शनिवार, 21 जनवरी 2012

एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य : एक नास्तिक और आस्तिक की समस्या

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एक नास्तिक और आस्तिक की समस्या

एक नास्तिक और एक आस्तिक की मुलाकात हुई। दोनों में बातचीत होने लगी। बातचीत के दौरान आस्तिक को लगा कि सामने वाला नास्तिक है। इसलिए उसने सोचा कि मैं इससे इस बिषय में जरूर बातचीत करूँगा और इसके अविश्वास को विश्वास में बदल दूँगा। नास्तिक पहले तो ईश्वर बिरोधी तर्क प्रस्तुत करता रहा लेकिन बातचीत के अंत में ईश्वर को न मानने और अपने नास्तिक होने के राज का खुलासा किया

हर आस्तिक को लगता है कि उसका विश्वास बड़ा है। और इसी विश्वास के बल पर आस्तिक ने ऐसा निर्णय लिया था। लेकिन इन्हें यह नहीं मालुम था कि हर नास्तिक को भी लगता है कि उसका अविश्वास सबसे बड़ा है। और वह सोचता है कि हिमालय को तो डिगाया जा सकता है पर मेरे अर्थात एक पक्के नास्तिक के अविश्वास को नहीं।

असम्भव सम्भव हो सकता है पर नास्तिक का अविश्वास डिगे यह कभी सम्भव नहीं हो सकता। दुनिया के अजूबों में यह भी एक अजूबा है लेकिन आस्तिक अज्ञानतावश नास्तिक से प्रश्न कर ही बैठा।

आस्तिक ने पूछा क्या आप ईश्वर में विश्वास करते हैं ?

नास्तिक ने जबाब में प्रश्न किया कि ईश्वर में विश्वास करने से आपका क्या मतलब है ?

प्रश्नकर्ता जो जबाब की प्रतीक्षा में था, जबाब के बदले प्रश्न सुनकर थोड़ा आश्चर्यचकित हो गया। सोचने लगा कि क्या इन्हें विश्वास का मतलब ही नहीं मालूम है। तब तो शायद इनको किसी पर विश्वास ही नहीं होगा। न माता-पिता पर, न बीबी पर... और न ही अपने पर।

फिर सोचने लगा कि आज देश-समाज की स्थिति इसी विश्वास की कमी से दयनीय होती जा रही है। सब शंका में ही जिए जा रहे हैं। किसी को किसी पर भरोसा ही नहीं रहा। इसी से तो रोज तलाक हो रहे हैं। अनाथालयों में बूढ़े और बच्चे बढ़ रहे। कई तरह के अपराध दिनों-दिन बढ़ रहे हैं और इनका कारण अविश्वास ही है।

प्रश्नकर्ता यानी आस्तिक फिर सोचने लगा कि यदि जबाब मिला होता भले ही नहीं ही सही तो भी ठीक था। क्योंकि यदि किसी को किसी एक चीज में विश्वास नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि इनको किसी भी चीज में विश्वास नहीं है। लेकिन यहाँ मामला गम्भीर है क्योंकि इन्हें विश्वास का मतलब ही नहीं मालूम है।

खैर नास्तिक को समझाने के गरज से आस्तिक बोला मेरा मतलब है कि क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि भगवान हैं ?

नास्तिक ने फिर जबाब में प्रश्न ही किया- मुझे ऐसा क्यों लगना चाहिए ?

जबाब में फिर ऐसा प्रश्न सुनकर आस्तिक को थोड़ा-थोड़ा समझ में आने लगा कि नास्तिक भी क्या चीज होते हैं ?

आस्तिक ने कहा मेरे समझ से आपके अंदर भी बिचार आते होंगे। आप भी बहुत कुछ अनुभव करते होंगे। क्योंकि यह केवल सामान्य मानव का ही नहीं बल्कि पशुओं का भी गुण है। यह सभी जानते हैं कि मनुष्य अपने को पशुओं से श्रेष्ठ मानते आये हैं। और आप भी देखने में मनुष्य ही लगते हैं।

आस्तिक बोला मैं जो कहने जा रहा हूँ, वह हवा-हवाई नहीं है। हर आदमी जानता है अथवा जान या समझ सकता है कि कार्य और कारण में अनूठा रिश्ता है। बिना कारण के और बिना किसी के किए इस संसार में कुछ भी नहीं होता है।

सोच कर देखिये हर चीज, घटना आदि के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। आप कह सकते हैं कि आखिर मैं क्यों सोचूँ ? यह तो कोई बात नहीं हुई।

