शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

अरूणिका भटनागर की दो कविताएँ

hari bhatnagar 001 (Mobile)

अजन्मी माँ

जब भी
किसी माँ के पेट में
बेटी आती है,
माँ-बाप की मुस्कान
क्यों चली जाती है?
बेटी ही तो एक दिन
बनती है बहन,
बाँधती है रक्षा-सूत्र।


बेटी ही बनती है - माँ।
बेटा और बेटी
देन है विधाता की।
मत कीजिए खिलाफत,
वरन् समाज में
आ जाएगी आफत।
बेटियाँ अजन्मी रह जाएँगी,
नव वधुएँ कहाँ से आएँगी?
किसे कहोगे - माँ ...!
जो इन्सान की जन्मदात्री है।

और वह लोग
जो बेटियों की करते हैं भ्रूण हत्या
वह जानवरों से भी गए बीते हैं,
राक्षसी-संस्कृति में जीते हैं!
' बेटी ' रूपी की अस्थिरता के
भक्षक और तक्षक हैं।


शायद,
ऐसे हैवानों की
' माँ ' नहीं होती,
उनकी कोई
बहन, बेटी नहीं होती!
वे पैदा हुए होंगे क्या
बिना ' माँ ' के? '
अरे, भारत तो
देवियों का देश है।


यहाँ देवियों को
कहते हैं ' माँ '।
बनाए जाते हैं
' माँ ' के मंदिर।
' माँ ' भारत की संस्कृति है,
संस्कारों की पहचान है,
अस्थिरता है।
' माँ ' भारत में युग-युगों से
गौरव-गर्विता है।

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नियति उस नारी देह की

एक साँवली लड़की,
एक बावली लड़की,
थोड़ा शरमाती -सी,
थोड़ा सकुचाती -सी।


प्यारी -सी, भोली-सी,
लगता कुछ बोली -सी,
माँगती थी काम क भी
हाँ, वह मुँहबोली -सी।


किससे प्यार करती थी,
क भी न बताती सी,
प्रसव -काल में आ -
उपचार वह कराती थी।


डाँटा कई बार उसे,
प्यार से समझाया भी,
समय -काल है खराब
मैंने बतलाया भी।


वादा कर जाती थी
अब क भी न आऊँगी,
उस निष्ठुर प्रियतम से
नेह न लगाऊँगी।

लेकिन कुछ रोज बाद
फिर वैसी आ जाती,
कहती, '' वह आएगा,
मुझको ले जाएगा। ''


'' बहुत प्यार करता है,
कभी न झगड़ता है,
नौकरी लग जाने दो-
बस यही कहता है। ''


मगर मैं उस दिन को
आज तक न भूल पाई,
वह नारी-देह खड़ी
जब द्वार पर लजाई।


हाँ, कि उसकी वाणी में
अन्तहीन दर्द था,
छल गया उसे वह ही
मर्द जो बेदर्द था।


आज के इस दौर की
वह एक सच्चाई थी,
निस्पृह अनुराग में
मिली बेवफाई थी।


तन पर थे बेढंग के
कटे-फटे तंग वस्त्र,
अस्मिता की रक्षा को
पास थे न कोई शस्त्र।

पल रही थी पेट में
प्यार की निशानी थी,
छली हुई देह-दृष्टि,
लगती. पाषाणी थी।


गले में था मंगल -सूत्र,
विश्वास की डोर-सा,
घात-प्रतिघात का -
दर्द ओर-छोर था।


पर अब भी आशा थी
वह छलिया आएगा,
नौकरी के मिलते ही -
आकर अपनाएगा।


किन्तु प्रसव -काल में
दर काल गया जीत,
काल के कपाल पर-
गूँज उठा मृत्यु गीत।


फिर भी उसे देखने
आया न कोई गीत,
माटी में जा सोई,
मौत से न पाई जीत।


विश्वास गया हार
स्वप्न हुआ तार-तार,
बसने से पहले ही -
उजड़ गया ' संसार।

---=---

(चित्र - हरि भटनागर की कलाकृति)

1 blogger-facebook:

  1. बसने से पहले ही उजाड गया संसार .....वाह बहुत सुंदर कविता दूसरी कविता इतनी सुंदर है और एकदम पूर्ण है बधाई | भाव पक्ष पहली भी काफी मजबूत नजर आया लेकिन कहीं कहीं बिखराव है | सुधार की जरुरत है |

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