गुरुवार, 5 जनवरी 2012

मोहसिन खान की कविता - मैं नहीं देता हूं तुम्हें.... कोई बधाई या शुभकामनाएं...

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" वक़्त अच्छा हो जाये "

कोई औपचारिकता नहीं

इसलिये बने बनाए शब्दों का

सहारा भी नहीं.....

मैं नहीं चाहता कि

बरसों के घिसे-पिटे शुभकामनाओं

के शब्दों को

फ़िर से थोप दूं तुम पर

जैसा दुनिया करती आई है ।

 

मैं नहीं देता हूं तुम्हें....

कोई बधाई या शुभकामनाएं,

"इस अशुभ समय में"

अगर दूं तो महज़ यह एक दिखावा होगा ।

 

समय की बहती नदी

और उसके माप की एक कोशिश

समय गणना (केलेंडर)

तुम्हें एक नये वक़्त का आभास देता होगा ।

 

मगर यह सच नहीं

वक़्त नहीं बदलता....

हम बदल जाते हैं

और हमारे बदलने को

वक़्त बदलना कह देते हैं ।

 

इसलिये ख़ुद को बदलो

और समय को बदल दो

समय लाता नहीं कुछ तुम्हारे लिये

तुम ही लाते हो

ख़ुद के लिये सब कुछ ।

 

इसलिये इस नये साल पर

नहीं कहुंगा, वह सब कुछ

जिसे दुनिया दोहराती है

मेरी तो इतनी ही पुकार है....

आज से हम

और भी अधिक भीतर से

हो जायें

पावन, विनत, सदय, सहज, और समर्पित

ताकि वक़्त अच्छा हो जाये !

-

ग़ज़ल

अबके जाने कैसा दौर हुआ है ।

आदमी कितना कमज़ोर हुआ है ।

 

सच की आवाज़ नहीं सकते ।

झूटों का कितना शोर हुआ है ।।

 

बचते हैं सब हरेक निगाह से ।

इंसान क्यों आदमख़ोर हुआ है ।।

 

कोइ रोशनी नहीं, बस्ती जलती है ।

किस क़दर धुंआ घनघोर हुआ है ।।

 

फ़िज़ाओं में कैसा बारूद घुला है ।

अब ये धमाका किस ओर हुआ है ।।

 

इस कहानी का कोई अन्त नहीं ।

यहां सिपाही ख़ुद चोर हुआ है ।।

--

 

डॉ. मोहसिन खान

सहायक प्राध्यापक हिंदी

जे.एस.एम. महाविद्यालय,

अलिबाग- महाराष्ट्र

--

(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  , फतुहा पटना की कलाकृति)

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