सोमवार, 16 जनवरी 2012

प्रमोद भार्गव का आलेख - संस्‍कृत, भारत की आत्‍मा !

दिल्‍ली में संपन्‍न हुए पन्‍द्रहवें विश्‍व संस्‍कृत सम्‍मेलन के उद्‌घाटन समारोह में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने संस्‍कृत को भारत की ‘आत्‍मा' बतलाते हुए, संस्‍कृत की महत्ता व महिमा के दृष्‍टिगत कई महत्‍वपूर्ण बातें कहीं। उन्‍होंने कहा, संस्‍कृत दुनिया की सबसे प्राचीनतम जीवंत भाषाओं में से एक है। यदि हम इसकी टूटी हुई कड़ियों को जोड़ने और बहुविषयक पहल को आगे बढ़ाते हैं तो संस्‍कृत में वर्तमान ज्ञान-प्रणाली और भारतीय भाषाओं को समृद्ध बनाने की अद्‌भुत क्षमता है। उन्‍होंने संस्‍कृत को नकारने की कमजोर नब्‍ज पर हाथ रखते हुए बड़ी साफगोई से कहा इस भाषा के बारे में ऐसी गलत धारणा बन गई है कि इसे केवल धर्म, उपासना और रीतियों से जोड़कर देखा जाने लगा। ऐसी धारणा कौटिल्‍य, चरक चार्वाक, आर्यभट्‌ट, सुश्रुत, वात्‍स्‍यायन, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्‍त, भास्‍कराचार्य, पंतजलि और अन्‍य कवियों, चिंतकों व लेखकों के मर्म को नजरअंदाज करने के अलावा इसकी मूल उपादेयता के साथ अन्‍याय है। किंतु इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि संस्‍कृत के महत्‍व को संस्‍कृत से जुड़े पर्वों के अवसर पर औपचारिक पुनरावृत्ति कर कर्तव्‍य की इतिश्री कर दी जाती है। संस्‍कृत साहित्‍य के सागर से मोती कैसे बटोरे जाएं, इस उद्‌देश्‍य के प्रति जिज्ञासा और चेष्‍टा अपेक्षाकृत गौण ही रहती है। यही कारण है कि संसक्‍ृत की भाषाई सामर्थ्‍य, बहुविषयक देनें और वैज्ञानिक उपलब्‍धियों को बेहतर व सिलसिलेबार ढंग से रेखांकित किए जाने की स्‍वतंत्रत भारत में शुरूआत ही नहीं हुई।

इसमें कोई दो राय नहीं कि संस्‍कृत एक जीवंत भाषा है। जीवंत इसलिए है, क्‍योंकि इसमें प्रवाह है। संस्‍कृत में यदि प्रवाह और ग्राह्यता नहीं होती तो देश के करोड़ों लोग जो निरक्षर हैं, विविध भाषी एवं विविध बोलियों से आते हैं, वे रामायण, महाभारत, गीता और अनेक संस्‍कृत के नीति ग्रंथों के रहस्‍य को जानते हैं और उनके मर्म से आत्‍मसात हैं। बहुसंख्‍यक लोगों की दिनचर्या इन्‍हीं ग्रंथों के दृष्‍टांत से अनुशासित होती है। सामाजिक लोकाचार में सही-गलत क्‍या है, इसके निर्णय में इन्‍हीं ग्रंथों के उदाहरण पथ-प्रदर्शक बनते हैं। इसीलिए राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी ने सभी भारतीयों के लिए संस्‍कृत पढ़ने की अनिवार्यता जताई थी। संस्‍कृत की इसी विलक्षणता को रेखांकित करते हुए भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद 351 में कहा गया है कि केंद्र हिन्‍दी के प्रसार को बढ़ावा देने की जरूरत पड़ने पर हिन्‍दी शब्‍द-कोष में संस्‍कृत शब्‍दों को शामिल करेगी। वैसे भी हमारी बोलियों और अन्‍य राज्‍य प्रमुख व क्षेत्रीय भाषाओं के शब्‍द-भण्‍डार में ज्‍यादातर शब्‍द संस्‍कृत से ही लिए गए हैं। संस्‍कृत की इसी संस्‍कारजन्‍य व्‍यापकता को स्‍वीकारते हुए महात्‍मा गांधी ने 20 मार्च 1927 को हरिद्वार की राष्‍ट्रीय शिक्षा परिषद्‌ में बोलते हुए कहा था, ‘संस्‍कृत का अध्‍ययन करना प्रत्‍येक भारतीय छात्र का दायित्‍व है। हिन्‍दुओं का तो है ही, मुसलमानों का भी है, क्‍योंकि अंततः उनके पूर्वज राम और कृष्‍ण ही थे। अपने इन पूर्वजों को जानने के लिए उन्‍हें संस्‍कृत सीखनी चाहिए।'

