सोमवार, 16 जनवरी 2012

दामोदर खड़से की पहली कहानी - चुभता हुआ घोंसला

महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्यकारी अध्यक्ष श्री खडसे ने अध्यापक के रूप में अपना सफर शुरू किया, बाद में एक बैंक में राजभाषा अधिकारी और फिर सहायक महाप्रबंधक के रूप में सेवा-निवृत्त हुए. अब तक छह कथा-संग्रह, दो उपन्यास, पांच कविता-संग्रह, चार राजभाषा विषयक पुस्तकें, एक वार्ता -संग्रह व एक संस्मरणात्मक कृति प्रकाशित. केंद्रीय हिंदी समिति सहित भारत सरकार के कई मंत्रालयों के हिंदी सलाहकार.

(1978 में लिखी गई यह कहानी कादम्बिनी के जून 1979 अंक में छपी )

ह-सुबह की बारिश देखकर वह बहुत खुश होता है. ऐसी बरसाती सुबह में उसकी सब्जी खूब बिकती है. बजाजनगर, जहां वह अक्सर अपनी ठेली लिये जाता है, अधिकांश लोग वहां ऑफिसवाले हैं. सुबह की बारिश देखकर सब चाय की चुस्कियां लेते रहते हैं और अखबार के पन्नों के विज्ञापन तक चाट जाते हैं. भीगने की जोखिम कोई नहीं उठाता. बस, यहीं उसकी बिक्री बढ़ जाती है और वह थोड़ा- बहुत भाव भी बढ़ा देता है. हरी सब्जियों के लिए पानी छिड़कने का भी झंझट नहीं रहता, उल्टे उनका वजन कुछ बढ़ ही जाता है. उसने अपनी कर्मभूमि के लिए बजाजनगर का चुनाव बहुत सोच - समझकर किया था.

सबसे बड़ी बात तो यह थी कि बजाजनगर उसके घर से काफी दूरी पर था, जिससे उसके पास-पड़ोसवालों को यह पता चलने की सम्भावना बहुत कम रहती कि वह सब्जी बेचने जैसे कामों तक में उतर सकता है. नागपुर में रहने का यही तो एक फायदा था उसे. आज सुबह से ही बारिश बहुत तेज थी. वह हमेशा से कुछ पहले ही अपनी ठेली पर कई प्रकार की हरी सब्जियां और दूसरी सब्जियां रखकर बड़ी तेजी से आगे बढ़ रहा था. ' सब्जी की थोक दुकान, फुले मार्केट से सब्जी लेकर बजाजनगर पहुंचने में उसे करीबन आधे घंटे से ऊपर लगता है. उसने अपनी पैंट की मोहरी घुटनों तक मोड़ ली है. स्लीपर, जो पैरों में थी, बहुत काट रही थी. उन्हें उतारकर उसने झोलीनुमा बोरी में रख दिया. पीठ तक का हिस्सा उसने ठेली की टप में घुसेड़ दिया. वह ठेली ढकेलते हुए आगे बढ़ने लगा. कितना बुरा लगा था पिताजी को, जब उन्हें पता चला कि उनका दीनू सब्जी बेचने का काम करता है! पहली बार उन्हें सस्पेंड होने का घातक अहसास हुआ था. वैसे कई असहनीय झमेले उन्होंने झेले थे, पर यह बात वे न सह सके. बहुत डांटा था उन्होंने, ''मेरी इच्चत का तनिक भी खयाल नहीं! सारे लोग कहेंगे, बड़े बाबू का लड़का अब सब्जी बेचने का काम करता है!'' बाद में कमायी के तीन-चार रुपये घर की बोझिलता को कम करने लगे. पिताजी की मजबूरी और क्रोध को वे रुपये धीरे - धीरे सहलाने लगे आज उसकी काफी बिक्री हुई और रकम भी अच्छी बनी. उसने देखा, ठेली में अब कोई खास सब्जी नहीं बची. वह ठेली को रामू के घर पर रखने के लिए निकला. दोपहर को वह अपनी ठेली रामू के यहां रखता है.

