शशांक मिश्र भारती की गणतंत्र-दिवस विशेष कविता

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फहराये चहुं ओर तिरंगा

आज देखूं यदि देश की हालत

तो आता है रोना,

पर सत्‍ता स्‍वार्थ की जोंकों का

देख रहा हूं सोना,

एक नहीं असंख्‍य ही देखो

विसंगतियां पड़ी हैं,

भ्रष्‍टाचार, महंगाई की

नित श्रृंखलाएं नयी खड़ी हैं,

चाहता हूं समय की धारा को

स्‍वपौरुष से जोड़ दूं,

उत्‍साहित कर सत्‍साहस को

शैय्‍यायें स्‍वार्थ की तोड़ दूं,

मैं रहूं या न रहूं इस जग में

पर बहे स्‍वतंत्रता की गंगा

उन्‍नत हो शिखर हिमालय का,

फहराये चहुंओर तिरंगा।

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सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-2424010प्र0 9410985048

ईमेल:-shashank.misra73@rediffmail.com

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2 टिप्पणियाँ "शशांक मिश्र भारती की गणतंत्र-दिवस विशेष कविता"

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ……रस्म निभाने को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें ।

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