किंतु मैकाले ने गुलाम भारत में भाषा नीति की जो बुनियाद रखी उसमें मट्‌ठा डालने की बजाय, स्‍वतंत्रता के छह दशक बाद भी हम खाद-पानी डालने में लगे हैं। साथ ही हमने यह भ्रम भी पाल लिया है कि विज्ञान और तकनीक में ही नहीं ज्ञानार्जन के अन्‍य क्षेत्रों में जो भी काम हो रहा है, वह पश्‍चिम में ही हो रहा है। भारत और अन्‍य पूर्वी देश तो नितांत पिछड़े हुए हैं। इसी धारणा के चलते न केवल भारतीय भाषाओं की हालत नाजुक हुई, बल्‍कि समग्र राष्‍ट्रीय चेतना भी कमजोर पड़ी है। लिहाजा राष्‍ट्रीय और राष्‍ट्रबोध से जुड़े प्रतीक चिन्‍हों पर न केवल सवाल उठाए जा रहे हैं, अपितु उन्‍हें नकारा भी जा रहा है।

नकारात्‍मकता के बीज-तत्‍व शिक्षा-नीति में डालने का यह काम मैकाले पहले ही कर चुके थे। इसीलिए मैकाले ने अंग्रेजी पढ़ने पर उतना जोर नहीं दिया, जितना संस्‍कृत और भारतीय भाषाओं के महत्‍व को अस्‍वीकारने पर दिया। मैकाले मिनिट्‌स में लिखा भी है, ‘यदि आप भारत में ऐसी युवा पीढ़ी का निर्माण करना चाहते हैं, जो न केवल अपनी संप्रभुता और सांस्‍कृतिक विरासत से पृथक हो, बल्‍कि उसके प्रति घृणा के भाव भी पनप आए, इस मकसद के लिए जरूरी है कि उसे संस्‍कृत व अन्‍य भारतीय भाषा में अध्‍यापन न कराया जाए। क्‍योंकि संस्‍कृत एक ऐसी भाषा है, जो एक देशवासी को अपनी सनातन परंपरा और राष्‍ट्र-बोध के प्रति चैतन्‍य बनाए रखती है। नतीजतन उसे अंगे्रजी शिक्षा देनी चाहिए और इस भाषा के माध्‍यम से पढ़े युवक को ही ब्रिटिश सत्ता की प्रशासनिक व्‍यवस्‍था में भागीदार बनाना चाहिए।'

