गुरुवार, 5 जनवरी 2012

मालती जोशी का संस्मरण - इस प्यार को क्या नाम दूं?


धर एक अभूतपूर्व घटना घटी है. कम से कम मेरे लिए तो यह बहुत ही खास और अहम है.

लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व की बात है. परम पून्यनीय स्वामी सत्यमित्रानंदजी का कोई कार्यक्रम जबलपुर में था. जोशीजी ने उनसे दीक्षा ली हुई थी. तो, हम लोग उस कार्यक्रम के लिए गये थे.

एक दिन प्रवचन स्थल पर कुछ महिलाओं ने मुझसे सम्पर्क किया, कहा कि हमलोग एक महिला मंडल या कहिए कि लेखिका संघ की स्थापना कर रहे हैं. हम चाहते हैं कि उसका उद्घाटन आपके हाथों हो. मना करने का कोई प्रश्न नहीं था. मैंने तुरंत हामी भर दी. दूसरे दिन एक सदस्य के घर में अत्यंत घरेलू वातावरण में वह कार्यक्रम सम्पन्न हुआ. कुल जमा आठ-दस महिलाएं थीं इसलिए भाषणबाजी नहीं हुई. गीत - संगीत ही कार्यक्रम का मुख स्वर रहा.

बाद में जीवन की आपाधापी में मैं यह प्रसंग भूल भी गयी. याद तब आयी जब इस ' संगठन ने अपने पच्चीस साल पूरे किये. उन्हीं लोगों ने याद दिलायी. बाकायदा निमंत्रण आया कि यह पच्चीसवीं सालगिरह हम आपके साथ ही मनाना चाहते हैं. सो, फिर एक बार जबलपुर पधारे.

मैंने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि इन पच्चीस सालों में मैं उस के उस पड़ाव पर पहुंच गयी हूं जहां सफर से जी घबराता है. अत: क्षमा करें. उनका उत्तर आया कि आप नहीं आ सकतीं तो हम आ जाते हैं. बस १४ अप्रैल हमारे लिए खाली रखें. और वे लोग- करीब अठारह सदस्य जनशताब्दी. से आयीं. दुष्यंत कुमार संग्रहालय के. सभागार में उन्होंने यह रजत-जयंती मेरे साथ मनायी और रात की देन से वापस लौट गयीं.

इस प्यार को क्या नाम दूं समझ' में नहीं आता. पर ये कुछ ऐसे ही क्षण होते हैं जब अपने लेखक होने पर .गर्व होता है.

मैंने सन १९५० में मैट्रिक पास किया था. उन दिनों स्कूल में अध्यापिकाएं या तो उम्रदराज होती थीं या फिर वे युवतियां जो हालात की मार से हताश, निराश और जीवन से उदासीन होती थीं. ऐसे में ठंडी हवा के झोंके की तरह हिंदी की नयी टीचर का आगमन हुआ. लखनऊ कोलेज से ताजा ग्रैजुएट होकर आयी थीं. रहन -सहन में, बातचीत में नफासत थी, नजाकत थी. छात्राओं से उनका व्यवहार भी मित्रवत था, जो एक नयी बात थी. लड़कियां तो उनपर लट्टू हो गयीं. मुझमें तब कविता के अंकुर फूटने लगे थे. -मैंने उनपर ढेरों कविताएं लिख डालीं.

उनकी शादी और हमारी फाइनल परीक्षा आसपास ही सम्पन्न हुई थी. फेयरवेल पार्टी के दिन मैंने अपनी कविताओं की काँपी उन्हें सादर भेंट कर दी थी.

उसके बाद कॉलेज, फिर शादी फिर बच्चे, नयी - नयी गहस्थी, जगह- जगह तबादले- इस आपाधापी में किशोरावस्था का पागलपन सुदूर अतीत की चीज बन गया. कोई बाईस- तेईस साल बाद मुझे अचानक उनका पता मिला. भूला-बिसरा बहुत कुछ याद आ गया, और मैंने उन्हें एक पत्र लिख डाला. पत्र में मैंने सिर्फ अपना नाम और पता लिखा. 'जोशी' जान- बूझकर नहीं लिखा, क्योंकि इस नाम से उन दिनों मुझे थोड़ी शोहरत मिलने लगी थी.