मोड़ पर उसने अपना हिसाब मिलाया. ठेकेदार को अरि ठेली का किराया देकर उसके पास लगभग सोलह रुपये बच गये. पहली बार आधे दिन की इतनी बड़ी उसकी कमाई थी. कुल तीन महीने के उसके इस रोड- व्यापार की जिंदगी में सबसे अधिक कमाई! पर शाम को शायद कुछ भी न मिले! वह सोच ही रहा था कि ऊपर से आवाज आयी, '' अरे... पालक है क्या?'' किसी महिला ने पूछा पहले उसने अपनी ठेली में देखा. थोड़ा पालक बचा था. फिर ऊपर देखकर ' हां ' कह दी. महिला ऊपर से नीचे आ रही थी. जिस बिल्डिंग के सामने वह खड़ा था, वहां डिस्पेंसरी थी. डॉ. बी. एस. भागवत, एम.बी.बी.एस. और पास ही उसी आकार की डॉ. श्रीमती सुशीला भागवत की तख्ती सटकर लगी थी. वह, जो सब्जी लेने आ रही है, डॉक्टर ही होगी. नीचे डिस्पेंसरी है और ऊपर शायद वे रहते हैं. उस महिला के जाने के बाद उसने सोचा, यदि पिताजी की नौकरी न छुटी होती तो वह भी इस वर्ष बी.एस-सी. के दूसरे वर्ष में होता, और ऐसी ही डिस्पेंसरी होती और ऐसी ही... बहुत देर तक उसने अपने - आपको सोचने की इजाजत नहीं दी. पैसे जेब में रखे और झटके से ठेली ढकेलने लगा. साढ़े ग्यारह बज चुके थे. ठेली रामू के घर रखकर घर जाना, भोजन करना, इस सबके लिए उसे और दो घंटे चाहिए, पर तब तक उसकी भूख कड़ककर रह जाएगी.

'' अरे दिनेश! '' दिनेश ने मुड़कर देखा, रामू ही था. गली से निकल रहा था. ' 'बहुत देर कर दी आज?'' रामू ने पूछा.

''तू भी तो बहुत लेट हो गया. '' दिनेश बोला.

''मेरा घर तो पास ही है, कभी भी पहुंच सकता हूं पर तुम तो दो के पहले नहीं पहुंच सकते. ''

पंद्रह -बीस दिनों में ही वह दिनेश से कैसे घुल - मिल गया, पता नहीं. ''यार, इतनी बरसात में भीगकर कमाओ! घर जाते ही दिमाग की किरकिरी हो जाती है. खाना खाने बैठो, थाली में दाल है तो चावल नहीं. सब्जी में ठीक से तेल नहीं. बस, मुंह लटकाकर थाली पर झुके रहो. कैसे भी खाओ और थोड़ी देर में वापस जुत जाओ...'' रामू कह रहा था और दिनेश सुन रहा था. पर उसे लगा कि वह उसकी ही बात बयान कर रहा है. दिनेश रामू के जीवन-दर्शन से प्रभावित हुआ. झट बोल पड़ा, ''बस, ज्यादा भाषण मत झाड़ो. आज तुम्हारे साथ हो जाए? ''

रामू की जम गयी. वह तो इसी इंतजार में था. दोनों स्ट्शन के पास, ' शेरे -पंजाब' होटल में घुसे. दोनों की ठेली होटल के सामने खड़ी थी. साढ़े - बारह बजे के करीब दोनों बाहर आये. पैसे दिनेश ने ही दिए थे. बाहर आते ही हिसाब हो गया. रामू हिसाब के बारे में बड़ा साफ था. हिसाब होते ही उसने पांच रुपये अस्सी पैसे दिनेश की ओर बढ़ाये.

रामू के पास दस का नोट देखकर दिनेश बोला, ' 'तू ऐसा कर, यह दस रुपये का नोट मुझे दे दे! मैं तुझे चार रुपये बीस पैसे लौटा देता हूं हिसाब बराबर. '' रामू ने दस का नोट दिनेश को दे दिया और बाकी पैसे वापस ले लिये. इतने दिनों बाद दस रुपये के नोट से दिनेश अचानक ही जुड़ गया था. पिताजी की नौकरी जब छूट गयी थी, तब भी उसका सिनेमा देखना नहीं छूटा था. वह दो- चार रुपये पिताजी के पहचानवालों से ले चुका था, पिताजी के नाम पर. कई लोगों ने पैसे दिये और कइयों ने 'ना' भी कही.

