सोमवार, 9 जनवरी 2012

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता - षडयंत्र

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षडयंत्र

जो गुप चुप रचते षडयंत्र की राजनीति

घर पर एकाधिकार की नीति

पहले दिन दिल के छेद का भेद बताते

बच्‍चों की मां को डरा कर मरघट पहुंचाते

बाप को शराब की सोहबत से रास्‍ते से हटाते

खुद को हमदर्दी का नया मसीहा कहलवाते

अब बारी बेटे की है आई

उसे भी शराब खोरी सिखाई

नौकरी छुड़वाकर बदला सीन

खुद वंशवेल की मिटा जमीन

तीन लाख जो तैंतीस लाख बन जाते

उस पर चापलूसी से रोक लगाते

इस आपाघापी में काल चक्र लेता बदला

गायब हो जाती हंसी समय नहीं अब अबला

कुछ दिनों में अपनी करतूतों का फल भूल जाते

षडयंत्र की राजनीति का फिर नया जाल बिछाते

जिनका सब कुछ लूट लिया उन्‍हें मोहरा बनाते

अपने ही जाल में फिर उन्‍हें फसाते।

जैसा अपना जीवन वैसा उनका बनाते

फिर भी काल के उसी जाल में फंस जाते।

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन-120/132 बेलदारी लेन, लालबाग, लखनऊ

1 blogger-facebook:

  1. very thoughtful the poem is
    bahut khub

    add me in blog i am also kavi
    my ID is ghfdbzoya123

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