प्रभुदयाल श्रीवास्तव की चार रचनाएं : नया साल

नया साल आ चुका है चुनौतियां देता हुआ | प्रस्तुत हैं चार छोटी रचनायें

[1]

कूद कूद कर आ जाता है

साल और दर साल

आता है तो आने भी दो

इसका नहीं मलाल

सोच समझ कर इसी बात का

मंथन करना है

आकर हमें दिया क्या करता

नया साल हर साल

 

[2]

लूट डकैती मारामारी

होते हैं हर साल

दंगे होते डंडे चलते

होता रोज बवाल

नये साल में रोक लगेगी

कौन सोचता है

इस पर किसने किसी तरह के

कभी उठाये सवाल?

 

[ 3]

उनको कौन पकड़ सकता है

कौन माई का लाल

जिसको चाहे गेंद बना दें

जिसे चाहे फुटबाल

अफसर नेता धनवालों की

यह तिकड़ी ऐसी

ऊपर से नीचे तक इनका

फैला रहता जाल

 

[4]

स्वच्छ धुले कपड़ों में होता

इनका ऊंचा भाल

इसी आड़ में करते रहते

नित नित नये कमाल

इन्हें पकड़ना आसमान के

तारे जैसा है

इनके तार जुड़े रहते हैं

दिल्ली और भोपाल

2 टिप्पणियाँ "प्रभुदयाल श्रीवास्तव की चार रचनाएं : नया साल"

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