शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

विजय वर्मा की ग़ज़ल - सिद्धार्थ कभी बुद्ध बन ही नहीं पाते, गर सुजाता के हाथों में खीर नहीं होती.

ग़ज़ल

हर ख्वाब की तो ताबीर नहीं होती

किस दिल में भला पीर नहीं होती.

 

तेरे सानिध्य का आकांक्षी नहीं कौन?

सबकी तो ऐसी तकदीर  नहीं होती.

 

सिद्धार्थ कभी बुद्ध बन ही नहीं पाते,

गर सुजाता के हाथों में खीर नहीं होती.

 

आज भी द्रौपदियां बे-वसन हो रही है,

किसी कृष्ण के हाथों में चीर नहीं होती.

 

होती नहीं तबाही,होता नहीं ये प्रलय

उनकी आँखों से टपकी जो नीर नहीं होती.

 

उम्र यूँ  ही गुजारी है,रहने दो ये बेड़ियाँ

किस ज़माने मेरे पैरों ज़ंजीर नहीं होती.

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v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

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