शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

विजय वर्मा की ग़ज़ल - सिद्धार्थ कभी बुद्ध बन ही नहीं पाते, गर सुजाता के हाथों में खीर नहीं होती.

ग़ज़ल

हर ख्वाब की तो ताबीर नहीं होती

किस दिल में भला पीर नहीं होती.

 

तेरे सानिध्य का आकांक्षी नहीं कौन?

सबकी तो ऐसी तकदीर  नहीं होती.

 

सिद्धार्थ कभी बुद्ध बन ही नहीं पाते,

गर सुजाता के हाथों में खीर नहीं होती.

 

आज भी द्रौपदियां बे-वसन हो रही है,

किसी कृष्ण के हाथों में चीर नहीं होती.

 

होती नहीं तबाही,होता नहीं ये प्रलय

उनकी आँखों से टपकी जो नीर नहीं होती.

 

उम्र यूँ  ही गुजारी है,रहने दो ये बेड़ियाँ

किस ज़माने मेरे पैरों ज़ंजीर नहीं होती.

clip_image001

--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

2 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

और दिलचस्प, मनोरंजक रचनाएँ पढ़ें-

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------