गुरुवार, 5 जनवरी 2012

देवेन्द्र पाठक'महरूम' की ग़ज़लें - जो नज़र में उसकी मैं चढ़ गया।तो नज़र से अपनी उतर गया ॥

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ग़ज़ल 1

रात-दिन,शामो-सुबह उल्लास की.

रुत रँगीली आ गई मधुमास की.

 

नयन की उन दो कुँआरी सीपियोँ मेँ ;

पिघलती है हिमनदी इक प्यास की .

 

रात भर खिड़की खुली तकती रही ;

चाँद बिन सूनी सड़क आकाश की .

 

दर्दे-दिल किससे कहेँ ग़मगीँ हैँ सब ;

बुझ गई है शम्अ हर अहसास की .

 

डूब न जाए ये दिल की नाव 'महरूम' ;

टूटने दे डोर मत विश्वास की .

--

      ग़ज़ल 2         
जो नज़र मेँ उसकी मैँ चढ़ गया।
तो नज़र से अपनी उतर गया ॥ 
 
अक्सर ही मेरे क़रीब से ; 
सुख अज़नबी  सा गुज़र गया॥ 
 
हर बार दुख मुझे और भी ; 
ज़्यादा जुझारू कर गया ॥    
 
दहलीज पर दिल की मेरी   ;
कोई दीप आश का धर गया ॥ 
 
इक ख़्वाब जो मेरे साथ ही; 
जीने का वादा कर गया ॥
 
खोकर मैँ इक उम्मीद फिर; 
इक और उम्मीद के घर गया ॥
 
किया सर क़लम तूने जो मेरा ; 
हूँ मैँ पेड़ क़द मेरा बढ़ गया ॥
 
हूँ मैँ नज़्म या अशआर कोई ; 
'महरूम 'तू मुझे पढ़ गया ॥     
               - - - * - - -
आदमी का क़द /  
आदमी का क़द सियासत से न कम कर देखिए .        
ओहदोँ की चौहदोँ से अब निकलकर देखिए .   
         
आपने जो नेकियोँ की राह दिखलाई हमेँ ;                  
आप भी उस पर कभी कुछ दूर चलकर देखिए .    
 
ख़ौफ़ ओ शक़ की जिस गली मेँ  गुज़री मेरी ज़िँदगी; 
आप उसमेँ  दो घड़ी भी साँस लेकर देखिए.  
 
गर बुलंदी पर पहुँचना चाहते हैँ ज़ल्द तो;  
अपने ईमानो -धरम से थोड़ा गिरकर देखिए .    
    
हैँ करोड़ोँ चेहरोँ पर मर्सिए लिक्खे हुए ; 
थोड़ी भी ग़ैरत है तो ' महरूम ' पढ़कर देखिए .  
--
 
AATMPARICHAY          DEVENDRA KUMAR PATHAK [ TAKHLLUS 'MAHROOM' ] DATE OF BIRTH -02.03.1955 /    VILLEGE- 'BHUDSA' , (BADWARA)  DIST-KATNI (M.P.) EDUC.-M.A.B.T.C.(HINDI /TEACHING )HINDI TEACHER IN A MIDDLE SCHOOL / EDU.M.P. GOVT. /PBLSHD BOOKS - 'VIDHRMI', 'ADANA SA ADAMI' ;[NOVEL ] 'MUHIM', 'MARI KHAL: AKHIRI TAL', 'DHARAM DHARE KO DAND' , ' CHANSURIYA KA SUKH' [STORIES BOOKS] 'MIL KA MAMLA HAI'[SATIRES] 'DUNIYA NAHIN ANDERI HOGI' [ POEMS] 1981  SE PATR-PATRIKAON MEN  PRKASHAN /REDIO -T.V. SE PRSARAN/ PREMNAGAR,KHIRAHANI;POST SCINECE COLLEGE POST OFFICE-KATNI. 483501 M.P.

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  , फतुहा पटना की कलाकृति)

4 blogger-facebook:

  1. आपने जो नेकियोँ की राह दिखलाई हमेँ ;

    आप भी उस पर कभी कुछ दूर चलकर देखिए .



    ख़ौफ़ ओ शक़ की जिस गली मेँ गुज़री मेरी ज़िँदगी;

    आप उसमेँ दो घड़ी भी साँस लेकर देखिए.


    Behtareen rachana!

    उत्तर देंहटाएं
  2. DHARMENDRA KUMAR TRIPATHI6:08 pm

    kiya sar kalam tune jo mera, mein hoon ped kad mera badh gaya

    behatareen gazal prakashit karne ke liye sadhubad

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेनामी12:20 pm

    ek din esa bhi ayega jab har admi ki jawan par sirf apki gajale hogi.........tinku

    उत्तर देंहटाएं

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