इस अजेंडे पर फिरंगी हुकूमत का ठप्‍पा लगने के बाद मैकाले और उनके सहयोगियों ने बड़ी कुटिल चतुराई से भारत की ज्ञान-परंपरा पर हमला तेज कर दिया। इसी लिहाज से संस्‍कृत व सांस्‍कृतिक धरोहरें आमजन के लिए महत्‍वहीन हो जाएं, इस दृष्‍टि से संपूर्ण प्राचीन संस्‍कृत साहित्‍य को आध्‍यत्‍मिक व कर्मकाण्‍डी साहित्‍य की संज्ञा देकर, ज्ञान-विज्ञान के मंत्रों को पूजा की वस्‍तु बना देने की रणनीति चल दी। इन धूर्त उपक्रमों को हमने अंग्रेजों की कृतज्ञ उपलब्‍धियां मान लिया। जबकि हमारे उपनिषद्‌ ब्रह्मांण्‍ड के रहस्‍यों को जानने की जिज्ञासाएं हैं। रामायाण, महाभारत ऐतिहासिक कालखण्‍डों की सामाजिक, भौगोलिक, राजनीतिक, आर्थिक व युद्ध-कौशल के वस्‍तुपरक चित्रण हैं। गीता नैतिक आत्‍मबल का सटीक दर्शन है। आयुर्वेद व पंतजलि योग एवं औषधीय चिकित्‍साशास्‍त्र हैं। अठारह पुराण ऐतिहासिक क्रम में शासकों के समयकाल की गाथाएं हैं। मनुस्‍मृति, विदुर-नीति और कौटिल्‍य का अर्थशास्‍त्र वर्तमान शासन व्‍यवस्‍थाओं के संविधान हैं। वात्‍स्‍यायन का कामसूत्र अर्थ और काम विषयक अद्वितीय व सर्वथा मौलिक ग्रंथ है। चार्वाक के दर्शन ने हमें ऐसा प्रत्‍यक्षवाद दिया जो समस्‍त ईश्‍वरीय और कर्मकाण्‍डी अवधारणाओं को नकारता है। चार्वाक ने ही कहा था कि सुख के लिए ऋण लेकर भी घी पीना पड़े तो पीना चाहिए। यही आधुनिक भौतिकता है। जिसका मौजूदा आर्थिक दर्शन अमेरिका के अर्थशास्‍त्री एड्‌म स्‍मिथ ने रचा है और जिसका परचम पूरी दुनिया में नव-उदारवाद के बहाने फहराया जा रहा है। संस्‍कृत के माध्‍यम से आमजन में आत्‍मसात होने वाले संस्‍कारों के ये ऐसे उपाय थे, जिन्‍हें आचरण की थाती बनाकर बहुसंख्‍यक लोगों ने प्राकृतिक संपदा के असीमित उपभोग और माया के मोह से शताब्‍दियों से दूरी बनाए रखकर प्रकृति की देनों को प्राणी जगत के लिए अक्षुण्‍ण बनाए रखा। बुद्ध, महावीर और गांधी ने इसी संस्‍कृत के भाषायी संस्‍कार से असंचयी भाव का दर्शन अंगीकार किया।

इन सब पुख्‍ता आधारों के विशलेषण से मैकाले ने समझ लिया कि संस्‍कृत के भारतीय परिवेश में ज्ञान-परंपरा से गहरे सरोकार हैं, क्‍योंकि वह ज्ञान-मीमांसा से जुड़ी भाषा है। इसीलिए संस्‍कृत ने दुनिया के नव-निर्माण और मूल्‍यों की जड़ता को परिवर्तित करने में तीन हजार साल से भी ज्‍यादा लंबे समय तक अहम भूमिका निभाई। मानव समुदाय को संस्‍कारित करने में भाषा की क्‍या भूमिका हो सकती है, इसे बीसवीं सदी के विख्‍यात दार्शनिक विटगेंस्‍टाइन ने बेहतर ढंग से परिभाषित किया है, ‘भाषा हम बनाते हैं और भाषा को हम बदलते भी हैं। किंतु इतना ही सच नहीं है, भाषा भी हमें बनाती और बदलती है।' संस्‍कृत व हिन्‍दी समेत सभी देशज भाषाओं पर सवार होकर, अंग्रेजी आज हमें निरंतर बदलने में लगी है। क्‍योंकि अंग्रेजी योग्‍यता साबित करने का प्रतिमान तो बनी ही है, शासन-प्रशासन में रौब-रूतबे का पद हासिल करने में भी मददगार साबित हो रही है। अंग्रेजी के इस वर्चस्‍व को तोड़े बिना न तो संस्‍कृत की टूटी हुई कड़ियों को जोड़ा जा सकता है और न ही इसकी बहुविषयक पहल को समझा व अपनाया जा सकता है। अनेक विदेशी विचार और आक्रमण हमसे टकराए। हमने उनसे सामना किया और अपनी भाषाओं, संस्‍कृति व सभ्‍यता को बचाए रखा, लेकिन अंग्रेजी दासता के शिकंजे से छुटकारे के उपाय हम आजादी के साठ साल बाद भी नहीं खोज पा रहे। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह यदि वाकई संस्‍कृत को भरत की आत्‍मा मानते हैं तो क्‍या वे यह आत्‍मा अजर-अमर बनी रहे इस लक्ष्‍य हेतु कोई ठोस और कारगर उपाय भी अमल में लाएंगे अथवा उनका यह भाषण भी एक रस्म अदायगी भर रह जाएगा ?

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी (म.प्र.) पिन 473-551

ई-पता - pramod.bhargava15@gmail.com

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