दीपक कुमार पाठक की कविता - आबे-जमजम और आबे-गंगा

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लगता है आग बुझ गई है जहन से हमारे,

थोड़ी हवा तो दो शायद दबा शोला कोई दहक जाए।

आँख नम होती नहीं हैं, क्‍यों हमारी मौत पर,

कोशिश तो करो शायद जिन्‍दगी किसी की महक जाए।

तुम जो चाहो तो खिला दो फूल रेगिस्‍तान में,

और तुम जो चाहो तो नखलिस्‍तान, रेगिस्‍तान में बदल जाए।

घोसले तो कई बसे है, पेडों की शाखों पे गर,

आहिस्‍ता से थामना, सम्‍हालना, कहीं नीड़ न किसी का उजड़ जाए।

बागबाँ बन के तो देखो, इन उजड़े हुए मजारों के,

दाबा है, जर्रा-जर्रा, बूटा-बूटा इनका जो न चहक जाए।

कब तलक समुन्‍दर के किनारे, हम यूँ ही प्‍यासे रहेगें तमाम उम्र,

तबीयत से ठोकर लगा दो, चश्‍मा फूटे और प्‍यास हमारी मिट जाए।

ख्‍वाहिशों को मारना अब मुनासिब नहीं, ए-दोस्‍तों,

न जाने कब जिन्‍दगी मौत की बाहों में पिघल जाए।

आबे-जमजम और गंगा के पानी में फर्क करना मुश्‍किल है मगर,

कुछ ऐसा करों कि दोनों आबे-गंगा में बदल जाए।

मिटा दो काशी-काबा को कि खण्‍डहर भी न रहे, नामों-निशा भी न रहे,

आओं करें जतन ऐसा कि काबा-काशी की जगह इन्‍सानियत की पाठशालाएँ खुल जाए।

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डॉ० दीपक कुमार पाठक

सहा० प्राध्‍यापक-संस्‍कृत

संस्‍कृत विभागा

नेहरू महाविद्यालय, ललितपुर (उ०प्र०)

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com फतुहा , पटना की कलाकृति

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