सोमवार, 30 जनवरी 2012

विजय पाटनी की कविताएँ

image

1

जरा समय निकाल कर आ...

तेरे मेरे दरमियान कुछ बातें , अधूरी पड़ी हैं

जरा समय निकाल कर आ

थोड़े मेरे "लफ्ज" ले जा ,थोड़े अपने "गम" दे जा।।

बमुश्किल खुशियाँ जोड़ी हैं, तेरे इंतजार में

जरा समय निकाल कर आ

मुझे आंसू दे जा , अपनी खुशियाँ ले जा।।

कुछ त्यौहार अधूरे पड़े हैं , तेरे इंतजार में

जरा समय निकाल कर आ

अपने पीने की वजह ले जा , मुझे जीने की वजह दे जा।।

उन गलियों में , हमारे कुछ पुराने किस्से रखे हैं

कुछ इल्जाम तो ले लिए मैंने अपने सर

बाकी कुछ तेरे हिस्से रखे हैं।

जरा समय निकाल कर आ

अपना इनाम ले जा, मुझे और इल्जाम दे जा।।

पिछली बात का जख्म , अब भी हरा है

आँखों में, आंसुओं का ,समन्दर भरा है

उन जख्मों को कुरेदने के बहाने आ

अपन हक ले जा , मुझे और जख्म दे जा।

तेरे मेरे दरमियान कुछ बातें , अधूरी पड़ी हैं

जरा समय निकाल कर आ

---

२.

तुम हमें क्या रुलाओगे?
आंसू हमारी और आते आते , खुद ही मुस्कराने लगते हैं।

हम चाँद को छेड़ देते हैं , सूरज के साये में
तुमको अब भी , हम सयाने लगते हैं ?

दर्द की बात मत करना, ना ही जख्म देना हंसी कोई
जब गम होते हैं ज्यादा दिल में , हम लोगों को हंसाने लगते हैं।

मुझे याद करना हर पल , मैं हिचकियों से घबराता नहीं
पर मुझे याद ना आना , हमें भूलने में ज़माने लगते हैं।

मेरी तस्वीर देख कर , अपना इरादा बदल ना लेना
हम सूरत से , कुछ पागल दीवाने लगते हैं।

तुम फूल हो, तो हमें fool बनाने की, गुस्ताखी ना करना
हम मूडी हैं , जब मन किया, खुद को ही सताने लगते हैं।

तुम बाग़ में रहो या घने जंगल में , परवाह किसे है?
जब मन भर जाएँ फूलों से , हम काटों से रिश्ते बनाने लगते हैं।

तुम हमें क्या रुलाओगे ?
आंसू हमारी और आते आते , खुद ही मुस्कराने लगते हैं।

विजय पाटनी

नसीराबाद राजस्थान

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------