रविवार, 15 जनवरी 2012

गोवर्धन यादव की लघुकथाएं

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भैंस के आगे बीन बजाना

कमलकांत और श्रीकांत गहरे मित्र थे. कमलकांत कालेज में प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत थे, जबकि श्रीकांत अपने पिता की विरासत को आगे बढाते हुए परचून की दुकान चलाता था. दोनों के बेटों के बीच भी गहरी मित्रता थी. दोनों साथ ही पढ़ते भी थे. कमलकांत का बेटा क्लास में हमेशा प्रथम श्रेणी में पास होता जबकि श्रीकांत का बेटा फ़िसड्डी रहता. फ़ुरसत के क्षणों में दोनों मित्र बैठे चाय सुडक रहे थे. कमलकांत ने पहल करते हुए कहा:-“श्रीकांत बुरा न मानो तो एक बात कहूँ. तुम जिन्दगी भर पुडिया बांधते रहे. क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारा बेटा भी आगे चल कर पुडिया बांधता रहे. वह पढ़ाई में काफ़ी कमजोर है. उस पर थोडा ध्यान दिया करो.” इस बात पर श्रीकांत को थोडा गुस्सा आया. उसने अपने मित्र को पलटकर जबाब दिया” मित्र..बुरा न मानना. तुम्हारा बेटा पढ-लिख कर ज्यादा से ज्यादा कलेक्टर बन सकता है. मैं अपने बेटे को राजनीति में उतारुंगा. राजनीति में अकल की कोई जरुरत नहीं होती. उसे तो केवल वाकपटु होना चाहिए. देखना दस-पांच साल में वह कितनी तरक्की करता है. एक दिन ऐसा भी आएगा कि वह प्रदेश का दमदार मंत्री बन जाएगा और तुम्हारा कलेक्टर बना बेटा उसके सामने खडे होकर उसके आदेश की प्रतीक्षा करेगा. ऐसा भी हो सकता है कि उसे उसके जूते के तसमें न बांधना पडे.” अपने मित्र की बात सुनकर कमलकांत की हालत देखने लायक थी. उसे इस बात प़र गहरा क्षोभ हो रहा था कि उसे भैंस के आगे बीन बजाना ही नहीं चाहिए था.

जंगल में लोकतन्त्र.

जंगल का राजा शेर , अब बूढ़ा हो चुका था. शरीर में अब इतनी ताकत भी नहीं बची थी कि वह अपने बल पर शिकार कर सके. न तो आज वह दौड़-भाग कर सकता था और न ही ऊँची छ्लांग ही लगा सकता था. उसे ऐसा लगने लगा था कि अब भूखों मरना पडेगा. एक शेर होने के नाते वह खुदकुशी भी तो नहीं कर सकता था. अब क्या किया जाए,इसी उ्धेड़बुन में बैठा वह गंभीरता से विचार कर रहा था. जिन्दा कैसे रहा जाए,इसी बात को लेकर चिन्ता उसे खाए जा रही थी काफ़ी सोचने-विचारने के बाद उसके दिमाग में एक विचार आया. क्यों न किसी जानवर को पटाकर अपना असिस्टेन्ट बना लिया जाए,जो उसके भोजन-पानी की व्यवस्था करता रहे. इसी क्षण उसे अपने दिवंगत पिता की याद हो आयी. और यह भी याद हो आया कि किस तरह एक छोटे से प्राणी खरगोश ने उसे बुद्धू बना कर कुएँ में छलांग लगाने के उकसाया था. काफ़ी सोच विचार करने के बाद उसने एक भेडिए को पटाने की सोची. भेडिए को खबर भेज कर बुलाने के बाद उसने उससे कहा कि वह उसे इस जंगल का भावी राजा घो‍षित कर सकता है, बशर्ते कि वह उसके लिए शिकार का प्रबन्ध करे. भेडिया आखिरकार इस शर्त पर राजी हो गया कि शिकार में से उसका पच्चीस प्रतिशत हिस्सा रहेगा. शेर अब निश्चिन्त हो कर अपनी गुफ़ा में आराम से दिन काटने लगा था.

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गोवर्धन यादव

103,कावेरी नगर,

छिन्दवाडा (म.प्र.) 480001

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  फतुहा, पटना की कलाकृति)

3 blogger-facebook:

  1. very thoughtful the story is
    bahut khub

    add me in blog i am also kavi
    my ID is ghfdbzoya123

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  2. बेनामी7:32 pm

    श्री फ़रहान जी,एवं संगीता स्वरुपजी,
    आपको मेरी लघुकथाएं अच्छी लगी. धन्यवाद. गोवर्धन यादव.

    उत्तर देंहटाएं

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