लौटती डाक से उनका पत्र आया ( उन दिनों चिट्टिठयां तुरत- फुरत मिल जाती थीं. आजकल की तरह लेट- लतीफी नहीं थी. ) पत्र में उन्होंने लिखा कि मैं तो ? लिफाफा देखकर ही पहचान गयी थी कि मालती का पत्र होगा. तुम्हारे अक्षर मेरे लिए जाने - पहचाने हैं. आगे उन्होंने पूछा कि क्या अब भी कविताएं लिखती हो या छोड़ दिया? मैंने उत्तर में लिखा कि कोलेज के जमाने में इतने गति लिखे कि लोगों ने मुझे 'मालव की मीरा' की उपाधि दे डाली. पर अब कविता छूट गयी है, रूठ गयी है. हां, कभी- कभार कहानियां लिख लेती हूं तीर की तरह उनका दूसरा पत्र आया- 'कहीं तुम मेरी प्रिय लेखिका मालती जोशी तो नहीं हो? ' जीवन में इतनी प्रशंसा बटोरी है, पर सच कहती हूँ इस एक वाक्य ने जो रोमांच, जो खुशी, जो संतोष दिया उसका जवाब नहीं है.

सर २००६ में मध्य प्रदेश शासन का 'साहित्य शिखर सम्मान' मुझे दिया गया. इस कार्यक्रम के लिए इंदौर से मेरे भाई - बहन बरसते पानी में सपरिवार पधारे थे. मेरे भोपालवासी ससुराल के परिजन भी भीगते हुए भारत भवन पहुंचे थे. उस दिन मेरा घर फूलों से भर गया था. कार्यक्रम के दो दिन बाद मेरे यहां काम करनेवाले युवक ने मुझे एक फाइल पकड़ायी.

' 'ये क्या है?'' मैंने पूछा.

' आप देखिए तो...''

मैंने देखा, लाल रंग की जिल्द वाली सुंदर फाइल थी. ऊपर सुंदर अक्षरों में लिखा था ' अलंकरण समारोह'. फाइल खोलकर देखी तो मैं दंग रह गयी. उसमें भोपाल से निकलने वाले सारे अखबारों की कतरनें थीं. अंग्रेजी अखबार भी छूटे नहीं थे. उन कतरनों में मेरे बारे में जहां - जहां जो - जो इन दिनों छपा था, सब करीने से फाइल किया हुआ था. मेरे इंटरव्यूज, सम्मान समारोह की रिपोर्ट, दूसरे दिन की कथा - गोष्ठी का विवरण.. .सब कुछ उसमें था. महज आठवीं-नौवी पास उस व्यक्ति ने कितनी मेहनत, कितनी लगन से यह सामग्री जुटायी थी, सोचकर आश्चर्य हो रहा था.

वह फाइल आज भी एक अमूल्य धरोहर के रूप में मेरे पास सुरक्षित है. इसी 'शिखर सम्मान' से जुड़ी एक और घटना- मेरी भतीजी का फोन आया कि कल आप सब लोग भोजन पर आमंत्रित हैं.

' 'किस खुशी में?'' मैंने पूछा.

'' आपके सम्मान की खुशी में, '' उसने कहा. मैंने उस बात को बहुत सीरियसली नहीं लिया. मैं जानती हूं कि यह मेरी भतीजी अपने स्वर्गीय चाचाजी की तरह उत्सवधर्मी है. लोगों को बुलाकर खाना खिलाने का बहाना ढूंढ़ती रहती है.

