूँ...
पड़ी रहती हूँ
अपनी जगह पर
लोग आते हैं
लोग जाते हैं
थूकते भी हैं
गन्दगी भी करते हैं
मगर मैं, रेल की पटरी हूँ...
चुपचाप सब सहती हूँ
कभी बुरा नहीं मानती
बस चुप ही रहती हूँ
क्योंकि मैं बुरा मानूंगी तो
लोग बुरा मानेंगे
लोग बुरा मानेंगे तो
लोग नहीं आएँगे
लोग नहीं आएँगे
तो मैं बुरा मानूंगी
इसलिए मैं कभी
बुरा नहीं मानती
क्योंकि मैं रेल की पटरी हूँ...
बुरा मानना मेरा काम नहीं
लोग कहते हैं
अगर बुरा ही मानना था
तो यहाँ बिछी क्यों हो...
उठो, खड़ी हो जाओ
अगर बिना बिछे
जिन्दा रहने की
हिम्मत रखती हो तो
मैंने तो नहीं कहा था
यूँ बिछी रहने को
यूँ पड़ी रहने को
अब बिछी हो
और पड़ी हो
तो नखरे न दिखाओ
यूँ ही बिछी रहो
यूँ ही पड़ी रहो
हमें आने दो
हमें जाने दो मैं रेल की पटरी हूँ...
कभी-कभी सोचती हूँ
उठ जाऊं, खड़ी हो जाऊं
मगर फिर डरती हूँ
मैं तो एक रास्ता हूँ
अगर खड़ी हो गई तो
रास्ता न रहूँगी
और अगर रास्ता न रही तो
लोग नहीं आएँगे
फिर मैं खड़ी-खड़ी
सड़ने लगूंगी
जंग लग जाएगी मुझमें
फिर किसी कोने में
फेंक दी जाउंगी
क्यूंकि मैं हूँ ही क्या
ए…

प्रमोद भार्गव का आलेख - कुपोषण बनाम राष्‍ट्रीय शर्म

चित्र
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की इस आत्‍मस्‍वीकृति को दाद देनी होगी कि उन्‍होंने कुपोषण की हकीकत को स्‍वीकारते हुए ‘राष्‍ट्रीय शर्म' का दर्जा दिया। क्‍योंकि किसी भी बड़ी समस्‍या के निदान से पहले जरूरी है कि उसे शासन-प्रशासन के स्‍तर पर जिस हाल में भी है, मंजूर किया जाए। जबकि हम हकीकत को झुठलाने में ज्‍यादा ऊर्जा खपाते हैं। देश में कुल 16 करोड़ बच्‍चे हैं। इनमें से 42 प्रतिशत बच्‍चों का कुपोषण के दायरे में आना वाकई शर्मनाक है। इस समस्‍या से निजात के लिए फिलहाल देश में केवल ‘एकीकृत बाल विकास परियोजना' (आईसीडीएस) वजूद में है। प्रधानमंत्री ने कुपोषण की व्‍यापकता का आकलन करते हुए बिना किसी लाग-लपेट के कहा, कुपोषण जिस तादाद में है, उसके चलते अकेले आईसीडीएस औजार से इसे काबू में नहीं लिया जा सकता। नीति-निर्माताओं को जरूरी है कि वे शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, स्‍वच्‍छता, साफ पानी, और पोषण के बीच की कड़ियों को समझें और उनके मुताबिक अपनी गतिविधियों को आकार व अंजाम दें। ‘हंगामा' (भूख और कुपोषण) नामक इस रिपोर्ट को खुद प्रधानमंत्री ने जारी किया । भारत में कुपोषण का बड़े फलक पर सामने आना कोई न…

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - 18 वीं कड़ी - आओ कहें... दिल की बात : गर्भपात

चित्र
पिछली कड़ियाँ  - एक , दो , तीन, चार, पांच, छः , सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह , तेरह, चौदह, पंद्रह, 16, 17आओ कहें...दिल की बातकैस जौनपुरी
गर्भपात मैं अनीता, मैं अपनी सरकार, अपने कानून से कुछ कहना चाहती हूँ. मैं कहना चाहती हूँ कि मेरा होने वाला बच्चा एक नॉर्मल बच्चा नहीं है. वो पेट से ही अपाहिज है. मुझे न चाहते हुए भी इस बच्चे को जन्म देना पड़ेगा. क्यूंकि हमारा कानून ऐसा है. हमने क्या गलत किया था? हमने तो सही रास्ता अपनाया था. कानून से गर्भपात की इजाजत माँगने चले गए थे. वैसे तो पूरे हिन्दुस्तान में लोग सौ-दो सौ रूपये देके गर्भपात कराते रहते हैं. उन्हें कोई नहीं पूछता. मगर हम खुद को थोड़े पढ़े-लिखे, समझदार समझ बैठे थे. और अपने अन्धे-बहरे कानून से इजाजत माँगने चले गए थे. मगर हम ये भूल गए थे कि हमारे यहाँ कानून की कुर्सी पे बैठने वालों को कानून की जरा भी तमीज नहीं है. कानून इन्सान की भलाई के लिए होना चाहिए. कानून की वजह से किसी को जानबूझ के जिन्दगी भर अपाहिज की जिन्दगी जीने के लिए पैदा करना, कैसा कानून है? ऐसे कानून को आग लगा देना चाहिए. मगर हमारा कानून सिर्फ किताबों में लिखी हुई पाबन्दिय…

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.