सोमवार, 9 जनवरी 2012

संजय जनागल की कविता - ऐ जिन्दगी

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ऐ ज़िन्दगी

ऐ ज़िन्दगी

कितनी अजीब है तू

कहीं ग़मों से सहमी

तो कहीं खुशियां से सराबोर

कहीं जवां मदहोशी में चूर

कहीं लाचार, बेबस

कहीं कमी है कपड़े की

तो कहीं खुशी बदन दिखाने की

मची होड़

एक-दूसरे की

एक-दूसरे को नीचा दिखाने की

कभी हार जाता है कोई

तो कहीं ज़िन्दगी हरा देती है

दुश्मनों से नहीं डरती ज़िन्दगी

वो तो डरती है विभीषण से

मालिक भी रचकर

भूल गया ज़िन्दगी को

फरियाद जब कोई सुनता है

तो कलयुग का बहाना

करता है

न इल्ज़ाम ख़ुद पर

कोई लेता है

वो तो ज़िन्दगी को

ज़िन्दगी का अंज़ाम

बताता है

- संजय जनागल

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