विजय पाटनी की कविताएँ

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जरा समय निकाल कर आ...

तेरे मेरे दरमियान कुछ बातें , अधूरी पड़ी हैं

जरा समय निकाल कर आ

थोड़े मेरे "लफ्ज" ले जा ,थोड़े अपने "गम" दे जा।।

बमुश्किल खुशियाँ जोड़ी हैं, तेरे इंतजार में

जरा समय निकाल कर आ

मुझे आंसू दे जा , अपनी खुशियाँ ले जा।।

कुछ त्यौहार अधूरे पड़े हैं , तेरे इंतजार में

जरा समय निकाल कर आ

अपने पीने की वजह ले जा , मुझे जीने की वजह दे जा।।

उन गलियों में , हमारे कुछ पुराने किस्से रखे हैं

कुछ इल्जाम तो ले लिए मैंने अपने सर

बाकी कुछ तेरे हिस्से रखे हैं।

जरा समय निकाल कर आ

अपना इनाम ले जा, मुझे और इल्जाम दे जा।।

पिछली बात का जख्म , अब भी हरा है

आँखों में, आंसुओं का ,समन्दर भरा है

उन जख्मों को कुरेदने के बहाने आ

अपन हक ले जा , मुझे और जख्म दे जा।

तेरे मेरे दरमियान कुछ बातें , अधूरी पड़ी हैं

जरा समय निकाल कर आ

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२.

तुम हमें क्या रुलाओगे?
आंसू हमारी और आते आते , खुद ही मुस्कराने लगते हैं।

हम चाँद को छेड़ देते हैं , सूरज के साये में
तुमको अब भी , हम सयाने लगते हैं ?

दर्द की बात मत करना, ना ही जख्म देना हंसी कोई
जब गम होते हैं ज्यादा दिल में , हम लोगों को हंसाने लगते हैं।

मुझे याद करना हर पल , मैं हिचकियों से घबराता नहीं
पर मुझे याद ना आना , हमें भूलने में ज़माने लगते हैं।

मेरी तस्वीर देख कर , अपना इरादा बदल ना लेना
हम सूरत से , कुछ पागल दीवाने लगते हैं।

तुम फूल हो, तो हमें fool बनाने की, गुस्ताखी ना करना
हम मूडी हैं , जब मन किया, खुद को ही सताने लगते हैं।

तुम बाग़ में रहो या घने जंगल में , परवाह किसे है?
जब मन भर जाएँ फूलों से , हम काटों से रिश्ते बनाने लगते हैं।

तुम हमें क्या रुलाओगे ?
आंसू हमारी और आते आते , खुद ही मुस्कराने लगते हैं।

विजय पाटनी

नसीराबाद राजस्थान

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