शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - पर्दा

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पर्दा

रामू की माँ बोली “ तूँ अपनी घरवाली को इतना सिर पर क्यों चढ़ा रहा है। वह किसी से पर्दा ही नहीं करती। सबके सामने बिना चेहरा ढके ही पहुँच जाती है। और तो और घर से बाहर भी बिना पर्दा किये ही निकलती है। मेरे बोलने पर वह कहती है कि उन्हें यह सब पसंद नहीं है। आखिर तूँ घर बिगाड़ने पर क्यों तुला है” ?

रामू बोला “ माँ जी मैंने मोहन की घरवाली को देखा है। वह अपने घर के सदस्यों से पर्दा करती है। बाहर निकलने पर भी पर्दा करती है। और तो और गाँव की महिलओं से भी उससे पर्दा कराया जाता है और वह करती है।

लेकिन जब घर के लोग बाहर होते हैं तो वह बाहर बिना पर्दा किये ही निकलती है। भले ही बाहर अन्य लोग हों। जब उसे लगता है कि घर का कोई आ रहा है तो फौरन पर्दा कर लेती है। उसके घर वालों की अनुपस्थिति में मैंने उसे औरतों के सामने पर्दा करते हुए और कई पुरुषों से बिना पर्दा किए हुए बात करते हुए देखा है। बताओ इस तरह पर्दा करने से क्या फायदा ?

आपकी बहू भले ही सबके देखने में पर्दा नहीं करती। लेकिन वह नजर का पर्दा करती है। यदि नजर का पर्दा न हो तो ऐसे पर्दे का क्या मतलब है” ?

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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(चित्र- अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com , फतुहा, पटना की कलाकृति)

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