उसी दिन वह प्रकाश स्टूडियो की ओर बढ़ा. घनश्याम दास जी उसके पिता के अच्छे परिचितों में से हैं. उसने सोचा, आज इधर कुछ व्यवस्था हो जाए. ऊपर पहुंचते ही उसने देखा, एक नीम परिचित- से सज्जन भी घनश्याम दास जी के पास बेठे हैं. दिनेश को संकोच हुआ ''क्यों, फॉर्म भरने के लिए फोटो चाहिए? अब कौन - सी परीक्षा में बैठ रहे हो? '' घनश्याम दास जी के प्रश्न ने दिनेश को चौंका दिया. फॉर्म के लिए फोटो, वह सोच भी नहीं सकता था यह प्रश्न! कैसे बताये वह कि फीस के अभाव में पांच महीने से उसका कॉलेज जाना बंद है! अपने - आपको सम्भालते हुए उसने कहा, '' नहीं, फोटो नहीं, दस रुपये चाहिए थे...'' दिनेश

की आंखें अपनी सारी विवंचना छिपाने के लिए किसी अच्छे चेहरे की तलाश में उठीं, शो-बोर्ड पर. पर पहले ही नजर मूंछवाले खूंखार हवलदार के फुल साइज फोटो पर अटकी और उसने नजरें लुका लीं और धीरे- धीरे डरते हुए नीमपरिचित की नजरों की ओर उठाने लगा, जो उसी को घूरे जा रहा था. वह और भी सहम गया. '' अभी तो नहीं है, थोड़ी देर से चलेगा? '' घनश्याम दास जी के पर्याय ने उसे बहुत बड़ी राहत दी.

''ठीक है, साढ़े-पांच तक आऊं?''

'हां' में उत्तर पाकर दिनेश सीढ़ियां उतरने लगा. अभी वह तीन - चार सीढ़ियां ही उतर पाया था कि किसी शक्तिशाली चुम्बक ने उसे पीछे खींच लिया. वह ठिठक गया.

''देखो, इसे पैसे बिलकुल मत देना. रामेश्वर की जब से नौकरी फूटी है, उसका यह बड़ा लड़का एकदम आवारा हो गया है. बाप के नाम पर पैसे मांगता फिरता है.''

पास ही बैठे उस व्यक्ति ने घनश्याम दास जी को आगाह कर दिया. दिनेश के पांव जैसे लकड़ी के थे, और अचानक किसी ने एक ही झटके में छीन लिये! अब सहारे के लिए दीवार से चिपक गया. वैसे ही बेजान - सा धीरे धीरे नीचे आने लगा. उसे पहली बार अहसास हुआ कि वह आवारा हो गया है! इस तरह उसे अपने पिता की साख नहीं बिगाड़नी चाहिए. पर वह ऐसा क्यों करता गया, उसे भी नहीं मालूम. शाम को वह रुपये लेने नहीं गया. दोपहर से ही इधर-उधर भटकता रहा. पार्क में, चौक की रेलिंग पर सिनेमा के पोस्टर्स आदि देखता- सोचता वह भटकता रहा. रात हो चली थी. घर जाना जरूरी था. उसे घर खाने को दौड़ता है. पिताजी अब चिड़चिड़े हो गये हैं. घर की हालत निरंतर गिरती जा रही है. वह सब जानता है, पर बोझ से बहुत घबराता है. अभी तक उसने अपने कंधे बचाये रखे हैं घर में कदम रखते ही उसके पिता प्रश्नों और गालियों की बौछार लिये टूट पड़े. दिनेश के मौन ने रामेश्वर को और अधिक उग्र बना दिया. शायद दिनेश की पैसे मांगनेवाली बात उन्हें मालूम हो चुकी थी. वे दांत पीसते हुए दिनेश पर दो - चार झापड़ों के साथ टूट ही पड़े. गुस्सा जोरों पर था.

''यह कोई मारने की उम्र है! सब- कुछ कैसे बिगड़ता जा रहा है! क्या होगा अब इस घर का! '' दीनू की मां की बातें सुनते ही रामेश्वर के हाथ रुक गये. मुंह भी बंद हो गया. वे भी शायद चाहते ही थे कि ऐसी ही कोई बात हो, जिससे गुस्से में दरार पड़े और वे उसमें से बाहर भाग निकलें. क्योंकि हाथ गुस्से में उठ गया था और प्रतिष्ठा का प्रश्न जबरन गुस्सा बनाये रखना चाहता था.

