सोमवार, 9 जनवरी 2012

एस. के. पाण्डेय (यसकेपी) के कुछ हास्य-व्यंग्य दोहे

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दोहे (२)

बटुक कैमरा ले चले तप हित गुर हरषाय ।

यसकेपी छाया मुदित सबको रहे दिखाय ।।

 

अंत समय सुर बोलिहैं जीवन दियो गवाँय ।

यसकेपी तब डांटिहैं तुमको नहीं लखाय ।।

 

यसकेपी मूरख नहीं हमरे हाँथ सबूत ।

पूजा जप तप बहु किये झूठ कहै को बूत ।।

 

जग रीझा तो क्या हुआ रीझे नहि जो राम ।

यसकेपी चुनने लगे राम दाम बिच दाम ।।

 

राम खोजने जग चला निज मन देखा नाहि ।

यसकेपी जो देखता नहि भरमत जग माहि ।।

 

यसकेपी मन मैल ले किये बहुत जप योग ।

दर-दर खोजा राम को बना न शुभ संयोग ।।

 

गंदा दर्पण हाथ ले देखे कछु न दिखाय ।

यसकेपी निर्मल करे छाया सहज लखाय ।।

 

मन दर्पण निर्मल नहीं जतन हुए बेकाम ।

यसकेपी नहि दीखते कण-कण में श्रीराम ।।

 

जीवन जीते लोग सब नहि जानै यह कोय ।

यसकेपी क्या उड़ चला लोग रहे सब रोय ।।

 

नहि देखा सो अब कहीं जो देखा सो पास ।

यसकेपी अब कुछ नहीं कहते लोग निरास ।।

 

यसकेपी खुद डूबते अचरज कहाँ समाय ।

औरन को हम काढिहैं कहते हाथ उपाय ।।

 

पपिहा पी-पी मत करे पी जारै बहु लोग ।

को सुनकर पीना चहै को चाहै संयोग ।।

 

यसकेपी कलिकाल में मति सबकी गै रूठ ।

ठूठें को समुझत हरा हरे पेड़ को ठूठ ।।

 

यसकेपी सो बात सुनि जो मनहूँ न समाय ।

मूरख बनि भागन लगे कहते कहाँ उपाय ।।

 

यसकेपी सुन लीजिए जो कहते सब लोग ।

करने के पहले मगर कीजिए मति प्रयोग ।।

 

बीस सवें दस दो नहीं परलय सकती आय ।

यसकेपी कहते सही लोग रहे घबराय ।।

 

यसकेपी जो चाहते डूब मरैं कहुँ जाय ।

परलय कहि काहे रहे लोगन झूठ सताय ।।

 

धरम सनातन बकत नहि साच कहत समुझाय ।

यसकेपी जाना चहै ग्रंथन डूब नहाय ।।

 

यसकेपी संसार की बिगडत दिन-दिन चाल ।

याते ही फिरते सही होके लोग बिहाल ।।

 

यसकेपी रघुपति चहै सब चतुराई छोड़ ।

चतुर चलैं संसार से करि जग से गठजोड़ ।।

 

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.) ।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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