मंगलवार, 17 जनवरी 2012

गोवर्धन यादव की लघुकथा - आदमी और बंदर


"मेहरबान,,,,,कदरदान......आना....चार आना.....रात की बची बासी रोटियाँ.....फ़टा- पुराना कपडा...जो भी देना चाहें दे दीजिये.. पापी पेट का सवाल है." बंदरों का खेल दिखा चुकने के बाद मदारी ने गुहार लगाना शुरु किया था. एक आला अफ़सर अपने लान में बैठे सिगार का धुआँ उडा रहे थे. मदारी की कर्कश आवाज सुनकर उनका पारा सातवें आसमान पर जा पहुँचा. उन्होने अपने मातहत अधिकारी को बुलाकर आदेश दिया कि सारे बंदरों को मुक्त करा दिया जाये और मदारी को प्राणि- संरक्षण अधिनियम के विरुद्ध कार्य करने के लिये जेल भेज दिया जाये. बंधनमुक्त होते ही बंदर पेड पर जा बैठे और अपने मदारी साथी को जंजीरों से जकडा जाता देखते रहे. एक बंदर ने रुआंसा होते हुये अपने बंदर साथी से कहा"-हम मदारी के साथ थे तो कितने सुरक्षित थे. बेचारा वह खुद भूखा रहकर हमें खाने को तो देता था, अब हम कहाँ जायें,? जा भी कहाँ सकते हैं? शहर मे लोग ,हमें पत्थरों की मार के अलावा और क्या दे सकते हैं. शहर में रहे तो मुफ़्त में मारे जायेगे. फ़िर जंगल में भी तो नहीं जा सकते ,क्योंकि जंगल भी तो अब जंगल जैसे रहे नहीं. बोलते समय बंदर की आँखे डबडबा आयी थीं.

--
गोवर्धन यादव
103,कावेरी नगर,छिन्दवाडा (म.प्र.) 480001

3 blogger-facebook:

  1. 50ke dask ki bat hai kai graminh kahate the aise
    raj ki bajay angrejon ka raj achcha tha we rajaon ko bhagawan mante the wahi charcha ice laghu katha
    me varnithai uttam rachana

    उत्तर देंहटाएं
  2. गोवर्धन यादव9:49 am

    आपने मेरी लघुकथा पढी और आपने अपनी प्रतिक्रिया दी. धन्यवाद-यादव

    उत्तर देंहटाएं
  3. गोवर्धन यादव9:51 am

    आपने मेरी लघुकथा पढी और अपनी प्रतिक्रिया दी-हार्दिक धन्यवाद--यादव

    उत्तर देंहटाएं

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