गुरुवार, 5 जनवरी 2012

रतन चंद ‘रत्‍नेश' की लघुकथा - गोल्ड मेडल

क सरकारी दफ्‍तर में लिखित परीक्षा पास हुए उम्‍मीदवारों का इंटरव्‍यू चल रहा था।

इंटरव्‍यू बोर्ड के सदस्‍य ने एक उम्‍मीदवार से कहा--- ‘तुम्‍हारी क्‍वालिफिकेशन तो अपेक्षाकृत अच्‍छी है। फिर इस मामूली-सी क्‍लर्क की नौकरी में क्‍यों आना चाहते हो?'

सर, आजकल नौकरियां मिलती ही कहां हैं? अतः सरकारी नौकरी अगर मामूली भी मिल जाय तो उसे करने में हर्ज क्‍या है?' उम्‍मीदवार ने कहा।

‘तो तुम भी यही मानते हो कि सरकारी नौकरी में मजे हैं। काम का बोझ नहीं रहता। करो या न करो, यही न?' दूसरे सदस्‍य ने उसे कुरेदा।

‘नो सर, ऐसी बात नहीं है। ईमानदारी, समर्पण-भाव और कर्त्‍तव्‍यपारायणता से सरकारी नौकरी करने का अर्थ है, देष के विकास में अपना महत्‍तवपूर्ण योगदान देना।' कुछ रूककर उम्‍मीदवार ने आगे जोड़ा---‘सर मुझे यह नौकरी मिल गई तो पूरी ईमानदारी और सेवाभाव से अपना काम करूंगा। आप सबको मैं ऐसा विश्वास दिलाता हूं।'

इसी आधार पर उम्‍मीदवार चुन लिया गया।

लगभग दस साल बाद उसी उम्‍मीदवार जो अब बाकायदा एक सरकारी कर्मचारी था, को उसके अधिकारी ने अपने कक्ष में बुलाया और सख्‍ती से कहा, ‘तुम नौकरी बिल्‍कुल ठीक से नहीं करते। सुबह दफ्‍तर भी देर से आते हो और अक्‍सर अपनी सीट से गायब रहते हो। तुम्‍हारा कोई भी काम संतोषजनक नहीं है। इस लापरवाही और ड्‌‌यूटी में कोताही बरतने का कारण मैं जान सकता हूं?'

प्रत्‍युत्‍तर में सरकारी कर्मचारी ने कहा--- ‘सरकारी नौकरियां ऐसी ही चलती हैं सर। अधिक काम करने से हमें कौन-सा गोल्‍ड मेडल मिल जाएगा?'

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रतन चंद ‘रत्‍नेश', म0 नं0 1859, सेक्‍टर 7-सी, चंडीगढ़- 160 019

5 blogger-facebook:

  1. बहुत सटीक और सशक्त अभिव्यक्ति बधाई |

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  2. Sarkari Naukri Ka Such Bayan Karne ke liye Sadhuwad.....RKantBhardwaj

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  3. हाथी के दन्त खाने के और दिखाने के और

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  4. Dharmendra Tripathi6:16 pm

    Waqt waqt ki baat hai bhai.

    उत्तर देंहटाएं

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