”काज़िम” जरवली का आलेख - वन्दे मातरम्

image

वन्दे मातरम

-------------

बात सच्ची हो तो चाहे जिस ज़बा में बोलिये,

फर्क मतलब पर नहीं पड़ता है ख़ालिक़ कि क़सम।

"माँ के पैरो में है जन्नत" क़ौल है मासूम का,

मैं मुसल्ले पर भी कह सकता हूं “वन्दे मातरम”।। --”काज़िम” जरवली

उपरोक्त पंक्तियाँ इमाम बुखारी द्वारा अन्ना हजारे के आन्दोलन को सांप्रदायिक रंग देने के विरोध मे कहीं थी। जैसा की विदित है की इमाम बुखारी ने अपील की थी कि मुसलमान आन्दोलन का विरोध करे क्योंकि वहां वन्दे मातरम कहा जा रहा है। कवि ने यहाँ मुस्लिम दृष्टिकोण साफ़ करने की कोशिश की है।

पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ने फ़रमाया है कि "जन्नत माँ के पैरों के नीचे है" अतार्थ माँ वन्दनीय है। यह एक साफ़ मुस्लिम दृष्टिकोण है। किसी आन्दोलन में भाग लेना या विरोध करना एक निजी फैसला हो सकता है, लेकिन धर्म के नाम पर इसका विरोध निन्दनीय हैं; और वन्दे मातरम कहने में इस्लामिक दृष्टिकोण से कोई बुराई नहीं है।

वन्दे मातरम का मतलब है की हे माँ आप पूज्य हैं और वास्तव में माँ पूज्य है। माँ को पूजनीय कहने में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह केवल शब्दों का हेरफेर भर है वरना किस मुसलमान के लिए माँ पूजनीय नहीं है अर्थात सब पूजनीय मानते हैं।

केवल इस वजह से माँ को पूज्य मानने से इनकार के यह शब्द (वन्दे मातरम) हिंदी में कहे गए हैं, इसे केवल एक संकीर्ण मानसिकता ही कहा जा सकता है। कवि के अनुसार वे इसे मुसल्ले (नमाज़ पढने का पवित्र कपडा) पर भी कह सकते है, क्योंकि माँ को पूज्य होने का दर्जा उसी पैग़म्बर ने दिया है जिसने नमाज़ पढने को कहा है। यह कहाँ का तर्क है कि एक कहा मानें और एक कहा न मानें।

माँ को पूज्य मानने या कहने का मतलब यह कदापि नहीं कि उसको भगवान् मान लिया है; और वो हमारे कहते ही अब ईश्वर हो गयी; और ये दो ईश्वरवाद का सिद्धांत हो गया। हे संकीर्ण मानसिकता वालों माँ को भगवान् हिन्दू भी नहीं मानते, बल्कि कोई धर्म माँ को ईश्वर नहीं मानता। हिन्दू धर्म में मातृभूमि को माँ का दर्जा दिया जाता है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। देश से प्यार करना एक गर्व की बात है। कोई नास्तिक भी इसका विरोध नहीं कर सकता। भगवान् के मानने वालों की तो बात अलग। यहाँ पर यह विदित रहे इसलिए मुस्लिम इतिहास का हवाला दिया जा रहा कि पैग़म्बर मुहम्मद ने अपने जीवन में सिर्फ एक बार आक्रमण किया। यह आक्रमण मक्का जो उनकी मात्रभूमि थी उसमें रहने का हक़ पाने के लिए किया गया था। इस्लाम में भी देशप्रेम की भावना को उचित और ज़रूरी बताया गया है।

यहाँ पर प्रकट विचारों का अभिप्राय किसी धर्म विशेष को अच्छा बुरा बताना या किसी आन्दोलन को सही या गलत क़रार देना नहीं है। बल्कि धर्म के नाम पर नफरत व द्वेष का वातावरण न पैदा होने देना है। यदि कोई इन निजी विचारों से सहमत नहीं है तो वह इसके लिए बाध्य भी नहीं है।

हमारा विनम्र निवेदन यही होगा की न बुखारी को माने न तोगड़िया के उग्र भाषणों से प्रेरित हों, बल्कि अपने अन्दर बैठे विकेक का प्रयोग करें तब सही या गलत का निर्णय लें।

धन्यवाद।

gulamca@gmail.com

3 टिप्पणियाँ "”काज़िम” जरवली का आलेख - वन्दे मातरम्"

  1. आपके विचार अत्यन्त संतुलित हैं, कुछ नेता आम मनुष्यों को भड़काते हैं. आपका वक्तव्य सुन्दर और प्रासंगिक है, मुसलमान भारत के लिये जागरुक हैं और देशभक्त भी. "वन्दे मातरम"

    उत्तर देंहटाएं
  2. भाई काज़िम जरवली ने जिस निर्भीकता के साथ अपने विचार प्रस्तुत किये हैं, वे अति महत्त्वपूर्ण हैं...एकदम संतुलित अभिव्यक्ति!

    निश्‍चित रूप से यह आलेख किसी मुस्लिम लेखक ने नहीं, बल्कि एक भारतीय लेखक ने लिखा है। धर्म के तथाकथित अलम्बरदारों/ध्वजावाहकों को अपनी सनातन ‘कूप-मण्डूकता’ से अब तो बाहर आ जाना चाहिए...दुनिया बड़ी तेज़ी से बदल रही है।

    काज़िम भाई...आपकी चिंतन-शैली नमन एवं लेखन-धर्म के सफल निर्वाह को प्रणाम!

    उत्तर देंहटाएं
  3. - शुकून मिलता है यह जानकर कि'काजिम जरबली'जैसे सुलझे विचारों
    वाले व्यक्ति मैजूद है,सही है --ना बुखारी की सुने,ना तोगड़िया की.

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.