मंगलवार, 10 जनवरी 2012

रघुनंदन प्रसाद दीक्षित 'प्रखर' की कविताएँ

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गीतिका

कभी तुम शाम की रंगत कभी हो प्रात की शबनम ।

तुम्हीं से रंग जीवन के तुम्हीं से होते सब गम बेगम ।।

कभी माशा कभी तोला कभी लगे अंगार जीवन में ,

कभी नदिया का शीतल जल कभी कर दे दम बेदम।।

दिखेंगे रंग सब इनमें तुम्हारे जो चाह मन में हो ।

जोरु जर जमीं तब तक जब तक शक्ति तन में हो।।

अब्र सा वो भी बरसेंगीं नजर हो नब्ज पर हर दम

उडा देंगी वो ख्वाबों को अगर गोली-गन में हो।।

उन्हें तो शाम की चाहत हमें है यह भोर सुखदायी।

यही सच द्वन्द का कारन नेह की आंख भर आयी।।

सरल है व्याकरण कितना नेह की इस पाठशाला में ,

तुम्हारी मैं हमारी तुम-मान लो, मिल बात सैदायी ।।

--

 

जिस नेता से प्रश्न करोगे वही कहेगा क्यों भाई ?

बेजा मंहगाई को रोते कहाँ, किधर है मंहगाई ।।

कहते सौ दिन काम दे रहे गारंटी है शिक्षा की।

फिर भी रोना रोज रो रहे दृश्यावलि है भिक्षा की।।

यही रहनुमा घुटी पिलाते,

आशा आफत बन आयी ।।

बजट पात्र में छिद्र अनेकों लगुआ भगुआ ताक रहे।

खा जायें सब माल मलाई लेकिन दामन साफ रहे।।

अज्ञान अशिक्षा अंधकार की,

लोक बीच रखते खाई।।

वजीर निरंकुश मोटे बिल्ले शोषक वृत्ती मनमानी।

होगी सेज कैदखाने में दे रही् बददुआ 'वो' छानी।।

चाल चरित कौतुक अति बेढब,

क्यों न समझे ,अब तक भाई।।

सोने की चिडिया था भारत विश्वगुरू पहचान बनी।

कैसै अपनी भरें तिजोरी ये ही मित्रों होड ठनी।।

'प्रखर' जुगाली इनके जुमले,

यह लडवाते नित भाई।।

 

हार का विश्वास

हारा नहीं हूँ अभी,

थकना कोई धर्म न।

गिरना,गिरकर संभलना

रुकना मेरा कर्म न।।

वर्षें गयीं अज्ञान में

समझा कोई मर्मन।

इंसानियत इक धर्म हो

द्वन्द कोई धर्म न।।

 

(2)

हुक्मरानों को पता !

हर आम-ओ-खास पर उनका असर है।

खिचडी पकने में अभी कुछ कसर है।।

बढती कीमतें रोजमर्रा चीजों की आज,

हुक्मरानों को पता! कैसे होती बसर है।।

इतना भी नाउम्मीदी का मंजर नहीं यारों,

हर शाम के बाद एक मुकम्मल सहर है।।

हर तरफ दहशत,कत्लोगारद,लूट का साया ,

आतंकी आग से कौन सा अछूता शहर है।।

हंसी ओंठों पर बातों में मिसरी धुली देखें ,

'प्रखर'उनके दिलों में कैसा घुला जहर है।।

 

कथ्य तथ्य पर हावी

आलिंगन गुल्मों सा देखा ,

किन्तु प्रेम के अक्ष नहीं है।

तन्हाँ-तन्हाँ आंसू सिसके

कहिं बूढे वट के वृक्ष नहीं हैं।।

तथ्य हो गये दुर्लभ कौडी

कथ्यों के बाजार सजे,

कथ्य तथ्य पर हावी होकर

ओढ नग्नता करे मजे,

चाटुकार की सजी सभाऐं

स्वाभिमान अध्यक्ष नहीं है।।

उजली खादी मैली शोहरत

प्राचीरों में सिसके आहें,

किया भरोसा जिन पर हमने

लहू सनी उनकी गलबाहें,,

इनका उजलापन मरीचिका,

लेकिन उजला पक्ष नहीं है।।

आस्तीन के सर्प विषैले,

आस्तीन कुतरें की काटीं,

जिस पर तगमा रहनुमाई का

उसने जमी प्रेम की बांटी,

चेत 'प्रखर'मंतव्य भांप लो

दुष्टवृत्ति निष्पक्ष नहीं है।।

 

खुदायी की बरसात

प्रेम कभी होता दक्षिण तो कभी बाम है।

कभी भोर का सूरज तो कभी शाम है।।

कभी तौला तो लाखों भी कमतर लगते,

कभी कौडी के मोल सा प्रेम बेदाम है।।1।।

कभी लगी सहर की शबनम सी सुहानी,।

दिले अजीज कभी नियतें लगती बेगानी।

होती कभी दौलते जहां हमें जिन्दगी की,

हो गयी कभी भूल तो किरदारे नादानी।।2।।

जाने कब दुश्मनों की बिसात बिछ जाए।

इस जिन्दगी की जाने कब रात हो जाए।।

रखो तमन्ना, मेहनत और भरोसा 'उस' पर,

किस लम्हें खुदायी की बरसात हो जाए।।3।।

कभी खुशियों का संबल बना करता।

कभी गमों के संग आहें भरा करता।।

कर लो लाख कोशिशें छूटने की यारो,

खुली आंखें में ख्वाब सा रहा करता।।4।।

किसी को प्रेम आतिश का शोला है।

सावन में सुकून का ठन्डा ओला है।।

बगावत पे उतरा तो निश्चित जानो,

हदों का बरसता ये तूफानी गोला है।।5।।

ये सही, कि वक्त ठहरा है न कभी।

बिन जागे ये अपना हुआ है न कभी।।

गर पहचानते किरदारे वक्त पर,तो-

दुश्वारियों से सामना होता न कभी।।6।।

--

रचनाकार कनिष्ठ सैन्य अधिकारी हैं।

 

डा0 रघुनंदन प्रसाद दीक्षित 'प्रखर'

सूबेदार मेजर(से.नि.)सेना पुलिस

शांतिदाता सदन

नेकपुर चौरासी फतेहगढ

जनपद फर्रुखाबाद (उ0प्र0)

पिन 209601

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