प्रभुदयाल श्रीवास्तव की एक बोध कथा : योग्य उम्मीदवार

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चुनाव सिर पर थे और योग्य उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी थी। सभी राजनैतिक दल एक दूसरे को पटकनी देने के जुगाड़ में थे। किसी भी तरह चुनाव में बढ़त बनायें और सत्ता हथियाएं, मात्र यही एक सूत्रीय कार्यक्रम सबके पास था। बहुमत मिल जाये तो फिर क्या कहने हैं अपने ही बलबूते सरकार बन जाये क्यों किसी दूसरे दल के आगे हाथ पैर जोड़ना पड़े। इसी उधेड़ बुन में सब लगे थे। राजनैतिक दलों में घमासान मचा था। सभी प्रमुख दलों को, उम्मीदवारों के चयन में अपनी नानी याद आ रही थी। एक एक चुनाव क्षेत्र में कई कई उम्मीदवार लार टपका रहे थे। एक विशेष क्षेत्र के लिये तो दस धुरंधर छटपटा रहे थे।दल की कार्यकारिणी निश्चित नहीं कर पा रही थी कि क्या करें क्या न करें। बड़ी मशक्कत करना पड़ रही थी,कैसे फैसला हो आखिर टिकिट तो किसी एक ही को मिल सकती थी।


मान मनौअल का दौर जारी था।
अंत में आठ ऐसे लोग जिनकी बाहुओं में बल नहीं था या बहुत कम बल था या जो निर्धन थे या बहुत मामुली हस्तीवाले थे उन्हें बिठाल दिया गया किंतु दो उम्मीदवार किसी भी तरह हटने को तैया नहीं थे,दोनों योग्य एक दूसरे पर बीस पड़ते हुये। एक के पास अरबों की संपत्ति थी तो दूसरे के पास सोने चांदी हीरे जवाहारातों का जखीरा भरा पड़ा था। एक के पास हज़ारों एकड़ जमीन ,थी सैकड़ों फार्म हाउस थे तो दूसरे के पास देश विदेशों के बड़े शहरों में आलीशान होटल थे। एक के खिलाफ तीन बैंक लूटने के आरोप थे तो दूसरे के विरुद्ध न्यायालय में बलात्कार के चार मामले लंबित थे। एक समुद्री तस्कर था तो दूसरा ड्रग माफिया था।

आखिर दल के लोगों ने निश्चित किया कि दोनों का आपस में मल्लयुद्ध करा दिया जाये जो विजयी होगा उसे ही उम्मीदवार बना दिया जाये। सर्व सम्मति से प्रस्ताव पारित हो गया है और प्रयोग के तौर पर एक बड़ा अखाड़ा तैया र किया जा चुका है। बस प्रतीक्षा है जो जीता वही सिकंदर,उसे ही उम्मीदवार घोषित कर दिया जायेगा। परिणाम पर सबकी निगाहें हैं। यदि प्रयोग सफल रहा तो अन्य दल भी इसे अपना सकते हैं। अड़ियल उम्मीदवारों की संख्या अधिक होने पर क्वार्टर फाइनल सीमी फाइनल फिर फाइनल का प्रावधान भी रखा जा सकता है। राम भली करें ।वैसे अच्छे रेफरियों की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है।


कथा का सार यह है कि टिकिट पाने के लिये ऐसी ही होड़ मची रही तो निश्चित ही आनेवाले दिनों आदिम युग की तरह बाहुबल से ही उद्देश्य की प्राप्ति हो सकेगी।

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2 टिप्पणियाँ "प्रभुदयाल श्रीवास्तव की एक बोध कथा : योग्य उम्मीदवार"

  1. वर्तमान को आईना दिखाती लघुकथा. अच्छी लगी

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