मंगलवार, 17 जनवरी 2012

अरविन्‍द कुमार का आलेख - लोगों के विचार बदल रहे हैं

लोगों के विचार बदल रहे हैं

डॉ. अरविन्‍द कुमार

जकल जैसे लोगों की सोचने समझने की क्षमता मरती चली जा रही है। या आप यूं कह सकते हैं लोग अब सोचना ही नहीं चाह रहे हैं। अंग्रेजी में इसे (थिंकिंग) कहते हैं। सहज रूप में समझ भी लेते हैं। लेकिन यदि हिन्‍दी में शब्‍द इसके लिए विचार(थाट) रखें तो इससे सब लोग परिचित है। अमूमन जब किसी जगह खुली बहस या परिचर्चा का आयोजन होता है। तो आयोजक सभी प्रतिभागियों से उनकी अपनी राय जानना चाहता है। लेकिन इस प्रकार से लोगों के वे शब्‍द 'वाक्‍य' विचार का ही प्रतिरूप होता है। खैर मैं आपको दूर तक नहीं 'पैराऊँगा'। पैराऊँगा शब्‍द अवधी का है। हिन्‍दी में इसका तैराऊँगा होगा।

मुझे लगता है आज कल दो ही लोग अधिक सोचते हैं। नेता और बुद्धिजीवी (बौद्धिक एवं लेखक )वर्ग। नेता इस लिए सोचते हैं किस तरह से 'वोट' पाकर विधान सभा या 'लोक सभा'में पहुंचा जाए। और मंत्री पद प्राप्‍तकर 'सत्‍ता' में बना रहा जाय। उसके लिए उन्‍हें चाहे कोई भी हथकन्‍डा अपनाना पड़े। जरा भी 'पार्टी' में अनबन हो जाय फिर का इस पार्टी से उस पार्टी छलांग लगा दी। उनके लिए पार्टी की 'वैचारिकता' क्‍या है कोई मायने ही नहीं रखती। मायने सिर्फ यह रखता है अब इस पार्टी में गुजारा नहीं ।एक पार्टी के नेतागण नहीं सभी पार्टियों के नेताओं का यही हाल। ज्‍यादा कुछ बोलेंगे तो समझो अलग पार्टी का गठन । यह मिला आपको 'नया विचार'। सत्‍ता कहा कि या झूठ निर्णय आप करें। यह अपनी सत्‍ता में भागीदारी सुनिश्‍चित करता है 'जाति' पर सबके अपने अलग-अलग विचार अब किसको कहा जाय सबमें तो सब 'जाति' के लोग, विविधता में एकता हमारी पहचान यही उनका विचार । अपनी अपनी जाति का विकास करो उनका नारा और विचार कर 'सूत्र 'जिसे सोशल इंजीनियरिंग कहा जा रहा है आप इसे क्‍या मानेंगें 'सोशल इंजीनियरिंग' या 'कास्‍ट इंजीनियरिंग' या 'कास्‍ट मार्केटिंग' का रीयल कारोबार । ये विचारों में बदलाव आ रहा है।

दूसरी ओर बुद्धिजीवी वर्ग सोच रहा है कैसे आगे बढ़ा जाय आगे बढे़ हुए से कैसे आगे निकला जाए। चूंकि बुद्धिजीवी वर्ग सबसे पहले अपना भला सोचता है। जिस कार्य में उसका लाभ नहीं उसमें वह हाथ ही नहीं डालता हाथ डाल भी दिया तो जैसे लगा उसे घाटा होगा तुरन्‍त हाथ खींच लेगा। यही उसकी फितरत है फिर क्‍यों सोचते हो उसने ऐसा क्‍यों किया ! लाभ की दुनिया है जिधर लाभ नहीं उधर कौन जायेगा जिसे अंग्रेजी में 'बेनीफिट' कहते हैं अक्‍सर हमारे मित्र कहा करते हैं आप उनकी मदद क्‍यों करते हैं इससे आपको क्‍या लाभ। मेरा जवाब होता मेरा लाभ या हानि से क्‍या मतलब लाभ एवं हानि साथ चलता है मुझे तो बेनीफिट होता है। मैं सदैव प्‍लस में रहता हूँ तब वे कहते तुमसे बातों में कोई नहीं जीतेगा। अब बताओ इसमें मेरी क्‍या गलती है।

इन्‍सान तो सब जगह लाभ ही ढूंढ़ता है हानि की वह बात सोचता ही नहीं पसन्‍द करता है जिससे लोग नकारात्‍मक सोच'निगेटिब थिंकिंग' कहते हैं। यदि हानि कोई उठाता है मुझे लगता है वह ईश्‍वर। क्‍यों कि वही सब को समाहित कर लेता है अब कहिए विचार कर रहे हैं या लोगों के विचारों में बदलाव आ रहा है। अरे भई इण्‍डिया के लोग अब शिक्षा में आगे बढ़ रहे हैं बदलाव तो आयेगा ही।

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सम्‍पर्कःअसि0प्रोफेसर (हिंदी)

राजकीय महिला महाविद्यालय

ढ़िढुई,पट्‌टी,प्रतापगढ़(उ0प्र0½

eks0u0 09451143511

email:drdivyanshu.kumar6@gmail.com

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  1. आदरणीय डॉ साहब आपका सुंदर आलेख विचारोतेजक एवं संग्रहणीय है हार्दिक बधाई |

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