दूसरे दिन सहज भाव से हम खाना खाने पहुंचे तो दरवाजे पर ही अभिनंदन समारोह के बैनर ने हमारा स्वागत किया. भीतर जाकर देखा तो दीवान को बाकायदा स्टेज का रूप दिया गया था और दीवार पर भी एक बैनर था. कमरे में ससुराल का पूरा कुनबा मौजूद था.. .सबके हाथ में गुलदस्ते थे. सबने मुझे गुलदस्ता भेंट किया. जिससे बन पड़ा उसने छोटा-सा वक्तव्य भी दिया. मेरी जेठानीजी ने भी माला पहनाकर मुझे आशीर्वाद दिया. बाद में 'जोशी परिवार' की ओर से एक मानपत्र भी भेंट किया गया. यह सब देखकर मैं तो इतनी अभिभूत हो गयी थी कि धन्यवाद के दो शब्द कहना, कृतज्ञता ज्ञापन करना मेरे लिए कठिन हो. गया. सौभाग्य से मेरा बड़ा बेटा उन दिनों भोपाल आया हुआ था.. उसने इन दुर्लभ क्षणों को कैमरे में कैद कर लिया और बाद. में एक सुंदर - सा अलबम बनाकर मुझे भेजा.

भारत भवन में मान्यवरों की उपस्थिति में मुस्यमंत्रीजी ने मुझे यह सम्मान प्रदान किया था- वे क्षण सचमुच अविस्मरणीय' और गौरवशाली थे. पर उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण, अविस्मरणीय यह घरेलू सम्मान समारोह था, जो मेरे अपनों ने आयोजित किया था. इन लोगों को साहित्य से नहीं, केवल मुझसे सरोकार था, और मेरे गौरव से वे गौरवान्वित हो रहे थे.

कभी-कभी जीवन में ऐसे सुखद आश्चर्य घटित होते हैं कि हम देर तक उस रस में डूबे रहते हैं. मुम्बई प्रवास में एक बार मुझे एक हिंदी संस्थान से बुलावा आया.' कहा गया कि मानदेय तो हम नहीं देंगे, पर हां, लाने- ले जाने की व्यवस्था कर सकते हैं. मुम्बई में अगर वाहन व्यवस्था हो जाए तो वह किसी भी मानदेय से ज्यादा श्रेयस्कर है, खासकर अगर पवई से चौपाटी जाना हो तो. मैंने सहर्ष हामी भर दी. नियत समय पर गाड़ी आयी. ड्राइवर ने फोन किया कि मैं आ गया हूं आप तैयार हो जाएं तो बिल्डिंग से नीचे.. आ जाएं.

फोन रखते हुए मुझे याद आया कि ड्राइवर मराठी में बोल रहा था. आश्चर्य हुआ- क्या मुम्बई में मराठीवाद इतना प्रबल हो गया है कि हिंदी संस्थान का ड्राइवर भी हिंदी में बात नहीं करना चाहता! पवई से चौपाटी तक का रास्ता काफी लम्बा था. रास्ते में बातें होती रहीं- मराठी में ही. आखिर मैंने पूछ ही लिया, '' आप तो एकदम मराठी में ही शुरू हो गये... आपने कैसे जाना कि मैं मराठी हूं? जोशी तो पहाड़ी भी होते हैं, गुजराती भी होते हैं, राजस्थानी और मालवी भी होते हैं...'' उसने कहा, '' आज आपका कार्यक्रम था इसलिए कई लोगों ने लाइब्रेरी से आपकी पुस्तकें निकलवायी थीं. मैंने भी एक ले ली थी. उसमें आपके परिचय में लिखा था कि आपका जन्य महाराष्ट्रियन परिवार में हुआ है. ''

मैंने किसी ड्राइवर से इस उत्तर की अपेक्षा नहीं की थी. अपने सोच पर मैं खुद ही शर्मिंदा थी.

ऐसे ही शर्मसार होने का एक और मौका आया था. मैं पुणे में अपनी फुफेरी बहन के यहां मेहमान बनकर गयी थी. रात का खाना खाकर बिस्तर पर अधलेटी मैं टीवी देख रही थी कि उसके यहां काम करनेवाले एक लड़के ने आकर कहा, ' 'मैडम, जरा पैर नीचे कर लेंगी! ''

मुझे बड़ा ताव आ गया. अरे, क्या कोई सोफा है जो पैर नीचे करने होंगे! मैंने कसैले अंदाज में कहा, ' 'चादर बदलनी है क्या? ''

' 'नहीं, वह तो हो गया. ''