दिनेश को अपनी मां का चेहरा स्पष्ट याद नहीं. वैसे, लोगों द्वारा ही उसे धीरे- धीरे यह मालूम हुआ कि यह उसकी सौतेली मां है. पर अभी- अभी जिसने उसे सहानुभूति दी, वह निश्चित ही मां थी. यह बात दिनेश को काफी सहारा दे रही थी. फिर भी उसका चेहरा लाल हो गया था. आंख- कानों में आग लगी थी. स्थितियों के जाल में छोर खो चुका था. कहां से शुरू करे? कैसे सुलझाया जाए? ये यक्ष- प्रश्न कमर कसकर खड़े थे, पर युधिष्ठिर के अभाव में सब कुछ अनुत्तरित रह जाता.

दिनेश और रामू पान चबाते हुए फुले मार्केट में ठेकेदार की ओर मुड़े. एक ही सिगरेट वे आपस में फूंक रहे थे.

'' अब तो आकाश साफ हो गया'' रामू ने ऊपर देखते हुए कहा.

हूं के सिवाय दिनेश के पास था भी क्या!

उधर रामू चहक रहा था, ''मौसम बड़ा मजेदार रहेगा आज शाम को. आज जहां मटन खाया था न, वहां केबिन में बियर और शराब भी मिलती है. चलेगा शाम को? आज तो भाई अपना मन बहक रहा है और लगाम अपने पास है नहीं. कोई साथ हो तो मजा डबल, नहीं तो अकेले राम! ''

'' अपने को यार उसमें मजा नहीं आता!'' दिनेश ने कटते हुए कहा.

''बेटा, अभी तो एक -दो बार चखी ही है... पीना शुरू कर दे, उसके बगैर मजा नहीं आयेगा; और आज तो उसकी अगली गली का भी प्रोग्राम है. '' ऐसा कहकर रामू ने अपनी एक आंख मारकर शरारतपूर्ण इशारा किया और आंखें गड़ाकर दिनेश के चेहरे की प्रतिक्रिया पढ़ने में लग गया.

सामने पूरन ठेकेदार की दुकान आ चुकी थी. सुबह का हिसाब करना था. नयी सब्जियां लेनी थीं. दोनों अपने- अपने काम में लग गये. रामू का हिसाब -किताब जल्द हो गया. उसने अपनी ठेली सजा ली और दिनेश से बोला, '' शाम का तय रहा, मेरे घर आ जाना. वापस घर आने की जरूरत नहीं. फिर वहीं से सब तय कर लेंगे. ''

दिनेश को रामू की यह आदत अच्छी नहीं लगती. वह बड़ी डरावनी स्थिति में होता है इन सब स्थितियों के बीच. वह सिर्फ इतना ही कह पाया, ''मैं शाम को तो घर ही जाऊंगा. ''

''सोच ले! '' इतना कहकर रामू अपनी ठेली ढकेलते हुए आगे बढ़ गया.

रोज की तरह. शाम को दिनेश ने अपनी ठेली रामू के घर के पास जमा करा दी. किराया चुकाया. बची सब्जियों को बोरे में भरकर रामू के घर रखने के बाद ठेकेदार के पैसे चुकाये. दिनेश की जेब में अब दस का नोट और तीन - चार रुपये बच गये. आठ-साढ़े आठ बज रहे होंगे. आकाश फिर डबडबाया हुआ था. मोटे छीटों के छिटपुट हमले हो रहे थे. दूर कहीं आकाश की काली छाती पर एक छोटी - सी रोशनी की रेखा तिलमिलाकर गायब हो गयी थी. दिनेश को घर पहुंचने की जल्दी थी. वह बस स्टॉप पर आया. उसे तेरह नम्बर की बस का इंतजार था. तेरह नम्बर की बस आयी. लदी हुई. लोग बस की ओर लपके और दिनेश बस के डंडे से लटककर भीड़ में धंस गया. बस मंदिर के स्टॉप पर रुकी. उतरते ही दिनेश शेड में हो लिया. उसकी और भीगने की हिम्मत नहीं थी. बिल्डिंगों की आड़ में लुकता-छिपता, बारिश से अपने - आपको बचाता वह अपनी गली में दाखिल हो गया. उसे रामू की याद आयी. आज दोपहर को उसके साथ भोजन में कितना मजा आया था! इस ठंड में रामू का प्रोग्राम...? और यदि सेकंड शो के लिए मैं कहता तो वह ना कहने की हिम्मत न रखता... सोचते - सोचते अनायास ही वह मुस्कराया.

