मंगलवार, 3 जनवरी 2012

गोवर्धन यादव की लघु-कथा - शिष्टाचार

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शि‍ष्टाचार.

एक राजा था. वह बडा ही नेक,न्यायप्रिय तथा प्रजापालक था.अपनी प्रजा के कल्याण के लिए वह नयी-नयी योजनाएं बनाता रहता था,छोटे-बडे अपराधों के लिए कडी से कडी सजा देता था.इतना सब कुछ करने के बाद भी उसे एक चिन्ता खाए जाती थी. और वह यह कि आय के समस्त स्त्रोतॊं के बावजूद राजकीय घाटा निरन्तर बढ्ता ही जा रहा था.

उसने कई प्रभावशाली उपाय किए,लेकिन उसमें उसे सफ़लता नहीं मिली. तंग आकर उसने अपने प्रधानमंत्री को बुला भेजा और अपनी चिन्ता से अवगत कराते हुए कोई कारगर उपाय खोजने को कहा. काफ़ी विचार विनिमय के बाद उसने अपने प्रधानमंत्री को एक ऎसे अफ़सर को नियुक्त करने के आदेश दिए,जो सब पर कडी नजर रख सके.


अफ़सर की नियुक्ति हो जाने के बावजुद भी कोई प्रतिफ़ल नहीं निकला और राजकीय घाटा बढता ही रहा .प्रधानमंत्री ने और एक उच्च अधिकार संपन्न अधिकारी की नियुक्ति की फ़िर भी स्थिति जस की तस थी. इस तरह प्रधानमंत्री अफ़सरों की नियुक्ति करता रहा,लेकिन वही ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ होती रही. राजा ने तंग आकर प्रधानमंत्री को तलब किया और असफ़ल होने का कारण जानना चाहा तो, उसने हाथ जोडकर मुस्कुराते हुए उत्तर दिया:- महाराज, आप खामोखां इस चिन्ता में दुबले हुए जा रहे है. अब भ्र‍ष्टाचार कहाँ रहा ,वह तो कभी का शि‍ष्टाचार में बदल गया है.
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103,कावेरी नगर,छिन्दवाडा (म.प्र.) 480001

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com , फतुहा, पटना की कलाकृति)

3 blogger-facebook:

  1. A very nice stire story, hope you will continue this type of story. My heartiest congratulation on this unique story.

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  2. गोवर्धन यादव10:00 am

    श्री अमरेन्द्रजी श्री रवि भारद्वाजजी एवं मेरे अनाम साथी-नमस्कार. अमरेन्द्रजी ने बहुत ही बढिया चित्र इस लघुकथा पर उकेरा और सभी ने पसंद किया. हार्दिक आभा् र- धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

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