नेता, अभिनेता, चोर, सिपाही, साधु, सन्यासी, लेखक, कवि आदि जो कोई और जो कुछ भी करता है, वह अकारण नहीं होता है। चोर-उचक्के बढ़ रहे हैं। नेता बढ़ रहे हैं। घोटाले बढ़ रहे हैं। काले बढ़ रहे हैं। भले ही काले दिख न रहे हों। कोई मुँह काला किए है। कोई काला धन लिए है। कोई काला मन लिए है। सबके पीछे कारण है।

यह सड़क देखिये यह अपने आप नहीं बन गई है। और न ही आसमान से टपकी है। इसे किसी ने बनाया है। यह बाग किसी ने लगाया है। अपने आप नहीं लग गया है। यह बिल्डिंग अपने आप नहीं बन गई है। इसे भी किसी ने बनाया है। ऐसे ही यह संसार किसी ने बनाया है। यह धरती, आसमान, चाँद और सितारे आदि के होने के पीछे कोई कारण है। और इसे बनाने वाला अथवा उत्पन्न करने वाला भी कोई न कोई है।

यह सुनकर नास्तिक मुस्कराया। क्योंकि उसे अपने अग्रजों का जाना माना अकाट्य प्रश्न, जिसके बल पर वे अपने को कई बार बिजई और गौरवान्वित समझ चुके थे, पूछने का उचित अवसर मिल गया था।

वह बोला कि ठीक है। हर चीज को बनाने वाला कोई न कोई होता है। सो दुनिया भी किसी ने बनाई ही होगी। लेकिन अब मेरा प्रश्न यह है कि-

दुनिया बनाने वाले को किसने बनाया ? क्या आप बता सकते हैं कि भगवान को किसने बनाया ?

आस्तिक विचार करने लगा कि मूर्ख और विद्वान में एक समानता होती है। मूर्ख विद्वान को मूर्ख समझता है। और विद्वान मूर्ख को। दोनों में एक असमानता भी होती है। विद्वान ज्ञान का पुजारी होता है। और मूर्ख अज्ञान का। इसी से गुरुदेव जी को यह कहना पड़ा कि ‘मूरख हृदय न चेत जो गुर मिलँय बिरंच सम’। यही दशा नास्तिक और आस्तिक की भी होती है।

आस्तिक बोला कि ईश्वर को बनाने वाला कोई नहीं है। क्योंकि वह इकाई है जहाँ से शुरुआत होती है। जिससे सब कुछ बनता है।

ईश्वर अजन्मा और अविनाशी है। भला ईश्वर को कौन बना सकता है ? ईश्वर तो सबको बनाता है। हर किसी को बनाने वाला कोई न कोई होता है। यह सत्य है। किसी भी चीज को ले लीजिए और देखते जाइये कि इसको किसने बनाया। और जिसने इसको बनाया उसको किसने बनाया ..... । जहाँ पर यह श्रृंखला बंद होती है वही ईश्वर है।

हर चीज का अंत होता है। यह सत्य है। लेकिन एक चीज ऐसी है जिसका अंत नहीं होता है। वही ईश्वर है, शुरुआत है।

आस्तिक आगे बोला कि पूछा जाय कि तुमको किसने बनाया। तो कह सकते हो को पिता जी ने। फिर उनको उनके पिताजी ने.....। लेकिन एक बिंदु पर रुकना ही पड़ेगा। वही ईश्वर है। गणित और विज्ञान इन तथ्यों का पूर्ण समर्थन करते हैं। हम एक उदाहरण दे रहे हैं-

पियानो नामक गणितज्ञ ने पियानो एक्जिम्स में प्राकृतिक संख्याओं के बारे में कहा है कि दो कहाँ से आया एक में एक जोड़ने से, तीन कहाँ से आया- दो में एक जोड़ने से, चार कहाँ से आया तीन में एक जोड़ने से, पांच कहाँ से आया चार में एक जोड़ने से........। इसी प्रकार हर संख्या अपने पूर्ववर्ती संख्या में एक जोड़ने से मिल जाती है अथवा बन जाती है।

लेकिन एक इकाई है, यहीं से शुरुआत होती है। एक का कोई सक्सेसर नहीं है। एक को बनाने वाली कोई संख्या नहीं है क्योंकि यह सभी संख्याओं को बनाती है। यह तो एक छोटा सा उदाहरण था जिसे मूर्खश्रेष्ठ भी आसानी से समझना चाहें तो समझ सकते हैं। गणित और विज्ञान ऐसे ही सिद्धांतों पर आधारित हैं। इस प्रकार ईश्वर शुरुआत है। अतः उसको बनाने वाला कोई नहीं है।

नास्तिक बोला - होगा। जिसे हमने कभी नहीं देखा अथवा जो दिखाई नहीं पड़ता। उसका अस्तित्व है। सोचकर भी हँसी आती है।

आस्तिक बोला - आत्मा या प्राण भी तो नहीं दिखाई पड़ता। तो क्या इसका भी अस्तित्व नहीं है ? तो वह क्या है जिसके निकल जाने पर कुछ शेष नहीं रह जाता ?