' 'फिर? '' मैंने कहा और तैश में आकर खड़ी हो गयी- कर लो जो करना है.. पर उसने जो किया वह एकदम अप्रत्याशित था. उसने झुककर मेरे पैर छू लिये. मैं तो हक्का-बक्का रह गयी. फिर उसी ने बताया कि मम्मीजी के पास आपकी जितनी किताबें हैं, सब मैंने पढ़ी हैं. मुझे बहुत अच्छी लगीं. किताबों में आपकी तस्वीर है- मैं पहचान तो गया था, पर प्रणाम करने के लिए मम्मीजी से पूछ लिया. सोचा, इतनी बड़ी हस्ती घर आयी हैं तो प्रणाम तो करना ही चाहिए. पर लेटे हुए व्यक्ति को प्रणाम नहीं करते न, अशुभ होता है. कितनी देर तक मैं अपनी शर्म से उबर नहीं पायी थी!

मुस्वई प्रवास में एक दिन बेटे ने एक सुखद धक्का दिया- ''मेरी एक फ्रेंड आपसे बहुत नाराज हैं.''

''कौन-सी फ्रेंड? क्या मैं उसे जानती

हूं? क्यों नाराज है?''

''उसका ई-मेल आया है,'' बेटे ने कहा, “your mom is giving me sleepless nights”''

हद है! कौन है यह लड़की! जरा नाम तो बताओ... अपनी जान में sleepless nights मैंने अपनी बहुओं को नहीं दी, इसे क्या दूंगी!

''वह लिखती है,'' बेटे ने कहा, 'I had been to a book fair. I have baught all her books. And since that day I have no peace, no sleep.''

तारीफ करने का कैसा अनोखा ढंग है! मुझे सचमुच खुशी हुई कि प्रौद्योगिक क्षेत्र में काम करनेवाली एक महिला मेरी पुस्तकें खरीदती है, पढ़ती है और पसंद भी करती है!

कभी-कभी प्रशंसा से घबराहट होने लगती है. इसका भी दारुण अनुभव मैंने किया है. सर ६० - ६२ की बात है. उन दिनों इनकी पोष्टिंग एक देहात में थी. मेरे साहित्यिक जीवन में उस समय अकाल- पर्व चल रहा था. कविता कामिनी तो रूठ ही गयी थी, गद्य भी लड़खड़ाता चल रहा था. दस रचनाएं भेजती थी तो आठ सधन्यवाद वापस आ जीती थीं. बड़े बुरे दिन थे.

उन दिनों यह आम प्रथा थी कि डाकिया सारी डाक दफ्तर में ही ? दे जाता था. वहीं से लोग घरेलू डाक अपने साथ घर ले जाते थे. मैं जिस व्यग्रता से पति की प्रतीक्षा करती थी उसके मूल में ये पत्र भी होते थे. बाहर की दुनिया से जुड़ने का वही तो एक साधन था.'

ये जब टूर पर होते थे, चपरासी घर- घर डाक दे जाता था. एक दिन देखती क्या हूं कि इनकी गैरमौजूदगी में बड़े बाबू खुद डाक लेकर चले आ रहे हैं. उनके हाथ में जो बड़ा - सा लिफाफा था उसे मैंने दूर से पहचान लिया था. वह 'सधन्यवाद वापस' वाला लिफाफा था, जो मैं हर रचना के साथ भेजती थी ( आज भी भेजती हूं). बड़े बाबू जब कमरे में आकर बैठ गये तो मैंने दुख और आश्चर्य के साथ नोट किया कि लिफाफा खुला हुआ था. किसने खोला लिफाफा? क्यों खोला? अपने मन में घुमड़ते प्रश्नों को मैं शब्द देती उससे पहले ही बड़े बाबू ने सफाई दे डाली - ' 'माफ करना मैडम, लिफाफा जरा भारी था तो मैंने खोल लिया. सोचा, ऐसी-वैसी कोई बात न हो... साहब भी यहां नहीं हैं... पर मैडम, मैं लिफाफा नहीं खोलता तो कितनी बड़ी चीज से वंचित रह जाता! वाह मैडम! क्या कहानी लिखी है आपने! बिल्कुल प्रेमचंद की याद दिला दी. नारी की व्यथा का क्या वर्णन किया है! मेरे तो आंसू निकल आये...''

