मोहसिन खान की ग़ज़लें

  

ग़ज़ल

मुझको सहुलियतें न थीं,
उनको दिक्क़तें न थीं ।

हर शर्त पर सौदा तय हुआ,
चीज़ की क़ीमतें न थीं ।

उनकी ज़िंदगी कितनी अजीब,
जिन्हें कोई मुसीबतें न थीं ।

हर बार बुलंदी उनको मिली,
जिनकी ठीक हरकतें न थीं ।

उनको यक़ीं की आदत नहीं,
क्या सच अपनी बातें न थीं ।

 

ग़ज़ल

काश के ये मजबूरियां न होतीं,
तो हम में ये दूरियां न होतीं ।

बहोत बिखरा हूं तेरे बिछड़ने के बाद,
तेरे होने से ये दुशवारियां न होतीं ।

तू जो रहता पहलू में मेरे दिन-रात,
तो कैफ़ की ये ख़ुमारियां न होतीं ।

तू न होता गर उजालों के मानिन्द,
मेरी भी ये परछाइयां  न होतीं ।

तू कहता सच मेरी ही तरह,
तो ये रुसवाइयां न होतीं ।

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3 टिप्पणियाँ "मोहसिन खान की ग़ज़लें"

  1. वाह!!
    तू न होता गर उजालों के मानिन्द,
    मेरी भी ये परछाइयां न होतीं ।

    ...बहुत खूब...

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  2. .बहुत खूब..मुझको सहुलियतें न थीं,
    उनको दिक्क़तें न थीं ।

    हर शर्त पर सौदा तय हुआ,
    चीज़ की क़ीमतें न थीं ।

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  3. जनाब आप दोनों का बहोत शुकरिया !!!

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