विज्ञान के अनुसार काला द्रव्य श्वेत द्रव्य से कई गुना अधिक है। फिर भी दिखाई नहीं पड़ता। तो क्या हम कह देंगे कि काला द्रव्य नहीं है ?

परमाणु के मूल कण नहीं दिखते। जबकि मूल कण का सिद्धांत और प्रयोग दोनों से पुष्टि होती है। लेकिन वह नहीं दिखता, केवल उसका प्रभाव दिखता है। आज तक किसी वैज्ञानिक ने नहीं देखा। और न ही किसी मशीन के जरिये यह सम्भव हो सका। तो क्या हम कह दें कि वह नहीं होता ?

नास्तिक को कुछ सूझ नहीं रहा था सो बोला विज्ञान भी तो कहता है कि ईश्वर नहीं है। आस्तिक को थोड़ी हँसी आई। बोला - विज्ञान के वाणी नहीं है। न ही वह दिखता है। हम जो देखते हैं वह विज्ञान का प्रभाव है। यह कुछ वैज्ञानिकों का प्रलाप मात्र है। यह उनका अज्ञान है। सच्चे यानी महान वैज्ञानिकों ने, न ऐसा कभी कहा है और न ही कहेंगे। क्योंकि वे विज्ञान, अज्ञान और मानव ज्ञान की सीमा को पहचानते हैं। और जीवन के अंत समय में मेटाफिजिकल थियरी की बात करने लगते हैं।

कुछ सोचकर नास्तिक बोला कि हमारे भाई कहते हैं कि ईश्वर को मनुष्यों ने बनाया है। मनुष्यों ने ईश्वर बनाकर पूजना शुरू कर दिया। लेकिन पशुओं ने ईश्वर नहीं बनाए। इसलिए पशु न ईश्वर को मानते हैं और न पूजते हैं।

आस्तिक मुस्कराया। और बोला - इस बात पर मैं तुमसे कुछ सहमत हूँ।

इस तरह से अनेक बातें हुईं। नास्तिक कि अडिगता को देखकर आस्तिक की समस्या बढ़ गई। सोचने लगा कि यह अडिगता भले ही निराधार और अज्ञान व अंहकार वश ही है। पर इतनी बड़ी है कि सामान्य आस्तिक को बिचलित कर सकती है और कर भी देती है। उसने कई आस्तिकों के विश्वास को डिगते हुए देखा था। कई आस्तिक न चाहते हुए भी इसी अविश्वास की अचलता को देखकर नास्तिक बन जाते हैं। लेकिन इनमें से कई ऐसे हैं जो मंदिर जाया करते हैं। कहते हैं कि मैं ईश्वर को नहीं मानता फिर भी मंदिर चला जाता हूँ। जब मानते ही नहीं तो आयें अथवा न आयें क्या फर्क पड़ता है ? कई आस्तिक भी विश्वास और अविश्वास के चक्कर में जीते जा रहे हैं।

इधर नास्तिक भी कुछ तनावग्रस्त हो चला। आस्तिक के तर्क से उसके अंदर कुछ चल रहा था। लेकिन वह प्रकट नहीं कर रहा था। आखिर में बोला सुनो मैं नास्तिक हूँ। नास्तिक। और इसलिए ही मैं भगवान को नहीं मानता हूँ। नास्तिक का यही मतलब होता है कि जो भगवान को न माने। मैं न मानता हूँ और न ही मानूँगा। दुनिया बनाने वाला कोई है भी तो मैं क्या करू। उससे मेरा क्या वास्ता ? वह क्या कर लेगा ?

ईश्वर नहीं है। है भी तो मैं नहीं मानूँगा। नहीं मानूँगा। क्योंकि मैं नास्तिक हूँ। लेकिन ईश्वर है ही नहीं। फिर मानूँ या न मानूँ। मैं कदापि नहीं मानूँगा। जिसे मानना हो वह माने। मैं क्यों मानूँ। क्योंकि मैं नास्तिक हूँ।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.)।

URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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(चित्र - अमरेन्द्र, aryanartist@gmail.com,  फतुहा पटना की कलाकृति)

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