आंसू तो मेरे भी आ रहे थे - दुख के अपमान के, शर्म के. मन तो हो रहा था कि बह लिफाफा छीन लूं पर असहाय भाव से बैठी उनका प्रलाप सुनती रही. उनके जाने के बाद ही मैंने खुलकर सांस ली. उसके बाद तो यह जैसे नियम हो. गया कि जब भी मेरी कोई कहानी लौटती, ये सज्जन उसे लेकर हाजिर हो जाते और मेरी तारीफ में कसीदे पढ़ने लगते. उन्होंने मुझे कब से प्रेमचंद के समकक्ष बिठा दिया था. शायद दूसरे किसी लेखक का नाम उन्हें पता भी नहीं था.

आखिर जब मेरी सहनशक्ति ने. जवाब दे दिया तो मैंने इनसे शिकायत की. ये हंसकर बोले, ''सुनो, वह गांव का सीधा- साधा निरीह प्राणी है. उसे इस बात का जरा भी इल्म नहीं है कि ये तुम्हारी लौटी हुई कहानियां हैं. उसे असलियत बताने जाओगी तो अपनी ही हंसी करवाओगी. वह शख्स इस समय तुम्हारी प्रतिभा से अभिभूत है. उसका भ्रम बना रहने दो. '' अब कभी सोचती हूं कि तत्कालीन सम्पादकों ने तो मेरी कद्र नहीं की, पर बड़े बाबू ने शायद मेरे भीतर बैठे. महान ( ? ) लेखक को पहचान लिया था. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें.

(साभार - नवनीत हिंदी डाइजेस्ट - अक्तूबर 2011)

6 blogger-facebook:

  1. भावाभिभूत करने वाले संस्मरण

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  2. इस संस्मरण को पढवाने का बहुत बहुत आभार..... मालती जोशी मेरी प्रिय लेखिका हैं...सच कहूँ तो उनकी कहानियाँ पढ़-पढ़ कर ही साहित्य की तरफ झुकाव हुआ.....अब तक जो भी लिखा..जैसा भी लिखा...उनकी रचनाएं पढ़ कर ही लिखना सीखा... धर्मयुग में छपे, उनके कितने ही संस्मरण..कहानियाँ...अब तक बिलकुल याद हैं...जैसे उनकी रचनाएं लौटने वाला किस्सा...धर्मयुग में भी छपी थी...

    बहुत बहुत शुक्रिया ...इस संस्मरण को यहाँ शेयर करने का ..मैने इसे फेसबुक पर शेयर कर रही हूँ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर लेख
    धन्यवाद ...इस संस्मरण को यहाँ शेयर करने के लिए

    उत्तर देंहटाएं
  4. मन में यही विचार उभरते हैं पर उन्हें इतनी सच्चाई से शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्ति देना कोई अादरणीया मालती जोशी से सीखे!! धर्मयुग में छपी कहानियों को पढते पढते बरसों पहले से उनकी 'फेन' रही हूँ और अाज भी उनकी कहानी या उपन्यास हाथ लगने पर फिर उसे पूरा करने तक बाकी सब काम ताक पर!

    उत्तर देंहटाएं
  5. मन में यही विचार उभरते हैं पर उन्हें इतनी सच्चाई से शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्ति देना कोई अादरणीया मालती जोशी से सीखे!! धर्मयुग में छपी कहानियों को पढते पढते बरसों पहले से उनकी 'फेन' रही हूँ और अाज भी उनकी कहानी या उपन्यास हाथ लगने पर फिर उसे पूरा करने तक बाकी सब काम ताक पर!

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  6. उमा5:16 pm

    मन में उभरते विचारों को इतनी सच्चाई और सहजता से पन्नों पर भी उतारा जा सकता है ?? भाषा की इस क्षमता, सामर्थ्य की सीख तो अादरणीया मालती जोशीजी ही दे सकती हैं! बरसों पहले--- तकरीबन तीन दशक पूर्व धर्मयुग में छपी कहानियों से लेखिका से परिचय हुअा और अाज भी जब इनकी कोई कहानी या उपन्यास हाथ लग जाये तो फिर उसे पढने तक बाकी सब काम ताक पर!

    उत्तर देंहटाएं

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