अनुराग तिवारी की कविता - शहर पसारे पाँव

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शहर पसारे पाँव,
सिकुड़ते गाँव।
हाकिम पहुँचे चौपालों पर,
एक नया फ़रमान लिए,
ले लो यह नोटों की गड्डी,
अब ग्राम भूमि सरकारी है।


यहाँ बनेगी फ़ैक्टरी,
अस्पताल, स्कूल,
सबको काम मिलेगा भइया,
दुर्दिन जाओगे भूल।
खेती, खलिहानी सब छूटी,
फूले हाथ, पाँव।
शहर पसारे पाँव,
सिकुड़ते गाँव।


भूपतियों से इतर गाँव में
ऐसे भी थे,
सरकारी खसरों में जिनके
नाम नहीं थे।
कहलाते मज़दूर,
गाँव में ही रहते थे,
खेतों में मज़दूरी करके
जीवन यापन करते थे।
कौन सुने अब उनकी पीड़ा,
कहाँ मिलेगी ठाँव।
शहर पसारे पाँव,
सिकुड़ते गाँव।


उद्घाटन को मंत्री आये,
साथ में मेला ठेला था,
सरकारी वादे थे लेकिन,
गाँव का एक न धेला था।
उस पर, यह क्या, बनते दिखते,
फ्लैट, इमारत आलीशान,
मंहगे होटल, शॉपिंग मॉल,
जहाँ बसें शहरी धनवान।
जाने कब तक छला करेगा,
गाँवों को सरकारी दाँव।
शहर पसारे पाँव,
सिकुड़ते गाँव।


सी ए. अनुराग तिवारी

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