प्रभुदयाल श्रीवास्तव की कविता : कह रही थी चीखकर मैं सत्य की परछाईं हूं

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स्वस्थ थी अच्छी भली थी डाक्टरों ने मार डाला
डाक्टरों की ही चली थी डाक्टरों ने मार डाला।
 
लाख कोशिश की बचा लें हम किसी लाचार को
दाल उनकी ही गली थी डाक्टरों ने मार डाला।
 
रोज‌ स‌म‌झाया ह‌ज़ारों बार‌ त‌क‌ ताकीद‌ की
आज‌ रोटी फिर‌ ज‌ली थी डाक्टरों ने मार डाला।
 
आज‌ जिस‌को रौंदक‌र‌ हंस‌ते हुये स‌ब‌ आ ग‌ये हैं
अध‌खिली ही व‌ह‌ क‌ली थी डाक्टरों ने मार डाला।
 
एक‌ डाली पेड़‌ की जो आज‌ सूखी दिख‌ र‌ही है
व‌ह‌ क‌भी फूली फ‌ली थी डाक्टरों ने मार डाला।
 
ये पसीना और बदबू और हम कितना चलें अब‌
धूप में भी खलबली थी डाक्टरों ने मार डाला।
 
कह रही थी चीखकर " मैं सत्य की परछाईं हूं "
राह में रोती डली थी डाक्टरों ने मार डाला।

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2 टिप्पणियाँ "प्रभुदयाल श्रीवास्तव की कविता : कह रही थी चीखकर मैं सत्य की परछाईं हूं"

  1. बेनामी6:30 pm

    Acchii rachana
    P.N. Shrivastava sagar

    उत्तर देंहटाएं
  2. "डाक्टरों ने मार डाला" ..से..का क्या अर्थ है लेखक का ??...अस्पष्ट भाव हैं...अपितु अनर्थक भाव हैं...

    उत्तर देंहटाएं

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