बारिश कुछ छितरायी. उसने सिर को एक झटका दिया. बाल रुमाल से पोंछे और दस का नोट टटोलकर तसल्ली कर ली, छुट्टे पैसों से उसे उसने अलग रखा था. बस में भी बड़ा सावधान था वह. बस की इतनी भीड़- भाड़ में भी वह सलामत रहा. वह सोच रहा था कि उसके पिताजी कितने खुश होंगे! इस दस रुपये की खातिर उसने बहुत-कुछ सहा है. आज पिताजी के हाथ में यह नोट देकर मैं उस दिन का बदला लूंगा. देखना है, आज किसकी नजर कितनी नीची-ऊंची होती है. गैलरी खत्म होते ही उसने अपने स्लीपर हाथ में ले लिये और दीवार के साथ- साथ कूदता- फांदता आगे बढ़ा अब वह अपने मकान के सामने था. बीच में संकरी गली थी.

पर ज्यों ही वह दरवाजे के एकदम करीब गया तो सुना, ''दीनू नहीं आया अभी तक?''.

अपना नाम सुनते ही सांकल पर खटखटानेवाले उसके हाथ अचानक रुक गये. उत्तर मैं पिताजी की. आवाज भी उसने सुनी, ''आ जाएगा .. .तुम तो इधर आओ.''

''दोपहर में भी नहीं आया, न जाने क्या बात है...''

''दिनेश की इतनी चिंता करती हो... यदि तुम्हारा अपना होता तो मेरा तो भगवान ही मालिक था... जितना थोड़ा- बहुत अभी ध्यान देती हो...''

तभी बिजली कड़की और भीतर से सम्पर्क टूट गया. बारिश धरती पर चीते की तरह झपटी. मूसलाधार झोंका आया और दिनेश को पूरी तरह नहला गया. भीतर -बाहर तक वह भीग गया. उसका दस का नोट भी भीग चुका था.

रामेश्वर रुक - रुककर बोल रहे थे, ''दीनू को अब पंख उन आये हैं, उसकी चिंता कम किया करो, अपनी सोचो. ''

'' कितने बजे हैं? ''

पत्नी के पूछने पर बिना घड़ी देखे बोले, ''ग्यारह. ''

आधे घंटे से वे पत्नी का इंतजार कर रहे थे. '' भोजन भी ठंडा हो रहा है. '' दीनू की मां ने कहा. दिनेश की ओर से पत्नी का ध्यान हटाने के लिए बोल पड़े, ''इतनी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. जहां उसे गरम भोजन मिलेगा वहां कर लेगा वह. '' कहते-कहते वे रुक गये.

''क्या मतलब?'' दीनू की मां ने उत्सुकतावश पूछा. '' आज ही मैंने उसे होटल से निकलते हुए देखा. पान-वान चबाकर साहबजादे सिगरेट से अपने - आपको खूब गरमाते हुए चल रहे थे. उसके साथ एक लड़का भी था. ''

''क्या कहते हो! ''

''सही कह रहा हूं मैंने अपनी आंखों से देखा है. थोड़ा कमाता है, बहुत उड़ाता है. आजकल के लड़के हैं, कौन किसकी चिंता करता है! तुम हो, जो मुफ्त में अपना जी ठंडा कर रही हो. बस, बचे-खुचे चिल्लर पैसे वह हमारी मजबूरी के माथे मारकर मजा करता है. उसके लिए कोई चिंता करने की जरूरत नहीं. ''

उसे लगा कि यह अधमरा मवेशी है, जिस पर चील-गिद्ध हमले कर रहे हैं. . उसके शरीर से जिंदा लोथड़े नोच रहे हैं और वह कुछ नहीं कर पा रहा है. दिनेश के नथुने गुस्से से फूल रहे थे. उसकी एक मुट्ठी दूसरी हथेली पर ठोंक रही थी. भीतर -बाहर अंधेरा- ही - अंधेरा था. ऐसा गहरी बारिश में उसे गली के कोने का टिमटिमाता पीला बल्ब दिखा. उसे फिर रामू याद आ गया. बस, तभी वह उल्टे पांव भागा, किसी रामू की तलाश में.

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(साभार - नवनीत हिंदी डाइजेस्ट अक्तूबर 2011)

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